08-06-2026, 10:44 PM
भाग ~ २०
"अब ऐसे क्यों देख रहा है तू।" मुझे अपनी तरफ अपलक देखते देख उसने अपनी भौंहों को ऊपर कर के पूछा। इस बार भी अदा वही थी उसकी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा।
"देख रहा हूं कि तू कितनी सुंदर और प्यारी है।" मैं अनायास ही बोल गया।
"क...क्या???" वो एकदम से सीधा हुई और शर्मा गई।
"मैंने कल तुझसे कहा था न कि जब तू ऐसे शर्माती है तो और भी सुंदर और प्यारी दिखती है।" मैंने कहा।
"क्या...कुछ भी बोलता है तू।" उसने शर्माते हुए झूठी नाराजगी दिखाई।
"अच्छा चल...अब से ऐसा कभी नहीं बोलूंगा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"क..क्यों नहीं बोलेगा?" वो चौंकी।
"तुझे अच्छा नहीं लगता न इस लिए।"
"मैंने कब कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगता?"
"तो क्या तुझे सच में अच्छा लगता है?"
"ह..हां।" वो बोली और फिर शर्मा गई।
"एक बात बता।" मैंने वो पूछा जो मेरे मन में एकाएक सवाल के रूप में उभर आया था─"तू बार बार ऐसे शर्माने क्यों लगती है।"
"मैं कहां शर्माती हूं।" वो एकदम से सकपका गई।
"झूठ मत बोल।" मैंने कहा─"सब दिखता है मुझे। मैंने साफ साफ देखा है कि तू मेरी बात पर कई बार शर्मा जाती है।"
"हां तो तू बात ही ऐसी कर देता है कि मुझे शर्म आ जाती है।" उसने मासूमियत से कहा।
"अच्छा...बता भला...मैंने कौन सी ऐसी बात कह दी जिससे तुझे शर्म आ जाती है?"
"रहने दे।" अनीता के चेहरे पर लाज की सुर्खी उभर आई─"मैं कुछ नहीं बताऊंगी।"
"यार अब ये क्या बात हुई?" मैंने कहा─"अब क्या मुझसे कोई बात छुपाएगी तू? क्या भूल गई कि हमारे बीच क्या फैसला हुआ था?"
"भूली नहीं हूं।" उसने कहा─"लेकिन राजू...कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बहन अपने भाई को नहीं बता सकती।"
"पर मैं तो तुझे अपनी हर बात बता सकता हूं।"
"हां तो मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं...समझा।"
"यार ऐसे न कर न।" मैंने मनुहार सा किया─"बता न...मेरी कौन सी बात से शर्म आ जाती है तुझे?"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए।
"अब बता भी दे न।"
"अच्छा ठीक है बताती हूं।" वो कागज से नमकीन गुड़ ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाते हुए बोली─"गांव में मेरी एक सखी है...गुंजा नाम है उसका। तू जानता है उसे...वो मुझे कई ऐसी बातें बताया करती है जो हम लड़कियों या औरतों वाली होती हैं। उसी से मुझे पता चला था कि लड़का और लड़की में सबसे बड़ा अंतर ये होता है कि लड़के किसी बात से शर्माते नहीं हैं और हम लड़कियां शर्माती हैं...क्योंकि ऊपर वाले ने हमें बनाया ही ऐसा है। उसने ये भी बताया था कि जब हम लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तो कई बातों के लिए हमें शर्म आती है। लड़के जो बात बिना झिझक के बोल देते हैं वहीं बात हम लड़कियां शर्म की वजह से नहीं बोल पातीं।"
"अच्छा...और क्या बताया उसने?" मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"सब कुछ नहीं बता सकती तुझे।" अनीता हल्के से मुस्कुराई─"बाकी तेरी किस बात पर शर्मा जाती हूं तो उसका जवाब यही है कि तू जब मेरी तारीफ करता है तो अनायास ही शर्म लगने लगती है मुझे। माना कि हम भाई बहन हैं...लेकिन इसके अलावा लड़का लड़की भी तो हैं। गुंजा बताया करती है कि जब कोई लड़का किसी लड़की की इस तरह तारीफें करता है तो लड़की ऐसे ही शर्माती है और पता है....लड़का क्यों लड़की की तारीफ करता है?"
"क..क्यों करता है?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"गुंजा के अनुसार वो उस लड़की को पटाने की फिराक में होता है।" अनीता ने शर्माते हुए कहा─"मतलब वो ऐसा उसके प्रेम में करता है...और लड़की जब ये समझ जाती है तो उसे अनायास ही शर्म आने लगती है।"
"अच्छा??? क्या सच में ऐसा होता है?" मैं हैरान रह गया।
"मुझे क्या पता।" अनीता ने कहा─"ऐसा तो गुंजा ही कहती है।"
"इसका मतलब मैं तेरी तारीफ कर रहा हूं तो क्या तुझे पटा रहा हूं??" मैं इस खयाल मात्र से ही सिहर उठा─"पर ऐसा कैसे हो सकता है? मतलब...मेरे मन में तो ऐसा कुछ नहीं है। वैसे भी तू मेरी बहन है तो ऐसा तो मैं सोच ही नहीं सकता।"
अनीता को भी समझ न आया इस लिए वो कुछ न बोली। मैं कुछ देर तक इस बारे में सोचता रहा।
"बड़ी अजीब बात है न अनीता।" फिर मैंने कहा─"कुछ बातें होती तो हैं लेकिन समझ नहीं आतीं।"
"हम्म्म्म।" अनीता ने सिर हिलाया─"जाने दे...तू ज्यादा मत सोच इस बारे में...ले मुंह खोल अपना।"
अनीता के कहने पर मैंने अपना मुंह खोला तो उसने नमकीन गुड़ मेरे मुंह में डाल दिया। फिर मैंने भी उसे खिलाया।
"अच्छा ये बता...क्या तूने गुंजा से प्रेम के बारे में पूछा है कभी?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा।
"नहीं।" उसने झट इंकार किया─"पर तू ये क्यों पूछ रहा है?"
"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"मतलब मुझे और तुझे नहीं पता इस बारे में तो शायद उसे पता हो। मुझे लगता है तुझे पूछना चाहिए उससे इसके बारे में।"
"धत्त पागल है क्या?" अनीता ने मुझे घूरा─"मैं क्यों पूछूं इसके बारे में?"
"यार पता तो चलना ही चाहिए कि सब इसके बारे में इस तरह क्यों बोलते हैं?" मैंने कहा─"आखिर लोग इसके बारे में क्यों इतनी अजीब अजीब बातें बताते हैं। पता तो चलना ही चाहिए कि सच में ये प्रेम क्या होता है...कैसे होता है और....और प्रेमी लोग क्या करते हैं प्रेम में?"
"तू न एकदम पागल है।" अनीता ने कहा─"भला क्या जरूरत है तुझे ये सब जानने की? क्या तुझे भी अब किसी से प्रेम करने का मन है?"
"म...मैं भला किससे प्रेम करूंगा??" मैं चौंक पड़ा।
"ऐ...ऐसा क्यों कहता है?" अनीता की आँखें फैलीं─"गांव में कितनी लड़कियां हैं जिनसे तू प्रेम कर सकता है।"
"हट...मैं किसी लड़की की तरफ ऐसे नहीं देखता।" मैंने भोली शक्ल बना के कहा─"तेरे सिवा मैं गांव की किसी लड़की से बात ही नहीं करता।"
"अच्छा...क्या सच में???"
"हां...सच में।"
"ऐसा क्यों??"
