10 hours ago
सुमन ने और झुक कर उसे मजा दिया।
उसने अपने स्तनों को हाथों से उठाया — जैसे उन्हें सहारा दे रही हो — और एसी की हवा उनके नीचे जाने दी। उसकी यह हरकत इतनी स्पष्ट थी कि संदीप लगभग कराह उठा।
"तुम्हारी तो... बहुत गर्मी लग रही है मैडम," उसने कहा। उसकी आवाज़ में काँप थी। "अंदर से।"
सुमन ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में शरारत थी — और कुछ और भी। भूख। "हाँ भैया। बहुत। बहुत ज्यादा।"
संदीप ने अपनी पैंट का बटन खोल दिया। चुपके से। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसका लंड बाहर निकल आया — उसकी बॉक्सर में ही सही, पर अब वह पूरी तरह सीधा था। वह उसे छिपा नहीं सकता था। उसका सिरा काला दिख रहा था। उसमें से एक बूँद टपकी — उसकी अपनी लार — उसकी जींस पर।
पर उसने कुछ नहीं कहा। वह वैसे ही झुकी रही। अपने स्तनों को एसी के सामने रखे। अपनी गांड को सीट पर उठाए। लेगिंग के ऊपर से उसकी चूत का आकार साफ दिख रहा था — और वहाँ एक गीला पैच था। बड़ा। गहरा। गीला।
संदीप ने वह भी देखा। उसकी जीभ सूख गई। उसने सोचा — यह रांड मुझे पागल कर देगी आज।
गाड़ी रुकी। सुमन सीधी हुई। उसकी कमीज ठीक की। पर उसने अपना क्लीवेज नहीं छिपाया। उसने पैसे निकाले। पर्स खोला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — पर वह उत्तेजना से, डर से नहीं।
"पैसे लो, भैया," उसने कहा।
संदीप ने पैसे लिए। पर उसका हाथ उसके हाथ पर रुक गया। एक सेकंड। दो सेकंड। तीन सेकंड। उसने उसकी हथेली दबाई। सुमन ने हाथ नहीं हटाया।
"मैं वेट करूँ, मैडम?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "आपका क्या?"
उसकी आँखों ने कहा — तुम्हारे अंदर उतरूँ? तुम्हारी चूत चाटूं? तुम्हारे ऊपर अपना लंड रगड़ूं?
सुमन ने अपना हाथ हटाया। पर वह गाड़ी से नहीं उतरी। वह उसे देख रही थी। उसकी आँखें उसके लंड पर थीं — जो अब पूरी तरह सीधा और उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
"नहीं भैया," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में इनकार नहीं था। "आज नहीं।"
आज नहीं — मतलब कभी और। संदीप ने समझ लिया।
सुमन गाड़ी से उतरी। उसके पैर डगमगा रहे थे। उसकी लेगिंग अब पूरी तरह गीली थी। उसने एक कदम बढ़ाया। फिर रुक गई।
वह मुड़ी। संदीप की तरफ देखा। और एक बार मुस्कुरा दी।
एक मुस्कान जिसका मतलब था — रुक। मैं अभी वापस आती हूँ। और तब...
