14-06-2026, 11:37 PM
सुमन मुस्कुराई। फिर मुँह में लिया। एक हाथ से लंड पकड़ा, दूसरे से उसकी बॉल्स पर हाथ फेरा — गोल, भरे हुए, गर्म। उसने बॉल्स को दबाया — लड़का कराह उठा।
"मैडम... मैं आ रहा हूँ... रुको..."
लेकिन सुमन ने नहीं रोका। उसने और तेज़ किया। सिरे पर अपनी जीभ तेज़ी से घुमाई, फिर पूरा लंड गले तक ले गई।
लड़के ने आखिरी साँस ली — फिर उसका पूरा शरीर सख्त हो गया। उसके हाथ टेबल छोड़कर सुमन के सिर पर आ गए — उसके बाल पकड़ लिए — अनजाने में, अपने आप।
वह फूटा। सुमन के मुँह में। गर्म, गाढ़ा, तेज़ धार में। पहली धार, दूसरी, तीसरी — उसके गले में जा रहा था, उसके होठों से बाहर निकल रहा था, उसकी ठुड्डी पर टपक रहा था।
सुमन ने सब पी लिया। सब।
लड़का ढीला पड़ गया। उसके घुटने मुड़ गए — वह फर्श पर बैठ गया। पैंट टखनों पर लटक रही थी। उसका लंड अभी भी सख्त था, लेकिन गीला हो चुका था — सुमन की लार से, उसके खुद के पानी से।
सुमन उठी। उसने अपने होठों को पोंछा। फिर उसने अपनी ठुड्डी पर लगा हुआ पानी — लड़के का वीर्य — अपनी उँगली से पोछा और अपने मुँह में डाल लिया।
लड़का उसकी तरफ देख रहा था — उसकी आँखों में डर, पछतावा, और कुछ और... भूख। अभी भी भूख।
"अब उठ," सुमन ने कहा। "खाना ठंडा हो रहा है।"
लड़का उठा। धीरे-धीरे अपनी पैंट पहनी। ज़िप बंद की। बटन बंद किया। उसने बैग उठाया — लेकिन उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।
"मैडम... मैं..."
"जा," सुमन ने कहा। दरवाज़ा खोल दिया। "कल फिर से ऑर्डर करुँगी। कुछ और खाने का।"
लड़का बाहर निकला। सुमन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
वह दरवाज़े की तरफ पीठ करके खड़ी रही। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसकी चूत गीली हो चुकी थी — नाइटी के नीचे से पानी टपक रहा था, उसकी जांघ पर बह रहा था।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। एक उँगली अंदर डाली — गीली, गरम, फूली हुई। वह कराही। फिर दूसरी उँगली डाल दी। दो उँगलियाँ अंदर। आगे-पीछे। आगे-पीछे।
वह बिना किसी को छुए ही आ गई। खड़े-खड़े। दरवाज़े की तरफ पीठ करके। उसका शरीर काँपा, उसकी चूत ने दो उँगलियों को दबोचा, फिर छोड़ दिया। पानी फर्श पर टपक गया।
सुमन दीवार पर झुक गई। मुस्कुराई।
फिर उसने फोन उठाया।
राज का नंबर मिलाया।
राज ने उठाया — "हल्लो?"
"सुन," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में अभी भी काँप थी। "डिलीवरी बॉय आया था। ज़ोमैटो वाला।"
"हाँ?"
"मैंने उसका लंड मुँह में लिया। पूरा पी लिया।"
लाइन के दूसरी तरफ — चुप्पी। फिर साँसें तेज़ हुईं। राज ने धीरे से कहा — "बस? मुँह में?"
"बस। आज के लिए। कल फिर आएगा। शायद तब कुछ और हो।"
राज की साँसें काँप रही थीं। "तू... तूने वीडियो लिया?"
"नहीं। अगली बार लूँगी। तू देखेगा?"
राज ने निगल लिया। "हाँ।"
सुमन मुस्कुराई। "ठीक है। अब काम कर। शाम को मिलते हैं।"
उसने फोन रख दिया।
रात के ग्यारह बज रहे थे।
शहर की सड़कें सूनी पड़ी थीं। लाइटें धुंधली। हवा में ठंडक थी — अक्टूबर के आखिरी दिनों जैसी। सिर्फ कुत्ते भौंक रहे थे कहीं दूर, और कभी-कभार कोई रिक्शा गुजर जाता था।
राज और सुमन उस पार्क में घुस गए थे — जो दिन में बच्चों और बूढ़ों से भरा रहता था, लेकिन रात में उजाड़, सन्नाटा, केवल टूटी हुई बेंचें और सूखे पत्ते। पार्क की रोशनी थी — एक झिलमिलाती, पीली, इतनी धुंधली कि चेहरे नहीं पहचाने जा सकते थे।
सुमन वही काली थाई-स्लिट ड्रेस पहनकर आई थी — वही जो उसने क्लब में पहनी थी। नीचे कुछ नहीं। ब्रा नहीं। चड्डी नहीं। सिर्फ वह ड्रेस, उसके भीतर उसका गर्म, मांसल, नंगा शरीर। बाल खुले थे, कंधों पर बिखरे हुए।
राज उसके पीछे-पीछे चल रहा था। उसके हाथ उसकी गांड पर थे — ड्रेस के ऊपर से, सहला रहे थे, उसकी गांड के गोलपन को महसूस कर रहे थे।
"मैडम... मैं आ रहा हूँ... रुको..."
