16-06-2026, 11:17 PM
सुमन ने दिन में कुछ खास नहीं किया।
वह बिस्तर पर पड़ी रही, फोन चलाया, टीवी देखा, कुछ खाया, कुछ पिया, फिर से लेट गई। उसने राज को एक और मैसेज किया — "मिश्रा जी को टीज़ किया। उनका लंड खड़ा हो गया। मेरा भी हो गया था।"
राज ने रिप्लाई किया — "फोटो भेजती तो अच्छा था।"
सुमन ने फोटो ली — अपनी चूत की। गीली, खुली हुई। भेज दी।
राज ने लिखा — "अभी मीटिंग में हूँ। अब उठकर नहीं बैठ सकता। थैंक्यू मेरी राँड।"
सुमन हँसी। वह फोन पटककर लेट गई।
उसकी चूत — वह गीली थी। सूख नहीं रही थी। राज के बिना उसका शरीर शांत नहीं हो रहा था। वह चाहती थी कि कोई उसकी चूचियाँ दबाए। कोई उसकी गांड पकड़े। कोई उसकी चूत में उँगली डाले।
लेकिन कोई नहीं था।
सिर्फ वह थी। उसकी उँगलियाँ। और उसकी कल्पनाएँ।
शाम को उसने टीवी पर एक फिल्म लगाई — कुछ रोमांटिक सी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ राज था। राज की गंध। राज का लंड। राज की वह आवाज़ — जब वह उसके कान में कहता था, "आज तू किसी और की है।"
सुमन ने अपना हाथ अपनी नाइटी के अंदर डाल दिया। अपनी चूत पर रखा। गीली थी। फूली हुई। धड़क रही थी।
लेकिन उसने अंदर नहीं डाला।
बस बाहर रखा।
बस दबाया।
और कल्पना की।
कल्पना की — राज उसके सामने बैठा है, देख रहा है। कोई और उसकी चूत में उँगली डाल रहा है। वह कोई — मिश्रा अंकल नहीं, कोई युवा, कोई अनजान, जिसके हाथ बड़े हों, जिसकी उँगलियाँ मोटी हों...
सुमन कराही। लेकिन रुक गई।
"नहीं," उसने फुसफुसाया। "पहले दिन ही नहीं। राज ने कहा है — भूखी रहो। जब वह लौटेगा, तब पूरा करेगा।"
उसने अपना हाथ बाहर निकाल लिया। अपनी गीली उँगलियाँ देखीं। उन्हें चाट लिया।
फिर वह उठी। खाना बनाया। अकेले खाया। बर्तन धोए। कपड़े बदले — उसी पारदर्शी नाइटी में सो गई।
रात को वह करवट बदलती रही। राज के तकिए को गले लगाए रही। उसकी गंध अब लगभग खत्म हो चुकी थी — बस एक धुंधली सी याद बची थी।
उसकी चूत ने पूछा — "कब तक?"
सुमन ने जवाब दिया — "छह दिन और। और रातें। बहुत लंबी रातें।"
वह सो गई। भूखी। अधूरी। लेकिन राज के इंतज़ार में।
दोपहर के लगभग डेढ़ बज रहे थे। सुमन अब भी बिस्तर में थी। राज का तकिया अब बेकार हो चुका था — उसकी गंध पूरी तरह चली गई थी। अब सिर्फ सूती कपड़े की बासी गंध बची थी। सुमन ने उसे एक तरफ फेंक दिया।
वह उठी। बालकनी में गई — मिश्रा अंकल नहीं थे। शायद दोपहर की झपकी ले रहे थे। सुमन ने एक बार चारों तरफ देखा, फिर अंदर आ गई।
बोरियत। वही बोरियत। दीवारें उसी से बात कर रही थीं। फ्रिज की आवाज़, पंखे की गूंज, बाहर गली में कुत्तों का झगड़ा — बस यही था।
वह सोफे पर लेट गई। छत की तरफ देखती रही। फिर उठी। फिर लेट गई। फिर फ्रिज खोला। कुछ नहीं चाहिए था, बस कुछ करना था।
तभी — गली से आवाज़ आई।
"तरकारी... तरकारी... ककड़ी... घीया... करेला... तरकारी ले लो..."
