14-06-2026, 11:42 PM
(This post was last modified: 14-06-2026, 11:43 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
सड़क पर आकर राज ने सुमन को दीवार से लगा दिया। उसने उसका चेहरा पकड़ा। उसके होठों पर जोर से किस किया — गीला, गरम, लंबा किस। सुमन ने जवाब दिया। उनकी जीभें मिलीं, अलग हुईं, फिर मिलीं।
राज अलग हुआ। उसने सुमन की आँखों में देखा।
"कैसा लगा?" उसने पूछा।
सुमन ने साँस ली। उसकी साँसें अभी भी फट रही थीं।
"लंड... नहीं चाहिए था उनका मेरे अंदर," उसने कहा। "बस इतना। छूना। चूसना। रगड़ना। और देखना — उनकी आँखों में वह भूख, वह पागलपन..."
उसकी चूत अभी भी गीली थी। उसकी जांघों पर पानी टपक रहा था। राज ने अपना हाथ उसके नीचे किया — वह भीगा हुआ था।
"पागल है तू," राज ने मुस्कुराते हुए कहा।
"हाँ," सुमन ने कहा। "तेरे बनाई हुई। अब तू ही संभाल।"
राज ने अपनी उँगलियाँ सुमन की चूत पर रखीं। धीरे-धीरे — ड्रेस के ऊपर से नहीं, ड्रेस के अंदर। सीधा। उसकी उँगलियाँ अंदर घुस गईं। सुमन कराही।
लेकिन राज ने उँगलियाँ बाहर निकाल लीं।
"घर चल," उसने कहा। "अभी नहीं। रात बाकी है।"
सुमन ने अपनी जीभ बाहर निकाली — उसने राज की उँगलियाँ चाट लीं। अपना ही पानी।
फिर दोनों सड़क पर चल पड़े। हाथों में हाथ। राज का लंड अभी भी खड़ा था। सुमन की चूत अभी भी गीली थी।
और पार्क में वे दोनों आदमी अभी भी बैठे थे — थके हुए, शांत, अपने हाथों में लंड पकड़े हुए, जो अभी-अभी सुमन के शरीर पर रगड़ खा रहे थे।
अगली सुबह। साढ़े दस बजे।
सुमन ने नहाया था — नहाया तो था, लेकिन सिर्फ पानी से। कोई साबुन नहीं। रात की पार्क की गंध अभी भी उसके शरीर पर थी — उस मोटे आदमी की लार, युवा लड़के के हाथों का पसीना, और उसकी अपनी चूत का पानी जो रात भर सूखा नहीं था, बल्कि जम गया था — चिपचिपा, चमकदार।
उसने वही पारदर्शी सफेद नाइटी पहनी थी — आज सुबह इसे धोया नहीं था। उस पर कल के डिलीवरी बॉय के वीर्य के धब्बे थे, रात के पार्क की मिट्टी, और उसके अपने शरीर के निशान। कॉफी बनाई। बालकनी में आ गई।
धूप तेज़ थी। गर्मी। उसने अपने बाल खुले छोड़ दिए थे — लहराते, सूखे हुए, बिना कंघी के।
वह बालकनी के रेलिंग पर खड़ी हो गई। अपनी कॉफी पी रही थी। नाइटी के नीचे उसकी चूचियाँ स्वतंत्र थीं — निप्पल कपड़े को आगे की तरफ धकेल रहे थे। उसकी चूत — नाइटी के नीचे से काला उभार — उसकी जांघों के बीच छिपी हुई, लेकिन कपड़ा इतना पतला था कि हर लकीर, हर बाल साफ दिख रहा था।
"सुमन बेटा।"
राज अलग हुआ। उसने सुमन की आँखों में देखा।
"कैसा लगा?" उसने पूछा।
सुमन ने साँस ली। उसकी साँसें अभी भी फट रही थीं।
"लंड... नहीं चाहिए था उनका मेरे अंदर," उसने कहा। "बस इतना। छूना। चूसना। रगड़ना। और देखना — उनकी आँखों में वह भूख, वह पागलपन..."
उसकी चूत अभी भी गीली थी। उसकी जांघों पर पानी टपक रहा था। राज ने अपना हाथ उसके नीचे किया — वह भीगा हुआ था।
"पागल है तू," राज ने मुस्कुराते हुए कहा।
"हाँ," सुमन ने कहा। "तेरे बनाई हुई। अब तू ही संभाल।"
राज ने अपनी उँगलियाँ सुमन की चूत पर रखीं। धीरे-धीरे — ड्रेस के ऊपर से नहीं, ड्रेस के अंदर। सीधा। उसकी उँगलियाँ अंदर घुस गईं। सुमन कराही।
लेकिन राज ने उँगलियाँ बाहर निकाल लीं।
"घर चल," उसने कहा। "अभी नहीं। रात बाकी है।"
सुमन ने अपनी जीभ बाहर निकाली — उसने राज की उँगलियाँ चाट लीं। अपना ही पानी।
फिर दोनों सड़क पर चल पड़े। हाथों में हाथ। राज का लंड अभी भी खड़ा था। सुमन की चूत अभी भी गीली थी।
और पार्क में वे दोनों आदमी अभी भी बैठे थे — थके हुए, शांत, अपने हाथों में लंड पकड़े हुए, जो अभी-अभी सुमन के शरीर पर रगड़ खा रहे थे।
अगली सुबह। साढ़े दस बजे।
सुमन ने नहाया था — नहाया तो था, लेकिन सिर्फ पानी से। कोई साबुन नहीं। रात की पार्क की गंध अभी भी उसके शरीर पर थी — उस मोटे आदमी की लार, युवा लड़के के हाथों का पसीना, और उसकी अपनी चूत का पानी जो रात भर सूखा नहीं था, बल्कि जम गया था — चिपचिपा, चमकदार।
उसने वही पारदर्शी सफेद नाइटी पहनी थी — आज सुबह इसे धोया नहीं था। उस पर कल के डिलीवरी बॉय के वीर्य के धब्बे थे, रात के पार्क की मिट्टी, और उसके अपने शरीर के निशान। कॉफी बनाई। बालकनी में आ गई।
धूप तेज़ थी। गर्मी। उसने अपने बाल खुले छोड़ दिए थे — लहराते, सूखे हुए, बिना कंघी के।
वह बालकनी के रेलिंग पर खड़ी हो गई। अपनी कॉफी पी रही थी। नाइटी के नीचे उसकी चूचियाँ स्वतंत्र थीं — निप्पल कपड़े को आगे की तरफ धकेल रहे थे। उसकी चूत — नाइटी के नीचे से काला उभार — उसकी जांघों के बीच छिपी हुई, लेकिन कपड़ा इतना पतला था कि हर लकीर, हर बाल साफ दिख रहा था।
"सुमन बेटा।"


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