15-06-2026, 11:44 PM
(This post was last modified: 16-06-2026, 12:02 AM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
आवाज़ — बगल वाली बालकनी से। मिश्रा अंकल। आज वह पहले से ही वहाँ खड़े थे। इंतज़ार कर रहे थे। उनकी लुंगी के आगे हल्का सा उभार था — पूरा नहीं, अभी बस शुरुआत। लेकिन उनकी आँखों में वही भूख थी — और कुछ और। एक बेचैनी। जैसे पिछली बार अधूरा रह गया हो।
सुमन मुस्कुराई। "नमस्ते अंकल।"
"बहुत दिन बाद दिखी बेटा। कल नहीं दिखीं।"
सुमन ने कॉफी का घूँट लिया। "कल व्यस्त थी।"
मिश्रा अंकल ने निगल लिया। उनकी नज़र सुमन के स्तनों पर थी — उस नाइटी के नीचे की उभार पर। निप्पल। काला घेरा।
"अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी, मुलायम, लेकिन अंदर से तेज़। "चाय पियोगे? अंदर आ जाओ। बना दूँगी।"
मिश्रा अंकल ठिठक गए। उन्होंने सोचा — शायद मज़ाक कर रही है। लेकिन सुमन के चेहरे पर वह मुस्कान थी — जो ना नहीं कहती।
"पर... पर मैं..."
"आओ न अंकल। घर में कोई नहीं है। राज ऑफिस गया है।"
मिश्रा अंकल ने फिर निगल लिया। उन्होंने अपनी लुंगी सँभाली। अपने घर की तरफ देखा — पत्नी किचन में थी, टीवी चल रहा था, उन्हें कोई नहीं देख रहा था।
वह अपनी बालकनी से अंदर गए। पाँच मिनट बाद — सुमन के दरवाजे पर दस्तक।
खट-खट।
सुमन ने दरवाज़ा खोला। वह वही नाइटी पहने थी। बदली नहीं थी। उसके बाल अभी भी बिखरे हुए थे।
"अंदर आइए अंकल।"
मिश्रा अंकल अंदर आए। उनके हाथ काँप रहे थे। उनकी लुंगी अब पूरी तरह आगे की तरफ तनी हुई थी — उनका लंड सख्त हो चुका था। सुमन ने देखा। वह मुस्कुराई।
"बैठो अंकल। चाय बनाती हूँ।"
सुमन किचन में गई। वह जानबूझकर धीरे चल रही थी — उसकी गांड नाइटी के नीचे से हिल रही थी, एक गाल से दूसरा, लहरा रही थी। मिश्रा अंकल सोफे पर बैठे थे — उनकी नज़रें सुमन की गांड पर थीं। उनके हाथ अपने आप लुंगी के ऊपर चले गए।
सुमन ने चाय बनाना शुरू किया — पानी गरम किया, दूध डाला, चीनी। लेकिन उसका ध्यान किचन पर नहीं था। वह जानती थी कि अंकल क्या कर रहे हैं — अपना लंड मसल रहे हैं। उसकी पीठ उनकी तरफ थी — वह नाइटी इतनी पतली थी कि उसकी चूत के काले बाल पीछे से भी दिख रहे थे, नाइटी के नीचे से झाँक रहे थे।
चाय बन गई। सुमन ने दो कप उठाए — वह लिविंग रूम में आई। उसने एक कप मिश्रा अंकल के सामने रखा। फिर वह उनके बिल्कुल पास बैठ गई। इतना पास कि उसकी जांछ उनकी जांघ से लग रही थी। गर्म। मुलायम।
मिश्रा अंकल ने चाय का कप उठाया — लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि चाय गिरने लगी। उन्होंने कप वापस रख दिया।
"सुमन बेटा..." उनकी आवाज़ फट रही थी। "तुम... तुम बहुत..."
"क्या अंकल?" सुमन ने मासूमियत से पूछा। वह थोड़ा और पास हो गई। अब उसकी चूची उनकी बाँह से लग रही थी — नाइटी के कपड़े के बीच से। मुलायम, गर्म, दब रही थी।
मिश्रा अंकल ने अपना हाथ बढ़ाया।
![[Image: z-image-turbo-00037.png]](https://i.postimg.cc/8C4D7bbc/z-image-turbo-00037.png)
पहले तो हिचकिचाए — फिर अचानक उन्होंने सुमन की चूची पकड़ ली। पूरा हाथ। जोर से।
सुमन ने आह भरी — लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उसने बस देखा — अंकल के चेहरे पर। उनकी आँखों में पानी था — बूढ़े आदमी की भूख, जो सालों से दबी हुई थी।
"अंकल... धीरे..." सुमन ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में मना नहीं थी।
मिश्रा अंकल ने दूसरी चूची भी पकड़ ली। अब दोनों हाथों से वह सुमन की चूचियाँ दबा रहे थे — मसल रहे थे, निचोड़ रहे थे, जैसे पका हुआ फल। निप्पल उनकी हथेलियों के बीच में दब रहे थे, सख्त होकर।
सुमन कराह उठी — "अह्ह... अंकल..."
