13-06-2026, 01:08 AM
(This post was last modified: 13-06-2026, 01:10 AM by Certified Addict. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
उसने अपने लंड को पकड़ा। और सुमन के क्लीवेज के ठीक ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया। उसके स्तनों के बीच की गहरी दरार में। उसका लंड उसकी चूचियों को छू रहा था — बाईं तरफ, दाईं तरफ। उसके निप्पल उसके लंड की गर्मी से और कड़े हो गए।
सुमन ने नीचे देखा। उसने उसका लंड देखा। उसने उसे अपने स्तनों पर रगड़ते देखा। उसने अपने दोनों हाथों से अपने स्तनों को उठाया — और उसके लंड को उनके बीच दबा दिया।
विक्रांत कराह उठा। इतनी जोर से कि लोग मुड़कर देखने लगे।
अरुण की उँगलियाँ अब भी उसकी चूत के अंदर थीं। वह उन्हें तेज़ी से अंदर-बाहर कर रहा था। उसकी चूत उन पर चटक रही थी — पानी छोड़ रही थी। वह पानी उसके हाथ पर, उसकी जांघ पर, ड्रेस पर टपक रहा था।
सुमन का शरीर अब पूरी तरह उनके हाथों में था। वह हिल नहीं सकती थी। वह सिर्फ कराह सकती थी। उसके मुँह से शब्द निकल रहे थे — बेहोशी के।
**"चोदो मुझे... रुको मत... मैं पागल हो रही हूँ..."**
---
### राज — दूर से देखता हुआ
राज बार के कोने में खड़ा था। उसके हाथ में शराब का गिलास था। पर उसकी आँखें सुमन पर थीं। उसकी पैंट के अंदर उसका लंड दर्द कर रहा था — वह इतना सख्त था।
वह देख रहा था। दूसरे आदमी उसकी बीवी को छू रहे थे। उसकी बीवी का लंड के बीच दबा रहे थे। उसकी बीवी की चूत में उँगलियाँ डाली जा रही थीं।
पर वह रुका नहीं। वह गया नहीं। क्योंकि वह देख रहा था — सुमन का चेहरा।
वह चेहरा — जो दर्द और सुख के बीच झूल रहा था। वह चेहरा — जो पहली बार पूरी तरह आज़ाद था।
राज ने अपना गिलास नीचे रखा। अपने लंड को पकड़ा — पैंट के ऊपर से ही। वह हिलने लगा। देखते हुए। सुमन को। अपनी सुमन को।
अरुण ने अपनी तीसरी उँगली डाल दी। तीन उँगलियाँ। उसकी तंग चूत के अंदर। वह उन्हें घुमा रहा था — भीतर ही भीतर। उसकी चूत उन्हें दबा रही थी — जैसे कोई लंड को चूस रहा हो।
विक्रांत उसके स्तनों के बीच अपने लंड को रगड़ रहा था — तेज़, पागलों की तरह। उसके स्तन उसके लंड के चारों तरफ लिपटे हुए थे। उसका लंड उसके निप्पल के बीच से निकल रहा था और उसके मुँह को छू रहा था।
सुमन ने अपनी जीभ निकाली। उसने उसके लंड की नोक को छुआ — बस एक बार। हल्के से। उसकी जीभ गर्म थी। नम।
विक्रांत चीख उठा। उसका लंड फड़कने लगा। उसका बीज उसके स्तनों पर, उसके क्लीवेज में, उसकी गर्दन पर गिरने लगा। गरम। चिपचिपा। सफेद। उसके स्तनों पर बूँदें लग गईं। कुछ उसके मुँह तक आ गए।
उसी समय — अरुण ने अपनी उँगलियाँ बाहर निकाल लीं। और अपनी पैंट खोल ली। उसका लंड बाहर आ गया — पतला, लंबा, सीधा। उसने उसे अपने हाथ में लिया। उसे रगड़ना शुरू किया। और सुमन की गीली, खुली चूत के ठीक बाहर — उसी हवा में — वह फट गया।
उसका बीज उसकी चूत के ऊपर गिरा। ड्रेस पर। उसकी जांघ पर। उसके पेट पर। वह गरम था — उसकी त्वचा को जला रहा था।
सुमन के शरीर में एक लहर उठी। वह काँपी। थरथराई। उसकी चूत ने हवा में भी चूसने की कोशिश की। उसके स्तन झूल गए। उसकी आँखें खुली थीं — पर वह कुछ नहीं देख रही थी।
वह अपने ही सुख में खो गई थी। बिना उतरे। बिना भरे। बस छुई गई। रगड़ी गई। चूसी गई।
संगीत बदल गया। रोशनी हरी हो गई। लोग हंस रहे थे, पी रहे थे, बातें कर रहे थे। किसी ने कुछ देखा था। किसी ने कुछ नहीं देखा।
सुमन ने अपने स्तन पोंछे। अपनी जांघ पोंछी। अपनी चूत के ऊपर से सूखे कपड़े से बीज हटाया। उसने अपनी ड्रेस ठीक की। अपने बाल संभाले। और राज की तरफ देखा।
राज आया। उसने उसका हाथ पकड़ा।
**"चलो घर,"** उसने कहा। उसकी आवाज़ में बस दो चीज़ें थीं — प्यार और लंड।
सुमन ने सिर हिलाया। वह काँप रही थी। उसकी चूत अब भी गीली थी। उसके स्तन अब भी उन लंडों की गर्मी महसूस कर रहे थे।
