16-06-2026, 01:37 PM
इसके बाद मैंने काजल की भरी हुई बोब्लो को जोर से दबाना शुरू किया और उल्टा होकर उसकी चूत चाटने लगा। मेरी जीभ उसकी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी। कमरा पूरी तरह कामवासना और चूत चाटने की आवाजों से भर गया था। बाकी दो औरतें भी इसमें शामिल हो गईं और अब सिर्फ़ सेक्स ही था।
फिर मैंने अपना लंड काजल की चूत पर रखा और धीरे-धीरे अंदर की खाली जगह को भरने लगा। काजल अब पूरी तरह तैयार थी। मैंने उसकी जमकर चुदाई की। मैंने उसे ज़ोर-ज़ोर से और जैसे चाहा वैसे चोदा। काजल भी अपनी गांड उठा-उठाकर मेरा ज़ोर-ज़ोर से साथ दे रही थी। अब कोई शर्म नहीं थी।
आखिर में काजल ने मुझे लेटा दिया, वो मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे लंड पर बैठ गई और उछल-उछलकर मेरे लंड से खुद को चोदने लगी। यह खेल एक घंटे तक चलता रहा। आखिर में मैंने काजल की चूत को अपने लंड के जूस से भर दिया। अब वो तीनों बहुत खुश और सैटिस्फाइड लग रही थीं। यह काम-कार्य हो जाने के बाद भी, वे मेरे लंड से खेलती रहीं। कभी उन तीनों बचा हुआ वीर्य और उनके चुतरस अपने मुँह में डालकर चूसती, कभी मेरा पूरा लंड उनके मुँह में लेकर चूसती-चाटती। वो तीनों मज़े ले रही थीं। कोई कुछ नहीं बोली, बस काम चल रहा था और मैं बिस्तर पर लेटा यह सीन देख रहा था। लंड में कोई उम्मीद बची नहीं थी कि मैं उन्हें फिर से चोद सकूँ। मैत्री की रचना।
सात दिनों तक, मैंने काजल, अंजलि और चंपा को अलग-अलग तरीकों से चोदा - कभी माँ-बेटी के साथ, कभी गांड के साथ, कभी मुँह से, कभी उन तीनों के साथ। कभी-कभी, मैंने उन्हें एक साथ नंगा करके चोदा, जबकि वे एक-दूसरे की चूत चाट रही थीं। कोई टाइम लिमिट नहीं थी। जब भी मेरा लंड कड़क होता, वे तीनों उसे ढीला करने के लिए तैयार हो जातीं, और करती भी।
7वें दिन जब मुखिया सात नदियों का जल लेकर आया, तो मैंने उस जल से अंजली को नहलाया और मुखिया से कहा कि अंजली के पति सुरज को बुला लो।
अगले दिन सुरज आ गया।
उसे देखते ही मैंने गंभीर होकर कहा, "सूरज, अब अगर तुम मेरे बताए तरीके को अपनाओगे, तो तुम ज़रूर पापा बनोगे।"
लगता था कि सूरज को ऐसी बातों पर यकीन नहीं था। लेकिन, अपने ससुराल वालों और बाकी घरवालों के ज़ोर देने पर सूरज मान गया।
मैंने कहा, "अगले चार दिनों तक अंजलि रोज़ दुल्हन की तरह सजेगी। हम कमरे में अगरबत्ती जलाएंगे और मंत्र पढ़ेंगे। जब मैं बाहर आऊंगा, तो तुम अंदर जाकर उसके साथ अपने तरीके से सुहागरात मनाओगे। यह चार दिनों तक चलेगा।" प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
सूरज ने कहा, "ठीक है," लेकिन उसके दिल में गहरे शक पैदा हो रहे थे। उसने मन ही मन कुछ तय कर लिया था...
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जुड़े रहिये दोस्तों.
मैत्री.
फिर मैंने अपना लंड काजल की चूत पर रखा और धीरे-धीरे अंदर की खाली जगह को भरने लगा। काजल अब पूरी तरह तैयार थी। मैंने उसकी जमकर चुदाई की। मैंने उसे ज़ोर-ज़ोर से और जैसे चाहा वैसे चोदा। काजल भी अपनी गांड उठा-उठाकर मेरा ज़ोर-ज़ोर से साथ दे रही थी। अब कोई शर्म नहीं थी।
आखिर में काजल ने मुझे लेटा दिया, वो मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे लंड पर बैठ गई और उछल-उछलकर मेरे लंड से खुद को चोदने लगी। यह खेल एक घंटे तक चलता रहा। आखिर में मैंने काजल की चूत को अपने लंड के जूस से भर दिया। अब वो तीनों बहुत खुश और सैटिस्फाइड लग रही थीं। यह काम-कार्य हो जाने के बाद भी, वे मेरे लंड से खेलती रहीं। कभी उन तीनों बचा हुआ वीर्य और उनके चुतरस अपने मुँह में डालकर चूसती, कभी मेरा पूरा लंड उनके मुँह में लेकर चूसती-चाटती। वो तीनों मज़े ले रही थीं। कोई कुछ नहीं बोली, बस काम चल रहा था और मैं बिस्तर पर लेटा यह सीन देख रहा था। लंड में कोई उम्मीद बची नहीं थी कि मैं उन्हें फिर से चोद सकूँ। मैत्री की रचना।
सात दिनों तक, मैंने काजल, अंजलि और चंपा को अलग-अलग तरीकों से चोदा - कभी माँ-बेटी के साथ, कभी गांड के साथ, कभी मुँह से, कभी उन तीनों के साथ। कभी-कभी, मैंने उन्हें एक साथ नंगा करके चोदा, जबकि वे एक-दूसरे की चूत चाट रही थीं। कोई टाइम लिमिट नहीं थी। जब भी मेरा लंड कड़क होता, वे तीनों उसे ढीला करने के लिए तैयार हो जातीं, और करती भी।
7वें दिन जब मुखिया सात नदियों का जल लेकर आया, तो मैंने उस जल से अंजली को नहलाया और मुखिया से कहा कि अंजली के पति सुरज को बुला लो।
अगले दिन सुरज आ गया।
उसे देखते ही मैंने गंभीर होकर कहा, "सूरज, अब अगर तुम मेरे बताए तरीके को अपनाओगे, तो तुम ज़रूर पापा बनोगे।"
लगता था कि सूरज को ऐसी बातों पर यकीन नहीं था। लेकिन, अपने ससुराल वालों और बाकी घरवालों के ज़ोर देने पर सूरज मान गया।
मैंने कहा, "अगले चार दिनों तक अंजलि रोज़ दुल्हन की तरह सजेगी। हम कमरे में अगरबत्ती जलाएंगे और मंत्र पढ़ेंगे। जब मैं बाहर आऊंगा, तो तुम अंदर जाकर उसके साथ अपने तरीके से सुहागरात मनाओगे। यह चार दिनों तक चलेगा।" प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
सूरज ने कहा, "ठीक है," लेकिन उसके दिल में गहरे शक पैदा हो रहे थे। उसने मन ही मन कुछ तय कर लिया था...
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मैत्री.



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