"मुझे नहीं पता।" मैंने भोलेपन में कहा─"मेरी कभी हिम्मत ही नहीं होती किसी लड़की से बात करने की। मुझे लगा करता है कि कहीं वो गलत न समझ ले और फिर मुझे कुछ उल्टा सीधा बोलने लग जाए। इस लिए मैं किसी से मतलब ही नहीं रखता।"
"पर कोई लड़की ऐसे कैसे तुझे कुछ बोल देगी?" अनीता ने कहा─"तू अगर किसी से अच्छे से बात करेगा तो वो भी तो अच्छे से बात करेगी तुझसे।"
"मुझे नहीं करना किसी से बात।" मैंने कहा─"मैं तुझसे बात कर लेता हूं यही काफी है।"
"अच्छा।"
"हां।"
अनीता एकटक देखने लगी मुझे। एक बार फिर उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए। तभी हमारे कानों में श्यामू काका की आवाज पड़ी। वो हमारा नाम ले के पुकार रहे थे।
"र..राजू चल।" अनीता हड़बड़ाते हुए बोली─"छोटे काका बुला रहे हैं हमें। लगता है हमें आए काफी देर हो गई है।"
"हां चल जल्दी।" मैं झट से उठ कर खड़ा हो गया।
अनीता ने बाकी का नमकीन गुड़ वापस कागज में लपेटा और फिर उसे अपने दुपट्टे में छुपा कर दुपट्टे को कमर में बांध लिया। दुपट्टे का बाकी हिस्सा उसने अपने सीने पर फैला कर उसका एक छोर पीठ से घुमा कर कमर में खोंस लिया।
हम दोनों जल्दी ही वहां से खलिहान तरफ आ गए। हमें देखते ही श्यामू काका ने कहा कि सुनीता और रानी थक गई हैं इस लिए अब बैलों को हांकने की बारी हमारी है। काका की बात सुन कर हमने डंडा ले कर अपना अपना पाला सम्हाल लिया।
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दोपहर होने से पहले ही काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। मां ने आ कर अनीता से कहा कि वो मेरे साथ घर जाए और नहा धो कर फटाफट खाना बना ले। मां की बात सुन अनीता मन ही मन ये सोच के खुश हो गई कि अब वो मेरे साथ आज नदी में नहाने आसानी से जा सकेगी।
असल में गहाई के बाद गेहूं को भूसे से निकालने का काम अभी बाकी था। आज हवा अच्छी चल रही थी जिसके कारण मझले काका ने कहा कि गेहूं को ओसाने में आसानी होगी और साथ ही काम भी जल्दी हो सकता है।
खैर मैं और अनीता चल पड़े। दोनों काकी एवं सुनीता और रानी उनके साथ पहले ही चली गईं थी। खेत में अब मां बापू के अलावा दोनों काका ही थे।
"तो आज मौका मिल ही गया नदी में नहाने का..है न।" रास्ते में मैंने मुस्कुराते हुए अनीता से कहा।
"हां...अच्छा हुआ जो मां साथ नहीं आई।" अनीता खुशी से मुस्कुराते हुए बोली─"नहीं तो उसके साथ सीधा घर ही जाना पड़ता और फिर कुएं में ही नहाना पड़ता।"
"तो क्या हुआ अगर कुएं में ही नहाना पड़ता हमें।" मैंने कहा─"मैं कुएं में भी तुझे जी भर के नहलाता।"
"नहीं राजू...मुझे अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे नहलाने के लिए इतना सारा पानी कुएं से खींचता है।" अनीता ने कहा─"और ये भी अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे कुएं से पानी नहीं खींचने देता।"
"देख तू मुझसे छोटी है...ऊपर से लड़की है तो ज्यादा पानी खींचने से थक जाएगी तू।" मैंने उसे समझाया─"इसी लिए मैं तुझे इसके लिए मना करता हूं। दूसरी बात...मैं तुझसे प्यार करता हूं तो मेरा दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे...हां।"
अनीता गर्दन घुमा कर एकटक देखने लगी मुझे। उसके पसीने से भीगे चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए।
"पर मैं भी तो तुझसे प्यार करती हूं।" फिर उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"मेरा भी तो दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतना ज्यादा कुएं से पानी खींचे।"
अब मैं उसे एकटक देखने लगा। मेरी धड़कनें तो कब से तेज तेज चल रहीं थी। उसकी बातें सुन कर मैं सोचने लगा कि हम दोनों एक जैसा ही एक दूसरे के लिए सोचने लगे हैं। मुझे समझ न आया कि अब मैं उससे क्या कहूं।
"अब ऐसे क्यों देख रहा है?" जब मैं उसकी तरफ देखता ही रहा तो वो थोड़ा लजाते हुए बोली─"क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
"न..नहीं..कुछ गलत नहीं कहा तूने।" मैंने हड़बड़ा कर कहा─"मैं जानता हूं कि तू भी मुझसे बहुत प्यार करती है और जैसे मैं नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे वैसे ही तू भी नहीं चाहती कि मैं तेरे लिए इतनी मेहनत करूं...लेकिन...फिर भी मैं लड़का हूं तो इतने से मैं नहीं थक सकता पर तू लड़की है तो जल्दी थक जाएगी। इस लिए मेहनत का काम मुझे करने दे।"
"बातें बनाना खूब आने लगा है तुझे।" उसने आँखें फैला कर कहा।
"बात नहीं बना रहा मैं।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"मैं तो सच कह रहा हूं तुझसे। दूसरी बात...मुझे अच्छा लगता है तेरे लिए इतनी मेहनत करना। तू भले ही ऐसा न करे...फिर भी मुझे अच्छा ही लगेगा।"
"अच्छा जाने दे।" उसने कहा─"पर मैं नदी में तुझे अपने से नहलाऊंगी और मेरा जैसे मन होगा वैसे नहलाऊंगी। तू मुझे बिल्कुल नहीं रोकेगा...बताए देती हूं...हां।"
"हां ठीक है...नहीं रोकूंगा।" मैं मुस्कुरा उठा।
कुछ ही देर में हम दोनों नदी किनारे पहुंच गए। दोपहर हो ही गई थी क्योंकि आसमान में आग उगल रहा सूरज एकदम सिर पर ही था। मैंने आस पास दूर दूर तक निगाह दौड़ाई। इस वक्त कोई नहीं था यहां। होता भी कैसे...ज्यादातर लोग दोपहर होने से पहले ही नहा के और कपड़े धो के चले जाते थे।
"हमारे अलावा यहां दूर दूर तक कोई नहीं है अनीता।" मैंने कहा─"अब तू कपड़े उतार के आराम से नहा सकती है नदी में।"
"हां तू तो चाहता ही है कि मैं कपड़े उतार कर नंगी हो जाऊं।" अनीता मुस्कुराते हुए बोली और फिर एकदम से जाने क्या सोच के शर्मा गई।
"ऐसा क्यों कह रही है तू।" मैंने चौंक कर उससे कहा─"मैं भला क्यों ऐसा चाहूंगा। मैं तो ऐसा इस लिए कह रहा हूं ताकि तू अच्छे से माटी लगा के नहा सके जिससे गर्मी भी दूर हो जाए। बाकी तेरी जैसी इच्छा हो वैसे नहा...मैं नहीं बोलूंगा।"
"बुद्धू...मजाक कर रही थी मैं।" उसने हल्के से मेरी बाजू पर मारा फिर मुस्कुराते हुए बोली─"मैं तो सच में कुर्ता उतार के ही नहाऊंगी।"
"ठीक है।" मैं अपनी शर्ट उतारते हुए बोला─"अब चल बातें करना छोड़ और जल्दी से नहाते हैं...नहीं तो अगर घर जाने में देर हो गई तो मां बापू के आने से पहले तू खाना भी नहीं बना पाएगी और फिर तुझे मां से डांट सुननी पड़ेगी।"
"हां ये तो तूने सही कहा राजू।" उसने हड़बड़ा कर कहा─"चल जल्दी से नहा लेते हैं।"
कहने के साथ ही उसने आस पास निगाह घुमाई। जब उसे कोई न दिखा तो झट नदी किनारे रखे पत्थर के चौड़े पाट पर जा कर बैठ गई। उसके बाद वो बैठे बैठे ही अपना कुर्ता उतारने लगी। ये देख मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं।
यूं तो कल कुएं में मैं उसे कमीज पहने देख चुका था लेकिन यहां खिली धूप में पहली बार ही देखने वाला था। न मैंने और ना ही अनीता ने कभी ये सोचा होगा कि एक दिन उसे इस तरह खुले में अपना कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहन के नहाना होगा।
खैर जल्दी ही उसने कुर्ता उतार लिया और उसे नदी के पानी में डुबा कर धोने लगी। कुर्ता उतर जाने के बाद अब वो ऊपर सिर्फ कमीज में थी जो उसकी आधी पीठ और आधे पेट तक ही थी...जबकि नीचे उसने सलवार पहन रखी थी।
इधर मैं अपने कपड़े उतार चुका था और अब सिर्फ कच्छे में था। मैं झट आगे बढ़ा और नदी में उतर गया। ठंडे ठंडे पानी का स्पर्श होते ही बदन में झुरझुरी दौड़ गई। नदी में उतर कर मैं अनीता के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझे देख वो मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी।
उसके घुटने क्योंकि कमीज के ऊपर से उसकी छातियों पर सटे थे इस लिए जब वो नदी के पानी में अपने कुर्ते को धोने लगती तो घुटनों का दबाव उसकी छातियों पर पड़ जाता जिससे उसके सीने की गोलाईयां ऊपर की तरफ उभर कर दिखने लगती थीं। खिली धूप में मैं उसके उन उभारों की चमक स्पष्ट देख सकता था। एकाएक ही मेरा हलक सूखने लगा था।
"अब देखता ही रहेगा या नहाएगा भी।" अनीता ने हल्के से शर्माते हुए कहा तो मेरा ध्यान भंग हुआ।
"अरे...मैं ये देख रहा हूं कि तूने कुर्ता तो उतार लिया है।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा─"लेकिन सलवार तो अभी भी तूने पहन रखा है।"
"हाय दय्या...तो क्या मैं सलवार भी उतार दूं?" वो एकदम से चौंक कर बोली─"र..राजू ये क्या बोल रहा है तू?"
