16-06-2026, 11:15 PM
मिश्रा अंकल अपनी बालकनी में थे। पहले से ही। बैठे हुए, चाय पी रहे थे, अखबार पढ़ रहे थे। लेकिन उनकी नज़र अखबार पर नहीं थी — वह तो रास्ता देख रहे थे। सुमन का।
जैसे ही सुमन ने अपनी बालकनी में कदम रखा, मिश्रा अंकल का पूरा शरीर सख्त हो गया।
उनकी आँखें सुमन के शरीर पर जम गईं। वह सफेद पारदर्शी नाइटी — उसमें सुमन जैसे देवी लग रही थी। उसके बाल बिखरे थे, उसकी आँखों में नींद और भूख मिली हुई थी। उसकी चूचियाँ नाइटी के नीचे हिल रही थीं — बिना किसी ब्रा के, बिना किसी शर्म के। उसकी चूत — वह साफ दिख रही थी, काले बालों का त्रिकोण, बीच में गीली चमक।
मिश्रा अंकल ने थूक निगला। उनकी लुंगी के सामने हल्का सा उभार बन चुका था।
"गुड मॉर्निंग अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में वही मासूमियत थी — लेकिन उसकी आँखों में शैतानी चमक रही थी।
"गुड... गुड मॉर्निंग बेटा," अंकल की आवाज़ फट रही थी। उन्होंने अपना अखबार ऊपर उठा लिया — चेहरा छिपाने के लिए, लेकिन उनकी आँखें अखबार के ऊपर से झाँक रही थीं।
"राज जी नहीं हैं क्या आज?" अंकल ने पूछा। उनके हाथ काँप रहे थे।
"नहीं अंकल," सुमन ने कहा। वह बालकनी के रेलिंग के करीब आ गई। उसने अपनी कॉफी का कप रेलिंग पर रखा। झुकी। जानबूझकर झुकी।
नाइटी का नेकलाइन खुल गया। उसकी दोनों चूचियाँ लगभग बाहर आ गईं — बड़ी, गोरी, भरी हुई, निप्पल सख्त, उन पर हल्की नमी (ठंडी हवा की या अपने पसीने की — पता नहीं)।
मिश्रा अंकल का मुँह खुला रह गया। अखबार उनके हाथ से गिर गया। उन्होंने उसे उठाने का नाटक किया — और झुकते हुए उनकी नज़र सीधी सुमन की चूत पर पड़ी, जो बालकनी के रेलिंग के पिलर के बीच से खुल रही थी।
सुमन ने देखा। वह जानती थी।
वह सीधी हुई। फिर उसने अपना एक पैर बालकनी की कुर्सी पर रख दिया — जैसे आराम से खड़ी हो रही हो। उसकी जांघ खुल गई। नाइटी ऊपर चढ़ गई। अब उसकी चूत पूरी तरह खुली थी — लेबिया फूले हुए, बीच की दरार से चमक आ रही थी। राज के वीर्य का कुछ हिस्सा सूखकर उसके बालों पर जमा था — सफेद दाग।
मिश्रा अंकल के हाथ उनकी लुंगी पर चले गए। वह अपना लंड लुंगी के ऊपर से दबाने लगे। उनकी आँखों से पानी आ रहा था — या पसीना, या बस भूख।
"अंकल, आपने चाय पी ली?" सुमन ने बिल्कुल सामान्य स्वर में पूछा।
"हाँ... हाँ बेटा..." अंकल बुदबुदाए। उनकी जीभ लड़खड़ा रही थी। उनका लंड अब लुंगी के कपड़े को तीर की तरह उठा रहा था — कोई शक नहीं बचा था।
सुमन ने अपनी कॉफी का कप उठाया। वह चुस्की ले रही थी, और अपनी चूत खुली छोड़ रही थी। हवा उसके लेबिया पर पड़ रही थी — उसे ठंडक मिल रही थी, लेकिन अंदर आग थी।
"राज एक हफ्ते के लिए गए हैं," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी — बस एक बयान था।
"एक... एक हफ्ता?" अंकल की आवाज़ फट गई। उनके दिमाग में तेजी से कुछ चल रहा था। "तो आप अकेली होंगी?"
