15-06-2026, 11:52 PM
(This post was last modified: 15-06-2026, 11:58 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
शाम के सात बज रहे थे।
राज अभी-अभी ऑफिस से लौटा था। शर्ट की बटनें खुली, चेहरे पर थकान, लेकिन आँखों में वही शरारत — जो हमेशा रहती थी। उसने बैग सोफे पर फेंका और सुमन के पास आकर बैठ गया।
सुमन किचन में थी। खाना बना रही थी
![[Image: z-image-turbo-00020.png]](https://i.postimg.cc/jqFhKDDZ/z-image-turbo-00020.png)
— राज की पसंद का मटन, हाथी मिर्च, और गरमा-गरम रोटियाँ। लेकिन उसके हाथों की रफ्तार आज धीमी थी। कुछ बेचैन थी वह। जैसे हवा में कोई अधूरा सा एहसास तैर रहा हो।
राज ने उसे अपने पास बुलाया। "आ, यहाँ बैठ। बात करनी है।"
सुमन ने हाथ पोंछे, एप्रन उतारा और सोफे पर राज के बगल में आकर बैठ गई। उसका शरीर राज की तरफ झुक गया — जैसे कह रहा हो, 'मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ।'
राज ने उसकी आँखों में देखा। गहराई में।
"सुन..." उसने एक लंबी साँस ली। "मुझे एक हफ्ते के लिए बाहर जाना है। बिजनेस ट्रिप। कल सुबह की फ्लाइट है।"
सुमन का चेहरा तुरंत बदल गया।
वह मुस्कुरा रही थी — बस एक सेकंड पहले तक। अब उसकी मुस्कान गायब थी। उसकी आँखों में कोहरा छा गया। उसने राज की कमर पकड़ ली — जैसे वह उसे जाने नहीं देना चाहती थी।
"एक हफ्ता?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "सात दिन? राज, तुम मुझे अकेला छोड़कर जाओगे?"
राज ने सिर हिलाया। "काम है। बहुत जरूरी। रुक नहीं सकता।"
सुमन चुप हो गई। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने राज की तरफ देखा — और उसकी आँखों में वह भूख थी। वह ज्वाला जो राज ने खुद जलाई थी। और अब वह उसे बुझाए बिना जा रहा था।
"तुम मुझे तड़पता छोड़के जाओगे," सुमन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में दर्द था — और साथ ही, एक गहरी, जलती हुई चाहत। "मेरी ये प्यास जो अब और बढ़ गई है... इसे कौन बुझाएगा?"
उसने अपना हाथ राज के सीने पर रखा। उसके निप्पल उसी समय सख्त हो गए थे — बस राज के स्पर्श से, बस राज की बातों से।
राज एक पल चुप रहा। फिर वह मुस्कुराया। शैतानी से। उसी मुस्कान के साथ जिसने सुमन को राँड बना दिया था — जिसने उसे अपनी सीमाओं से आज़ाद कर दिया था।
"मिश्रा जी हैं ना," उसने कहा।
सन्नाटा।
सुमन ने पहले समझा नहीं। फिर उसकी आँखें फट गईं। उसने राज की छाती पर मुक्का मारा। एक नहीं, दो नहीं — बार-बार। मारा, हँसी, फिर मारा।
"गंदे कहीं के!" सुमन चिल्लाई। "बदमाश! हरामी! मिश्रा अंकल! तूने मुझे राँड बना दिया और अब मिश्रा अंकल के पास छोड़के जा रहा है?"
