9 hours ago
सुमन ने पीछे का दरवाजा खोला। गर्मी की लहर ने उसका स्वागत किया। पर फिर उसने दरवाजा बंद कर दिया। वह आगे गई। ड्राइवर की बगल वाली सीट खोली। और बैठ गई।
सीधे उसके बगल में।
संदीप ने उसकी तरफ देखा। एक बार। पर वह देख बहुत कुछ था। उसकी आँखें सुमन की जांघों पर गईं — जो लेगिंग में जकड़ी हुई थीं और मोटी, रसीली, गोल दिख रही थीं। फिर उसके स्तनों पर — जो बिना ब्रा के कमीज के नीचे हिल रहे थे। फिर उसकी गर्दन पर — जहाँ पसीने की बूँदें चमक रही थीं। फिर उसके चेहरे पर — जो गर्मी से लाल हो चुका था, और कुछ और वजह से भी।
"एसी तेज कर दो, भैया। बहुत गर्मी लग रही है," सुमन ने कहा। उसने अपनी कमीज का गला थोड़ा खोला। सिर्फ थोड़ा सा। पर उसके स्तनों का काला क्लीवेज निकल आया। गहरा। नम। पसीने से चमकता हुआ।
संदीप का गला सूख गया। उसने एसी की स्पीड बढ़ा दी। ठंडी हवा सुमन के चेहरे पर आई। उसने अपना चेहरा उसकी तरफ कर लिया — जैसे वह हवा का मजा ले रही हो, पर असल में वह अपने क्लीवेज को संदीप की तरफ कर रही थी।
गाड़ी चलने लगी। रास्ते में गड्ढे थे। हर झटके पर सुमन के स्तन झूलते थे। उसकी जांघें संदीप के हाथ से रगड़ खाती थीं — कभी-कभी। जानबूझकर। गलती से नहीं। सुमन जानती थी।
"आज बहुत गर्मी है," सुमन ने फिर कहा। उसने अपने बालों को गर्दन से हटाया। उसकी गर्दन गीली थी। पसीने से। पर सिर्फ पसीना नहीं था वहाँ — उसकी नसें उभर आई थीं। उसकी गर्दन की धड़कन दिख रही थी।
संदीप ने अपनी पैंट में हलचल महसूस की। उसका लंड — अनुशासनहीन — सिर उठाने लगा था। उसने अपनी कमर को आगे किया। उसे छिपाने की कोशिश की। पर सुमन की आँखें नीचे गईं। एक सेकंड के लिए। उसने देख लिया था।
वह मुस्कुराई। अंदर ही अंदर।
"जी मैडम, है तो गर्मी। और आप तो वैसे भी... हॉट हैं। तो आपको और लगती होगी। हे हे हे," संदीप ने कहा। वह हंसा। अपनी हिमाकत पर। उसके दांत निकल आए। सुमन को उसकी बात में दोहरा अर्थ सुनाई दिया।
वह भी मुस्कुरा दी। "बहुत चालाक हो भैया तुम।"
संदीप का दिल जोर से धड़का। उसने सोचा — यह मुझे टीज़ कर रही है। साली... मजे ले रही है।
अब सुमन ने वह किया जो उसने पिछले दो महीनों में किसी और के साथ नहीं किया था। वह आगे की तरफ झुकी। इतना आगे कि उसकी छाती एसी के ठीक सामने आ गई। उसकी कोहनियाँ डैशबोर्ड पर टिक गईं। उसकी कमीज आगे की तरफ लटक गई — पूरी तरह।
अब संदीप साफ-साफ देख सकता था।
उसके स्तन लटक रहे थे। बड़े। भारी। मोटे। उनके निप्पल कड़े थे — पत्थर जैसे। कमीज का कपड़ा उन पर चढ़ गया था, जैसे वहाँ कुछ भी न हो। उसके स्तनों के बीच की दरार गहरी थी। पसीने से चमक रही थी। और उस गहराई से एक गंध आ रही थी — उसके शरीर की गंध। नम। गर्म। औरत की।
संदीप की साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं। उसका लंड अब पूरी तरह सख्त था। उसकी जींस में जगह कम थी। उसने अपना हाथ नीचे रखा — ढकने के लिए। पर वह ढक नहीं पा रहा था। उसका लंड उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
उसकी आँखें सड़क पर थीं। पर उसकी नज़रें सुमन के स्तनों पर थीं। वह तिरछी नज़रों से देख रहा था — बार-बार। रोड देखता, फिर उसकी तरफ देखता। उसकी गर्दन दुखने लगी थी। पर वह रुक नहीं सकता था।
