Thread Rating:
  • 2 Vote(s) - 3 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#56
रिजवान ने अब सुमन की कुर्ती के बटन खोलना शुरू किए। पहला बटन। दूसरा बटन। तीसरा।

प्रत्येक बटन के साथ, उसके होंठ उसके शरीर पर और नीचे उतर रहे थे। पहले बटन खोलने पर — उसके कंधे। दूसरे पर — उसके कॉलरबोन। तीसरे पर — उसके स्तनों का ऊपरी हिस्सा, उभरता हुआ, मोमबत्ती की रोशनी में चमकता हुआ।
रिजवान ने अपनी उँगलियाँ उसके स्तनों के ऊपर रखीं — बिना दबाए, बस छूकर। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं। उन्होंने सुमन की त्वचा पर हल्के-हल्के घेरे बनाए।
"तुम्हारी चूचियाँ," उसने कहा। "बहुत बड़ी हैं। बहुत भारी। राज कैसे पकड़ता है उन्हें?"
सुमन के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। बस एक कराह — जो रुकी हुई थी, दबी हुई।
रिजवान ने अपना मुँह उसके बाएँ स्तन पर रखा। उसके होंठ उसके निप्पल के चारों तरफ थे — पर उन्होंने छुआ नहीं। बस हवा। गर्म हवा।
"क्या राज तुम्हारे निप्पल को चूसता है?" उसने पूछा। उसकी साँसें सुमन के निप्पल पर गर्म लहर की तरह गिर रही थीं।
"हाँ..." सुमन ने कहा। "पर..." उसकी आवाज़ रुक गई।
"पर?"
"पर उतना नहीं जितना तुम कर रहे हो।"
रिजवान की साँसें और भारी हो गईं। उसने अपना मुँह खोला। उसने सुमन के निप्पल को अंदर ले लिया — पूरा। उसकी जीभ उसके चारों तरफ लिपट गई।
"अह्ह्ह..." सुमन ने अपना सिर पीछे झुका लिया। उसकी पीठ सोफे से ऊपर उठ गई। उसके हाथ रिजवान के बालों में चले गए।
रिजवान ने उसे चूसा। धीरे-धीरे। गहरा। उसका मुँह उसके निप्पल पर था — उसकी जीभ उसे घुमा रही थी, उसके दाँत हल्के से उसे दबा रहे थे, उसके होंठ उसे खींच रहे थे। उसने चूसा — जोर से — दूध पी रहा हो जैसे।
सुमन की साँसें फट गईं। "अह्ह्ह... बहुत... बहुत अच्छा..."
फिर उसने दूसरा निप्पल पकड़ा। इस बार उसने उसे और जोर से चूसा। उसकी जीभ उसे काट रही थी — उसके दाँत उसे दबा रहे थे। सुमन चीखी — एक दबी हुई, रुकी हुई चीख।
"अह्ह्ह... रुको मत... रुको मत..."

रिजवान ने अब सुमन की कुर्ती पूरी तरह उतार दी। वह नंगी थी — सिर्फ एक पतली सी लेगिंग के साथ। उसका शरीर मोमबत्ती की रोशनी में सुनहरा दिख रहा था।

रिजवान ने अपनी उँगलियाँ सुमन की नाभि पर रखीं। धीरे-धीरे, उसने उन्हें नीचे सरकाया — उसके पेट पर, उसके नाभि के ठीक नीचे। उसकी त्वचा वहाँ मुलायम थी — इतनी मुलायम कि उसकी उँगलियाँ डूब रही थीं।

"तुम्हारा पेट," उसने कहा। "बहुत मुलायम है। राज कभी तुम्हारे पेट को चूमता है?"
"कभी-कभार..." सुमन ने कहा। पर उसकी आवाज़ में अब कोई शक नहीं था — बस एक अलग तरह की नमी थी।
रिजवान ने अपना सिर नीचे किया। उसने उसके पेट को चूमा — एक लंबा, गीला चुंबन। उसकी जीभ उसकी त्वचा पर एक रास्ता बना रही थी — नाभि से जांघों की तरफ।
सुमन का शरीर काँप गया। उसकी साँसें तेज़ थीं।

"रिजवान..." उसने फुसफुसाया। "क्या कर रहे हो?"
"मैं तुम्हें जान रहा हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब उसके पेट के पास से आ रही थी। "हर इंच। हर त्वचा का कण।"
Like Reply


Messages In This Thread
RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - Yesterday, 12:08 AM



Users browsing this thread: 6 Guest(s)