सुमन मुस्कुराई। "नमस्ते अंकल।"
"बहुत दिन बाद दिखी बेटा। कल नहीं दिखीं।"
सुमन ने कॉफी का घूँट लिया। "कल व्यस्त थी।"
मिश्रा अंकल ने निगल लिया। उनकी नज़र सुमन के स्तनों पर थी — उस नाइटी के नीचे की उभार पर। निप्पल। काला घेरा।
"अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी, मुलायम, लेकिन अंदर से तेज़। "चाय पियोगे? अंदर आ जाओ। बना दूँगी।"
मिश्रा अंकल ठिठक गए। उन्होंने सोचा — शायद मज़ाक कर रही है। लेकिन सुमन के चेहरे पर वह मुस्कान थी — जो ना नहीं कहती।
"पर... पर मैं..."
"आओ न अंकल। घर में कोई नहीं है। राज ऑफिस गया है।"
मिश्रा अंकल ने फिर निगल लिया। उन्होंने अपनी लुंगी सँभाली। अपने घर की तरफ देखा — पत्नी किचन में थी, टीवी चल रहा था, उन्हें कोई नहीं देख रहा था।
वह अपनी बालकनी से अंदर गए। पाँच मिनट बाद — सुमन के दरवाजे पर दस्तक।
खट-खट।
सुमन ने दरवाज़ा खोला। वह वही नाइटी पहने थी। बदली नहीं थी। उसके बाल अभी भी बिखरे हुए थे।
"अंदर आइए अंकल।"
मिश्रा अंकल अंदर आए। उनके हाथ काँप रहे थे। उनकी लुंगी अब पूरी तरह आगे की तरफ तनी हुई थी — उनका लंड सख्त हो चुका था। सुमन ने देखा। वह मुस्कुराई।
"बैठो अंकल। चाय बनाती हूँ।"
सुमन किचन में गई। वह जानबूझकर धीरे चल रही थी — उसकी गांड नाइटी के नीचे से हिल रही थी, एक गाल से दूसरा, लहरा रही थी। मिश्रा अंकल सोफे पर बैठे थे — उनकी नज़रें सुमन की गांड पर थीं। उनके हाथ अपने आप लुंगी के ऊपर चले गए।
सुमन ने चाय बनाना शुरू किया — पानी गरम किया, दूध डाला, चीनी। लेकिन उसका ध्यान किचन पर नहीं था। वह जानती थी कि अंकल क्या कर रहे हैं — अपना लंड मसल रहे हैं। उसकी पीठ उनकी तरफ थी — वह नाइटी इतनी पतली थी कि उसकी चूत के काले बाल पीछे से भी दिख रहे थे, नाइटी के नीचे से झाँक रहे थे।
चाय बन गई। सुमन ने दो कप उठाए — वह लिविंग रूम में आई। उसने एक कप मिश्रा अंकल के सामने रखा। फिर वह उनके बिल्कुल पास बैठ गई। इतना पास कि उसकी जांछ उनकी जांघ से लग रही थी। गर्म। मुलायम।
मिश्रा अंकल ने चाय का कप उठाया — लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि चाय गिरने लगी। उन्होंने कप वापस रख दिया।
"सुमन बेटा..." उनकी आवाज़ फट रही थी। "तुम... तुम बहुत..."
"क्या अंकल?" सुमन ने मासूमियत से पूछा। वह थोड़ा और पास हो गई। अब उसकी चूची उनकी बाँह से लग रही थी — नाइटी के कपड़े के बीच से। मुलायम, गर्म, दब रही थी।
मिश्रा अंकल ने अपना हाथ बढ़ाया।
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पहले तो हिचकिचाए — फिर अचानक उन्होंने सुमन की चूची पकड़ ली। पूरा हाथ। जोर से।
सुमन ने आह भरी — लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उसने बस देखा — अंकल के चेहरे पर। उनकी आँखों में पानी था — बूढ़े आदमी की भूख, जो सालों से दबी हुई थी।
"अंकल... धीरे..." सुमन ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में मना नहीं थी।
मिश्रा अंकल ने दूसरी चूची भी पकड़ ली। अब दोनों हाथों से वह सुमन की चूचियाँ दबा रहे थे — मसल रहे थे, निचोड़ रहे थे, जैसे पका हुआ फल। निप्पल उनकी हथेलियों के बीच में दब रहे थे, सख्त होकर।
सुमन कराह उठी — "अह्ह... अंकल..."


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