14-06-2026, 07:31 PM
फिर मैंने एक चम्मच में घी डाला, उसे अग्नि पर गरम किया और चंपा की चूत पर रख दिया। मैत्री रचित कहानी।
“ऊई माँ!!! जल गई… बाबाजी… बहुत गरम है!!!” चंपा जोर से चीख उठी। उसका पूरा शरीर तड़प गया।
“सहन करो चंपा… थोड़ा जलना तो पड़ेगा। गुरुजी की क्रिया है।”
मैंने 2-3 बार गरम घी वाला चम्मच उसकी चूत में हल्का-हल्का दबाया। चंपा हर बार चीखती और मचलती।
फिर मैंने एक लंबा कलावा लिया। अपनी अंगुली पर घी लगाकर पहले चंपा की चूत में घुसाया और कलावे का एक सिरा अंदर डाल दिया। दूसरा सिरा मैंने अंजली की चूत में घुसा दिया। कलावा काफी लंबा (10-12 मीटर) था।
मैंने कहा,
“कलावा को कोख तक पहुँचाना है, लेकिन अंगुली से सिर्फ 3 इंच ही जा रहा है। अब एक ही चीज है जो इसे कोख तक ले जा सकती है… अगर तुम कहो तो?”
चंपा ने शर्म और व्याकुलता से कहा, “कीजिए बाबाजी… जो करना है कीजिए। मेरी बेटी के लिए कुछ भी सहन कर लूँगी।”
मैंने आगे बढ़कर अपना मोटा, खड़ा लंड चंपा की चूत पर रख दिया और धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ कलावा और अंदर सरक रहा था।
“आह्ह्ह… बाबाजी… आपका लंड… बहुत मोटा है… मेरी चूत फट रही है…” चंपा कराह रही थी।
अंजली बार-बार कह रही थी, “अभी नहीं पहुँचा बाबा… और अंदर जाने दीजिए…” उसने माँ की चूत के होंठो को थोडा फैलाया और बोली: “हाँ अब शायद ठीक है आपका साधन अब सही तरीके से अन्दर जा सकता है बाबाजी।“
मुझे समझ आ गया कि अंजली जानबूझकर चुदाई का पूरा मजा लेना चाहती है।
मैंने कलावे को और गहराई तक ठेल दिया और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। अंजली की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं - “आह्ह… बाबा… उफ्फ… धीरे… लेकिन और अंदर… हाँ… ऐसे…”
थोड़ी देर बाद मैंने गुरु वाली आवाज में कहा, “अंजली, अब कलावा कोख तक पहुँच गया है? जरा देखो तो।” रचयिता मैत्री।
अंजलि ने माँ की चूत को थोडा फैलाया और अंजली ने अनमने और कामुक स्वर में कहा, “हाँ बाबा जी… लगता है, अब पहुँच गया…”
“माँ तुम्हे कैसा लगता है क्या बाबाजी का यह आपके अन्दर पूरा का पूरा समां गया है?”
“आ....आ....ह.....ह...ल...ग....तो.....कुछ ऐसा ही रहा है बेटी। लेकिन काफी दुःख रहा है, बाबाजी, थोडा धीरे धीरे डालो न.....थोडा मजा भी तो आ रहा है।“ चंपा ने अपने पैरो को कुछ ज्यादा फैला के लंड को जगह दी।
मैंने गुरु वाली भारी आवाज में आदेश दिया,
“अब हम कुछ मंत्रों का जाप करेंगे। तब तक तुम दोनों एक-दूसरे से चिपटकर जमीन पर लेट जाओ।”
चंपा और अंजली दोनों नंगी होकर एक-दूसरे से सटकर लेट गईं। अंजली की भरी हुई चूचियाँ अपनी माँ चंपा की भारी चूचियों से पूरी तरह दब रही थीं। दोनों की चूतें आपस में रगड़ खा रही थीं और चूत का पानी एक-दूसरे पर बह रहा था।
मैं मंत्र पढ़ते हुए दोनों की चूतों पर घी और चंदन लगाने लगा। फिर धूप दिखाकर मंत्रों का जाप करने लगा।
थोड़ी देर बाद मैंने शहद लेकर दोनों की चूतों पर प्यार से फैलाना शुरू किया। फिर मैंने अंजली को पलट दिया, अब चंपा अंजली के ऊपर आ गई।
चंपा की मोटी, भारी गांड देखकर मेरा लंड फड़क उठा और अधिक इच्छा हो गई। मैंने एक नया नाटक रचा और चंपा से कहा, “अब मैं तुम्हारे पेट में गंगाजल डालूँगा, जिससे तुम्हारी कोख का रस अंजली की कोख को हरा-भरा कर देगा।”
चंपा ने सहमति में सिर हिला दिया। प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
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शुक्रिया दोस्तों.
