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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#41
तीसरा दिन। सुबह के 11 बज रहे हैं। गर्मी बहुत है।
सुमन अकेली बिस्तर पर पड़ी है। उसकी आँखें खुली हैं। वह छत की तरफ देख रही है। उसके हाथ उसके शरीर पर हैंएक हाथ उसके बड़े स्तनों पर, दूसरा हाथ उसकी जांघों के बीच।
वह सोच रही हैराज ने यह आग लगाई। और अब वह आग बुझने वाली नहीं।
उसकी चूतबेचारी उसकी चूतलंड के बिना पागल हो रही है। वह सूखी नहीं बैठ सकती। वह खाली है। खोखली है। उसके अंदर कुछ ऐसा है जो चीख रहा है। भर दो। कुछ भी करो। बस भर दो।
वह उठती है। नहा लेती है। ठंडे पानी से। पर ठंडा पानी भी उसकी गर्मी नहीं बुझा पाता।
अलमारी खोलती है। राज के कपड़े देखती है। उन्हें सूंघती है। उसकी महक। उसकी याद। उसका लंड।
वह रोना चाहती है। वह चिल्लाना चाहती है। पर आवाज़ नहीं निकलती।
बाहर निकलने का फैसला:
वह खुद से कहती है — मैं राज को धोखा नहीं देना चाहती। मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ। बेइंतहा प्यार।
लेकिन उसकी चूत। वह चूतवह सिर्फ लंड चाहती है। लंड। बस लंड। कोई भी लंड।
लंड के भूख के आगे सब कुछ फेल है। यही सच है। यही उसकी हकीकत है।
वह टाइट लेगिंग पहनती है। वही काली लेगिंगजिसमें उसकी गांड गोल और भारी दिखती है। ऊपर एक छोटी सी कमीज। हल्के रंग की। बहुत हल्की। ब्रेसलेस। उसके निप्पल कपड़े के नीचे दब रहे हैं। साफ दिख रहे हैं।
वह आईने में देखती है।
तेरी शक्ल देख, सुमन, वह सोचती है। तेरी आँखों में क्या है? भूख। बस भूख।
वह गहरी सांस लेती है। और घर से निकल जाती है।
दुविधा में कदम:
बाजार दूर नहीं है। पंद्रह मिनट की पैदल दूरी। रिक्शा है। बस है। टैक्सी है। सब कुछ है।
लेकिन वह पैदल ही चल रही है। धीरे-धीरे। अपनी रफ्तार से।
वह सोच रही है — क्या कर रही हूँ मैं? कहाँ जा रही हूँ?
पर उसके पैर नहीं रुक रहे। उसकी चूत उसे खींच रही है। बाजार की तरफ। भीड़ की तरफ। नज़रों की तरफ।
वह कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि पीछे से आवाज़ आई
 
सुबह के 11 बज रहे थे। गर्मी अपने चरम पर। सूरज सीधा सिर पर। सड़कें पिघल रही थीं।
सुमन घर से निकली। उसके कदम भारी थे। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। एक बेचैनी। एक आग। राज ने जो आग लगाई थी, वह अब उसे अंदर से जला रही थी। वह रुकने वाली नहीं थी।
उसने टाइट लेगिंग पहनी थी। वही काली लेगिंग जो उसके गांड की गोलाई को पूरी तरह दिखाती थी। ऊपर एक छोटी सी कमीज। हल्के नीले रंग की। बहुत हल्की। बिना ब्रा के। उसके बड़े स्तन कमीज के नीचे स्वतंत्र थे। उसके निप्पल कपड़े को चीरते हुए बाहर झाँक रहे थे। उसकी चूत पहले से ही गीली थी। सिर्फ सोच से। सिर्फ राज के नाम से। सिर्फ उस आग से जो उसके अंदर लगातार धधक रही थी।
वह बस स्टैंड की तरफ बढ़ी। पर उसके कदम कुछ और ही कह रहे थे। वह रिक्शा या बस में नहीं बैठना चाहती थी। वह चाहती थीकुछ और। कोई हाथ। कोई लंड। कोई साहसिकता।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"कहाँ जाना है, मैडम?"
आवाज़ भारी थी। गरज जैसी। पर फिर भी नर्म।
सुमन ने पीछे मुड़कर देखा। वह टैक्सी थी। एक पुरानी सफेद इंडिका। खिड़कियों पर धूल। पर अंदर एसी चल रहा थाउसकी ठंडी हवा बाहर निकल रही थी।
खिड़की से एक चेहरा बाहर आया। मूंछें। गहरी आँखें। गोरा रंग। हाथ स्टीयरिंग पर। और आँखेंउसके सिर से पैर तक घूम चुकी थीं।
"मैं संदीप, मैडम। याद है? क्लब वाली रात। राज सर के साथ थीं आप। मैं ही लेकर आया था घर।"
सुमन को कुछ याद आया। धुंधली सी तस्वीरें। नशे में उतारा गया शरीर। राज का हाथ उसकी कमर पर। और यह चेहरापीछे के शीशे में। उसे देखता हुआ।
"हाँ, याद आया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वह गर्मी नहीं थी जो वह दिखाना चाहती थी। वह बस कह रही थी। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था — यह वही है जिसने उस रात मुझे घर छोड़ा था। मेरी नींद में। मेरे नशे में। क्या उसने मुझे देखा था? क्या उसने...
"मार्केट चलोगे?" उसने पूछा।
संदीप की आँखें चमक गईं। "हाँ-हाँ, बिल्कुल। बैठिए। चलते हैं।"
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 17-06-2026, 11:56 PM



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