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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#12
एक मिनट भी नहीं हुआ था।
सुमन का पूरा शरीर अकड़ गया। उसकी जांघें राज के सिर को दबोचने लगीं। उसकी चूत ने राज की जीभ को ऐसे पकड़ा जैसे कोई मुँह के अंदर उँगली दबा ले।
और वह गई।
पानी बह निकलाराज के मुँह में, उसकी ठुड्डी पर, चादर पर। सुमन चिल्लाईदबी हुई, लंबी, जानवरों वाली आवाज़।
राज उसके ऊपर चढ़ गया। लंड अभी भी सख्त था। उसने सुमन के बालों को अपनी मुट्ठी में लपेटा। उसकी आँखों में देखा।
"बता। मेट्रो में कैसा लगा?"
सुमन की साँसें अभी ठीक नहीं हुई थीं। "क्या... क्या बताऊँ?"
"वो आदमी। जो तुझे घूर रहा था। उसने अपने लंड को हाथ लगाया। तूने देखा।"
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ काँप रहे थे।
"देखा," उसने कहा। "और मेरी चूत ने... उसकी कल्पना की। कैसे वो मुझे दीवार से लगाकर... मेरी ड्रेस ऊपर करेगा... अपना लंड निकालेगा... और भीड़ के सामने... सब देखते रहें... और वो मुझे चोदेगा..."
राज का लंड और सख्त हो गया। सुमन ने महसूस किया।
"और तू?" राज ने पूछा। "तू क्या करेगी?"
सुमन खुद ऊपर गई। राज को नीचे धकेल दिया। वह उसके लंड पर बैठ गई। घोड़ी की तरह। अपनी चूत में लंड लेकर।
"मैं चिल्लाऊंगी," सुमन ने राज की छाती पर हाथ रखा। गति तेज़ कर दी। उसकी चूत ऊपर-नीचे हो रही थी, उसकी चूचियाँ उछल रही थीं। "चिल्लाऊंगीचोद मुझे, रंडी के जैसे चोद। सब सुनें। सब देखें। फिर उनके लंड भी खड़े हो जाएँ। और मैं..."
वह रुकी। झुकी। राज के कान में बोली।
"और मैं सबकी चूत चाटूंगी।"
राज पागल हो गया। उसने सुमन की गांड पर हाथ माराजोर से। थप्पड़ की आवाज़। फिर दूसरा। फिर तीसरा। सुमन चिल्लाती हुई और तेज़ हो गई।
"चोद मुझे! रंडी के जैसे चोद! और बोल! बोल मुझे!"
"रंडी," राज ने कहा। "साली रंडी। अपनी चूत फाड़ दे मेरे लंड पर।"
दोनों चिल्लाते रहे। कमरा गर्म हो गया था। पसीना, लार, चूत का पानीसब मिल रहा था।
पहला राउंड। दूसरा राउंड। तीसरा राउंड।
एक बार राज ने सुमन को पेट के बल लिटाकर गांद में लंड डालने की कोशिश कीसुमन ने मना किया। "अभी नहीं। आज चूत काफी है। गांद का दिन भी आएगा।"
राज ने उसकी जांघों के बीच लंड दबाकर अपना माल छोड़ा। सुमन के पेट पर, चूचियों पर, चेहरे पर।
सुमन ने अपनी उँगली पर माल लिया। चाटा। मुस्कुराई।
"तेरा स्वाद आता है," उसने कहा। "अच्छा लगता है।"

तीन बजे थे। दोनों नंगे थे। लिपटे हुए। सुमन राज की छाती पर सिर रखे लेटी थी। उसकी चूत अभी भी गीली थी। राज का लंड अभी भी आधा सख्त।

बिना बात किए दोनों सो गए।

गीली चादर पर। अपनी ही आवाज़ों के निशानों के बीच।

शाम
के सात बज रहे थे। राज बेडरूम के दरवाजे पर खड़ा था।


"तैयार हो जाओ।"

अंदर से सरसराहट की आवाज़। कपड़े बदलने की। ज़िप खुलने और बंद होने की।

फिर दरवाज़ा खुला।

राज की साँसें रुक गईं।

सुमनउसी काले थाई-स्लिट ड्रेस में जो आज सुबह उसने सेल्फी भेजी थी। गोरे कंधे खुले। बिना ब्रा के। ड्रेस के अंदर उसके स्तन स्वतंत्र थेलचकते, उछलते, भारी।

ड्रेस का नेकलाइन उसके निप्पल तक जाता हुआ। उसकी चूचियाँ ड्रेस के कपड़े को आगे की तरफ धक्का दे रही थीं। हर साँस के साथ वह ऊपर नीचे हो रही थीं।

नीचेसिर्फ एक ब्लैक थोंग। ड्रेस के नीचे से उसकी गांड के दो गोल गाल साफ दिख रहे थे।

राज का लंड फट गया। पेंट में तंबू खड़ा हो गया।

"ये... ये ब्रा और चड्डी निकाल दे," राज ने घुर्र कर कहा। "अपनी चूचियों को हिलने दे। अपनी चाल के साथ।"

सुमन शरमा गई। उसने ड्रेस के अंदर हाथ डाला। ब्रा के हुक खोले। बिना चड्डी वह पहले से ही थीथोंग पहने हुए। ब्रा बाहर निकाली, राज के हाथ पर रख दी।
गरम थी। उसके शरीर की गर्मी से तपी हुई।
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 11-06-2026, 10:36 PM



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