"हां तो क्या गलत बोला मैंने?" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"जब तू कुर्ता उतार सकती है तो भला सलवार उतारने में क्या समस्या हो सकती है तुझे। तूने सलवार के अंदर कच्छी तो पहन ही रखी होगी न।"
"राजू चुप कर जा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"क्या क्या बोले जा रहा है तू।"
"ले अब मैंने क्या गलत बोल दिया?" मैंने भोली शक्ल बना ली।
वो एकटक मुझे देखने लगी। उसके चेहरे पर एकाएक अजीब से भाव उभर आए थे।
"क्या हुआ...ऐसे क्यों देख रही है मुझे।" मैंने धड़कते दिल से पूछा─"नहीं उतारना तो मत उतार...पर नहाएगी नहीं क्या? भूल मत ज्यादा देर करेगी तो मां से डांट सुनने को मिलेगी। अगर मां ने तुझे डांटा तो तुझसे ज्यादा मुझे बुरा लगेगा।"
"तु..तुझे क्यों बुरा लगेगा भला?" अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।
"ले अब ये भी समझाऊं तुझे?" मैंने कहा─"अरे बताया था न कि अगर तुझे किसी तरह की तकलीफ होगी तो मुझे भी होगी। मुझे ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा कि तुझे कोई डांटे या तुझे कोई बुरा भला कहे।"
ये सुन कर अनीता हैरानी से देखने लगी मुझे। इधर मेरी धड़कनें एकाएक फिर से तेज हो गईं।
"तू न सच में बहुत अजीब बातें करता है।" फिर उसने कहा─"मुझे तेरी बातें समझ ही नहीं आतीं।"
"तो तू समझने की कोशिश ही न कर।" मैंने कहा─"पर अगर तुझे मेरी बातें बुरी लगें तो बोल दे....नहीं करूंगा ऐसी बातें।"
"ऐसी बात नहीं है राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे तेरी सारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं...बस कभी कभी समझ नहीं पाती हूं।"
"चल जाने दे।" मैंने कहा─"और आ जा फटाफट नदी में।"
अनीता ने अपने कुर्ते को पाट पर रखा और खड़ी हो गई। उसके खड़े होते ही मेरी नजर सीधा उसकी चूचियों पर जा पड़ी। कमीज का निचला सिरा उसके आधे पेट तक ही था। पेट के बीच उसकी छोटी सी मगर खूबसूरत नाभी साफ दिख रही थी मुझे। नाभी के बिल्कुल नीचे उसकी सलवार बंधी हुई थी।
मुझे खुद को यूं देखते देख उसके चेहरे पर शर्म के भाव उभर आए। फिर हल्के से मुस्कुराते हुए वो बड़ी सावधानी से नदी के पानी में उतरने लगी। मैं सांसें रोके उसे ही देखे जा रहा था।
थोड़ी ही देर में वो नदी के पानी में उतर कर मेरे करीब आ गई। नदी का पानी हमारी कमर तक था। उसे सिर्फ कमीज पहने मैं पहली बार खिली धूप में इतना करीब से देख रहा था।
"ऐसे न देख मुझे...नहीं तो वापस चली जाऊंगी मैं।" अनीता शर्माते हुए मुस्कुराई─"गंदा कहीं का।"
"अनीता...तू..तू सच में बहुत सुंदर है।" मैं एकदम मंत्रमुग्ध सा हो कर बोला─"मैने पहले कभी तुझे इतना ध्यान से नहीं देखा।"
"न कर न ऐसी बात।" वो बुरी तरह शर्मा गई।
"अरे शर्मा क्यों रही है तू?" मैं मुस्कुराया─"तू न....मुझसे शर्माया न कर। जैसे मैं बिना शर्माए तुझसे हर बात कह देता हूं वैसे ही तू भी बिना शर्माए कह दिया कर।"
"नहीं कह सकती मैं।" उसने मुस्कुराते हुए कहा─"मुझे शरम आने लगती है...फिर मुझसे कुछ बोला ही नहीं जाता।"
"अच्छा...क्या सच में???" मुझे हैरानी हुई।
"हां...पता नहीं तुझे क्यों नहीं शर्म आती कुछ भी बोलने में?" वो फिर से लजाते हुए बोली।
"क्योंकि जो मेरे अंदर होता है उसे बोलने में मैं संकोच नहीं करता।" मैंने कहा─"अगर संकोच करता तो इस तरह खुल के तेरी तारीफ न करता...और...और जब तेरी तारीफ न करता तो तुझे अच्छा कहां लगता...बता भला?"
"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता ने कहा।
"मैं सब कुछ सही ही कहता हूं।" मैंने कहा─"और बिना संकोच के कहता हूं ताकि मेरी सुंदर और प्यारी बहन खुश हो जाए।"
"अच्छा...मेरी खुशी का इतना खयाल है तुझे?" अनीता तिरछी नजर से देख मुस्कुराई। इस बार उसके चेहरे पर वही अदा दिखी जो पहले भी कई बार दिखी थी।
"हां...बहुत ज्यादा खयाल है।" मैं थोड़ा उसके करीब सरका─"मेरा मन करता है कि तेरी खुशी के लिए पता नहीं क्या क्या कर डालूं।"
"क..क्या सच में???" अनीता की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"हां...पता नहीं क्यों एकाएक मुझे लगने लगा है?" मैंने सोचने वाले अंदाज में सिर खुजाया─"पर सच यही कि मेरा मन यही करता है। क्या तेरा मन ऐसा कुछ नहीं करता?"
"प..पता नहीं।" अनीता बोली─"मैंने इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं।"
"वाह फिर तो बड़ी मतलबी है तू।" मैंने उसे घूरा─"मतलब मैं तेरे बारे में इतना सोचता हूं और तू मेरे बारे में कुछ नहीं सोचती?"
"न..नहीं नहीं...ऐसी बात नहीं है राजू।" वो एकदम से हड़बड़ा गई─"मैं...मैं भी सोचती हूं तेरे बारे में...पर तेरे जैसे नहीं...शायद मैं तेरे जितना समझदार नहीं हूं।"
ये कहते ही उसके चेहरे पर एकाएक मायूसी छा गई। जैसे उसे इस बात का अब अफसोस होने लगा हो।
"कोई बात नहीं।" मैंने उसका चेहरा थाम लिया फिर उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"तुझे कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं है। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह...चल अब नहाते हैं।"
"नहीं राजू...मैं भी तेरी तरह सोचना चाहती हूं।" अनीता ने मासूमियत से कहा─"जैसे तू मेरे बारे में इतना कुछ सोचता है...मैं भी ऐसे ही तेरे बारे में सोचना चाहती हूं...पर मुझे समझ नहीं आता कि मैं कैसे सोचूं। तू ही बता...तू कैसे मेरे बारे में इतना कुछ सोच लेता है?"
