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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#46
सुमन की लेगिंग काली थी। साधारण। पर उसके शरीर पर वह साधारण नहीं रह गई थी। वह उसकी गांड के हर गोलाई को, हर उभार को, हर दरार को दिखा रही थी। लेगिंग का कपड़ा उसकी चूत के आकार में बिल्कुल फिट था। और अब, वहाँ, बीच मेंएक गीला पैच। छोटा नहीं। अंडाकार। गहरा। पानी का। गर्मी का। उसकी चूत का रस लेगिंग के दूसरी तरफ चुका था।

रिजवान ने उसे देखा। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी पैंट के अंदर हाथ डालाबिना किसी शर्म केअपने लंड को ऊपर की तरफ कर दिया। वह बाहर निकलने को था। उसकी पैंट में तम्बू अब साफ दिख रहा था। उस लंड की नोक सुमन की गांड की दरार के ठीक पीछे थी। बस एक कपड़े का फर्क था।
उसने अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे। जैसे कोई गाना सुन रही हो। दाएँ-बाएँ। आगे-पीछे। उसकी गांड उसी ताल पर हिल रही थी। रिजवान की तरफ। उसके लंड की तरफ।
रिजवान की आँखें बंद हो गईं। एक सेकंड के लिए। फिर खुल गईं। उसके होंठ सूख गए थे। उसने अपना लंड पकड़ रखा थापैंट के ऊपर से ही। वह उसे दबा रहा था। रगड़ रहा था। उसकी लार टपकने लगी थी।
"कपड़े तो देख लीजिए मैडम," इमरान ने कहा, पर उसकी आवाज़ में दम नहीं था। वह टूट रहा था।
"हाँ," सुमन बोली। उसने एक हाथ बढ़ाया। कपड़े को छुआ। रेशम। मुलायम। उसकी उँगलियाँ कपड़े पर फिर रही थीं, पर उसके निप्पल काउंटर के किनारे से रगड़ खा रहे थे। उसने आह भरी। छोटी सी। इतनी छोटी कि सुनना मुश्किल था। पर रिजवान ने सुन लिया। इमरान ने भी।
रिजवान अब स्थिर नहीं रह सकता था। उसने एक कदम और बढ़ाया। उसकी कमर सुमन की गांड से लग गई। सीधे। बिना किसी हिचक के। उसका लंडकपड़े के अंदर ही सहीउसकी गांड की दरार में समा गया। वह दब गया। गर्मी ने उसे झुलसा दिया।
सुमन की साँसें रुक गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका मुँह थोड़ा खुल गया। वह चुप थी। पर उसके शरीर ने जवाब दे दिया। वह और नीचे झुक गई। उसने अपनी गांड और पीछे धकेल दी। अब उसका गांड उसके लंड पर पूरी तरह बैठ गया था। लेगिंग के कपड़े के उस पारवह महसूस कर सकती थी उसकी सख्ती। उसकी गर्मी। उसका आकार।
"ये कलर... आप पर बहुत सेक्सी लगेगा मैडम," रिजवान ने कहा। उसकी आवाज़ में काँप थी। उसने अपने कूल्हे और आगे बढ़ाए। अपने लंड को और अंदर धकेला। उसकी जांघें सुमन की जांघों से चिपक गईं।
सुमन के मुँह से एक छोटी सी "आह" निकली। बस इतनी सी। पर काफी थी।
इमरान वहाँ खड़ा था। उसके हाथ काउंटर पर थे। उसकी उँगलियाँ लकड़ी में गड़ रही थीं। उसके लंड ने उसकी पैंट को पूरी तरह ऊपर उठा दिया था। वह इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। वह सुमन के चेहरे को देख रहा थाआँखें बंद, होंठ खुले, सिर पीछे झुका। और फिर नीचेउसका क्लीवेज। इतना करीब कि वह उसकी चूचियों की नसें देख सकता था। उनका भार। उनकी गर्मी।
इमरान ने अपनी पैंट के ऊपर से अपने लंड को दबाया। जोर से। उसने आह भरी। और फिरउसने अपनी उँगली बढ़ाई। सुमन के निप्पल की तरफ। बस एक इंच रह गया था छूने को।
"कपड़ा मत छुओ मैडम," उसने कहा, बहाना बनाकर। "उससे दाग लग जाता है। मैं दिखाता हूँ।"
उसने अपनी उँगली कपड़े पर रखी। पर वह कपड़ा सुमन के निप्पल के ठीक ऊपर था। उसकी उँगली दब गई। सुमन का निप्पल उसकी उँगली के नीचे कड़ा हो गया।
सुमन की साँसें फट गईं। "आह..."
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 18-06-2026, 10:20 PM



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