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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#55
रिजवान के घर का वह कमरा। अंधेरा था। सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी — कोने में। उसकी लौ हिल रही थी, दीवारों पर परछाइयाँ बना रही थी।
सुमन सोफे पर लेटी हुई थी। उसकी साँसें भारी थीं। उसका दिल धड़क रहा था — इतना तेज़ कि उसे अपनी गर्दन में उसकी धड़कन महसूस हो रही थी।
रिजवान उसके बगल में बैठा था। उसने अभी तक उसे छुआ नहीं था। बस देख रहा था। उसकी आँखें सुमन के शरीर पर घूम रही थीं — उसके चेहरे से, उसकी गर्दन से, उसके स्तनों से, उसकी जांघों से, और फिर वापस उसकी आँखों पर।
"तुम बहुत सुंदर हो," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी। कोई भूख नहीं थी। बस एक गहरी, धीमी प्रशंसा थी।
सुमन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने खुद को उसके हाथों में छोड़ दिया था — अब वह नहीं लड़ रही थी। न सोच रही थी। बस महसूस कर रही थी।
रिजवान का हाथ उसके बालों पर आया। उसने उन्हें सहलाया — धीरे-धीरे, उँगलियों से। उसके सिर की त्वचा पर हल्का दबाव। सुमन ने आह भरी — एक लंबी, रुकी हुई साँस।
"तुम्हारे बाल," उसने कहा। "मुलायम हैं। रेशम की तरह। राज कभी तुम्हारे बालों को ऐसे सहलाता है?"
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें बंद थीं। उसके होंठ थोड़े खुले थे।
रिजवान ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। उँगलियाँ उसकी कुर्ती के कपड़े पर। उसने धीरे से उसे नीचे सरकाया — बिना खोले, बस इतना कि उसका कंधा निकल आए। उसके कंधे की त्वचा — गोरी, चिकनी, गर्म — मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी।
रिजवान ने अपना सिर झुकाया। उसके होंठ उसके कंधे को छूने को आए। पर छुआ नहीं। उसकी साँसें उसकी त्वचा पर गर्म हवा छोड़ रही थीं।
"तुम्हारी गंध," उसने फुसफुसाया। "फूलों की तरह। और कुछ और... कुछ ऐसा जो मुझे पागल कर रहा है।"
सुमन ने अपना सिर थोड़ा झुका लिया — जैसे वह उसे अपनी गर्दन और दे दे रही हो।

रिजवान के होंठ अब उसकी गर्दन पर थे। हल्के से। बिना दबाव के। बस त्वचा पर होंठों का स्पर्श। गरम। कोमल।
"तुम्हारी गर्दन," उसने कहा, उसके होंठ अब भी उसकी त्वचा पर थे। "इतनी पतली। इतनी नाजुक। और इतनी गर्म। राज कभी तुम्हारी गर्दन को चूमता है?"
"हाँ..." सुमन फुसफुसाई। पर उसकी आवाज़ में पूरा यकीन नहीं था।
रिजवान ने उसकी गर्दन को चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे। उसके होंठ उसकी त्वचा पर सरक रहे थे। उसकी जीभ ने एक छोटा सा घेरा बनाया — गोल-गोल — उसकी गर्दन की नस पर।
सुमन की नस धड़क रही थी। रिजवान ने उसे महसूस किया। उसकी जीभ ने उसे और गहरा दबाया। उसके होंठों ने चूसा — एक छोटा सा, लाल निशान बनाने के लिए।
"अह्ह..." सुमन के मुँह से निकल गया।
"यह निशान," रिजवान ने कहा। "यह तुम्हें राज की याद दिलाएगा। पर राज ने यह नहीं बनाया है। मैंने बनाया है।"
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - Yesterday, 12:06 AM



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