16-06-2026, 01:41 PM
सुरज ने “ठीक है” कह तो दिया, लेकिन उसके अंदर एक आग सी सुलग रही थी। मैत्री रचित कहानी।
वह रात भर सो नहीं पाया। बार-बार वही दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम रहा था - अंजली दुल्हन की तरह सजी हुई, कमरे का बंद दरवाजा, बाबा अंदर घंटों तक रहना, और फिर जब बाबा बाहर आते थे तो अंजली का चेहरा लाल, साँसें तेज, आँखों में एक अजीब नशा और शरीर पर पसीने की चमक।
सुरज ने मन ही मन सोचा - “चार दिन तक रोज सुहागरात? क्या यह सब संभव है? क्या सच में इतनी पूजा की जरूरत है? क्या सच में उपरवाला बाबा के शरीर में आते हैं? या… ये सब सिर्फ एक बहाना है? यह सब क्या चुतियापा है? बहनचोद, कुछ समज में नहीं आ रहा।”
जैसे जैसे समय चलता गया, उसकी शंका दिन-ब-दिन बढ़ती गई।
पहले दिन जब अंजली दुल्हन की तरह तैयार होकर कमरे में गई, सुरज बाहर खड़ा था। उसने देखा कि अंजली के चेहरे पर शर्म के साथ एक अजीब सी चमक थी। जब बाबा भी अंदर गए और दरवाजा बंद हुआ, तो सुरज का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। लेखिका मैत्री है।
वह सोचने लगा;
“मेरी पत्नी… मेरी अंजली… जिसे मैंने कभी छुआ तक नहीं… आज चार दिन तक इस बाबा के साथ अकेली रहेगी?
क्या सच में सिर्फ मंत्र पढ़ रहे होंगे?
या… बाबा उसकी चूत में अपना लंड डाल रहे होंगे?
क्या अंजली चीख रही होगी? क्या वह गांड उठा-उठाकर चुद रही होगी?”
पहले दिन बाबाजी बाहर आये और उन्हों ने इशारे से कहा अन्दर जाओ। सूरज अन्दर गया देखा अपनी बीवी सज के बैठी है। लेकिन उसके मानसिक संतुलन ने उसे कुछ करने नहीं दिया। थोड़ी देर बैठा और बाहर चला आया।
दूसरे दिन सुरज ने छिपकर दरवाजे के पास कान लगाया। अंदर से हल्की-हल्की सिसकारियाँ, “आह्ह… बाबाजी…” और “धीरे… फट रही है…” जैसी आवाजें आ रही थीं।
सुरज का खून खौल गया। लेकिन अपने आप को संभाल लिया। ऐसे लोगो पर शक करना मतलब खुद के लिए मुसीबत खड़ी करना सामान था।
तीसरे दिन जब बाबा कमरे से बाहर आए, तो अंजली का चेहरा पूरी तरह लाल था, होंठ सूजे हुए थे, साड़ी अस्त-व्यस्त थी और चलते समय वह जाँघें कसकर बंद किए हुए थी। सुरज ने साफ देखा कि अंजली की चाल लड़खड़ा रही थी - जैसे कोई उसे रात भर जोर-जोर से चोदा हो।
सुरज अब और नहीं सह पा रहा था। प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
रात को जब अंजली सोने आई, तो सुरज ने उससे पूछा, “अंजली… सच-सच बताओ… अंदर क्या होता है?
बाबा सिर्फ मंत्र पढ़ते हैं या… कुछ और भी?”
अंजली ने शर्मा कर नजरें झुका लीं और बोली, “सुरज… गुरुजी आते हैं… वो हमारे शरीर को शुद्ध करते हैं। तुम समझ नहीं सकते।”
सुरज का गुस्सा और शक दोनों बढ़ गए। वह मन ही मन ठान चुका था -
“चौथे दिन मैं खुद देखूँगा। चाहे जो हो जाए, मैं उस कमरे में घुसकर देखूँगा कि मेरी बीवी के साथ क्या हो रहा है। अगर बाबा उसे चोद रहा होगा… तो मैं… मैं…”
सुरज की आँखों में आग थी। उसने चुपचाप एक छोटा चाकू अपने पास रख लिया और चौथे दिन का इंतजार करने लगा।
उधर बाबा को सुरज के शक का अंदाजा हो चुका था, लेकिन वे मुस्कुराते हुए सोच रहे थे - “देखते हैं… यह भोसमारिका,लड़का क्या करता है। अगर चुदाई समारोह में घुसा तो… उसे भी शामिल कर लेंगे… या फिर…मन्त्र-तंत्र तो है ही, वह नहीं मानेगा तो क्या हुआ! बाकि सभी लोग मुज स काफी डरते है और जो मैं कहूँगा वही होना है अब इस घर में। यहाँ की सभी महिलाए अब मेरी बन चुकी है, मतलब मेरे कहने में वह कुछ भी कर सकती है। माँ-बेटी और बहु सभी अब मेरे इस लंड की गुलाम है और यह मुखिया चुटिया है, उसे कुछ समज आता नहीं और वह भी मेरे हर शब्द को पकड़ के जैसा मैं चाहता हूँ चुप-चाप करते जा रहा है।”
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क्रमश:
आज के लिए यही तक.
