08-06-2026, 03:29 PM
अगले छह दिनों तक मैं माँ और बेटी को अलग-अलग पोजीशन और सिचुएशन में चोदता रहा। जहाँ भी जगह मिली और जब भी मन किया, पूजा के नाम पर अलग-अलग जातीय कृत्यों करता रहा। गीता को सबसे ज़्यादा और बार-बार चोदा गया। वह पूरी रात मेरी सेवा में रही। जब भी मेरा लंड खड़ा होता, मैं गहरी, गुरु जैसी आवाज़ में कहता, “तैयार हो जाओ” और मैं गीता को चोद देता। गीता ने कभी कोई एतराज़ नहीं किया। जब मैंने उसकी चूत माँगी, तो उसने मुझे दे दी और जब मैंने उसकी गांड माँगी, तो उसने मेरे लंड से अपनी गांड चुदवाई। ऐसा नहीं है कि मैंने रजनी को बिल्कुल नहीं चोदा, लेकिन मैंने गीता के शरीर का ज़्यादा इस्तेमाल किया। वरना मेरी इच्छाओ से, मैंने माँ और बेटी दोनों को अपनी मर्ज़ी से अलग-अलग और एक साथ चोदा। उनमें से किसी ने भी मेरे लंड का विरोध या एतराज़ नहीं किया। उन दोनों ने मुझे काफी खुश रखा।
गीता को अब मुझसे चुदवाने में खूब मजा आने लगा था। वह खुद छाती फुलाकर, गांड हिलाकर मेरे लंड का स्वागत करती। कभी-कभी तो वह ऊपर चढ़कर खुद जोर-जोर से कसमसाती और कहती, “बाबाजी… और जोर से… मेरी चूत फाड़ दीजिए…”
7वें दिन शाम को रजनी का बाप सात नदियों का जल लेकर वापस आ गया।
मैंने मंत्र पढ़कर वह जल रजनी, गीता और पूरे घर में छिड़क दिया। रजनी अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। वह हँस-हँसकर सबसे बातें कर रही थी। रजनी का बाप बहुत खुश था।
जब मैं जाने लगा तो उसने मेरे पैर पकड़ लिये और बोला, “बाबाजी, एक दिन और रुक जाइए। प्रभु, हमें अपनी सेवा का एक मौका और दे दीजिए। आपने हमसे कुछ नहीं लिया, हम आपके गुलाम हैं।” मैत्री की प्रस्तुति।
सबसे ज्यादा जिद गीता ने की। पूरे गाँव में रजनी के ठीक होने की खबर आग की तरह फैल चुकी थी।
जब यह खबर गाँव के मुखिया गजराज को लगी, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसकी इकलौती बेटी अंजली को ससुराल वालों ने बांझ कहकर निकाल दिया था। मुखिया हर जगह इलाज करा-करा के थक चुका था।
उधर गीता ने पूरे दिन मेरे लिए तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए। पति-पत्नी दोनों दिन भर मेरी सेवा में लगे रहे।
रात को जब मैं कमरे में लेटा था, कुछ देर पहले रजनी का बाप मेरे पैर दबाकर चला गया था। उसके जाते ही गीता मेरे पैरों में आकर बैठ गई। उसने मेरे पैर पकड़कर रोना शुरू कर दिया।
“बाबाजी… अगर हमारा बस चले तो हम आपको कभी जाने न दें। आप भगवान हैं। हम पर आपका बहुत बड़ा उपकार है। हमारा जो कुछ भी है, सब आपका है।”
मैंने नाटकीय अंदाज में कहा, “ऐसा मत कहो गीता। मैंने कुछ नहीं किया, सब गुरु जी की कृपा है। मैं तो सिर्फ माध्यम हूँ।”
गीता ने अंदर आते ही दरवाजा बंद कर लिया। वह मेरे पैर दबाती हुई बोली, “आप महान हैं, इसलिए ऐसा कह रहे हैं। लेकिन मैं भी आपको खुश करना चाहती हूँ।”
ये कहते हुए गीता ने एक झटके में अपनी साड़ी उतारकर फेंक दी। अब वह पूरी तरह नंगी मेरे सामने खड़ी थी। उसके भरे-भरे स्तन, मोटी जाँघें और गीली चूत साफ दिख रही थीं।
मैंने बनावटी विरोध करते हुए कहा, “गीता… ये आप क्या कर रही हैं? ये सब गलत है।”
गीता ने मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा, “बाबाजी, हम आपके भक्त हैं। भगवान को भक्त की भेंट स्वीकार करनी ही पड़ती है। मैं जो कुछ भी दे रही हूँ, खुशी से दे रही हूँ। मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिए।” रचयिता मैत्री है।
कहते हुए गीता ने आगे झुककर मेरी धोती की गांठ खोली और मेरा 9 इंच का मोटा, खड़ा लंड एक झटके में अपने गर्म, गीले मुँह में ले लिया। उसने जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया।
मैंने कमजोर विरोध किया, “गीता… कोई देख लेगा…”
लेकिन गीता नहीं रुकी। उसने लंड को गले तक लेते हुए कहा, “देख लेने दो… आज मैं अपनी मर्जी से आपकी सेवा कर रही हूँ।”
7 दिनों तक मैंने गुरुजी के नाम पर उसे चोदा था, लेकिन आज वह खुद अपनी मर्जी से मेरे लंड के लिए आई थी। उसने मेरा लंड अच्छे से चूसकर पूरा खड़ा कर दिया, फिर मेरे ऊपर चढ़ गई और अपनी चूत में पूरा लंड उतारकर जोर-जोर से कसमसाने लगी।
थोड़ी देर में ही मैंने उसकी चूत के अंदर अपना गाढ़ा, गरम वीर्य उड़ेल दिया।
अगली सुबह जब मैं रजनी के घर से जाने लगा, तो गाँव का मुखिया गजराज मेरे पैरों में गिर पड़ा।
“बाबाजी, कृपा करके मेरे घर चलिए। मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा।”
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जुड़े रहिये दोस्तों .
