15-06-2026, 11:47 PM
(This post was last modified: 16-06-2026, 12:01 AM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
"हैलो?"
राज की आवाज़ — "क्या कर रही है?"
सुमन ने साँस ली। उसकी आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश — लेकिन उसकी साँसें भारी थीं। "बस... कुछ नहीं। कॉफी पी रही थी।"
मिश्रा अंकल की उँगली अंदर चली गई — और गहरी। सुमन की साँसें फट गईं। उसने मुँह पर हाथ रख लिया।
![[Image: z-image-turbo-00017.png]](https://i.postimg.cc/cLNNTz9w/z-image-turbo-00017.png)
"आवाज़ क्यों फट रही है?" राज ने पूछा। उसकी आवाज़ में शक नहीं था — वह जानता था। वह समझ गया था। और वह खेल रहा था।
"कुछ... कुछ नहीं," सुमन ने कहा। "बस... अकेले में थोड़ी... थोड़ी गरमी लग रही है।"
मिश्रा अंकल ने दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी। अब दो उँगलियाँ — सुमन की चूत के अंदर, अलग-अलग दिशाओं में घूम रही थीं। उनका अंगूठा सुमन के भग्ते पर दब रहा था — जोर से।
सुमन चुप रहने की कोशिश कर रही थी — लेकिन उसकी साँसें बता रही थीं सब कुछ। "हाँ... हाँ राज... मैं ठीक हूँ..."
"तुझे पता है," राज ने धीरे से कहा, "मैं यहाँ बैठा तेरी आवाज़ सुन रहा हूँ। और मेरा लंड खड़ा हो गया है। तू कुछ कर रही है। बता।"
सुमन ने अपने होंठ काट लिए। उसकी चूत फट रही थी — पानी निकल रहा था, मिश्रा अंकल के हाथ पर टपक रहा था, उनकी लुंगी पर, सोफे पर।
"बस... अंकल आए थे... चाय पीने..."
"कौन अंकल?"
"मिश्रा... मिश्रा अंकल..."
राज चुप हो गया। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उसकी आवाज़ आई — गहरी, काँपती हुई। "और?"
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। मिश्रा अंकल की दोनों उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर आगे-पीछे हो रही थीं — तेज़ होती जा रही थीं।
"उनकी उँगलियाँ... मेरे अंदर हैं, राज। दो... दो उँगलियाँ।"
राज ने लाइन पर साँस ली। लंबी, गहरी साँस।
"बोल रही है?"
"हाँ... और मैं... मैं आ रही हूँ, राज... बस अब..."
"आ जा। उनके हाथ पर आ जा।"
सुमन चिल्ला उठी। कॉल के बीच में ही। उसकी चूत ने मिश्रा अंकल की उँगलियों को दबोच लिया — जोर से, बार-बार, धक्के के साथ। उसका पानी फूट निकला — सोफे पर गिरा, मिश्रा अंकल की गोद में, उनके लंड पर।
मिश्रा अंकल भी आ गए — उनका लंड फूट गया, सुमन की जांघों पर, सोफे पर, फर्श पर। बूढ़े आदमी का वीर्य — गाढ़ा, गर्म, पीला सा — सुमन की गोरी जांघों पर चिपक गया।
सुमन का शरीर ढीला पड़ गया। वह सोफे पर गिर गई — मिश्रा अंकल के बगल में। उसने फोन उठाया — अभी भी कॉल चालू थी।
"राज... मैं आ गई..."
राज की आवाज़ काँप रही थी। "मैं भी, सुनकर ही... अभी-अभी... पेंट में ही..."
सुमन मुस्कुराई। थकी हुई, गीली, गन्दी मुस्कान।
[b]"अब," राज ने कहा, "अंकल को धन्यवाद कहो और विदा करो। मैं शाम को जल्दी आ रहा हूँ। तुझे अभी कुछ और करना है आज।"[/b]
"क्या?"
"बताऊँगा। पहले अंकल को भेज। और खुद को साफ मत करना। मैं जब आऊँ तब।"
कॉल डिसकनेक्ट हो गई।
सुमन ने फोन रखा। मिश्रा अंकल उसके बगल में बैठे थे — उनकी साँसें तेज़ थीं, उनके हाथ अभी भी गीले थे — सुमन के पानी से। उनका लंड अब ढीला पड़ गया था, उनकी जांघों पर गिरा हुआ।
सुमन ने उनकी तरफ देखा। उसने उनके गाल पर एक हल्का सा किस किया।
"थैंक यू अंकल," उसने कहा। "अब जाओ। पत्नी जी को कुछ शक न हो।"
मिश्रा अंकल ने सिर हिलाया। वह उठे। लुंगी सँभाली। उनका लंड अंदर किया। वह काँपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े।
बाहर निकलते समय वह मुड़े — उनकी आँखों में पानी था। भूख नहीं — कुछ और। शायद एहसान। शायद गिल्ट। शायद प्यार।
"कल... कल फिर आऊँ?" उन्होंने पूछा।
सुमन मुस्कुराई। "देखते हैं अंकल। राज से पूछूँगी।"
दरवाज़ा बंद हुआ।
सुमन अकेली रह गई। वह सोफे पर नंगी बैठी थी — उसकी चूत से पानी टपक रहा था, उसकी जांघों पर अंकल का वीर्य सूख रहा था, सोफे पर दोनों के शरीर के निशान थे।
उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपना ही पानी — और अंकल का भी। उसने उसे सूंघा। फिर चाट लिया।
[b][b]फिर वह अंदर चली गई। इंतज़ार करने लगी — राज का, शाम का[/b][/b]
राज की आवाज़ — "क्या कर रही है?"
