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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#24
अगली सुबह। ग्यारह बजे।

सुमन अभी तक नहीं नहाई थी। वह उसी पारदर्शी नाइटी में थी जो कल रात पहनी थीसफेद, मसलिन, इतनी पतली कि उसके निप्पल और चूत के काले बाल साफ दिख रहे थे। बिना ब्रा, बिना चड्डी।
वह किचन में कॉफी बना रही थी। राज ऑफिस जा चुका था। घर में सन्नाटा थासिर्फ फ्रिज की गुंजन और बाहर गलियों का हल्का शोर।
फिर दरवाज़े की घंटी बजी।
डिंग डोंग।
सुमन ने झाँका। पीकहोल से देखाएक युवा लड़का। 20 के दशक में। सफेद हेलमेट। हाथ में एक बैगज़ोमैटो का। गोरा सा, दुबला-पतला, घबराई हुई आँखें।
सुमन मुस्कुराई।
उसने दरवाज़ा खोल दिया। पूरा। पीकहोल के लिए नहींउसे सामने देखने के लिए।
लड़के की आँखें फट गईं। उसका हाथ बैग पर सख्त हो गया। उसने सुमन को देखासुबह की धूप में, उस पारदर्शी नाइटी में, उसके बिखरे बालों में, उसकी खुली जांघों में।
बैग उसके हाथ से लगभग गिरा। लड़खड़ाया। उसने बैग पकड़ा।
"मैडम... ऑर्डर..." उसकी आवाज़ फट रही थी।
"अंदर जाओ," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "खाना टेबल पर रख दो।"
लड़के ने निगल लिया। उसने अंदर कदम रखा। जूते दरवाजे पर ही उतार दिएउसके पैर काँप रहे थे।
सुमन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
क्लिक।
लड़का पीछे मुड़कर देखाउसकी आँखों में डर और चाहत दोनों थे। वह टेबल की तरफ बढ़ा। बैग रखा। फिर खड़ा हो गया। जाने कहाँ देखे।
सुमन पीछे थी। वह चुपचाप लड़के के पीछे आकर खड़ी हो गई। उसके बिल्कुल पीछे। इतना पीछे कि उसकी साँसें लड़के की गर्दन पर पड़ रही थीं।
लड़का थर्राया।
"क्या देख रहे हो?" सुमन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ नीची, नम। "हाथ लगाओ अगर देखना है।"
लड़का मुड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने धीरे-धीरे अपना हाथ बढ़ायासुमन के स्तनों की तरफ।
पहले तो उसने बस छुआ। कपड़े के ऊपर से। पारदर्शी नाइटी के ऊपर से। उसकी उँगलियाँ सुमन के निप्पल पर फिर गईंसख्त, खड़ा हुआ, गर्म।
सुमन ने आह भरी। हल्की सी। जैसे गले की गहराई से निकली हो।
लड़के ने धीरे-धीरे हाथ रख दियापूरी हथेली से। सुमन की बाईं चूची। बड़ी, भरी हुई, मुलायम। उसने दबायासुमन की चूची उसकी हथेली में समाने लगी।
"और जोर से," सुमन फुसफुसाई।
लड़के ने जोर से दबाया। दोनों हाथों से। दोनों चूचियाँ। उसने मसल दिया, जैसे आटा गूंथ रहा हो। निचोड़ा, छोड़ा, फिर निचोड़ा। उसकी उँगलियाँ निप्पल पर घूम रही थीं, दबा रही थीं, घुमा रही थीं।
सुमन कराह उठी। अब हल्की नहींखुली। "अह्ह..."
लड़के का लंड उसकी पैंट के अंदर तीर की तरह खड़ा हो चुका था। जींस के कपड़े को आगे की तरफ धकेल रहा था।
सुमन ने अपना हाथ नीचे किया। उसने लड़के की पैंट के ऊपर से उसका लंड पकड़ लिया।
लड़का हाँफ उठा।
"हॉट है," सुमन ने कहा। "गरम। बहुत सख्त।"
उसने धीरे-धीरे लड़के की पैंट की ज़िप खोली। बटन खोला। पैंट नीचे सरका दी। फिर उसने उसकी बॉक्सर पकड़ीनीचे उतारी।
लंड बाहर आया। 7 इंच के करीब। सीधा। गहरे रंग का सिरा। नसें उभरी हुई। पहले से ही पानी टपक रहा थाप्री-कम।
सुमन ने उसे पकड़ लिया। गर्म, सख्त, धड़कता हुआ। उसने एक बार ऊपर से नीचे कियाउसकी उँगलियाँ सिरे पर घूम गईं, वह गीला पानी उसके हाथ में लग गया।
लड़के के घुटने झुक गए। "मैडम... मैं..."
"चुप," सुमन ने कहा। "बस खड़ा रह।"
उसने लड़के को टेबल के किनारे से लगा दिया। फिर वह घुटनों के बल बैठ गई। लड़के के सामने।
उसने अपना मुँह खोला। लंड को अंदर ले लिया।
लड़का चीखा। दबी हुई चीखजैसे कोई सुन ले। उसने टेबल के किनारे पकड़ लियाउसकी पोरें सफेद पड़ गईं।
सुमन ने उसका लंड अपने मुँह में ले लिया। पूरा। गहरा। उसके होंठ सिरे पर बंद हुए। उसकी जीभ नीचे से ऊपर घूमीनसों के साथ, सिरे के चारों ओर।
लड़का हिलने लगा। उसके कूल्हे अपने आप आगे बढ़ेलंड सुमन के गले में धँस गया। वह लगभग उल्टी कर बैठी, लेकिन रुकी नहीं। उसने अपना सिर और आगे किया। अब उसकी नाक लड़के के पेट से लग रही थी।
सुमन ने उसका लंड मुँह से बाहर निकाला। साँस ली। फिर अंदर लिया। बाहर। अंदर। तेज़। गीली आवाज़ हो रही थीलार की, पानी की।
"बोल," सुमन रुकते हुए बोली। "कैसा लग रहा है?"
"बहुत... बहुत अच्छा मैडम... मेरा लंड... पहली बार किसी ने मुँह में लिया है..."
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 14-06-2026, 11:34 PM



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