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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#49
राज को आए चार दिन हो चुके थे। चार दिन। चार रातें। चार बार वह अपनी उँगलियों से खुद को संतुष्ट कर चुकी थी। पर हर बार के बाद खालीपन और बढ़ जाता था।

आज सुबह वह उठी तो उसकी चूत पहले से ही नम थी। उसके स्तन भारी थे। उसके निप्पल कड़ेबिना किसी वजह के। बस सोच से। राज के लंड की सोच से। उन हाथों की सोच से जो उसे क्लब में छू चुके थे। उन उँगलियों की सोच से जो दर्ज़ी की दुकान पर उसकी चूत के अंदर थीं।
वह बिस्तर पर करवट बदल कर लेट गई। उसके स्तन बाजू में दब गए। उसकी गांड हवा में निकल आई। उसने अपनी जांघों को आपस में रगड़ा। चूत गीली थीउसकी जांघों पर लसलसा पानी लग गया।
उसने अपना फोन उठाया।
सुबह का पोर्नपहली बार
उसने टेलीग्राम खोला। उसे एक लिंक मिला। वह क्लिक किया। एक पोर्न वीडियो चलने लगा।
एक औरत घुटनों पर थी। उसके मुँह में दो लंड थे। वह उन्हें बारी-बारी से चूस रही थी। उसकी लार ठुड्डी से टपक रही थी। उसकी आँखों में पानी था। पर वह रुक नहीं रही थी। वह और तेज़ चूस रही थी। जैसे उसे जिंदगी भर की भूख हो।
सुमन की साँसें तेज़ हो गईं। उसके निप्पल पत्थर हो गए। उसकी चूतवह सिहर उठी। पानी निकलने लगा।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। एक उँगली। धीरे से। बाहर से घुमाई। गोल-गोल। अपने लैबिया पर। वह सूजे हुए थे। गीले। गरम।
वीडियो में दूसरा शॉट। अब वह औरत पीछे से चोदी जा रही थी। उसके स्तन लटक रहे थे। हिल रहे थे। उसके मुँह से सिर्फ एक ही आवाज़ रही थी — "हाँ... चोदो... और... और..."
सुमन ने अपनी उँगली अपनी चूत के अंदर डाल दी। सिर्फ एक। फिर दूसरी।
दो उँगलियाँ। उसकी चूत ने उन्हें चूस लिया।
"आह्ह्ह..." वह कराही। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। अब वह वीडियो नहीं देख रही थी। वह उस औरत की जगह खुद को देख रही थी। दो लंड। उसके मुँह में। उसकी चूत में।
उसने अपनी उँगलियाँ तेज़ी से अंदर-बाहर करनी शुरू कर दीं। उसकी चूत चटक रही थी। चूचीवह अपने बाएँ हाथ से अपनी बाईं चूची दबा रही थी। निप्पल को मरोड़ रही थी।
"हाँ... राज... चोद मुझे... तेरा लंड चाहिए... बहुत दिन हो गए..."
वह फटने वाली थी। उसकी चूत उसकी उँगलियों को दबा रही थी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
और तभीवीडियो में वह औरत चीखी। जोर से। सुमन भी चीखी। उसकी चूत ने उसकी उँगलियों को बाहर निकाल दिया। पानी की एक लहर बिस्तर पर गिरी। चादर गीली हो गई। उसकी जाँघें गीली थीं। उसके हाथ गीले थे। बिस्तर पर उसके रस का एक बड़ा सा धब्बा।
वह थक कर लेट गई। साँसें तेज़। आँखें खुली। छत की तरफ देख रही थी।
"पागल हो गई हूँ मैं," वह फुसफुसाई।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 18-06-2026, 11:32 PM



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