मैत्री.
गीता को अब मुझसे चुदवाने में खूब मजा आने लगा था। वह खुद छाती फुलाकर, गांड हिलाकर मेरे लंड का स्वागत करती। कभी-कभी तो वह ऊपर चढ़कर खुद जोर-जोर से कसमसाती और कहती, “बाबाजी… और जोर से… मेरी चूत फाड़ दीजिए…”
7वें दिन शाम को रजनी का बाप सात नदियों का जल लेकर वापस आ गया।
मैंने मंत्र पढ़कर वह जल रजनी, गीता और पूरे घर में छिड़क दिया। रजनी अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। वह हँस-हँसकर सबसे बातें कर रही थी। रजनी का बाप बहुत खुश था।
जब मैं जाने लगा तो उसने मेरे पैर पकड़ लिये और बोला, “बाबाजी, एक दिन और रुक जाइए। प्रभु, हमें अपनी सेवा का एक मौका और दे दीजिए। आपने हमसे कुछ नहीं लिया, हम आपके गुलाम हैं।” मैत्री की प्रस्तुति।
सबसे ज्यादा जिद गीता ने की। पूरे गाँव में रजनी के ठीक होने की खबर आग की तरह फैल चुकी थी।
जब यह खबर गाँव के मुखिया गजराज को लगी, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसकी इकलौती बेटी अंजली को ससुराल वालों ने बांझ कहकर निकाल दिया था। मुखिया हर जगह इलाज करा-करा के थक चुका था।
उधर गीता ने पूरे दिन मेरे लिए तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए। पति-पत्नी दोनों दिन भर मेरी सेवा में लगे रहे।
रात को जब मैं कमरे में लेटा था, कुछ देर पहले रजनी का बाप मेरे पैर दबाकर चला गया था। उसके जाते ही गीता मेरे पैरों में आकर बैठ गई। उसने मेरे पैर पकड़कर रोना शुरू कर दिया।
“बाबाजी… अगर हमारा बस चले तो हम आपको कभी जाने न दें। आप भगवान हैं। हम पर आपका बहुत बड़ा उपकार है। हमारा जो कुछ भी है, सब आपका है।”
मैंने नाटकीय अंदाज में कहा, “ऐसा मत कहो गीता। मैंने कुछ नहीं किया, सब गुरु जी की कृपा है। मैं तो सिर्फ माध्यम हूँ।”
गीता ने अंदर आते ही दरवाजा बंद कर लिया। वह मेरे पैर दबाती हुई बोली, “आप महान हैं, इसलिए ऐसा कह रहे हैं। लेकिन मैं भी आपको खुश करना चाहती हूँ।”
ये कहते हुए गीता ने एक झटके में अपनी साड़ी उतारकर फेंक दी। अब वह पूरी तरह नंगी मेरे सामने खड़ी थी। उसके भरे-भरे स्तन, मोटी जाँघें और गीली चूत साफ दिख रही थीं।
मैंने बनावटी विरोध करते हुए कहा, “गीता… ये आप क्या कर रही हैं? ये सब गलत है।”
गीता ने मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा, “बाबाजी, हम आपके भक्त हैं। भगवान को भक्त की भेंट स्वीकार करनी ही पड़ती है। मैं जो कुछ भी दे रही हूँ, खुशी से दे रही हूँ। मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिए।” रचयिता मैत्री है।
कहते हुए गीता ने आगे झुककर मेरी धोती की गांठ खोली और मेरा 9 इंच का मोटा, खड़ा लंड एक झटके में अपने गर्म, गीले मुँह में ले लिया। उसने जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया।
मैंने कमजोर विरोध किया, “गीता… कोई देख लेगा…”
लेकिन गीता नहीं रुकी। उसने लंड को गले तक लेते हुए कहा, “देख लेने दो… आज मैं अपनी मर्जी से आपकी सेवा कर रही हूँ।”
7 दिनों तक मैंने गुरुजी के नाम पर उसे चोदा था, लेकिन आज वह खुद अपनी मर्जी से मेरे लंड के लिए आई थी। उसने मेरा लंड अच्छे से चूसकर पूरा खड़ा कर दिया, फिर मेरे ऊपर चढ़ गई और अपनी चूत में पूरा लंड उतारकर जोर-जोर से कसमसाने लगी।
थोड़ी देर में ही मैंने उसकी चूत के अंदर अपना गाढ़ा, गरम वीर्य उड़ेल दिया।
अगली सुबह जब मैं रजनी के घर से जाने लगा, तो गाँव का मुखिया गजराज मेरे पैरों में गिर पड़ा।
“बाबाजी, कृपा करके मेरे घर चलिए। मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा।”
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मैत्री.



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