उसके यूं मासूमियत से पूछने पर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मुझे उस पर बहुत ज्यादा प्यार आने लगा। जी किया कि झपट कर उसे अपने सीने से लगा लूं...पर हिम्मत न हुई।
"बता न राजू...कैसे सोच लेता है तू इतना कुछ?" उसने उसी मासूमियत से पूछा।
"मुझे खुद नहीं पता।" मैंने कहा─"बस वही करता हूं जो मेरा दिल कहता है...जो मैं तेरे लिए महसूस करता हूं।"
"तो...तो क्या महसूस करता है मेरे लिए?"
"देख मैं ढंग से इस बारे में कुछ नहीं बता सकता...क्योंकि मैं खुद नहीं जानता।" मैंने कहा─"पर हां इतना कह सकता हूं कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं। तू मेरी छोटी बहन है तो मेरा दिल यही कहता है कि मैं तुझे खूब प्यार और दुलार दूं। तेरा हर तरह से खयाल रखूं। ऐसा कुछ भी न करूं जिससे तुझे दुख हो या जिससे तेरे चेहरे पर उदासी आ जाए। बस...इतनी सी ही बात महसूस करता हूं मैं।"
मेरी बात खत्म होने पर अनीता कुछ न बोली। वो बस एकटक देखे जा रही थी मुझे। मेरी धड़कनें पहले से ही तेज तेज चल रहीं थी। अंदर कहीं उथल पुथल भी मची हुई थी।
"मुझे ज्यादा तो नहीं पता...पर गांव के दूसरे भाई बहनों को देख के जो समझ आया है उससे यही कह सकती हूं कि हमारे बीच जो प्यार है वैसा प्यार गांव के किसी भी भाई बहन के बीच नहीं देखा मैंने।" अनीता ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा─"मैं इतना जानती हूं कि भाई बहन में बहुत प्यार होता है लेकिन जिस तरह तू कर रहा है या जिस तरह मैं तुझसे कर रही हूं...वैसा शायद ही कोई करता होगा।"
"मतलब??" मैं अंदर ही अंदर चौंका─"तू ये क्या बोल रही है?"
"र..राजू...सुन...अब से पहले तक मैं यही समझती थी कि हमारे बीच जो प्यार है वो भाई बहन का ही है।" अनीता एकाएक कुछ ज्यादा ही गंभीर दिखने लगी─"मुझे इस बात से खुशी भी हो रही थी कि तू मुझसे झगड़ता नहीं है बल्कि अब प्यार करने लगा है। पर तेरी कुछ बातें मुझे अजीब भी लगती थीं। तुझसे कहती भी थी कि मुझे तेरी बातें समझ नहीं आती हैं। अब इस वक्त जब तू इतना कुछ बोल रहा था तो एकदम से मुझे ये लगने लगा कि हमारे बीच का ये प्यार भाई बहन वाला नहीं है....बल्कि...बल्कि शायद प्रे..प्रेमियों वाला है।"
"ये...ये क्या कह रही है तू??" मैं बुरी तरह उछल पड़ा। एकाएक ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर आसमान गिर पड़ा हो। धड़कनें जो अब तक तेज तेज चल रहीं थी वो एकदम रुक सी गईं।
"ह..हां राजू।" अनीता की आवाज लड़खड़ा गई─"मेरी सखी गुंजा अक्सर प्रेम के बारे में मुझे बताती थी। उस समय मुझे उसकी बातें समझ नहीं आती थीं...मगर अब समझ आ रही हैं। हां राजू...मुझे अच्छे से समझ आ रही हैं कि वो सच कहती थी। प्रेम सच में ऐसा ही होता है।"
"पता नहीं क्या क्या बोले जा रही है तू।" मैं बदहवास सा बोल पड़ा।
"मैं हैरान हूं कि तुझे इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई राजू?" अनीता ने कहा─"जबकि तू मुझसे उमर में बड़ा है। तुझे तो अब तक समझ जाना चाहिए था कि तू जो कुछ मेरे बारे में महसूस करता है वो हकीकत में एक बहन के लिए प्यार या स्नेह नहीं बल्कि एक प्रेमिका के लिए प्रेम है। मतलब....मतलब....तू मुझे अपनी बहन नहीं....प्रेमिका समझता है....है न???"
अंकिता की इस बात से मैं हतप्रभ सा रह गया। आश्चर्य से आँखें तो पहले ही फटी पड़ीं थी। धड़कनें तो पहले ही रुक गईं थी और अब ऐसा झटका लगा मानो अचानक की नदी के अंदर का तल मेरे पांवों के नीचे से गायब हो गया हो और मैं पलक झपकते ही नीचे पानी में डूबता चला जाने वाला हूं। मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला।
"न..नहीं..नहीं...ये सच नहीं है...ऐसा नहीं हो सकता।" मैं हैरान परेशान सा बोल पड़ा─"तू मेरी बहन है...मैं तुझे अपनी प्रेमिका कैसे समझ सकता हूं। नहीं नहीं...ये गलत है....गलत बात है अनीता। मैं तुझे बहन ही समझता हूं और....और हमारे बीच भाई बहन वाला ही प्यार है....है न....कह दे अनीता कि यही सच है...बोल..चुप क्यों है तू??"
"अब कुछ मत बोल राजू।" अनीता पीछे होते हुए बोली─"और न ही मुझसे कुछ पूछ। अगर तुझे इस बात का एहसास नहीं हो रहा तो अकेले में खुद सोच इस बारे में। तब शायद तुझे समझ आ जाए कि मैं सच कह रही हूं या झूठ।"
उसके बाद वो नहीं रुकी। नदी से बाहर निकल कर उसने फटाफट अपना गीला कुर्ता पहन लिया। पत्थर के पाट पर बैठ कर ही उसने थोड़ा बहुत खुद को भिगोया और फिर अकेले ही घर की तरफ जाने लगी।
मैं ठगा सा नदी के पानी में ही खड़ा रह गया था और अब उसे जाते देख रहा था। दिलो दिमाग में हड़कंप सा मच गया था। दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। मैंने कल्पना तक नहीं की थी दो पल में ऐसा कुछ हो जाएगा। अनीता को इस तरह अकेले जाता देख मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर कुछ टूट गया हो। ऐसा लगा जैसे अब कुछ भी इस दुनिया में नहीं बचा। कुछ देर पहले तक उसके साथ में रहने से जो खुशी महसूस कर रहा था वो खुशी एकाएक गहरे दुख में बदल गई थी।
अजीब तो मुझे भी लगा करता था कभी कभी। मैं इस सबके बारे में सोचता भी था लेकिन प्रेम के ज्ञान से पूरी तरह परिचित नहीं था और शायद इसी लिए समझ भी नहीं पाया था कि हम दोनों के बीच जो प्यार है वो भाई बहन वाला है या प्रेमियों वाला।
मेरे देखते ही देखते अनीता मेरी आंखों से दूर चली गई और कुछ देर बाद मुझे नजर आना भी बंद हो गई। तब...अचानक मुझे होश आया और मैं हड़बड़ा गया। एकाएक अंदर से ऐसा एहसास हुआ कि अब जाने क्या कर डालूं खुद के साथ। मन में अपने लिए बड़े जोर का गुस्सा आने लगा था। अपने बाल नोचने का मन करने लगा था। नदी किनारे रखे पत्थर के पाट पर सिर पटकने का मन करने लगा था।
आखिर मैंने खुद को किसी तरह सम्हाला और अपने अंदर उठे तूफान को शांत करने लगा। मुझे कामयाबी तो नहीं मिली लेकिन फिर किसी तरह दो तीन डुबकी लगा कर नहाया और फिर नदी से बाहर आ गया। नदी किनारे रखे अपने कपड़े लिए और चल दिया घर की तरफ।
जारी है.....
