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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#31
"हैलो?"

राज की आवाज़ — "क्या कर रही है?"

सुमन ने साँस ली। उसकी आवाज़ सामान्य रखने की कोशिशलेकिन उसकी साँसें भारी थीं। "बस... कुछ नहीं। कॉफी पी रही थी।"

मिश्रा अंकल की उँगली अंदर चली गईऔर गहरी। सुमन की साँसें फट गईं। उसने मुँह पर हाथ रख लिया।

[Image: z-image-turbo-00017.png]

"आवाज़ क्यों फट रही है?" राज ने पूछा। उसकी आवाज़ में शक नहीं थावह जानता था। वह समझ गया था। और वह खेल रहा था।

"कुछ... कुछ नहीं," सुमन ने कहा। "बस... अकेले में थोड़ी... थोड़ी गरमी लग रही है।"

मिश्रा अंकल ने दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी। अब दो उँगलियाँसुमन की चूत के अंदर, अलग-अलग दिशाओं में घूम रही थीं। उनका अंगूठा सुमन के भग्ते पर दब रहा थाजोर से।

सुमन चुप रहने की कोशिश कर रही थीलेकिन उसकी साँसें बता रही थीं सब कुछ। "हाँ... हाँ राज... मैं ठीक हूँ..."

"तुझे पता है," राज ने धीरे से कहा, "मैं यहाँ बैठा तेरी आवाज़ सुन रहा हूँ। और मेरा लंड खड़ा हो गया है। तू कुछ कर रही है। बता।"

सुमन ने अपने होंठ काट लिए। उसकी चूत फट रही थीपानी निकल रहा था, मिश्रा अंकल के हाथ पर टपक रहा था, उनकी लुंगी पर, सोफे पर।

"बस... अंकल आए थे... चाय पीने..."

"कौन अंकल?"

"मिश्रा... मिश्रा अंकल..."

राज चुप हो गया। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उसकी आवाज़ आईगहरी, काँपती हुई। "और?"

सुमन ने आँखें बंद कर लीं। मिश्रा अंकल की दोनों उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर आगे-पीछे हो रही थींतेज़ होती जा रही थीं।

"उनकी उँगलियाँ... मेरे अंदर हैं, राज। दो... दो उँगलियाँ।"

राज ने लाइन पर साँस ली। लंबी, गहरी साँस।

"बोल रही है?"

"हाँ... और मैं... मैं रही हूँ, राज... बस अब..."

" जा। उनके हाथ पर जा।"

सुमन चिल्ला उठी। कॉल के बीच में ही। उसकी चूत ने मिश्रा अंकल की उँगलियों को दबोच लियाजोर से, बार-बार, धक्के के साथ। उसका पानी फूट निकलासोफे पर गिरा, मिश्रा अंकल की गोद में, उनके लंड पर।

मिश्रा अंकल भी गएउनका लंड फूट गया, सुमन की जांघों पर, सोफे पर, फर्श पर। बूढ़े आदमी का वीर्यगाढ़ा, गर्म, पीला सासुमन की गोरी जांघों पर चिपक गया।

सुमन का शरीर ढीला पड़ गया। वह सोफे पर गिर गईमिश्रा अंकल के बगल में। उसने फोन उठायाअभी भी कॉल चालू थी।

"राज... मैं गई..."

राज की आवाज़ काँप रही थी। "मैं भी, सुनकर ही... अभी-अभी... पेंट में ही..."

सुमन मुस्कुराई। थकी हुई, गीली, गन्दी मुस्कान।
[b]"अब," राज ने कहा, "अंकल को धन्यवाद कहो और विदा करो। मैं शाम को जल्दी रहा हूँ। तुझे अभी कुछ और करना है आज।"[/b]
"क्या?"
"बताऊँगा। पहले अंकल को भेज। और खुद को साफ मत करना। मैं जब आऊँ तब।"
कॉल डिसकनेक्ट हो गई।

सुमन ने फोन रखा। मिश्रा अंकल उसके बगल में बैठे थेउनकी साँसें तेज़ थीं, उनके हाथ अभी भी गीले थेसुमन के पानी से। उनका लंड अब ढीला पड़ गया था, उनकी जांघों पर गिरा हुआ।

सुमन ने उनकी तरफ देखा। उसने उनके गाल पर एक हल्का सा किस किया।

"थैंक यू अंकल," उसने कहा। "अब जाओ। पत्नी जी को कुछ शक हो।"

मिश्रा अंकल ने सिर हिलाया। वह उठे। लुंगी सँभाली। उनका लंड अंदर किया। वह काँपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े।

बाहर निकलते समय वह मुड़ेउनकी आँखों में पानी था। भूख नहींकुछ और। शायद एहसान। शायद गिल्ट। शायद प्यार।

"कल... कल फिर आऊँ?" उन्होंने पूछा।

सुमन मुस्कुराई। "देखते हैं अंकल। राज से पूछूँगी।"

दरवाज़ा बंद हुआ।

सुमन अकेली रह गई। वह सोफे पर नंगी बैठी थीउसकी चूत से पानी टपक रहा था, उसकी जांघों पर अंकल का वीर्य सूख रहा था, सोफे पर दोनों के शरीर के निशान थे।

उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपना ही पानीऔर अंकल का भी। उसने उसे सूंघा। फिर चाट लिया।
[b][b]फिर वह अंदर चली गई। इंतज़ार करने लगीराज का, शाम का[/b][/b]
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 15-06-2026, 11:47 PM



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