वह मार्केट में अंदर चली गई। उसकी चूत धड़क रही थी। उसके स्तन भारी थे। उसके निप्पल कड़े थे। उसकी सांसें तेज़ थीं। और उसके दिमाग में सिर्फ एक ही शब्द था —
लंड। टैक्सी में संदीप अकेला रह गया था। उसका लंड अब भी सीधा था। उसने अपने हाथ में लिया। उसे रगड़ा। उसकी आँखें सुमन के जाते हुए गांड पर थीं। उसके होंठ सूख गए थे।
"साली... क्या माल है," वह फुसफुसाया। "तेरी तो... चूत में आग लगी है। और आज वह आग... मुझे जलाएगी।"
उसने अपना लंड जींस के अंदर दबाया। बटन बंद किया। और टैक्सी वहीं खड़ी रखी। इंतज़ार करता रहा।
उसे यकीन था — सुमन वापस आएगी।
उसने अपने स्तनों को हाथों से उठाया — जैसे उन्हें सहारा दे रही हो — और एसी की हवा उनके नीचे जाने दी। उसकी यह हरकत इतनी स्पष्ट थी कि संदीप लगभग कराह उठा।
"तुम्हारी तो... बहुत गर्मी लग रही है मैडम," उसने कहा। उसकी आवाज़ में काँप थी। "अंदर से।"
सुमन ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में शरारत थी — और कुछ और भी। भूख। "हाँ भैया। बहुत। बहुत ज्यादा।"
संदीप ने अपनी पैंट का बटन खोल दिया। चुपके से। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसका लंड बाहर निकल आया — उसकी बॉक्सर में ही सही, पर अब वह पूरी तरह सीधा था। वह उसे छिपा नहीं सकता था। उसका सिरा काला दिख रहा था। उसमें से एक बूँद टपकी — उसकी अपनी लार — उसकी जींस पर।
पर उसने कुछ नहीं कहा। वह वैसे ही झुकी रही। अपने स्तनों को एसी के सामने रखे। अपनी गांड को सीट पर उठाए। लेगिंग के ऊपर से उसकी चूत का आकार साफ दिख रहा था — और वहाँ एक गीला पैच था। बड़ा। गहरा। गीला।
संदीप ने वह भी देखा। उसकी जीभ सूख गई। उसने सोचा — यह रांड मुझे पागल कर देगी आज।
गाड़ी रुकी। सुमन सीधी हुई। उसकी कमीज ठीक की। पर उसने अपना क्लीवेज नहीं छिपाया। उसने पैसे निकाले। पर्स खोला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — पर वह उत्तेजना से, डर से नहीं।
"पैसे लो, भैया," उसने कहा।
संदीप ने पैसे लिए। पर उसका हाथ उसके हाथ पर रुक गया। एक सेकंड। दो सेकंड। तीन सेकंड। उसने उसकी हथेली दबाई। सुमन ने हाथ नहीं हटाया।
"मैं वेट करूँ, मैडम?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "आपका क्या?"
उसकी आँखों ने कहा — तुम्हारे अंदर उतरूँ? तुम्हारी चूत चाटूं? तुम्हारे ऊपर अपना लंड रगड़ूं?
सुमन ने अपना हाथ हटाया। पर वह गाड़ी से नहीं उतरी। वह उसे देख रही थी। उसकी आँखें उसके लंड पर थीं — जो अब पूरी तरह सीधा और उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
"नहीं भैया," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में इनकार नहीं था। "आज नहीं।"
आज नहीं — मतलब कभी और। संदीप ने समझ लिया।
सुमन गाड़ी से उतरी। उसके पैर डगमगा रहे थे। उसकी लेगिंग अब पूरी तरह गीली थी। उसने एक कदम बढ़ाया। फिर रुक गई।
वह मुड़ी। संदीप की तरफ देखा। और एक बार मुस्कुरा दी।
एक मुस्कान जिसका मतलब था — रुक। मैं अभी वापस आती हूँ। और तब...
वह मार्केट में अंदर चली गई। उसकी चूत धड़क रही थी। उसके स्तन भारी थे। उसके निप्पल कड़े थे। उसकी सांसें तेज़ थीं। और उसके दिमाग में सिर्फ एक ही शब्द था —
लंड। टैक्सी में संदीप अकेला रह गया था। उसका लंड अब भी सीधा था। उसने अपने हाथ में लिया। उसे रगड़ा। उसकी आँखें सुमन के जाते हुए गांड पर थीं। उसके होंठ सूख गए थे।
"साली... क्या माल है," वह फुसफुसाया। "तेरी तो... चूत में आग लगी है। और आज वह आग... मुझे जलाएगी।"
उसने अपना लंड जींस के अंदर दबाया। बटन बंद किया। और टैक्सी वहीं खड़ी रखी। इंतज़ार करता रहा।
उसे यकीन था — सुमन वापस आएगी।


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