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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#34
सुबह के छह बजे।

राज ने अपना लंड सुमन की चूत से बाहर निकाला। वह अभी भी सख्त थालेकिन कम गीला। सुमन की चूत ने रात भर उसे गर्म रखा था।
सुमन की आँख खुली। उसने देखाराज कपड़े पहन रहा था।
"जा रहे हो?" उसकी आवाज़ कर्कश थी, नींद से भरी हुई।
राज उसके पास आया। उसके माथे पर एक किस किया।
"जल्दी आऊँगा," उसने कहा। "अपना ध्यान रखना।"
सुमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम्हारे बिना यह चूत," उसने अपनी चूत की तरफ इशारा कियाजो अभी भी गीली थी, खुली हुई, रात के पानी और राज के वीर्य से लथपथ — "पागल हो जाएगी।"
राज मुस्कुराया। "पागल होने दे। जब मैं लौटूंगा, तब संभालूंगा।"
उसने बैग उठाया। दरवाजे तक गया। रुका।
"बाय, मेरी राँड। जल्दी मिलते हैं।"
सुमन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी थालेकिन वह नहीं रोई। उसने अपनी उँगली अपनी चूत पर फेरीगीली कीऔर राज की तरफ उँगली उठाई।
"तेरी याद आएगी," उसने कहा।
राज ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
सुमन अकेली रह गई।
उसने बिस्तर पर करवट ली। राज का तकिया उसके पास था। उसने उसे सूंघा। उसकी गंध अभी भी थीनमकीन, गर्म, पुरुष जैसी।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। वह अभी भी गीली थीराज के वीर्य से, उसके अपने पानी से। उसने उसे अपनी उँगलियों से फैलाया, चादर पर गीला निशान बनाया।
"एक हफ्ता," वह फुसफुसाई। "सात रातें।"
उसकी चूत ने जवाब दियाएक धड़कन के साथ।
सात दिनों की भूख शुरू हो चुकी थी।


सुबह के नौ बज रहे थे। सुमन अभी भी बिस्तर में थी। राज का तकिया उसकी बाँहों में दबा हुआ था, उसकी गंध अब धीरे-धीरे मिट रही थीलेकिन सुमन उसे छोड़ नहीं पा रही थी।
वह पूरी रात ऐसे ही पड़ी रही थी। करवट बदली, लेटी, फिर उठी, फिर लेट गई। कुछ अधूरा सा था हवा में। घर सन्नाटा थाफ्रिज की गुंजन, बाहर गली का शोर, कबूतरों की कूक। लेकिन राज की आवाज़ नहीं थी। उसकी हँसी नहीं थी। उसके हाथ नहीं थेजो उसकी चूचियों पर होते, उसकी चूत में होते, उसकी गांड दबाते।
सुमन बोर हो रही थी।
बहुत ज्यादा बोर।
उसने फोन उठाया। इंस्टाग्राम खोला, रील्स देखींसब बेकार लगा। उसने व्हाट्सएप खोलाराज का लास्ट सीन: 2 घंटे पहले। उसने मैसेज किया था — "पहुंच गया। मिस कर रहा हूँ।" सुमन ने रिप्लाई किया था — "मैं भी। तेरी चूत रो रही है।" राज ने हँसी वाला इमोजी भेजा था, फिर बात रुक गई। शायद मीटिंग में था।
सुमन ने फोन फेंक दिया। कमरे में छत की तरफ देखती रही। एक घंटा बीत गया। दो घंटे।
"बोरियत से मर जाऊँगी," उसने खुद से कहा।


फिर दस बजेउसे कुछ याद आया।
वह मुस्कुराई।
उठी। नहाई नहीं थी अभी। वही नाइटी पहनी थी जो कल रात पहनी थीसफेद, पारदर्शी, बिना ब्रा के, बिना चड्डी के। उसके निप्पल साफ दिख रहे थे, उसकी चूत के काले बाल, उसके बीच की गीली दरारराज के वीर्य का कुछ हिस्सा अभी भी सूखा नहीं था।
उसने कॉफी बनाई। अपना कप उठाया। और सीधे बालकनी में चली गई।

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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 16-06-2026, 11:08 PM



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