13-06-2026, 01:07 AM
(This post was last modified: 16-06-2026, 12:04 AM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
तभी कोई और उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। दूसरा आदमी। जवान। पतला। उसके हाथ सुमन के कंधों पर आ गए। उसने उसे पीछे की तरफ खींच लिया — विक्रांत से दूर।
अब सुमन दो आदमियों के बीच थी।
![[Image: z-image-turbo-00027.png]](https://i.postimg.cc/bNnhxPTj/z-image-turbo-00027.png)
सामने विक्रांत। पीछे वह जवान — उसका नाम था अरुण।
अरुण के हाथ उसकी गांड पर थे। उसने दोनों हाथों से उसकी गांड को पकड़ लिया। बिना पूछे। बिना रुके। उसकी उँगलियाँ उसकी गांड की दरार में धंसने लगीं। ड्रेस का कपड़ा उसके नीचे फँस गया था।
सुमन ने अपना सिर पीछे झुका दिया — उसके कंधे पर।
**"बहुत मुलायम हो,"** अरुण ने उसके कान में कहा। उसकी जीभ उसके कान को छू गई।
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने हाथ बढ़ा दिए — विक्रांत की छाती पर। उसने उसकी कमीज पकड़ी। उसे करीब खींचा।
अब वह बीच में थी। दो शरीरों के बीच। सामने लंड का उभार। पीछे भी।
अरुण के हाथ अब उसकी गांड पर नहीं — उसकी चूत पर थे। उसने ड्रेस के कपड़े के ऊपर से उसकी चूत को दबाया। वह गीली थी। गरम। उसकी उँगलियाँ उसके होंठों की दरार में फँस गईं। उसने वहीँ दबाया — एक उँगली से। फिर दो उँगलियों से।
सुमन कराह उठी। यह कराह संगीत से भी ऊँची थी।
विक्रांत ने अपनी जांघ को और ऊपर उठा लिया। अब उसकी जांघ सीधे उसकी चूत पर थी। उसने अपनी जांघ घुमाई — गोल-गोल — उसकी चूत पर। सुमन उसकी जांघ पर सवार हो गई। वह उस पर झूल रही थी। अपनी गीली चूत को उसकी जांघ पर रगड़ रही थी।
अरुण ने अपना हाथ ड्रेस के अंदर डाल दिया। उसने उसकी नंगी चूत को छुआ। सीधे। बिना कपड़े के।
**तुरंत — उसकी उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर चली गईं।**
सुमन की आँखें बंद हो गईं। उसका मुँह खुल गया। उसके स्तन काँप रहे थे। उसके निप्पल पत्थर जैसे। उसकी चूत — वह अरुण की उँगलियों को चूस रही थी। उसने उसकी उँगलियों को अपने अंदर खींच लिया। गीला। गरम। तंग।
अरुण ने अपनी दो उँगलियाँ उसके अंदर डाल दीं। उसने उन्हें घुमाया। उसकी चूत ने चारों तरफ से उन्हें दबा लिया।
**"आह... रुक मत..."** सुमन के मुँह से निकल गया।
अब विक्रांत ने अपना लंड निकाल लिया था। उसने अपनी जींस का बटन खोला। ज़िप खोली। उसका लंड बाहर आ गया — काला, मोटा, नसों से भरा हुआ। उसका सिरा लाल था — बैंगनी की तरह। पसीने से चमक रहा था।
अब सुमन दो आदमियों के बीच थी।
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सामने विक्रांत। पीछे वह जवान — उसका नाम था अरुण।
अरुण के हाथ उसकी गांड पर थे। उसने दोनों हाथों से उसकी गांड को पकड़ लिया। बिना पूछे। बिना रुके। उसकी उँगलियाँ उसकी गांड की दरार में धंसने लगीं। ड्रेस का कपड़ा उसके नीचे फँस गया था।
सुमन ने अपना सिर पीछे झुका दिया — उसके कंधे पर।
**"बहुत मुलायम हो,"** अरुण ने उसके कान में कहा। उसकी जीभ उसके कान को छू गई।
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने हाथ बढ़ा दिए — विक्रांत की छाती पर। उसने उसकी कमीज पकड़ी। उसे करीब खींचा।
अब वह बीच में थी। दो शरीरों के बीच। सामने लंड का उभार। पीछे भी।
अरुण के हाथ अब उसकी गांड पर नहीं — उसकी चूत पर थे। उसने ड्रेस के कपड़े के ऊपर से उसकी चूत को दबाया। वह गीली थी। गरम। उसकी उँगलियाँ उसके होंठों की दरार में फँस गईं। उसने वहीँ दबाया — एक उँगली से। फिर दो उँगलियों से।
सुमन कराह उठी। यह कराह संगीत से भी ऊँची थी।
विक्रांत ने अपनी जांघ को और ऊपर उठा लिया। अब उसकी जांघ सीधे उसकी चूत पर थी। उसने अपनी जांघ घुमाई — गोल-गोल — उसकी चूत पर। सुमन उसकी जांघ पर सवार हो गई। वह उस पर झूल रही थी। अपनी गीली चूत को उसकी जांघ पर रगड़ रही थी।
अरुण ने अपना हाथ ड्रेस के अंदर डाल दिया। उसने उसकी नंगी चूत को छुआ। सीधे। बिना कपड़े के।
**तुरंत — उसकी उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर चली गईं।**
सुमन की आँखें बंद हो गईं। उसका मुँह खुल गया। उसके स्तन काँप रहे थे। उसके निप्पल पत्थर जैसे। उसकी चूत — वह अरुण की उँगलियों को चूस रही थी। उसने उसकी उँगलियों को अपने अंदर खींच लिया। गीला। गरम। तंग।
अरुण ने अपनी दो उँगलियाँ उसके अंदर डाल दीं। उसने उन्हें घुमाया। उसकी चूत ने चारों तरफ से उन्हें दबा लिया।
**"आह... रुक मत..."** सुमन के मुँह से निकल गया।
अब विक्रांत ने अपना लंड निकाल लिया था। उसने अपनी जींस का बटन खोला। ज़िप खोली। उसका लंड बाहर आ गया — काला, मोटा, नसों से भरा हुआ। उसका सिरा लाल था — बैंगनी की तरह। पसीने से चमक रहा था।


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