"अब ऐसे क्यों देख रहा है तू।" मुझे अपनी तरफ अपलक देखते देख उसने अपनी भौंहों को ऊपर कर के पूछा। इस बार भी अदा वही थी उसकी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा।
"देख रहा हूं कि तू कितनी सुंदर और प्यारी है।" मैं अनायास ही बोल गया।
"क...क्या???" वो एकदम से सीधा हुई और शर्मा गई।
"मैंने कल तुझसे कहा था न कि जब तू ऐसे शर्माती है तो और भी सुंदर और प्यारी दिखती है।" मैंने कहा।
"क्या...कुछ भी बोलता है तू।" उसने शर्माते हुए झूठी नाराजगी दिखाई।
"अच्छा चल...अब से ऐसा कभी नहीं बोलूंगा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"क..क्यों नहीं बोलेगा?" वो चौंकी।
"तुझे अच्छा नहीं लगता न इस लिए।"
"मैंने कब कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगता?"
"तो क्या तुझे सच में अच्छा लगता है?"
"ह..हां।" वो बोली और फिर शर्मा गई।
"एक बात बता।" मैंने वो पूछा जो मेरे मन में एकाएक सवाल के रूप में उभर आया था─"तू बार बार ऐसे शर्माने क्यों लगती है।"
"मैं कहां शर्माती हूं।" वो एकदम से सकपका गई।
"झूठ मत बोल।" मैंने कहा─"सब दिखता है मुझे। मैंने साफ साफ देखा है कि तू मेरी बात पर कई बार शर्मा जाती है।"
"हां तो तू बात ही ऐसी कर देता है कि मुझे शर्म आ जाती है।" उसने मासूमियत से कहा।
"अच्छा...बता भला...मैंने कौन सी ऐसी बात कह दी जिससे तुझे शर्म आ जाती है?"
"रहने दे।" अनीता के चेहरे पर लाज की सुर्खी उभर आई─"मैं कुछ नहीं बताऊंगी।"
"यार अब ये क्या बात हुई?" मैंने कहा─"अब क्या मुझसे कोई बात छुपाएगी तू? क्या भूल गई कि हमारे बीच क्या फैसला हुआ था?"
"भूली नहीं हूं।" उसने कहा─"लेकिन राजू...कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बहन अपने भाई को नहीं बता सकती।"
"पर मैं तो तुझे अपनी हर बात बता सकता हूं।"
"हां तो मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं...समझा।"
"यार ऐसे न कर न।" मैंने मनुहार सा किया─"बता न...मेरी कौन सी बात से शर्म आ जाती है तुझे?"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए।
"अब बता भी दे न।"
"अच्छा ठीक है बताती हूं।" वो कागज से नमकीन गुड़ ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाते हुए बोली─"गांव में मेरी एक सखी है...गुंजा नाम है उसका। तू जानता है उसे...वो मुझे कई ऐसी बातें बताया करती है जो हम लड़कियों या औरतों वाली होती हैं। उसी से मुझे पता चला था कि लड़का और लड़की में सबसे बड़ा अंतर ये होता है कि लड़के किसी बात से शर्माते नहीं हैं और हम लड़कियां शर्माती हैं...क्योंकि ऊपर वाले ने हमें बनाया ही ऐसा है। उसने ये भी बताया था कि जब हम लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तो कई बातों के लिए हमें शर्म आती है। लड़के जो बात बिना झिझक के बोल देते हैं वहीं बात हम लड़कियां शर्म की वजह से नहीं बोल पातीं।"
"अच्छा...और क्या बताया उसने?" मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"सब कुछ नहीं बता सकती तुझे।" अनीता हल्के से मुस्कुराई─"बाकी तेरी किस बात पर शर्मा जाती हूं तो उसका जवाब यही है कि तू जब मेरी तारीफ करता है तो अनायास ही शर्म लगने लगती है मुझे। माना कि हम भाई बहन हैं...लेकिन इसके अलावा लड़का लड़की भी तो हैं। गुंजा बताया करती है कि जब कोई लड़का किसी लड़की की इस तरह तारीफें करता है तो लड़की ऐसे ही शर्माती है और पता है....लड़का क्यों लड़की की तारीफ करता है?"
"क..क्यों करता है?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"गुंजा के अनुसार वो उस लड़की को पटाने की फिराक में होता है।" अनीता ने शर्माते हुए कहा─"मतलब वो ऐसा उसके प्रेम में करता है...और लड़की जब ये समझ जाती है तो उसे अनायास ही शर्म आने लगती है।"
"अच्छा??? क्या सच में ऐसा होता है?" मैं हैरान रह गया।
"मुझे क्या पता।" अनीता ने कहा─"ऐसा तो गुंजा ही कहती है।"
"इसका मतलब मैं तेरी तारीफ कर रहा हूं तो क्या तुझे पटा रहा हूं??" मैं इस खयाल मात्र से ही सिहर उठा─"पर ऐसा कैसे हो सकता है? मतलब...मेरे मन में तो ऐसा कुछ नहीं है। वैसे भी तू मेरी बहन है तो ऐसा तो मैं सोच ही नहीं सकता।"
अनीता को भी समझ न आया इस लिए वो कुछ न बोली। मैं कुछ देर तक इस बारे में सोचता रहा।
"बड़ी अजीब बात है न अनीता।" फिर मैंने कहा─"कुछ बातें होती तो हैं लेकिन समझ नहीं आतीं।"
"हम्म्म्म।" अनीता ने सिर हिलाया─"जाने दे...तू ज्यादा मत सोच इस बारे में...ले मुंह खोल अपना।"
अनीता के कहने पर मैंने अपना मुंह खोला तो उसने नमकीन गुड़ मेरे मुंह में डाल दिया। फिर मैंने भी उसे खिलाया।
"अच्छा ये बता...क्या तूने गुंजा से प्रेम के बारे में पूछा है कभी?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा।
"नहीं।" उसने झट इंकार किया─"पर तू ये क्यों पूछ रहा है?"
"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"मतलब मुझे और तुझे नहीं पता इस बारे में तो शायद उसे पता हो। मुझे लगता है तुझे पूछना चाहिए उससे इसके बारे में।"
"धत्त पागल है क्या?" अनीता ने मुझे घूरा─"मैं क्यों पूछूं इसके बारे में?"
"यार पता तो चलना ही चाहिए कि सब इसके बारे में इस तरह क्यों बोलते हैं?" मैंने कहा─"आखिर लोग इसके बारे में क्यों इतनी अजीब अजीब बातें बताते हैं। पता तो चलना ही चाहिए कि सच में ये प्रेम क्या होता है...कैसे होता है और....और प्रेमी लोग क्या करते हैं प्रेम में?"
"तू न एकदम पागल है।" अनीता ने कहा─"भला क्या जरूरत है तुझे ये सब जानने की? क्या तुझे भी अब किसी से प्रेम करने का मन है?"
"म...मैं भला किससे प्रेम करूंगा??" मैं चौंक पड़ा।
"ऐ...ऐसा क्यों कहता है?" अनीता की आँखें फैलीं─"गांव में कितनी लड़कियां हैं जिनसे तू प्रेम कर सकता है।"
"हट...मैं किसी लड़की की तरफ ऐसे नहीं देखता।" मैंने भोली शक्ल बना के कहा─"तेरे सिवा मैं गांव की किसी लड़की से बात ही नहीं करता।"
"अच्छा...क्या सच में???"
"हां...सच में।"
"ऐसा क्यों??"
