18-06-2026, 11:47 PM
सुमन ने सोचा — मैं क्या कर रही हूँ? क्यों कर रही हूँ? राज से प्यार है। बहुत है। पर फिर भी... मैं क्यों?
वह उठी। फ्रिज से पानी लिया। तभी उसकी नज़र अपने फोन पर पड़ी। फोन पर एक नोटिफिकेशन था। एक मैसेज। नंबर नहीं था। नाम नहीं था। सिर्फ लिखा था —
"मैडम। कल मिलना ज़रूरी है। बहुत ज़रूरी।"
सुमन ने उस नंबर को पहचानने की कोशिश की। नहीं पहचाना। संदीप नहीं था। रिजवान नहीं था। इमरान तो कभी फोन नहीं करता था।
उसने रिप्लाई किया — "कौन?"
जवाब आया — "मैं। वह जो हमेशा देख रहा था।"
सुमन की रूह काँप गई। उसने फोन रख दिया। फिर उठाया। फिर रख दिया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा — डर से? उत्तेजना से? दोनों से शायद।
तीसरा मैसेज आया — "पार्क। कल सुबह 9 बजे। अकेले। बताना नहीं किसी को। राज को भी नहीं।"
सुमन ने पूछा — "क्यों?"
जवाब — "तुम्हारे पति की कुछ बातें हैं मेरे पास। तुम नहीं जानती हो। वह भी नहीं जानता कि मैं जानता हूँ।"
पूरी रात सुमन ने आँख नहीं मारी। वह राज के बारे में सोचती रही।
राज क्या छुपा रहा है? क्या वह भी... कहीं जाता है? किसी और के पास? कोई औरत? कोई आदमी? क्या वह मुझसे झूठ बोल रहा है?
या फिर यह कोई जाल है? कोई जो मुझे फँसाना चाहता है? रिजवान? इमरान?
पर उन्होंने क्यों? वे तो पहले ही मुझे छू चुके हैं। उन्हें क्या चाहिए?
और अगर यह सच है — अगर राज सच में कुछ छुपा रहा है — तो मैं क्या करूँगी?
वह उठी। फिर से नहाई। इस बार ठंडे पानी से। पर उसकी चूत की आग नहीं बुझी। और उसके दिमाग की आग तो और भी तेज़ थी।
सुमन पहुँची। उसने साधारण कपड़े पहने थे — जींस, कुर्ती, बाल बाँधे। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके हाथ काँप रहे थे।
पार्क खाली था। इक्का-दुक्का लोग। एक बूढ़ा। एक औरत। दो बच्चे।
फिर उसने उसे देखा।
एक आदमी। पीछे की बेंच पर बैठा था। काला चश्मा। टोपी। हाथ में एक लिफाफा। वह सीधे सुमन को देख रहा था।
उसने सुमन को इशारा किया — आओ।
सुमन उसके पास गई। उसके पैर भारी थे। वह बैठ गई। बेंच पर। उससे दो फुट दूर।
"तुम हो कौन?" सुमन ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
उस आदमी ने चश्मा उतारा। टोपी उतारी।
सुमन की आँखें फटी रह गईं।
वह रिजवान था।
वह उठी। फ्रिज से पानी लिया। तभी उसकी नज़र अपने फोन पर पड़ी। फोन पर एक नोटिफिकेशन था। एक मैसेज। नंबर नहीं था। नाम नहीं था। सिर्फ लिखा था —
"मैडम। कल मिलना ज़रूरी है। बहुत ज़रूरी।"
सुमन ने उस नंबर को पहचानने की कोशिश की। नहीं पहचाना। संदीप नहीं था। रिजवान नहीं था। इमरान तो कभी फोन नहीं करता था।
उसने रिप्लाई किया — "कौन?"
जवाब आया — "मैं। वह जो हमेशा देख रहा था।"
सुमन की रूह काँप गई। उसने फोन रख दिया। फिर उठाया। फिर रख दिया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा — डर से? उत्तेजना से? दोनों से शायद।
तीसरा मैसेज आया — "पार्क। कल सुबह 9 बजे। अकेले। बताना नहीं किसी को। राज को भी नहीं।"
सुमन ने पूछा — "क्यों?"
जवाब — "तुम्हारे पति की कुछ बातें हैं मेरे पास। तुम नहीं जानती हो। वह भी नहीं जानता कि मैं जानता हूँ।"
पूरी रात सुमन ने आँख नहीं मारी। वह राज के बारे में सोचती रही।
राज क्या छुपा रहा है? क्या वह भी... कहीं जाता है? किसी और के पास? कोई औरत? कोई आदमी? क्या वह मुझसे झूठ बोल रहा है?
या फिर यह कोई जाल है? कोई जो मुझे फँसाना चाहता है? रिजवान? इमरान?
पर उन्होंने क्यों? वे तो पहले ही मुझे छू चुके हैं। उन्हें क्या चाहिए?
और अगर यह सच है — अगर राज सच में कुछ छुपा रहा है — तो मैं क्या करूँगी?
वह उठी। फिर से नहाई। इस बार ठंडे पानी से। पर उसकी चूत की आग नहीं बुझी। और उसके दिमाग की आग तो और भी तेज़ थी।
सुमन पहुँची। उसने साधारण कपड़े पहने थे — जींस, कुर्ती, बाल बाँधे। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके हाथ काँप रहे थे।
पार्क खाली था। इक्का-दुक्का लोग। एक बूढ़ा। एक औरत। दो बच्चे।
फिर उसने उसे देखा।
एक आदमी। पीछे की बेंच पर बैठा था। काला चश्मा। टोपी। हाथ में एक लिफाफा। वह सीधे सुमन को देख रहा था।
उसने सुमन को इशारा किया — आओ।
सुमन उसके पास गई। उसके पैर भारी थे। वह बैठ गई। बेंच पर। उससे दो फुट दूर।
"तुम हो कौन?" सुमन ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
उस आदमी ने चश्मा उतारा। टोपी उतारी।
सुमन की आँखें फटी रह गईं।
वह रिजवान था।


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