18-06-2026, 10:15 PM
वही दुकान। वही लकड़ी का काउंटर। वही कपड़ों का ढेर। और वही इमरान — मोटा, भारी हाथों वाला, काली मूंछों वाला, चुप रहने वाला शिकारी।
उसने सुमन को देखा। खुले मुँह। आँखें उसके सिर से पैर तक उतर गईं। फिर ऊपर चढ़ गईं। उसके निप्पल पर रुकीं। फिर उसकी कमर पर। फिर उसकी लेगिंग के उस गीले पैच पर।
उसने मुँह बंद किया। थूक निगला। और बोला — "लाइए मैडम, क्या सिलवाना है?"
सुमन ने कहा — "मुझे कुछ ब्लाउज और सूट सिलवाने हैं। रिजवान तुम्हारी दुकान पर ले आया।"
इमरान ने रिजवान की तरफ देखा। रिजवान ने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया। फिर इमरान बोला — "हाँ-हाँ, मैडम। बिल्कुल। पहले कपड़े पसंद कर लो। फिर... लूँगा। फिर लूँगा आपका नाप।"
सुमन ने जान-बूझकर पूछा — "क्या मतलब, इमरान जी?"
इमरान सकपका गया। "मतलब... नाप लूँगा। मैडम। नाप।"
सुमन मुस्कुराई। अपनी जीत पर। उसने कहा — "अच्छा। कपड़े दिखाओ।"
सुमन काउंटर के सामने खड़ी थी। एक पल के लिए सब कुछ रुक गया था — दुकान की धूल भरी हवा, बाहर गली का शोर, पंखे की धीमी आवाज़। सिर्फ तीन साँसें चल रही थीं। उसकी। रिजवान की। इमरान की।
इमरान ने कपड़े बिछाए। रेशमी साड़ियाँ। सूती सूट। पर उसकी आँखें कपड़ों पर नहीं, सुमन के शरीर पर थीं। उसकी नज़रें उसकी गर्दन से उतरती हुई उसके क्लीवेज तक पहुँचीं, और वहीं अटक गईं।
सुमन ने वही किया जो वह अब अच्छे से जानती थी। उसने अपने दोनों हाथ काउंटर पर रखे। धीरे से। जैसे थक गई हो। जैसे कोई आराम कर रही हो। पर उसकी कोहनियाँ काउंटर पर टिकीं, उसकी पीठ झुकी, उसकी गांड पीछे को निकल आई।
उसकी कमीज — वह छोटी, हल्के रंग की, बिना ब्रा वाली कमीज — आगे की तरफ लटक गई। दोनों स्तन झूल गए। उनके बीच की दरार गहरी और काली दिख रही थी। उसके निप्पल कड़े थे। कपड़े के नीचे से वे बाहर झाँक रहे थे। वह जानती थी।
इमरान के मुँह से हवा निकली। एक सीटी नहीं, बल्कि एक लंबी, भारी साँस। उसकी पैंट के अंदर हलचल हुई। उसने अपने कूल्हे आगे किए। जैसे वह अपने लंड को और जगह देना चाहता हो।
रिजवान पीछे था। बिल्कुल पीछे। उसने दो कदम और बढ़ा लिए। अब वह सुमन से बस एक इंच दूर था। उसकी आँखें उसकी गांड पर जमी थीं।
उसने सुमन को देखा। खुले मुँह। आँखें उसके सिर से पैर तक उतर गईं। फिर ऊपर चढ़ गईं। उसके निप्पल पर रुकीं। फिर उसकी कमर पर। फिर उसकी लेगिंग के उस गीले पैच पर।
उसने मुँह बंद किया। थूक निगला। और बोला — "लाइए मैडम, क्या सिलवाना है?"
सुमन ने कहा — "मुझे कुछ ब्लाउज और सूट सिलवाने हैं। रिजवान तुम्हारी दुकान पर ले आया।"
इमरान ने रिजवान की तरफ देखा। रिजवान ने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया। फिर इमरान बोला — "हाँ-हाँ, मैडम। बिल्कुल। पहले कपड़े पसंद कर लो। फिर... लूँगा। फिर लूँगा आपका नाप।"
सुमन ने जान-बूझकर पूछा — "क्या मतलब, इमरान जी?"
इमरान सकपका गया। "मतलब... नाप लूँगा। मैडम। नाप।"
सुमन मुस्कुराई। अपनी जीत पर। उसने कहा — "अच्छा। कपड़े दिखाओ।"
सुमन काउंटर के सामने खड़ी थी। एक पल के लिए सब कुछ रुक गया था — दुकान की धूल भरी हवा, बाहर गली का शोर, पंखे की धीमी आवाज़। सिर्फ तीन साँसें चल रही थीं। उसकी। रिजवान की। इमरान की।
इमरान ने कपड़े बिछाए। रेशमी साड़ियाँ। सूती सूट। पर उसकी आँखें कपड़ों पर नहीं, सुमन के शरीर पर थीं। उसकी नज़रें उसकी गर्दन से उतरती हुई उसके क्लीवेज तक पहुँचीं, और वहीं अटक गईं।
सुमन ने वही किया जो वह अब अच्छे से जानती थी। उसने अपने दोनों हाथ काउंटर पर रखे। धीरे से। जैसे थक गई हो। जैसे कोई आराम कर रही हो। पर उसकी कोहनियाँ काउंटर पर टिकीं, उसकी पीठ झुकी, उसकी गांड पीछे को निकल आई।
उसकी कमीज — वह छोटी, हल्के रंग की, बिना ब्रा वाली कमीज — आगे की तरफ लटक गई। दोनों स्तन झूल गए। उनके बीच की दरार गहरी और काली दिख रही थी। उसके निप्पल कड़े थे। कपड़े के नीचे से वे बाहर झाँक रहे थे। वह जानती थी।
इमरान के मुँह से हवा निकली। एक सीटी नहीं, बल्कि एक लंबी, भारी साँस। उसकी पैंट के अंदर हलचल हुई। उसने अपने कूल्हे आगे किए। जैसे वह अपने लंड को और जगह देना चाहता हो।
रिजवान पीछे था। बिल्कुल पीछे। उसने दो कदम और बढ़ा लिए। अब वह सुमन से बस एक इंच दूर था। उसकी आँखें उसकी गांड पर जमी थीं।


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