"मुझे नहीं पता।" मैंने भोलेपन में कहा─"मेरी कभी हिम्मत ही नहीं होती किसी लड़की से बात करने की। मुझे लगा करता है कि कहीं वो गलत न समझ ले और फिर मुझे कुछ उल्टा सीधा बोलने लग जाए। इस लिए मैं किसी से मतलब ही नहीं रखता।"
"पर कोई लड़की ऐसे कैसे तुझे कुछ बोल देगी?" अनीता ने कहा─"तू अगर किसी से अच्छे से बात करेगा तो वो भी तो अच्छे से बात करेगी तुझसे।"
"मुझे नहीं करना किसी से बात।" मैंने कहा─"मैं तुझसे बात कर लेता हूं यही काफी है।"
"अच्छा।"
"हां।"
अनीता एकटक देखने लगी मुझे। एक बार फिर उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए। तभी हमारे कानों में श्यामू काका की आवाज पड़ी। वो हमारा नाम ले के पुकार रहे थे।
"र..राजू चल।" अनीता हड़बड़ाते हुए बोली─"छोटे काका बुला रहे हैं हमें। लगता है हमें आए काफी देर हो गई है।"
"हां चल जल्दी।" मैं झट से उठ कर खड़ा हो गया।
अनीता ने बाकी का नमकीन गुड़ वापस कागज में लपेटा और फिर उसे अपने दुपट्टे में छुपा कर दुपट्टे को कमर में बांध लिया। दुपट्टे का बाकी हिस्सा उसने अपने सीने पर फैला कर उसका एक छोर पीठ से घुमा कर कमर में खोंस लिया।
हम दोनों जल्दी ही वहां से खलिहान तरफ आ गए। हमें देखते ही श्यामू काका ने कहा कि सुनीता और रानी थक गई हैं इस लिए अब बैलों को हांकने की बारी हमारी है। काका की बात सुन कर हमने डंडा ले कर अपना अपना पाला सम्हाल लिया।
**********
दोपहर होने से पहले ही काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। मां ने आ कर अनीता से कहा कि वो मेरे साथ घर जाए और नहा धो कर फटाफट खाना बना ले। मां की बात सुन अनीता मन ही मन ये सोच के खुश हो गई कि अब वो मेरे साथ आज नदी में नहाने आसानी से जा सकेगी।
असल में गहाई के बाद गेहूं को भूसे से निकालने का काम अभी बाकी था। आज हवा अच्छी चल रही थी जिसके कारण मझले काका ने कहा कि गेहूं को ओसाने में आसानी होगी और साथ ही काम भी जल्दी हो सकता है।
खैर मैं और अनीता चल पड़े। दोनों काकी एवं सुनीता और रानी उनके साथ पहले ही चली गईं थी। खेत में अब मां बापू के अलावा दोनों काका ही थे।
"तो आज मौका मिल ही गया नदी में नहाने का..है न।" रास्ते में मैंने मुस्कुराते हुए अनीता से कहा।
"हां...अच्छा हुआ जो मां साथ नहीं आई।" अनीता खुशी से मुस्कुराते हुए बोली─"नहीं तो उसके साथ सीधा घर ही जाना पड़ता और फिर कुएं में ही नहाना पड़ता।"
"तो क्या हुआ अगर कुएं में ही नहाना पड़ता हमें।" मैंने कहा─"मैं कुएं में भी तुझे जी भर के नहलाता।"
"नहीं राजू...मुझे अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे नहलाने के लिए इतना सारा पानी कुएं से खींचता है।" अनीता ने कहा─"और ये भी अच्छा नहीं लगता जब तू मुझे कुएं से पानी नहीं खींचने देता।"
"देख तू मुझसे छोटी है...ऊपर से लड़की है तो ज्यादा पानी खींचने से थक जाएगी तू।" मैंने उसे समझाया─"इसी लिए मैं तुझे इसके लिए मना करता हूं। दूसरी बात...मैं तुझसे प्यार करता हूं तो मेरा दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे...हां।"
अनीता गर्दन घुमा कर एकटक देखने लगी मुझे। उसके पसीने से भीगे चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए।
"पर मैं भी तो तुझसे प्यार करती हूं।" फिर उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"मेरा भी तो दिल नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतना ज्यादा कुएं से पानी खींचे।"
अब मैं उसे एकटक देखने लगा। मेरी धड़कनें तो कब से तेज तेज चल रहीं थी। उसकी बातें सुन कर मैं सोचने लगा कि हम दोनों एक जैसा ही एक दूसरे के लिए सोचने लगे हैं। मुझे समझ न आया कि अब मैं उससे क्या कहूं।
"अब ऐसे क्यों देख रहा है?" जब मैं उसकी तरफ देखता ही रहा तो वो थोड़ा लजाते हुए बोली─"क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
"न..नहीं..कुछ गलत नहीं कहा तूने।" मैंने हड़बड़ा कर कहा─"मैं जानता हूं कि तू भी मुझसे बहुत प्यार करती है और जैसे मैं नहीं चाहता कि तू मेरे लिए इतनी मेहनत करे वैसे ही तू भी नहीं चाहती कि मैं तेरे लिए इतनी मेहनत करूं...लेकिन...फिर भी मैं लड़का हूं तो इतने से मैं नहीं थक सकता पर तू लड़की है तो जल्दी थक जाएगी। इस लिए मेहनत का काम मुझे करने दे।"
"बातें बनाना खूब आने लगा है तुझे।" उसने आँखें फैला कर कहा।
"बात नहीं बना रहा मैं।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"मैं तो सच कह रहा हूं तुझसे। दूसरी बात...मुझे अच्छा लगता है तेरे लिए इतनी मेहनत करना। तू भले ही ऐसा न करे...फिर भी मुझे अच्छा ही लगेगा।"
"अच्छा जाने दे।" उसने कहा─"पर मैं नदी में तुझे अपने से नहलाऊंगी और मेरा जैसे मन होगा वैसे नहलाऊंगी। तू मुझे बिल्कुल नहीं रोकेगा...बताए देती हूं...हां।"
"हां ठीक है...नहीं रोकूंगा।" मैं मुस्कुरा उठा।
कुछ ही देर में हम दोनों नदी किनारे पहुंच गए। दोपहर हो ही गई थी क्योंकि आसमान में आग उगल रहा सूरज एकदम सिर पर ही था। मैंने आस पास दूर दूर तक निगाह दौड़ाई। इस वक्त कोई नहीं था यहां। होता भी कैसे...ज्यादातर लोग दोपहर होने से पहले ही नहा के और कपड़े धो के चले जाते थे।
"हमारे अलावा यहां दूर दूर तक कोई नहीं है अनीता।" मैंने कहा─"अब तू कपड़े उतार के आराम से नहा सकती है नदी में।"
"हां तू तो चाहता ही है कि मैं कपड़े उतार कर नंगी हो जाऊं।" अनीता मुस्कुराते हुए बोली और फिर एकदम से जाने क्या सोच के शर्मा गई।
"ऐसा क्यों कह रही है तू।" मैंने चौंक कर उससे कहा─"मैं भला क्यों ऐसा चाहूंगा। मैं तो ऐसा इस लिए कह रहा हूं ताकि तू अच्छे से माटी लगा के नहा सके जिससे गर्मी भी दूर हो जाए। बाकी तेरी जैसी इच्छा हो वैसे नहा...मैं नहीं बोलूंगा।"
"बुद्धू...मजाक कर रही थी मैं।" उसने हल्के से मेरी बाजू पर मारा फिर मुस्कुराते हुए बोली─"मैं तो सच में कुर्ता उतार के ही नहाऊंगी।"
"ठीक है।" मैं अपनी शर्ट उतारते हुए बोला─"अब चल बातें करना छोड़ और जल्दी से नहाते हैं...नहीं तो अगर घर जाने में देर हो गई तो मां बापू के आने से पहले तू खाना भी नहीं बना पाएगी और फिर तुझे मां से डांट सुननी पड़ेगी।"
"हां ये तो तूने सही कहा राजू।" उसने हड़बड़ा कर कहा─"चल जल्दी से नहा लेते हैं।"
कहने के साथ ही उसने आस पास निगाह घुमाई। जब उसे कोई न दिखा तो झट नदी किनारे रखे पत्थर के चौड़े पाट पर जा कर बैठ गई। उसके बाद वो बैठे बैठे ही अपना कुर्ता उतारने लगी। ये देख मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं।
यूं तो कल कुएं में मैं उसे कमीज पहने देख चुका था लेकिन यहां खिली धूप में पहली बार ही देखने वाला था। न मैंने और ना ही अनीता ने कभी ये सोचा होगा कि एक दिन उसे इस तरह खुले में अपना कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहन के नहाना होगा।
खैर जल्दी ही उसने कुर्ता उतार लिया और उसे नदी के पानी में डुबा कर धोने लगी। कुर्ता उतर जाने के बाद अब वो ऊपर सिर्फ कमीज में थी जो उसकी आधी पीठ और आधे पेट तक ही थी...जबकि नीचे उसने सलवार पहन रखी थी।
इधर मैं अपने कपड़े उतार चुका था और अब सिर्फ कच्छे में था। मैं झट आगे बढ़ा और नदी में उतर गया। ठंडे ठंडे पानी का स्पर्श होते ही बदन में झुरझुरी दौड़ गई। नदी में उतर कर मैं अनीता के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझे देख वो मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी।
उसके घुटने क्योंकि कमीज के ऊपर से उसकी छातियों पर सटे थे इस लिए जब वो नदी के पानी में अपने कुर्ते को धोने लगती तो घुटनों का दबाव उसकी छातियों पर पड़ जाता जिससे उसके सीने की गोलाईयां ऊपर की तरफ उभर कर दिखने लगती थीं। खिली धूप में मैं उसके उन उभारों की चमक स्पष्ट देख सकता था। एकाएक ही मेरा हलक सूखने लगा था।
"अब देखता ही रहेगा या नहाएगा भी।" अनीता ने हल्के से शर्माते हुए कहा तो मेरा ध्यान भंग हुआ।
"अरे...मैं ये देख रहा हूं कि तूने कुर्ता तो उतार लिया है।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा─"लेकिन सलवार तो अभी भी तूने पहन रखा है।"
"हाय दय्या...तो क्या मैं सलवार भी उतार दूं?" वो एकदम से चौंक कर बोली─"र..राजू ये क्या बोल रहा है तू?"
