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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#54
"तुम... यह क्या चक्कर है?" सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, डर था, और हैरानी थी।
रिजवान मुस्कुराया। वह मुस्कान — वही जो दुकान में होती थी। पर अब कुछ और थी। गंदी। खतरनाक।
"तुम्हारे पति," रिजवान ने कहा। "राज। बहुत अच्छे आदमी हैं। पर एक बात... वह तुम्हें नहीं बताते।"
"क्या बात?"
रिजवान ने लिफाफा खोला। उसमें से कुछ फोटो निकालीं। सुमन के हाथ में थमा दीं।
फोटो में राज था। एक क्लब में। एक लड़की के साथ। लड़की राज की गोद में बैठी थी। राज का हाथ उसकी कमर पर था। और लड़की — उसकी शक्ल... सुमन की तरह थी। वही बाल। वही शरीर। वही मुस्कान।
"यह तुम्हारी छोटी बहन है," रिजवान ने कहा। "नीशा।"
सुमन के हाथ से फोटो गिर गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
"नीशा... राज के साथ? कब? क्यों?"
"पिछले दो महीने से," रिजवान ने कहा। "तुम्हारी नीशा राज से मिलती है। हर हफ्ते। तुम्हारे घर में। जब तुम बाजार जाती हो। या नहाती हो। या सोती हो।"
"झूठ," सुमन फुसफुसाई। पर उसकी आवाज़ में यकीन नहीं था।
"तुम्हारे घर की चाबी," रिजवान ने कहा। "तुम्हारी नीशा के पास है। राज ने दी।"

सुमन ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। वह रोना चाहती थी। पर आँसू नहीं आ रहे थे। उसकी आँखें सूखी थीं। उसकी चूत — जो कल तक इतनी गीली थी — वह भी सूख चुकी थी। जैसे कोई आग लगा दी गई हो। अंदर की आग नहीं — बाहर की। जलाने वाली।

उसने सोचा — तो मैं जब रिजवान के लंड पर अपनी गांड रगड़ रही थी, उसी समय कहीं राज नीशा के स्तन चूस रहा था? जब मैं इमरान की उँगलियाँ अपनी चूत में ले रही थी, राज नीशा की चूत में अपना लंड डाल रहा था?

उसका पेट मरोड़ने लगा। उसे उल्टी आने लगी। वह उठी। पेड़ के पास गई। उल्टी नहीं आई। बस सूखी उल्टी।

रिजवान उसके पास आया। उसने सुमन की पीठ पर हाथ रखा। धीरे से।

"मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें ऐसे पता चले," उसने कहा। "पर मैं तुम्हें तकलीफ देख नहीं सकता था। तुम जो कर रही थी वह सब... वह सब राज की कमी थी। मैं समझता हूँ।"

सुमन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था। गुस्सा नहीं था। बस एक खालीपन था। और उस खालीपन में — एक अजीब सी राहत।

"क्या मैं तुम्हारे घर चल सकती हूँ?" रिजवान ने पूछा। "तुम अकेली नहीं रह सकती।"
सुमन ने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।

रिजवान का घर छोटा था। अकेले का। अफीम और लार्ड की बू आ रही थी। सुमन को बैठाया। पानी दिया। उसने पानी पिया। फिर रिजवान ने शराब दी। उसने दो घूँट पिए। फिर पूरा गिलास। फिर दूसरा।

उसकी आँखें लाल हो गईं। उसके गाल गुलाबी। उसके हाथ काँप रहे थे। पर उसकी चूत... वह फिर से गीली होने लगी थी।

क्यों? क्योंकि वह गुस्से में थी। और उस गुस्से को वह सिर्फ एक तरीके से निकाल सकती थी।

"रिजवान," उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक अलग आग थी। "मुझे चोदोगे?"

रिजवान की साँसें रुक गईं। उसने सोचा था — शायद वह रोएगी। चिल्लाएगी। घर जाएगी। पर यह... उसने यह नहीं सोचा था।

"तुम अभी ठीक नहीं हो..." उसने कहा।

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ," सुमन ने कहा। उसने अपनी कुर्ती निकाल दी। अपनी जींस खोल दी। अपनी ब्रा — नहीं थी। अपने स्तन बाहर आ गए। बड़े। भारी। निप्पल पहले से ही कड़े।
"राज मुझे धोखा दे रहा है," वह बोली। "तो मैं भी उसे धोखा दूँगी। पर सिर्फ एक बार नहीं — हर उस तरीके से जो तुम सोच सकते हो। और तुम — तुम पहले हो।"
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 18-06-2026, 11:57 PM



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