जुड़े रहिये
मैत्री की तरफ से जय भारत।।
“ऊई माँ!!! जल गई… बाबाजी… बहुत गरम है!!!” चंपा जोर से चीख उठी। उसका पूरा शरीर तड़प गया।
“सहन करो चंपा… थोड़ा जलना तो पड़ेगा। गुरुजी की क्रिया है।”
मैंने 2-3 बार गरम घी वाला चम्मच उसकी चूत में हल्का-हल्का दबाया। चंपा हर बार चीखती और मचलती।
फिर मैंने एक लंबा कलावा लिया। अपनी अंगुली पर घी लगाकर पहले चंपा की चूत में घुसाया और कलावे का एक सिरा अंदर डाल दिया। दूसरा सिरा मैंने अंजली की चूत में घुसा दिया। कलावा काफी लंबा (10-12 मीटर) था।
मैंने कहा,
“कलावा को कोख तक पहुँचाना है, लेकिन अंगुली से सिर्फ 3 इंच ही जा रहा है। अब एक ही चीज है जो इसे कोख तक ले जा सकती है… अगर तुम कहो तो?”
चंपा ने शर्म और व्याकुलता से कहा, “कीजिए बाबाजी… जो करना है कीजिए। मेरी बेटी के लिए कुछ भी सहन कर लूँगी।”
मैंने आगे बढ़कर अपना मोटा, खड़ा लंड चंपा की चूत पर रख दिया और धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ कलावा और अंदर सरक रहा था।
“आह्ह्ह… बाबाजी… आपका लंड… बहुत मोटा है… मेरी चूत फट रही है…” चंपा कराह रही थी।
अंजली बार-बार कह रही थी, “अभी नहीं पहुँचा बाबा… और अंदर जाने दीजिए…” उसने माँ की चूत के होंठो को थोडा फैलाया और बोली: “हाँ अब शायद ठीक है आपका साधन अब सही तरीके से अन्दर जा सकता है बाबाजी।“
मुझे समझ आ गया कि अंजली जानबूझकर चुदाई का पूरा मजा लेना चाहती है।
मैंने कलावे को और गहराई तक ठेल दिया और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। अंजली की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं - “आह्ह… बाबा… उफ्फ… धीरे… लेकिन और अंदर… हाँ… ऐसे…”
थोड़ी देर बाद मैंने गुरु वाली आवाज में कहा, “अंजली, अब कलावा कोख तक पहुँच गया है? जरा देखो तो।” रचयिता मैत्री।
अंजलि ने माँ की चूत को थोडा फैलाया और अंजली ने अनमने और कामुक स्वर में कहा, “हाँ बाबा जी… लगता है, अब पहुँच गया…”
“माँ तुम्हे कैसा लगता है क्या बाबाजी का यह आपके अन्दर पूरा का पूरा समां गया है?”
“आ....आ....ह.....ह...ल...ग....तो.....कुछ ऐसा ही रहा है बेटी। लेकिन काफी दुःख रहा है, बाबाजी, थोडा धीरे धीरे डालो न.....थोडा मजा भी तो आ रहा है।“ चंपा ने अपने पैरो को कुछ ज्यादा फैला के लंड को जगह दी।
मैंने गुरु वाली भारी आवाज में आदेश दिया,
“अब हम कुछ मंत्रों का जाप करेंगे। तब तक तुम दोनों एक-दूसरे से चिपटकर जमीन पर लेट जाओ।”
चंपा और अंजली दोनों नंगी होकर एक-दूसरे से सटकर लेट गईं। अंजली की भरी हुई चूचियाँ अपनी माँ चंपा की भारी चूचियों से पूरी तरह दब रही थीं। दोनों की चूतें आपस में रगड़ खा रही थीं और चूत का पानी एक-दूसरे पर बह रहा था।
मैं मंत्र पढ़ते हुए दोनों की चूतों पर घी और चंदन लगाने लगा। फिर धूप दिखाकर मंत्रों का जाप करने लगा।
थोड़ी देर बाद मैंने शहद लेकर दोनों की चूतों पर प्यार से फैलाना शुरू किया। फिर मैंने अंजली को पलट दिया, अब चंपा अंजली के ऊपर आ गई।
चंपा की मोटी, भारी गांड देखकर मेरा लंड फड़क उठा और अधिक इच्छा हो गई। मैंने एक नया नाटक रचा और चंपा से कहा, “अब मैं तुम्हारे पेट में गंगाजल डालूँगा, जिससे तुम्हारी कोख का रस अंजली की कोख को हरा-भरा कर देगा।”
चंपा ने सहमति में सिर हिला दिया। प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
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मैत्री की तरफ से जय भारत।।



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