एक सब्जी वाला। उसका ठेला। पहिए जमीन पर घिस रहे थे — घर्र-घर्र-घर्र।
सुमन के कान खड़े हो गए। कुछ तो हुआ। उसके दिमाग में एक शैतानी ख्याल कौंधा। मुस्कुराई। सोफे से उछली। बेडरूम में भागी। अलमारी खोली। अंदर देखा।
वह टाइट लेगिंग — नेवी ब्लू, स्किन-टाइट, ऐसी कि पहनते ही उसकी चूत का उभार और गांड की लकीरें साफ दिख जाती थीं। उसने पहन ली। बिना चड्डी के। फिर वह डीप नेक टॉप — काला, स्ट्रेचेबल, सामने से नाभि तक खुला हुआ। बिना ब्रा के। उसके स्तन टॉप के अंदर आधे बाहर थे — बड़े, भारी, मुलायम, बीच की दरार गहरी।
उसने जल्दी से बालों में हाथ फेरा। लिपस्टिक नहीं लगाई। बस होंठों को चाट लिया। फिर दरवाजे की तरफ बढ़ी।
वह बिस्तर पर पड़ी रही, फोन चलाया, टीवी देखा, कुछ खाया, कुछ पिया, फिर से लेट गई। उसने राज को एक और मैसेज किया — "मिश्रा जी को टीज़ किया। उनका लंड खड़ा हो गया। मेरा भी हो गया था।"
राज ने रिप्लाई किया — "फोटो भेजती तो अच्छा था।"
सुमन ने फोटो ली — अपनी चूत की। गीली, खुली हुई। भेज दी।
राज ने लिखा — "अभी मीटिंग में हूँ। अब उठकर नहीं बैठ सकता। थैंक्यू मेरी राँड।"
सुमन हँसी। वह फोन पटककर लेट गई।
उसकी चूत — वह गीली थी। सूख नहीं रही थी। राज के बिना उसका शरीर शांत नहीं हो रहा था। वह चाहती थी कि कोई उसकी चूचियाँ दबाए। कोई उसकी गांड पकड़े। कोई उसकी चूत में उँगली डाले।
लेकिन कोई नहीं था।
सिर्फ वह थी। उसकी उँगलियाँ। और उसकी कल्पनाएँ।
शाम को उसने टीवी पर एक फिल्म लगाई — कुछ रोमांटिक सी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ राज था। राज की गंध। राज का लंड। राज की वह आवाज़ — जब वह उसके कान में कहता था, "आज तू किसी और की है।"
सुमन ने अपना हाथ अपनी नाइटी के अंदर डाल दिया। अपनी चूत पर रखा। गीली थी। फूली हुई। धड़क रही थी।
लेकिन उसने अंदर नहीं डाला।
बस बाहर रखा।
बस दबाया।
और कल्पना की।
कल्पना की — राज उसके सामने बैठा है, देख रहा है। कोई और उसकी चूत में उँगली डाल रहा है। वह कोई — मिश्रा अंकल नहीं, कोई युवा, कोई अनजान, जिसके हाथ बड़े हों, जिसकी उँगलियाँ मोटी हों...
सुमन कराही। लेकिन रुक गई।
"नहीं," उसने फुसफुसाया। "पहले दिन ही नहीं। राज ने कहा है — भूखी रहो। जब वह लौटेगा, तब पूरा करेगा।"
उसने अपना हाथ बाहर निकाल लिया। अपनी गीली उँगलियाँ देखीं। उन्हें चाट लिया।
फिर वह उठी। खाना बनाया। अकेले खाया। बर्तन धोए। कपड़े बदले — उसी पारदर्शी नाइटी में सो गई।
रात को वह करवट बदलती रही। राज के तकिए को गले लगाए रही। उसकी गंध अब लगभग खत्म हो चुकी थी — बस एक धुंधली सी याद बची थी।
उसकी चूत ने पूछा — "कब तक?"
सुमन ने जवाब दिया — "छह दिन और। और रातें। बहुत लंबी रातें।"
वह सो गई। भूखी। अधूरी। लेकिन राज के इंतज़ार में।
दोपहर के लगभग डेढ़ बज रहे थे। सुमन अब भी बिस्तर में थी। राज का तकिया अब बेकार हो चुका था — उसकी गंध पूरी तरह चली गई थी। अब सिर्फ सूती कपड़े की बासी गंध बची थी। सुमन ने उसे एक तरफ फेंक दिया।
वह उठी। बालकनी में गई — मिश्रा अंकल नहीं थे। शायद दोपहर की झपकी ले रहे थे। सुमन ने एक बार चारों तरफ देखा, फिर अंदर आ गई।
बोरियत। वही बोरियत। दीवारें उसी से बात कर रही थीं। फ्रिज की आवाज़, पंखे की गूंज, बाहर गली में कुत्तों का झगड़ा — बस यही था।
वह सोफे पर लेट गई। छत की तरफ देखती रही। फिर उठी। फिर लेट गई। फिर फ्रिज खोला। कुछ नहीं चाहिए था, बस कुछ करना था।
तभी — गली से आवाज़ आई।
"तरकारी... तरकारी... ककड़ी... घीया... करेला... तरकारी ले लो..."
एक सब्जी वाला। उसका ठेला। पहिए जमीन पर घिस रहे थे — घर्र-घर्र-घर्र।
सुमन के कान खड़े हो गए। कुछ तो हुआ। उसके दिमाग में एक शैतानी ख्याल कौंधा। मुस्कुराई। सोफे से उछली। बेडरूम में भागी। अलमारी खोली। अंदर देखा।
वह टाइट लेगिंग — नेवी ब्लू, स्किन-टाइट, ऐसी कि पहनते ही उसकी चूत का उभार और गांड की लकीरें साफ दिख जाती थीं। उसने पहन ली। बिना चड्डी के। फिर वह डीप नेक टॉप — काला, स्ट्रेचेबल, सामने से नाभि तक खुला हुआ। बिना ब्रा के। उसके स्तन टॉप के अंदर आधे बाहर थे — बड़े, भारी, मुलायम, बीच की दरार गहरी।
उसने जल्दी से बालों में हाथ फेरा। लिपस्टिक नहीं लगाई। बस होंठों को चाट लिया। फिर दरवाजे की तरफ बढ़ी।


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