मैत्री की तरफ से जय भारत।।
वह रात भर सो नहीं पाया। बार-बार वही दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम रहा था - अंजली दुल्हन की तरह सजी हुई, कमरे का बंद दरवाजा, बाबा अंदर घंटों तक रहना, और फिर जब बाबा बाहर आते थे तो अंजली का चेहरा लाल, साँसें तेज, आँखों में एक अजीब नशा और शरीर पर पसीने की चमक।
सुरज ने मन ही मन सोचा - “चार दिन तक रोज सुहागरात? क्या यह सब संभव है? क्या सच में इतनी पूजा की जरूरत है? क्या सच में उपरवाला बाबा के शरीर में आते हैं? या… ये सब सिर्फ एक बहाना है? यह सब क्या चुतियापा है? बहनचोद, कुछ समज में नहीं आ रहा।”
जैसे जैसे समय चलता गया, उसकी शंका दिन-ब-दिन बढ़ती गई।
पहले दिन जब अंजली दुल्हन की तरह तैयार होकर कमरे में गई, सुरज बाहर खड़ा था। उसने देखा कि अंजली के चेहरे पर शर्म के साथ एक अजीब सी चमक थी। जब बाबा भी अंदर गए और दरवाजा बंद हुआ, तो सुरज का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। लेखिका मैत्री है।
वह सोचने लगा;
“मेरी पत्नी… मेरी अंजली… जिसे मैंने कभी छुआ तक नहीं… आज चार दिन तक इस बाबा के साथ अकेली रहेगी?
क्या सच में सिर्फ मंत्र पढ़ रहे होंगे?
या… बाबा उसकी चूत में अपना लंड डाल रहे होंगे?
क्या अंजली चीख रही होगी? क्या वह गांड उठा-उठाकर चुद रही होगी?”
पहले दिन बाबाजी बाहर आये और उन्हों ने इशारे से कहा अन्दर जाओ। सूरज अन्दर गया देखा अपनी बीवी सज के बैठी है। लेकिन उसके मानसिक संतुलन ने उसे कुछ करने नहीं दिया। थोड़ी देर बैठा और बाहर चला आया।
दूसरे दिन सुरज ने छिपकर दरवाजे के पास कान लगाया। अंदर से हल्की-हल्की सिसकारियाँ, “आह्ह… बाबाजी…” और “धीरे… फट रही है…” जैसी आवाजें आ रही थीं।
सुरज का खून खौल गया। लेकिन अपने आप को संभाल लिया। ऐसे लोगो पर शक करना मतलब खुद के लिए मुसीबत खड़ी करना सामान था।
तीसरे दिन जब बाबा कमरे से बाहर आए, तो अंजली का चेहरा पूरी तरह लाल था, होंठ सूजे हुए थे, साड़ी अस्त-व्यस्त थी और चलते समय वह जाँघें कसकर बंद किए हुए थी। सुरज ने साफ देखा कि अंजली की चाल लड़खड़ा रही थी - जैसे कोई उसे रात भर जोर-जोर से चोदा हो।
सुरज अब और नहीं सह पा रहा था। प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
रात को जब अंजली सोने आई, तो सुरज ने उससे पूछा, “अंजली… सच-सच बताओ… अंदर क्या होता है?
बाबा सिर्फ मंत्र पढ़ते हैं या… कुछ और भी?”
अंजली ने शर्मा कर नजरें झुका लीं और बोली, “सुरज… गुरुजी आते हैं… वो हमारे शरीर को शुद्ध करते हैं। तुम समझ नहीं सकते।”
सुरज का गुस्सा और शक दोनों बढ़ गए। वह मन ही मन ठान चुका था -
“चौथे दिन मैं खुद देखूँगा। चाहे जो हो जाए, मैं उस कमरे में घुसकर देखूँगा कि मेरी बीवी के साथ क्या हो रहा है। अगर बाबा उसे चोद रहा होगा… तो मैं… मैं…”
सुरज की आँखों में आग थी। उसने चुपचाप एक छोटा चाकू अपने पास रख लिया और चौथे दिन का इंतजार करने लगा।
उधर बाबा को सुरज के शक का अंदाजा हो चुका था, लेकिन वे मुस्कुराते हुए सोच रहे थे - “देखते हैं… यह भोसमारिका,लड़का क्या करता है। अगर चुदाई समारोह में घुसा तो… उसे भी शामिल कर लेंगे… या फिर…मन्त्र-तंत्र तो है ही, वह नहीं मानेगा तो क्या हुआ! बाकि सभी लोग मुज स काफी डरते है और जो मैं कहूँगा वही होना है अब इस घर में। यहाँ की सभी महिलाए अब मेरी बन चुकी है, मतलब मेरे कहने में वह कुछ भी कर सकती है। माँ-बेटी और बहु सभी अब मेरे इस लंड की गुलाम है और यह मुखिया चुटिया है, उसे कुछ समज आता नहीं और वह भी मेरे हर शब्द को पकड़ के जैसा मैं चाहता हूँ चुप-चाप करते जा रहा है।”
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क्रमश:
आज के लिए यही तक.
मैत्री की तरफ से जय भारत।।




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