राज जोर-जोर से हँस रहा था। उसने सुमन का हाथ पकड़ लिया — मुक्का मारते हुए — और उसे अपने सीने से चिपका लिया।
"तेरे अलावा किसी और का लंड मेरी चूत में नहीं घुसेगा," सुमन ने उसके कान में फुसफुसाया। "याद रखना। लेकिन तू जा रहा है... तो मैं अपनी उँगलियों से काम चला लूँगी। और रात-रात तेरी फोटो देखती रहूँगी।"
राज ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। उसके होठों पर एक किस किया। लंबा, गीला, गहरा।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "इसलिए तुझपे भरोसा है।"
राज अभी-अभी ऑफिस से लौटा था। शर्ट की बटनें खुली, चेहरे पर थकान, लेकिन आँखों में वही शरारत — जो हमेशा रहती थी। उसने बैग सोफे पर फेंका और सुमन के पास आकर बैठ गया।
सुमन किचन में थी। खाना बना रही थी
![[Image: z-image-turbo-00020.png]](https://i.postimg.cc/jqFhKDDZ/z-image-turbo-00020.png)
— राज की पसंद का मटन, हाथी मिर्च, और गरमा-गरम रोटियाँ। लेकिन उसके हाथों की रफ्तार आज धीमी थी। कुछ बेचैन थी वह। जैसे हवा में कोई अधूरा सा एहसास तैर रहा हो।
राज ने उसे अपने पास बुलाया। "आ, यहाँ बैठ। बात करनी है।"
सुमन ने हाथ पोंछे, एप्रन उतारा और सोफे पर राज के बगल में आकर बैठ गई। उसका शरीर राज की तरफ झुक गया — जैसे कह रहा हो, 'मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ।'
राज ने उसकी आँखों में देखा। गहराई में।
"सुन..." उसने एक लंबी साँस ली। "मुझे एक हफ्ते के लिए बाहर जाना है। बिजनेस ट्रिप। कल सुबह की फ्लाइट है।"
सुमन का चेहरा तुरंत बदल गया।
वह मुस्कुरा रही थी — बस एक सेकंड पहले तक। अब उसकी मुस्कान गायब थी। उसकी आँखों में कोहरा छा गया। उसने राज की कमर पकड़ ली — जैसे वह उसे जाने नहीं देना चाहती थी।
"एक हफ्ता?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "सात दिन? राज, तुम मुझे अकेला छोड़कर जाओगे?"
राज ने सिर हिलाया। "काम है। बहुत जरूरी। रुक नहीं सकता।"
सुमन चुप हो गई। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने राज की तरफ देखा — और उसकी आँखों में वह भूख थी। वह ज्वाला जो राज ने खुद जलाई थी। और अब वह उसे बुझाए बिना जा रहा था।
"तुम मुझे तड़पता छोड़के जाओगे," सुमन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में दर्द था — और साथ ही, एक गहरी, जलती हुई चाहत। "मेरी ये प्यास जो अब और बढ़ गई है... इसे कौन बुझाएगा?"
उसने अपना हाथ राज के सीने पर रखा। उसके निप्पल उसी समय सख्त हो गए थे — बस राज के स्पर्श से, बस राज की बातों से।
राज एक पल चुप रहा। फिर वह मुस्कुराया। शैतानी से। उसी मुस्कान के साथ जिसने सुमन को राँड बना दिया था — जिसने उसे अपनी सीमाओं से आज़ाद कर दिया था।
"मिश्रा जी हैं ना," उसने कहा।
सन्नाटा।
सुमन ने पहले समझा नहीं। फिर उसकी आँखें फट गईं। उसने राज की छाती पर मुक्का मारा। एक नहीं, दो नहीं — बार-बार। मारा, हँसी, फिर मारा।
"गंदे कहीं के!" सुमन चिल्लाई। "बदमाश! हरामी! मिश्रा अंकल! तूने मुझे राँड बना दिया और अब मिश्रा अंकल के पास छोड़के जा रहा है?"
राज जोर-जोर से हँस रहा था। उसने सुमन का हाथ पकड़ लिया — मुक्का मारते हुए — और उसे अपने सीने से चिपका लिया।
"तेरे अलावा किसी और का लंड मेरी चूत में नहीं घुसेगा," सुमन ने उसके कान में फुसफुसाया। "याद रखना। लेकिन तू जा रहा है... तो मैं अपनी उँगलियों से काम चला लूँगी। और रात-रात तेरी फोटो देखती रहूँगी।"
राज ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। उसके होठों पर एक किस किया। लंबा, गीला, गहरा।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "इसलिए तुझपे भरोसा है।"


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