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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#22
दस बजे।

सुमन की आँख खुली। बिस्तर खाली था। उसके बगल में एक नोट था
"मेरी राँड। कल रात कमाल थी। आज नया टास्क मिलेगा।तेरा बदमाश"
सुमन मुस्कुराई। बिस्तर से लुढ़की। नागी ही बाथरूम गई। शॉवर लियालेकिन साबुन नहीं लगाया। सिर्फ पानी। रात की गंध को वह अपने ऊपर रखना चाहती थी। थोड़ी देर और।
उसने वही सेमी-ट्रांसपेरेंट नाइटी पहनीजिसमें उसके निप्पल और चूत के बाल साफ दिख रहे थे। बालों में हाथ फेरा। कॉफी बनाई।
बालकनी में गई।
धूप। गर्मी। हल्की हवा।
वह बालकनी के रेलिंग पर खड़ी हुई। कॉफी पी रही थी। उसकी नज़र सामने के पार्क पर थी, लेकिन दिमाग में कल रात का डांस फ्लोर था।
वह आदमी। उसकी उँगली। उसकी गर्म साँस उसकी गर्दन पर।
सुमन की चूत में हल्की सी नमी गई। नाइटी के पतले कपड़े पर एक छोटा सा गीला दाग बन गया।
"कैसी हो सुमन बेटा?"
आवाज़बगल वाली बालकनी से।
सुमन ने पलट कर देखा। मिश्रा अंकल। रिटायर्ड बैंक मैनेजर। पचास के आसपास। कद में ठिगने, पेट निकला हुआ, लुंगी और बनियान पहने।
सुमन मुस्कुराई। "मैं ठीक हूँ अंकल। आप कैसे हैं?"
मिश्रा अंकल की आँखें फटी की फटी रह गईं।
सुमन सामने खड़ी थीनाइटी में। उसके निप्पल साफ दिख रहे थे। उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ नाइटी को आगे की तरफ धकेल रही थीं। उसकी चूत का उभारकाला, गीला साकपड़े के नीचे चमक रहा था।
उसकी जांघेंगोरी, मोटी, एक दूसरे से रगड़ खाती हुई।
मिश्रा अंकल ने थूक निगला। एक बार, दो बार।
"मैं... मैं भी ठीक हूँ बेटा।"
सुमन को मज़ा आने लगा। वह जानती थी कि अंकल क्या देख रहे हैं। उनकी लुंगी के आगे हल्का सा उभार बन चुका था।
उसने सोचाचलो थोड़ा और बढ़ा दें।
सुमन ने जानबूझकर अपना एक पैर उठाकर बालकनी में रखी हुई प्लास्टिक की कुर्सी पर रख दिया।
उसकी जांघ खुल गई। नाइटी ऊपर चढ़ गई। उसकी चूतअब पूरी तरह सामने। लैबिया थोड़े खुले हुए। गीली चमक।
मिश्रा अंकल का मुँह खुला रह गया। उनकी लुंगी के आगे अब पूरा तंबू था। उनके हाथ लुंगी के ऊपर अपने आप चले गए। मसलने लगे। उनकी लार टपकने लगीगाल से नीचे ठुड्डी तक।
"अंकल, क्या हुआ?" सुमन ने मासूमियत से पूछा।
"कुछ... कुछ नहीं बेटा..." मिश्रा अंकल की आवाज़ फट रही थी। "बस... आज का पेपर नहीं आया मेरे घर। तुम्हारे पास है क्या?"
सुमन मुस्कुराई। "हाँ अंकल, अंदर पड़ा है। ले आती हूँ।"
वह मुड़ी। अंदर चली गई।
पेपर फर्श पर पड़ा था। उसने धीरे से झुकना शुरू कियाजानबूझकर धीरे।
नाइटी पीछे से ऊपर चढ़ गई। उसकी गांडदो बड़े, गोरे, भरे हुए गालपूरी तरह खुल गई। बीच में काला गड्ढा। उसकी चूत पीछे से भी दिख रही थीगीली लटकनें लटक रही थीं।
सुमन ने एक बार अपनी गांड को मटकाया। जानबूझकर। धीरे से। हिली-डुली।
फिर उसने पीछे मुड़कर देखा।

[Image: z-image-turbo-00010.png]

मिश्रा अंकल दोनों हाथों से अपना लंड लुंगी के ऊपर से दबा रहे थे। उनकी आँखों से पानी रहा थाया पसीना, पता नहीं। उनका थूक ठुड्डी से टपक रहा था।
"ये लो अंकल," सुमन ने पेपर उठाया। लेकिन बालकनी तक लाने के लिए उसे पूरी तरह आगे झुकना पड़ा।
उसने बालकनी का रेलिंग पकड़ा। पूरी आगे झुक गई। अब उसकी चूचियाँ लगभग बाहर गई थींनाइटी का नेकलाइन ढीला था, स्तन लटक रहे थे। निप्पल हवा में।
"लो अंकल," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मिश्रा अंकल ने हाथ बढ़ाया। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने पेपर लियालेकिन उनकी नज़रें पेपर पर नहीं थीं। वह सुमन के स्तनों पर थीं। उसकी चूत पर। उसकी गांड पर।
"थैंक... थैंक यू बेटा..." वह बुदबुदाए।
सुमन मुस्कुराई। धीरे से सीधी हुई। उसने एक बार और मटका दियाअपनी गांड कोजैसे कुछ खास नहीं।
"बाय अंकल," उसने कहा। और अंदर चली गई।
अंदर जाकर वह दीवार से लग गई। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके निप्पल खड़े थे। उसकी चूत गीली हो चुकी थीहाथ लगाने की ज़रूरत नहीं थी, पानी बह ही रहा था।
वह मुस्कुराई। उसने सोचाराज को ये सब बताना है। आज रात।
फिर उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपनी ही उँगली अंदर डाली। एक बार। बाहर निकाली। चाट ली।
"मज़ा गया, अंकल जी," वह फुसफुसाई।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 14-06-2026, 11:12 PM



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