लेकिन सुमन ने नहीं रोका। उसने और तेज़ किया। सिरे पर अपनी जीभ तेज़ी से घुमाई, फिर पूरा लंड गले तक ले गई।
लड़के ने आखिरी साँस ली — फिर उसका पूरा शरीर सख्त हो गया। उसके हाथ टेबल छोड़कर सुमन के सिर पर आ गए — उसके बाल पकड़ लिए — अनजाने में, अपने आप।
वह फूटा। सुमन के मुँह में। गर्म, गाढ़ा, तेज़ धार में। पहली धार, दूसरी, तीसरी — उसके गले में जा रहा था, उसके होठों से बाहर निकल रहा था, उसकी ठुड्डी पर टपक रहा था।
सुमन ने सब पी लिया। सब।
लड़का ढीला पड़ गया। उसके घुटने मुड़ गए — वह फर्श पर बैठ गया। पैंट टखनों पर लटक रही थी। उसका लंड अभी भी सख्त था, लेकिन गीला हो चुका था — सुमन की लार से, उसके खुद के पानी से।
सुमन उठी। उसने अपने होठों को पोंछा। फिर उसने अपनी ठुड्डी पर लगा हुआ पानी — लड़के का वीर्य — अपनी उँगली से पोछा और अपने मुँह में डाल लिया।
लड़का उसकी तरफ देख रहा था — उसकी आँखों में डर, पछतावा, और कुछ और... भूख। अभी भी भूख।
"अब उठ," सुमन ने कहा। "खाना ठंडा हो रहा है।"
लड़का उठा। धीरे-धीरे अपनी पैंट पहनी। ज़िप बंद की। बटन बंद किया। उसने बैग उठाया — लेकिन उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।
"मैडम... मैं..."
"जा," सुमन ने कहा। दरवाज़ा खोल दिया। "कल फिर से ऑर्डर करुँगी। कुछ और खाने का।"
लड़का बाहर निकला। सुमन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
वह दरवाज़े की तरफ पीठ करके खड़ी रही। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसकी चूत गीली हो चुकी थी — नाइटी के नीचे से पानी टपक रहा था, उसकी जांघ पर बह रहा था।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। एक उँगली अंदर डाली — गीली, गरम, फूली हुई। वह कराही। फिर दूसरी उँगली डाल दी। दो उँगलियाँ अंदर। आगे-पीछे। आगे-पीछे।
वह बिना किसी को छुए ही आ गई। खड़े-खड़े। दरवाज़े की तरफ पीठ करके। उसका शरीर काँपा, उसकी चूत ने दो उँगलियों को दबोचा, फिर छोड़ दिया। पानी फर्श पर टपक गया।
सुमन दीवार पर झुक गई। मुस्कुराई।
फिर उसने फोन उठाया।
राज का नंबर मिलाया।
राज ने उठाया — "हल्लो?"
"सुन," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में अभी भी काँप थी। "डिलीवरी बॉय आया था। ज़ोमैटो वाला।"
"हाँ?"
"मैंने उसका लंड मुँह में लिया। पूरा पी लिया।"
लाइन के दूसरी तरफ — चुप्पी। फिर साँसें तेज़ हुईं। राज ने धीरे से कहा — "बस? मुँह में?"
"बस। आज के लिए। कल फिर आएगा। शायद तब कुछ और हो।"
राज की साँसें काँप रही थीं। "तू... तूने वीडियो लिया?"
"नहीं। अगली बार लूँगी। तू देखेगा?"
राज ने निगल लिया। "हाँ।"
सुमन मुस्कुराई। "ठीक है। अब काम कर। शाम को मिलते हैं।"
उसने फोन रख दिया।
रात के ग्यारह बज रहे थे।
शहर की सड़कें सूनी पड़ी थीं। लाइटें धुंधली। हवा में ठंडक थी — अक्टूबर के आखिरी दिनों जैसी। सिर्फ कुत्ते भौंक रहे थे कहीं दूर, और कभी-कभार कोई रिक्शा गुजर जाता था।
राज और सुमन उस पार्क में घुस गए थे — जो दिन में बच्चों और बूढ़ों से भरा रहता था, लेकिन रात में उजाड़, सन्नाटा, केवल टूटी हुई बेंचें और सूखे पत्ते। पार्क की रोशनी थी — एक झिलमिलाती, पीली, इतनी धुंधली कि चेहरे नहीं पहचाने जा सकते थे।
सुमन वही काली थाई-स्लिट ड्रेस पहनकर आई थी — वही जो उसने क्लब में पहनी थी। नीचे कुछ नहीं। ब्रा नहीं। चड्डी नहीं। सिर्फ वह ड्रेस, उसके भीतर उसका गर्म, मांसल, नंगा शरीर। बाल खुले थे, कंधों पर बिखरे हुए।
राज उसके पीछे-पीछे चल रहा था। उसके हाथ उसकी गांड पर थे — ड्रेस के ऊपर से, सहला रहे थे, उसकी गांड के गोलपन को महसूस कर रहे थे।


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