सुमन ने साँस ली। उसकी आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश — लेकिन उसकी साँसें भारी थीं। "बस... कुछ नहीं। कॉफी पी रही थी।"
मिश्रा अंकल की उँगली अंदर चली गई — और गहरी। सुमन की साँसें फट गईं। उसने मुँह पर हाथ रख लिया।
![[Image: z-image-turbo-00017.png]](https://i.postimg.cc/cLNNTz9w/z-image-turbo-00017.png)
"आवाज़ क्यों फट रही है?" राज ने पूछा। उसकी आवाज़ में शक नहीं था — वह जानता था। वह समझ गया था। और वह खेल रहा था।
"कुछ... कुछ नहीं," सुमन ने कहा। "बस... अकेले में थोड़ी... थोड़ी गरमी लग रही है।"
मिश्रा अंकल ने दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी। अब दो उँगलियाँ — सुमन की चूत के अंदर, अलग-अलग दिशाओं में घूम रही थीं। उनका अंगूठा सुमन के भग्ते पर दब रहा था — जोर से।
सुमन चुप रहने की कोशिश कर रही थी — लेकिन उसकी साँसें बता रही थीं सब कुछ। "हाँ... हाँ राज... मैं ठीक हूँ..."
"तुझे पता है," राज ने धीरे से कहा, "मैं यहाँ बैठा तेरी आवाज़ सुन रहा हूँ। और मेरा लंड खड़ा हो गया है। तू कुछ कर रही है। बता।"
सुमन ने अपने होंठ काट लिए। उसकी चूत फट रही थी — पानी निकल रहा था, मिश्रा अंकल के हाथ पर टपक रहा था, उनकी लुंगी पर, सोफे पर।
"बस... अंकल आए थे... चाय पीने..."
"कौन अंकल?"
"मिश्रा... मिश्रा अंकल..."
राज चुप हो गया। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उसकी आवाज़ आई — गहरी, काँपती हुई। "और?"
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। मिश्रा अंकल की दोनों उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर आगे-पीछे हो रही थीं — तेज़ होती जा रही थीं।
"उनकी उँगलियाँ... मेरे अंदर हैं, राज। दो... दो उँगलियाँ।"
राज ने लाइन पर साँस ली। लंबी, गहरी साँस।
"बोल रही है?"
"हाँ... और मैं... मैं आ रही हूँ, राज... बस अब..."
"आ जा। उनके हाथ पर आ जा।"
सुमन चिल्ला उठी। कॉल के बीच में ही। उसकी चूत ने मिश्रा अंकल की उँगलियों को दबोच लिया — जोर से, बार-बार, धक्के के साथ। उसका पानी फूट निकला — सोफे पर गिरा, मिश्रा अंकल की गोद में, उनके लंड पर।
मिश्रा अंकल भी आ गए — उनका लंड फूट गया, सुमन की जांघों पर, सोफे पर, फर्श पर। बूढ़े आदमी का वीर्य — गाढ़ा, गर्म, पीला सा — सुमन की गोरी जांघों पर चिपक गया।
सुमन का शरीर ढीला पड़ गया। वह सोफे पर गिर गई — मिश्रा अंकल के बगल में। उसने फोन उठाया — अभी भी कॉल चालू थी।
"राज... मैं आ गई..."
राज की आवाज़ काँप रही थी। "मैं भी, सुनकर ही... अभी-अभी... पेंट में ही..."
सुमन मुस्कुराई। थकी हुई, गीली, गन्दी मुस्कान।
[b]"अब," राज ने कहा, "अंकल को धन्यवाद कहो और विदा करो। मैं शाम को जल्दी आ रहा हूँ। तुझे अभी कुछ और करना है आज।"[/b]
"क्या?"
"बताऊँगा। पहले अंकल को भेज। और खुद को साफ मत करना। मैं जब आऊँ तब।"
कॉल डिसकनेक्ट हो गई।
सुमन ने फोन रखा। मिश्रा अंकल उसके बगल में बैठे थे — उनकी साँसें तेज़ थीं, उनके हाथ अभी भी गीले थे — सुमन के पानी से। उनका लंड अब ढीला पड़ गया था, उनकी जांघों पर गिरा हुआ।
सुमन ने उनकी तरफ देखा। उसने उनके गाल पर एक हल्का सा किस किया।
"थैंक यू अंकल," उसने कहा। "अब जाओ। पत्नी जी को कुछ शक न हो।"
मिश्रा अंकल ने सिर हिलाया। वह उठे। लुंगी सँभाली। उनका लंड अंदर किया। वह काँपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े।
बाहर निकलते समय वह मुड़े — उनकी आँखों में पानी था। भूख नहीं — कुछ और। शायद एहसान। शायद गिल्ट। शायद प्यार।
"कल... कल फिर आऊँ?" उन्होंने पूछा।
सुमन मुस्कुराई। "देखते हैं अंकल। राज से पूछूँगी।"
दरवाज़ा बंद हुआ।
सुमन अकेली रह गई। वह सोफे पर नंगी बैठी थी — उसकी चूत से पानी टपक रहा था, उसकी जांघों पर अंकल का वीर्य सूख रहा था, सोफे पर दोनों के शरीर के निशान थे।
उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपना ही पानी — और अंकल का भी। उसने उसे सूंघा। फिर चाट लिया।
[b][b]फिर वह अंदर चली गई। इंतज़ार करने लगी — राज का, शाम का[/b][/b]


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