"हां तो क्या गलत बोला मैंने?" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"जब तू कुर्ता उतार सकती है तो भला सलवार उतारने में क्या समस्या हो सकती है तुझे। तूने सलवार के अंदर कच्छी तो पहन ही रखी होगी न।"
"राजू चुप कर जा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"क्या क्या बोले जा रहा है तू।"
"ले अब मैंने क्या गलत बोल दिया?" मैंने भोली शक्ल बना ली।
वो एकटक मुझे देखने लगी। उसके चेहरे पर एकाएक अजीब से भाव उभर आए थे।
"क्या हुआ...ऐसे क्यों देख रही है मुझे।" मैंने धड़कते दिल से पूछा─"नहीं उतारना तो मत उतार...पर नहाएगी नहीं क्या? भूल मत ज्यादा देर करेगी तो मां से डांट सुनने को मिलेगी। अगर मां ने तुझे डांटा तो तुझसे ज्यादा मुझे बुरा लगेगा।"
"तु..तुझे क्यों बुरा लगेगा भला?" अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।
"ले अब ये भी समझाऊं तुझे?" मैंने कहा─"अरे बताया था न कि अगर तुझे किसी तरह की तकलीफ होगी तो मुझे भी होगी। मुझे ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा कि तुझे कोई डांटे या तुझे कोई बुरा भला कहे।"
ये सुन कर अनीता हैरानी से देखने लगी मुझे। इधर मेरी धड़कनें एकाएक फिर से तेज हो गईं।
"तू न सच में बहुत अजीब बातें करता है।" फिर उसने कहा─"मुझे तेरी बातें समझ ही नहीं आतीं।"
"तो तू समझने की कोशिश ही न कर।" मैंने कहा─"पर अगर तुझे मेरी बातें बुरी लगें तो बोल दे....नहीं करूंगा ऐसी बातें।"
"ऐसी बात नहीं है राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे तेरी सारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं...बस कभी कभी समझ नहीं पाती हूं।"
"चल जाने दे।" मैंने कहा─"और आ जा फटाफट नदी में।"
अनीता ने अपने कुर्ते को पाट पर रखा और खड़ी हो गई। उसके खड़े होते ही मेरी नजर सीधा उसकी चूचियों पर जा पड़ी। कमीज का निचला सिरा उसके आधे पेट तक ही था। पेट के बीच उसकी छोटी सी मगर खूबसूरत नाभी साफ दिख रही थी मुझे। नाभी के बिल्कुल नीचे उसकी सलवार बंधी हुई थी।
मुझे खुद को यूं देखते देख उसके चेहरे पर शर्म के भाव उभर आए। फिर हल्के से मुस्कुराते हुए वो बड़ी सावधानी से नदी के पानी में उतरने लगी। मैं सांसें रोके उसे ही देखे जा रहा था।
थोड़ी ही देर में वो नदी के पानी में उतर कर मेरे करीब आ गई। नदी का पानी हमारी कमर तक था। उसे सिर्फ कमीज पहने मैं पहली बार खिली धूप में इतना करीब से देख रहा था।
"ऐसे न देख मुझे...नहीं तो वापस चली जाऊंगी मैं।" अनीता शर्माते हुए मुस्कुराई─"गंदा कहीं का।"
"अनीता...तू..तू सच में बहुत सुंदर है।" मैं एकदम मंत्रमुग्ध सा हो कर बोला─"मैने पहले कभी तुझे इतना ध्यान से नहीं देखा।"
"न कर न ऐसी बात।" वो बुरी तरह शर्मा गई।
"अरे शर्मा क्यों रही है तू?" मैं मुस्कुराया─"तू न....मुझसे शर्माया न कर। जैसे मैं बिना शर्माए तुझसे हर बात कह देता हूं वैसे ही तू भी बिना शर्माए कह दिया कर।"
"नहीं कह सकती मैं।" उसने मुस्कुराते हुए कहा─"मुझे शरम आने लगती है...फिर मुझसे कुछ बोला ही नहीं जाता।"
"अच्छा...क्या सच में???" मुझे हैरानी हुई।
"हां...पता नहीं तुझे क्यों नहीं शर्म आती कुछ भी बोलने में?" वो फिर से लजाते हुए बोली।
"क्योंकि जो मेरे अंदर होता है उसे बोलने में मैं संकोच नहीं करता।" मैंने कहा─"अगर संकोच करता तो इस तरह खुल के तेरी तारीफ न करता...और...और जब तेरी तारीफ न करता तो तुझे अच्छा कहां लगता...बता भला?"
"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता ने कहा।
"मैं सब कुछ सही ही कहता हूं।" मैंने कहा─"और बिना संकोच के कहता हूं ताकि मेरी सुंदर और प्यारी बहन खुश हो जाए।"
"अच्छा...मेरी खुशी का इतना खयाल है तुझे?" अनीता तिरछी नजर से देख मुस्कुराई। इस बार उसके चेहरे पर वही अदा दिखी जो पहले भी कई बार दिखी थी।
"हां...बहुत ज्यादा खयाल है।" मैं थोड़ा उसके करीब सरका─"मेरा मन करता है कि तेरी खुशी के लिए पता नहीं क्या क्या कर डालूं।"
"क..क्या सच में???" अनीता की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"हां...पता नहीं क्यों एकाएक मुझे लगने लगा है?" मैंने सोचने वाले अंदाज में सिर खुजाया─"पर सच यही कि मेरा मन यही करता है। क्या तेरा मन ऐसा कुछ नहीं करता?"
"प..पता नहीं।" अनीता बोली─"मैंने इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं।"
"वाह फिर तो बड़ी मतलबी है तू।" मैंने उसे घूरा─"मतलब मैं तेरे बारे में इतना सोचता हूं और तू मेरे बारे में कुछ नहीं सोचती?"
"न..नहीं नहीं...ऐसी बात नहीं है राजू।" वो एकदम से हड़बड़ा गई─"मैं...मैं भी सोचती हूं तेरे बारे में...पर तेरे जैसे नहीं...शायद मैं तेरे जितना समझदार नहीं हूं।"
ये कहते ही उसके चेहरे पर एकाएक मायूसी छा गई। जैसे उसे इस बात का अब अफसोस होने लगा हो।
"कोई बात नहीं।" मैंने उसका चेहरा थाम लिया फिर उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"तुझे कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं है। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह...चल अब नहाते हैं।"
"नहीं राजू...मैं भी तेरी तरह सोचना चाहती हूं।" अनीता ने मासूमियत से कहा─"जैसे तू मेरे बारे में इतना कुछ सोचता है...मैं भी ऐसे ही तेरे बारे में सोचना चाहती हूं...पर मुझे समझ नहीं आता कि मैं कैसे सोचूं। तू ही बता...तू कैसे मेरे बारे में इतना कुछ सोच लेता है?"