वह बाहर निकली। उसने पीछे मुड़कर देखा। विक्रांत और अरुण अब भी वहीं खड़े थे। अपने लंड पैंट में डालते हुए। उनकी आँखें उस पर थीं।
सुमन मुस्कुराई। एक मुस्कान जिसका मतलब था — *शुक्रिया।*
सुमन ने नीचे देखा। उसने उसका लंड देखा। उसने उसे अपने स्तनों पर रगड़ते देखा। उसने अपने दोनों हाथों से अपने स्तनों को उठाया — और उसके लंड को उनके बीच दबा दिया।
विक्रांत कराह उठा। इतनी जोर से कि लोग मुड़कर देखने लगे।
अरुण की उँगलियाँ अब भी उसकी चूत के अंदर थीं। वह उन्हें तेज़ी से अंदर-बाहर कर रहा था। उसकी चूत उन पर चटक रही थी — पानी छोड़ रही थी। वह पानी उसके हाथ पर, उसकी जांघ पर, ड्रेस पर टपक रहा था।
सुमन का शरीर अब पूरी तरह उनके हाथों में था। वह हिल नहीं सकती थी। वह सिर्फ कराह सकती थी। उसके मुँह से शब्द निकल रहे थे — बेहोशी के।
**"चोदो मुझे... रुको मत... मैं पागल हो रही हूँ..."**
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### राज — दूर से देखता हुआ
राज बार के कोने में खड़ा था। उसके हाथ में शराब का गिलास था। पर उसकी आँखें सुमन पर थीं। उसकी पैंट के अंदर उसका लंड दर्द कर रहा था — वह इतना सख्त था।
वह देख रहा था। दूसरे आदमी उसकी बीवी को छू रहे थे। उसकी बीवी का लंड के बीच दबा रहे थे। उसकी बीवी की चूत में उँगलियाँ डाली जा रही थीं।
पर वह रुका नहीं। वह गया नहीं। क्योंकि वह देख रहा था — सुमन का चेहरा।
वह चेहरा — जो दर्द और सुख के बीच झूल रहा था। वह चेहरा — जो पहली बार पूरी तरह आज़ाद था।
राज ने अपना गिलास नीचे रखा। अपने लंड को पकड़ा — पैंट के ऊपर से ही। वह हिलने लगा। देखते हुए। सुमन को। अपनी सुमन को।
अरुण ने अपनी तीसरी उँगली डाल दी। तीन उँगलियाँ। उसकी तंग चूत के अंदर। वह उन्हें घुमा रहा था — भीतर ही भीतर। उसकी चूत उन्हें दबा रही थी — जैसे कोई लंड को चूस रहा हो।
विक्रांत उसके स्तनों के बीच अपने लंड को रगड़ रहा था — तेज़, पागलों की तरह। उसके स्तन उसके लंड के चारों तरफ लिपटे हुए थे। उसका लंड उसके निप्पल के बीच से निकल रहा था और उसके मुँह को छू रहा था।
सुमन ने अपनी जीभ निकाली। उसने उसके लंड की नोक को छुआ — बस एक बार। हल्के से। उसकी जीभ गर्म थी। नम।
विक्रांत चीख उठा। उसका लंड फड़कने लगा। उसका बीज उसके स्तनों पर, उसके क्लीवेज में, उसकी गर्दन पर गिरने लगा। गरम। चिपचिपा। सफेद। उसके स्तनों पर बूँदें लग गईं। कुछ उसके मुँह तक आ गए।
उसी समय — अरुण ने अपनी उँगलियाँ बाहर निकाल लीं। और अपनी पैंट खोल ली। उसका लंड बाहर आ गया — पतला, लंबा, सीधा। उसने उसे अपने हाथ में लिया। उसे रगड़ना शुरू किया। और सुमन की गीली, खुली चूत के ठीक बाहर — उसी हवा में — वह फट गया।
उसका बीज उसकी चूत के ऊपर गिरा। ड्रेस पर। उसकी जांघ पर। उसके पेट पर। वह गरम था — उसकी त्वचा को जला रहा था।
सुमन के शरीर में एक लहर उठी। वह काँपी। थरथराई। उसकी चूत ने हवा में भी चूसने की कोशिश की। उसके स्तन झूल गए। उसकी आँखें खुली थीं — पर वह कुछ नहीं देख रही थी।
वह अपने ही सुख में खो गई थी। बिना उतरे। बिना भरे। बस छुई गई। रगड़ी गई। चूसी गई।
संगीत बदल गया। रोशनी हरी हो गई। लोग हंस रहे थे, पी रहे थे, बातें कर रहे थे। किसी ने कुछ देखा था। किसी ने कुछ नहीं देखा।
सुमन ने अपने स्तन पोंछे। अपनी जांघ पोंछी। अपनी चूत के ऊपर से सूखे कपड़े से बीज हटाया। उसने अपनी ड्रेस ठीक की। अपने बाल संभाले। और राज की तरफ देखा।
राज आया। उसने उसका हाथ पकड़ा।
**"चलो घर,"** उसने कहा। उसकी आवाज़ में बस दो चीज़ें थीं — प्यार और लंड।
सुमन ने सिर हिलाया। वह काँप रही थी। उसकी चूत अब भी गीली थी। उसके स्तन अब भी उन लंडों की गर्मी महसूस कर रहे थे।
वह बाहर निकली। उसने पीछे मुड़कर देखा। विक्रांत और अरुण अब भी वहीं खड़े थे। अपने लंड पैंट में डालते हुए। उनकी आँखें उस पर थीं।
सुमन मुस्कुराई। एक मुस्कान जिसका मतलब था — *शुक्रिया।*


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