सीधे उसके बगल में।
संदीप ने उसकी तरफ देखा। एक बार। पर वह देख बहुत कुछ था। उसकी आँखें सुमन की जांघों पर गईं — जो लेगिंग में जकड़ी हुई थीं और मोटी, रसीली, गोल दिख रही थीं। फिर उसके स्तनों पर — जो बिना ब्रा के कमीज के नीचे हिल रहे थे। फिर उसकी गर्दन पर — जहाँ पसीने की बूँदें चमक रही थीं। फिर उसके चेहरे पर — जो गर्मी से लाल हो चुका था, और कुछ और वजह से भी।
"एसी तेज कर दो, भैया। बहुत गर्मी लग रही है," सुमन ने कहा। उसने अपनी कमीज का गला थोड़ा खोला। सिर्फ थोड़ा सा। पर उसके स्तनों का काला क्लीवेज निकल आया। गहरा। नम। पसीने से चमकता हुआ।
संदीप का गला सूख गया। उसने एसी की स्पीड बढ़ा दी। ठंडी हवा सुमन के चेहरे पर आई। उसने अपना चेहरा उसकी तरफ कर लिया — जैसे वह हवा का मजा ले रही हो, पर असल में वह अपने क्लीवेज को संदीप की तरफ कर रही थी।
गाड़ी चलने लगी। रास्ते में गड्ढे थे। हर झटके पर सुमन के स्तन झूलते थे। उसकी जांघें संदीप के हाथ से रगड़ खाती थीं — कभी-कभी। जानबूझकर। गलती से नहीं। सुमन जानती थी।
"आज बहुत गर्मी है," सुमन ने फिर कहा। उसने अपने बालों को गर्दन से हटाया। उसकी गर्दन गीली थी। पसीने से। पर सिर्फ पसीना नहीं था वहाँ — उसकी नसें उभर आई थीं। उसकी गर्दन की धड़कन दिख रही थी।
संदीप ने अपनी पैंट में हलचल महसूस की। उसका लंड — अनुशासनहीन — सिर उठाने लगा था। उसने अपनी कमर को आगे किया। उसे छिपाने की कोशिश की। पर सुमन की आँखें नीचे गईं। एक सेकंड के लिए। उसने देख लिया था।
वह मुस्कुराई। अंदर ही अंदर।
"जी मैडम, है तो गर्मी। और आप तो वैसे भी... हॉट हैं। तो आपको और लगती होगी। हे हे हे," संदीप ने कहा। वह हंसा। अपनी हिमाकत पर। उसके दांत निकल आए। सुमन को उसकी बात में दोहरा अर्थ सुनाई दिया।
वह भी मुस्कुरा दी। "बहुत चालाक हो भैया तुम।"
संदीप का दिल जोर से धड़का। उसने सोचा — यह मुझे टीज़ कर रही है। साली... मजे ले रही है।
अब सुमन ने वह किया जो उसने पिछले दो महीनों में किसी और के साथ नहीं किया था। वह आगे की तरफ झुकी। इतना आगे कि उसकी छाती एसी के ठीक सामने आ गई। उसकी कोहनियाँ डैशबोर्ड पर टिक गईं। उसकी कमीज आगे की तरफ लटक गई — पूरी तरह।
अब संदीप साफ-साफ देख सकता था।
उसके स्तन लटक रहे थे। बड़े। भारी। मोटे। उनके निप्पल कड़े थे — पत्थर जैसे। कमीज का कपड़ा उन पर चढ़ गया था, जैसे वहाँ कुछ भी न हो। उसके स्तनों के बीच की दरार गहरी थी। पसीने से चमक रही थी। और उस गहराई से एक गंध आ रही थी — उसके शरीर की गंध। नम। गर्म। औरत की।
संदीप की साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं। उसका लंड अब पूरी तरह सख्त था। उसकी जींस में जगह कम थी। उसने अपना हाथ नीचे रखा — ढकने के लिए। पर वह ढक नहीं पा रहा था। उसका लंड उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
उसकी आँखें सड़क पर थीं। पर उसकी नज़रें सुमन के स्तनों पर थीं। वह तिरछी नज़रों से देख रहा था — बार-बार। रोड देखता, फिर उसकी तरफ देखता। उसकी गर्दन दुखने लगी थी। पर वह रुक नहीं सकता था।


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