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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#52
सुबह के 10 बज रहे थे। सूरज पहले से ही तेज़ था। सुमन बिस्तर पर पड़ी थी। आँखें खुली थीं। पर वह कहीं और थी।
पिछली रात उसने सोचा था — कल दर्ज़ी की दुकान जाना है। इमरान ने कहा था — तीन दिन में आना। तो आऊँगी।
पर आज सुबह — जब उसकी आँखें खुलीं — तो उसके दिमाग में कुछ और ही था।
वह उठी। फ्रिज से पानी पिया। अपना चेहरा देखा — आईने में। उसके चेहरे पर थकान थी। कल रात की बेचैनी। रिजवान का वह मैसेज — "कल मिलना ज़रूरी है।" राज की वो तस्वीरें — जो अब भी उसके दिमाग में घूम रही थीं। और नीशा — उसकी अपनी बहन — राज की गोद में।
उसने सोचा — क्या मैं सच में आज इमरान के पास जाऊँगी? उसके सामने झुकूँगी? अपनी गांड और चूत दिखाऊँगी? उसकी उँगलियाँ अपने अंदर लेने दूँगी?
पर क्यों?
क्योंकि राज मुझे धोखा दे रहा है? तो क्या मैं भी उसे धोखा दूँ?
लेकिन वह धोखा — क्या वह मुझे शांति देगा? क्या मेरी चूत में इमरान का लंड जाने से मेरा दर्द कम होगा?
उसने गहरी साँस ली। अपनी आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।
"नहीं," उसने खुद से कहा। "आज नहीं। आज मैं घर पर रहूँगी। सोचूँगी। समझूँगी। क्या करना है।"

सुमन ने चाय बनाई। गरम। तेज़। उसने पिया। पर उसका स्वाद नहीं आया।

वह सोफे पर बैठी। टीवी चालू किया। कोई धारावाहिक चल रहा था — औरतें रो रही थीं, पति झूठ बोल रहे थे, ससुराल वाले झगड़ रहे थे। सुमन ने बंद कर दिया।

वह उठी। बालकनी में गई। बाहर देखा। बाजार की भीड़ दूर से दिख रही थी। उसी रास्ते पर लोग जा रहे थे — जिस रास्ते से वह दर्ज़ी की दुकान तक जाती थी।

उसने सोचा — वहाँ रिजवान होगा। इमरान होगा। वे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। सोच रहे होंगे — आएगी कि नहीं?

उसके शरीर में एक झटका सा लगा। उसकी चूत में गीलापन आ गया — सिर्फ सोच से। उसने अपनी जांघों को दबाया।

"नहीं," वह फिर बोली। "आज नहीं।"

वह वापस अंदर आ गई। किताब निकाली — जो बहुत पुरानी थी, जिसे उसने कभी खत्म नहीं किया था। उसने पढ़ने की कोशिश की। तीन पन्ने। फिर वही शब्द आँखों के सामने घूमने लगे। उसे समझ नहीं आ रहा था क्या लिखा है।

उसने किताब रख दी।

वह बेडरूम में गई। बिस्तर पर लेट गई। राज के तकिए को गले लगाया। उसकी महक अब लगभग खत्म हो चुकी थी। बस एक धुंधली सी बू — उसकी याद।

"राज..." वह फुसफुसाई। "तुम कहाँ हो? क्या कर रहे हो? क्या सच में... नीशा के साथ हो?"
उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने रोया। चुपचाप। तकिए में मुँह छुपाकर।

उसी समय — दर्ज़ी की दुकान पर।

रिजवान दुकान के बाहर खड़ा था। उसकी आँखें गली की तरफ थीं। उसके हाथ जेब में थे। उसके पैर बेचैन थे।

इमरान अंदर से बोला — "आई क्या?"

"नहीं," रिजवान ने कहा। "अभी नहीं।"

"आएगी?"

रिजवान ने अपनी घड़ी देखी। 11 बज गए थे।

"पता नहीं," उसने कहा। "पर मुझे लगता है — नहीं आएगी।"

"क्यों?"

रिजवान अंदर आ गया। उसने एक कुर्सी खींची। बैठ गया।

"क्योंकि उसे किसी ने बताया है," उसने कहा। "राज के बारे में।"

इमरान की आँखें फटी रह गईं। "तूने बताया?"

"मैंने नहीं," रिजवान ने कहा। "पर कोई और बता सकता है। कोई जो राज से जलता है। कोई जो सुमन को चाहता है।"

"कौन?"
रिजवान ने सिगरेट जलाई। धुआँ छोड़ा। आँखें सिकोड़ीं।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 18-06-2026, 11:43 PM



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