"हाँ अंकल," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत अकेली।"
उसने अपनी कॉफी खत्म की। फिर उसने धीरे-धीरे अपना पैर कुर्सी से नीचे उतारा। अपनी नाइटी को ठीक किया — लेकिन ठीक से नहीं। थोड़ा खुला ही छोड़ा।
"फिर मिलते हैं अंकल," उसने कहा। "कल सुबह। उसी समय।"
वह अंदर चली गई।
बालकनी में मिश्रा अंकल अकेले रह गए। उनकी लुंगी के आगे तंबू था। उन्होंने अपना लंड पकड़ा। जोर से दबाया। लेकिन उन्होंने मसला नहीं। वह बाथरूम की तरफ भागे — अपनी पत्नी के देखने से पहले। बाथरूम में दरवाजा बंद किया। पैंट उतारी। अपना लंड निकाला — लाल, सख्त, सिरे पर पानी टपक रहा था। उन्होंने आँखें बंद कीं। सामने सुमन थी — उसकी खुली चूत, उसकी गीली चमक, उसके बालों में सूखा वीर्य, उसकी बड़ी चूचियाँ, उसकी मुस्कान। पाँच मिनट में वह आ गए। दीवार पर लगा दिया। फिर टॉयलेट पर बैठ गए। थके हुए। लेकिन उनके दिमाग में एक ही बात थी —
"कल सुबह। फिर से।"
जैसे ही सुमन ने अपनी बालकनी में कदम रखा, मिश्रा अंकल का पूरा शरीर सख्त हो गया।
उनकी आँखें सुमन के शरीर पर जम गईं। वह सफेद पारदर्शी नाइटी — उसमें सुमन जैसे देवी लग रही थी। उसके बाल बिखरे थे, उसकी आँखों में नींद और भूख मिली हुई थी। उसकी चूचियाँ नाइटी के नीचे हिल रही थीं — बिना किसी ब्रा के, बिना किसी शर्म के। उसकी चूत — वह साफ दिख रही थी, काले बालों का त्रिकोण, बीच में गीली चमक।
मिश्रा अंकल ने थूक निगला। उनकी लुंगी के सामने हल्का सा उभार बन चुका था।
"गुड मॉर्निंग अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में वही मासूमियत थी — लेकिन उसकी आँखों में शैतानी चमक रही थी।
"गुड... गुड मॉर्निंग बेटा," अंकल की आवाज़ फट रही थी। उन्होंने अपना अखबार ऊपर उठा लिया — चेहरा छिपाने के लिए, लेकिन उनकी आँखें अखबार के ऊपर से झाँक रही थीं।
"राज जी नहीं हैं क्या आज?" अंकल ने पूछा। उनके हाथ काँप रहे थे।
"नहीं अंकल," सुमन ने कहा। वह बालकनी के रेलिंग के करीब आ गई। उसने अपनी कॉफी का कप रेलिंग पर रखा। झुकी। जानबूझकर झुकी।
नाइटी का नेकलाइन खुल गया। उसकी दोनों चूचियाँ लगभग बाहर आ गईं — बड़ी, गोरी, भरी हुई, निप्पल सख्त, उन पर हल्की नमी (ठंडी हवा की या अपने पसीने की — पता नहीं)।
मिश्रा अंकल का मुँह खुला रह गया। अखबार उनके हाथ से गिर गया। उन्होंने उसे उठाने का नाटक किया — और झुकते हुए उनकी नज़र सीधी सुमन की चूत पर पड़ी, जो बालकनी के रेलिंग के पिलर के बीच से खुल रही थी।
सुमन ने देखा। वह जानती थी।
वह सीधी हुई। फिर उसने अपना एक पैर बालकनी की कुर्सी पर रख दिया — जैसे आराम से खड़ी हो रही हो। उसकी जांघ खुल गई। नाइटी ऊपर चढ़ गई। अब उसकी चूत पूरी तरह खुली थी — लेबिया फूले हुए, बीच की दरार से चमक आ रही थी। राज के वीर्य का कुछ हिस्सा सूखकर उसके बालों पर जमा था — सफेद दाग।
मिश्रा अंकल के हाथ उनकी लुंगी पर चले गए। वह अपना लंड लुंगी के ऊपर से दबाने लगे। उनकी आँखों से पानी आ रहा था — या पसीना, या बस भूख।
"अंकल, आपने चाय पी ली?" सुमन ने बिल्कुल सामान्य स्वर में पूछा।
"हाँ... हाँ बेटा..." अंकल बुदबुदाए। उनकी जीभ लड़खड़ा रही थी। उनका लंड अब लुंगी के कपड़े को तीर की तरह उठा रहा था — कोई शक नहीं बचा था।
सुमन ने अपनी कॉफी का कप उठाया। वह चुस्की ले रही थी, और अपनी चूत खुली छोड़ रही थी। हवा उसके लेबिया पर पड़ रही थी — उसे ठंडक मिल रही थी, लेकिन अंदर आग थी।
"राज एक हफ्ते के लिए गए हैं," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी — बस एक बयान था।
"एक... एक हफ्ता?" अंकल की आवाज़ फट गई। उनके दिमाग में तेजी से कुछ चल रहा था। "तो आप अकेली होंगी?"
"हाँ अंकल," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत अकेली।"
उसने अपनी कॉफी खत्म की। फिर उसने धीरे-धीरे अपना पैर कुर्सी से नीचे उतारा। अपनी नाइटी को ठीक किया — लेकिन ठीक से नहीं। थोड़ा खुला ही छोड़ा।
"फिर मिलते हैं अंकल," उसने कहा। "कल सुबह। उसी समय।"
वह अंदर चली गई।
बालकनी में मिश्रा अंकल अकेले रह गए। उनकी लुंगी के आगे तंबू था। उन्होंने अपना लंड पकड़ा। जोर से दबाया। लेकिन उन्होंने मसला नहीं। वह बाथरूम की तरफ भागे — अपनी पत्नी के देखने से पहले। बाथरूम में दरवाजा बंद किया। पैंट उतारी। अपना लंड निकाला — लाल, सख्त, सिरे पर पानी टपक रहा था। उन्होंने आँखें बंद कीं। सामने सुमन थी — उसकी खुली चूत, उसकी गीली चमक, उसके बालों में सूखा वीर्य, उसकी बड़ी चूचियाँ, उसकी मुस्कान। पाँच मिनट में वह आ गए। दीवार पर लगा दिया। फिर टॉयलेट पर बैठ गए। थके हुए। लेकिन उनके दिमाग में एक ही बात थी —
"कल सुबह। फिर से।"


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