उसके यूं मासूमियत से पूछने पर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मुझे उस पर बहुत ज्यादा प्यार आने लगा। जी किया कि झपट कर उसे अपने सीने से लगा लूं...पर हिम्मत न हुई।
"बता न राजू...कैसे सोच लेता है तू इतना कुछ?" उसने उसी मासूमियत से पूछा।
"मुझे खुद नहीं पता।" मैंने कहा─"बस वही करता हूं जो मेरा दिल कहता है...जो मैं तेरे लिए महसूस करता हूं।"
"तो...तो क्या महसूस करता है मेरे लिए?"
"देख मैं ढंग से इस बारे में कुछ नहीं बता सकता...क्योंकि मैं खुद नहीं जानता।" मैंने कहा─"पर हां इतना कह सकता हूं कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं। तू मेरी छोटी बहन है तो मेरा दिल यही कहता है कि मैं तुझे खूब प्यार और दुलार दूं। तेरा हर तरह से खयाल रखूं। ऐसा कुछ भी न करूं जिससे तुझे दुख हो या जिससे तेरे चेहरे पर उदासी आ जाए। बस...इतनी सी ही बात महसूस करता हूं मैं।"
मेरी बात खत्म होने पर अनीता कुछ न बोली। वो बस एकटक देखे जा रही थी मुझे। मेरी धड़कनें पहले से ही तेज तेज चल रहीं थी। अंदर कहीं उथल पुथल भी मची हुई थी।
"मुझे ज्यादा तो नहीं पता...पर गांव के दूसरे भाई बहनों को देख के जो समझ आया है उससे यही कह सकती हूं कि हमारे बीच जो प्यार है वैसा प्यार गांव के किसी भी भाई बहन के बीच नहीं देखा मैंने।" अनीता ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा─"मैं इतना जानती हूं कि भाई बहन में बहुत प्यार होता है लेकिन जिस तरह तू कर रहा है या जिस तरह मैं तुझसे कर रही हूं...वैसा शायद ही कोई करता होगा।"
"मतलब??" मैं अंदर ही अंदर चौंका─"तू ये क्या बोल रही है?"
"र..राजू...सुन...अब से पहले तक मैं यही समझती थी कि हमारे बीच जो प्यार है वो भाई बहन का ही है।" अनीता एकाएक कुछ ज्यादा ही गंभीर दिखने लगी─"मुझे इस बात से खुशी भी हो रही थी कि तू मुझसे झगड़ता नहीं है बल्कि अब प्यार करने लगा है। पर तेरी कुछ बातें मुझे अजीब भी लगती थीं। तुझसे कहती भी थी कि मुझे तेरी बातें समझ नहीं आती हैं। अब इस वक्त जब तू इतना कुछ बोल रहा था तो एकदम से मुझे ये लगने लगा कि हमारे बीच का ये प्यार भाई बहन वाला नहीं है....बल्कि...बल्कि शायद प्रे..प्रेमियों वाला है।"
"ये...ये क्या कह रही है तू??" मैं बुरी तरह उछल पड़ा। एकाएक ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर आसमान गिर पड़ा हो। धड़कनें जो अब तक तेज तेज चल रहीं थी वो एकदम रुक सी गईं।
"ह..हां राजू।" अनीता की आवाज लड़खड़ा गई─"मेरी सखी गुंजा अक्सर प्रेम के बारे में मुझे बताती थी। उस समय मुझे उसकी बातें समझ नहीं आती थीं...मगर अब समझ आ रही हैं। हां राजू...मुझे अच्छे से समझ आ रही हैं कि वो सच कहती थी। प्रेम सच में ऐसा ही होता है।"
"पता नहीं क्या क्या बोले जा रही है तू।" मैं बदहवास सा बोल पड़ा।
"मैं हैरान हूं कि तुझे इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई राजू?" अनीता ने कहा─"जबकि तू मुझसे उमर में बड़ा है। तुझे तो अब तक समझ जाना चाहिए था कि तू जो कुछ मेरे बारे में महसूस करता है वो हकीकत में एक बहन के लिए प्यार या स्नेह नहीं बल्कि एक प्रेमिका के लिए प्रेम है। मतलब....मतलब....तू मुझे अपनी बहन नहीं....प्रेमिका समझता है....है न???"
अंकिता की इस बात से मैं हतप्रभ सा रह गया। आश्चर्य से आँखें तो पहले ही फटी पड़ीं थी। धड़कनें तो पहले ही रुक गईं थी और अब ऐसा झटका लगा मानो अचानक की नदी के अंदर का तल मेरे पांवों के नीचे से गायब हो गया हो और मैं पलक झपकते ही नीचे पानी में डूबता चला जाने वाला हूं। मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला।
"न..नहीं..नहीं...ये सच नहीं है...ऐसा नहीं हो सकता।" मैं हैरान परेशान सा बोल पड़ा─"तू मेरी बहन है...मैं तुझे अपनी प्रेमिका कैसे समझ सकता हूं। नहीं नहीं...ये गलत है....गलत बात है अनीता। मैं तुझे बहन ही समझता हूं और....और हमारे बीच भाई बहन वाला ही प्यार है....है न....कह दे अनीता कि यही सच है...बोल..चुप क्यों है तू??"
"अब कुछ मत बोल राजू।" अनीता पीछे होते हुए बोली─"और न ही मुझसे कुछ पूछ। अगर तुझे इस बात का एहसास नहीं हो रहा तो अकेले में खुद सोच इस बारे में। तब शायद तुझे समझ आ जाए कि मैं सच कह रही हूं या झूठ।"
उसके बाद वो नहीं रुकी। नदी से बाहर निकल कर उसने फटाफट अपना गीला कुर्ता पहन लिया। पत्थर के पाट पर बैठ कर ही उसने थोड़ा बहुत खुद को भिगोया और फिर अकेले ही घर की तरफ जाने लगी।
मैं ठगा सा नदी के पानी में ही खड़ा रह गया था और अब उसे जाते देख रहा था। दिलो दिमाग में हड़कंप सा मच गया था। दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। मैंने कल्पना तक नहीं की थी दो पल में ऐसा कुछ हो जाएगा। अनीता को इस तरह अकेले जाता देख मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर कुछ टूट गया हो। ऐसा लगा जैसे अब कुछ भी इस दुनिया में नहीं बचा। कुछ देर पहले तक उसके साथ में रहने से जो खुशी महसूस कर रहा था वो खुशी एकाएक गहरे दुख में बदल गई थी।
अजीब तो मुझे भी लगा करता था कभी कभी। मैं इस सबके बारे में सोचता भी था लेकिन प्रेम के ज्ञान से पूरी तरह परिचित नहीं था और शायद इसी लिए समझ भी नहीं पाया था कि हम दोनों के बीच जो प्यार है वो भाई बहन वाला है या प्रेमियों वाला।
मेरे देखते ही देखते अनीता मेरी आंखों से दूर चली गई और कुछ देर बाद मुझे नजर आना भी बंद हो गई। तब...अचानक मुझे होश आया और मैं हड़बड़ा गया। एकाएक अंदर से ऐसा एहसास हुआ कि अब जाने क्या कर डालूं खुद के साथ। मन में अपने लिए बड़े जोर का गुस्सा आने लगा था। अपने बाल नोचने का मन करने लगा था। नदी किनारे रखे पत्थर के पाट पर सिर पटकने का मन करने लगा था।
आखिर मैंने खुद को किसी तरह सम्हाला और अपने अंदर उठे तूफान को शांत करने लगा। मुझे कामयाबी तो नहीं मिली लेकिन फिर किसी तरह दो तीन डुबकी लगा कर नहाया और फिर नदी से बाहर आ गया। नदी किनारे रखे अपने कपड़े लिए और चल दिया घर की तरफ।
जारी है.....
It's Rajan 


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