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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#39
दरवाजा खोला। चौखट पर खड़ी हो गई।

ठेला सामने रुका था। सब्जी वालारिज़वान। कोई 25-26 का। गोरा सा, काली मूंछें, बाँहों पर बाल, कद में भरा हुआ। ढीली सी पैंट और बनियान पहने था। उसके हाथ मोटे थेकाम करने वाले हाथ। उसने सुमन की तरफ देखा। और वहीं रुक गया।
उसकी आँखें जम गईं। उसका मुँह धीरे-धीरे खुलता गयाजैसे कोई ताला खुल रहा हो। पहले उसने सुमन के चेहरे की तरफ देखा, फिर उसका गला सूख गया। उसकी नज़र सुमन के गले से नीचे उतरीउस डीप नेक टॉप पर, जहाँ से उसकी दोनों चूचियाँ बाहर झाँक रही थीं। बीच की गहरी दरार। आधी चूचियाँगोरी, मुलायम, उभरी हुई।
रिज़वान का मुँह और खुल गया। उसकी आँखें फट गईं। उसका थूकउसने निगलने की कोशिश की, लेकिन वह सूख चुका था। उसकी जीभ मुँह की छत से चिपक गई।
"भैया, रुको ज़रा," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ मीठी थीशहद से भी मीठी।
रिज़वान को होश आया। उसने अपना ठेला बगल की तरफ खींचा और सुमन के घर के ठीक सामने लाकर रोक दिया।
"जी मैडम... क्या चाहिए?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसने अपनी बनियान को एक बार सही कियालेकिन अपने नीचे वाले हिस्से को छुपाने के लिए।
सुमन चौखट पर ही बैठ गई। वहीं दरवाजे के सामनेपैर फैलाए। लेगिंग उसकी जांघों पर कसी हुई थी, उसकी चूत का उभार साफ दिख रहा था। उसने टोकरी में रखी सब्जियाँ देखना शुरू किया।
"भिंडी कैसी है?" उसने पूछा। बिना ऊपर देखे। वह सब्जियाँ छाँट रही थीछू रही थी, दबा रही थी, सूँघ रही थी।
रिज़वान उसकी तरफ घूर रहा था। उसकी नज़र सुमन के चेहरे से उसकी छाती पर, फिर उसके बीच की तरफजहाँ लेगिंग के नीचे उसकी चूत का पूरा उभार दिख रहा था। लेबिया की लकीरें। बीच की दरार। थोड़ी सी नमीबाहर से दिख रही थी, लेगिंग के पतले कपड़े पर।
रिज़वान के मुँह में पानी भर आया। नहींउसके मुँह में और उसके लंड में। उसकी पैंट के आगे एक तंबू खड़ा हो रहा था। उसने अपनी पैंट को खींचकर ढीला करने की कोशिश कीताकि दबाव कम हो। लेकिन लंड तो लंड था। वह उँगलियों से अपनी पैंट दबा रहा था, अपने लंड को एडजस्ट कर रहा थाएक तरफ, फिर दूसरी तरफ।
सुमन देख रही थी। चोरी की नज़रों से। उसने देखाउसके हाथ की हरकतें, उसकी बेचैनी, उसके मुँह का सूखापन। उसने अपने आप को रोकाहँसी नहीं आई। बस अंदर ही अंदर एक गर्मी उठी। उसकी अपनी चूत में हल्की सी नमी गई।
"ककड़ी दिखाओ," सुमन ने कहा।
रिज़वान ने ककड़ी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने ककड़ी सुमन की तरफ बढ़ा दी।
सुमन ने ककड़ी ली। उसे दोनों हाथों में लिया। देखालंबी, मोटी, हरी, बीच से थोड़ी टेढ़ी। उसने उसे अपने हाथ में घुमाया। अपनी उँगलियों से उसकी लंबाई नापी। फिर उसे अपनी नाक के पास ले गईसूँघा।
रिज़वान की आँखें उसके हाथों पर थीं। ककड़ी पर। उसके हाथों की हरकतेंजैसे वह ककड़ी को सहला रही हो। उसके दिमाग में क्या चल रहा था, सुमन जानती थी।
"ठीक है, ये लो," सुमन ने ककड़ी वापस रख दी। "भिंडी, करेला, ककड़ीसब देना।"
रिज़वान ने सब्जियाँ निकालनी शुरू कीं। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। उसकी पैंट के आगे अब छुपाना मुश्किल हो रहा थातंबू साफ दिख रहा था। वह एक हाथ से सब्जियाँ निकाल रहा था, दूसरे हाथ से अपने लंड को पैंट के अंदर दबाए हुए था।
सुमन को शरारत सूझी।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 17-06-2026, 11:35 PM



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