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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#57
रिजवान ने अपनी उँगलियाँ सुमन की लेगिंग के कमरबंद पर रखीं। धीरे-धीरे, उसने उसे नीचे सरकाया — बहुत धीरे-धीरे।

लेगिंग का कपड़ा उसकी त्वचा पर रगड़ खा रहा था — उसकी जांघों पर, उसके घुटनों पर, उसकी पिंडलियों पर — जब तक कि वह पूरी तरह नीचे नहीं आ गई। सुमन की चूत अब बिल्कुल नंगी थी।
रिजवान ने एक पल के लिए रुक गया। उसने उसे देखा — पूरी तरह से। उसकी चूत — गीली, फूली हुई, लेबिया खुले हुए, अंदर का गुलाबी रंग मोमबत्ती की रोशनी में चमक रहा था। उसके पैर थोड़े खुले थे — बहुत खुले नहीं, बस इतने कि उसे देख सके।
"तुम्हारी चूत," उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक गहरी, खनकती हुई भूख थी। "मैंने उसे महसूस किया है। पर आज मैं उसे चखूँगा।"

रिजवान ने अपना सिर झुकाया। वह सुमन की चूत के ठीक ऊपर रुका — एक इंच दूर। उसकी साँसें उसकी चूत पर गर्म लहर की तरह गिर रही थीं।

"तुम्हारी गंध," उसने फुसफुसाया। "बहुत गहरी है। बहुत नम। राज ने कभी तुम्हारी चूत चूसी है?"

सुमन की आवाज़ में काँप थी। "नहीं... कभी नहीं..."

"तो आज पहली बार," रिजवान ने कहा। "मैं तुम्हारी पहली बार हूँ।"

उसने अपनी जीभ निकाली — धीरे-धीरे — और उसके सिरे से सुमन की चूत के ऊपरी होंठ को छुआ। हल्का स्पर्श। बिना दबाव के। बस एक नम, गर्म बिंदु — जो उसकी त्वचा पर टिका और फिर सरक गया।

सुमन की साँसें रुक गईं। उसका शरीर सख्त हो गया — फिर ढीला पड़ गया।

"अह्ह..."

रिजवान ने अपनी जीभ को और नीचे सरकाया — उसके भीतरी होंठों के किनारे पर। वहाँ उसका रस था — गीला, चमकता हुआ, मीठा। उसकी जीभ ने उसे चाटा।
"तुम्हारा स्वाद," उसने कहा — बिना अपना मुँह उठाए। "बहुत नरम है। बहुत गरम। मुझे यह चाहिए और।"

रिजवान ने अपनी जीभ को सुमन की चूत के अंदर धकेल दिया — पूरी जीभ, न कि सिर्फ नोक। उसकी जीभ अंदर गई — उसकी भीतरी दीवारों को छूती हुई, उसके रस में लिपटी हुई।

"अह्ह्ह्ह..." सुमन चीखी। उसके हाथ रिजवान के बालों में जा गिरे। उसने उसे अपनी चूत पर दबा लिया।

रिजवान की जीभ अंदर थी — वह उसे बाहर निकाल रहा था, फिर अंदर, बाहर, अंदर। उसकी जीभ की हरकतें धीमी और गहरी थीं — जैसे कोई घोंघा अपनी तरल लय में चल रहा हो। हर बार जब वह अंदर जाती, तो सुमन की चूत उसे चूस लेती। हर बार बाहर आती, तो उसके साथ सुमन का रस भी आता — उसके होंठों पर, उसकी ठुड्डी पर, उसकी जीभ पर।

उसने अपनी जीभ को अंदर ही अंदर घुमाना शुरू किया — गोल-गोल — जैसे वह उसकी चूत की भीतरी परतों को चाट रहा हो। सुमन की चूत उसकी जीभ पर चटक रही थी — उसे अंदर खींच रही थी, उसे बाहर निकालना नहीं चाहती थी।
"अह्ह्ह... रिजवान... रुक मत... बहुत अच्छा लग रहा है..." सुमन के शब्द टूट रहे थे, उसके साथ उसकी साँसें भी।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - Yesterday, 12:09 AM



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