02-06-2026, 03:25 PM
थोड़ी देर बाद बाबा ने दोनों माँ-बेटी को जोर-जोर से चोदकर शांत कर दिया। गीता और रजनी दोनों पसीने से तर, हाँफती हुई बिस्तर पर पड़ी थीं। उनकी चूतें सूजी हुई थीं और बाबा का गाढ़ा वीर्य दोनों की जाँघों पर बह रहा था।
गीता ने अभी भी हाँफते हुए सवालिया नजर से बाबा की तरफ देखा और बोली, “बाबाजी… आप हमारी चूत तो भर देते हैं… पर कहीं फुग्गा फूल गया तो? बच्चा ठहर गया तो क्या होगा? मैत्री की पेशकश।
मेरा तो कुछ नहीं… मैं तो आपका और गुरुजी का प्रसाद लेकर बच्चे को जन्म दे सकती हूँ… लेकिन रजनी का क्या होगा? वो अभी सिर्फ 18 की है…”
रजनी भी शर्माते हुए अपनी माँ की तरफ देखने लगी। उसका एक हाथ अपने आप उसके पेट पर चला गया।
बाबा ने ठंडे दिमाग से, गुरु वाली भारी आवाज में जवाब दिया, “यह गुरुजी का प्रसाद है गीता। तुम दोनों को इस प्रसाद की कदर करनी चाहिए।
दूसरी बात… गुरुजी जब चाहेंगे तभी बच्चा रहेगा। उनके अलावा किसी की मर्जी नहीं चलती। तुम दोनों को इस बात की कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।अ और अगर गुरूजी की मर्जी हुई तो कोई तुमे माँ बन ने से रोक भी नहीं सकता। अगर किसी ने भी हिम्मत की तो उसका सर्वनाश तय है।”
बाबा मन ही मन मुस्कुराए -“जो सफेद लेप मैं तुम दोनों को चाटने को देता हूँ, वो कोई प्रसाद नहीं… बल्कि मजबूत गर्भनिरोधक दवा है। लेकिन ये बात तुम दोनों को कभी पता नहीं चलेगी।”
गीता और रजनी गुरुजी की इस “ताकत” के सामने पूरी तरह झुक गईं।
गीता ने कहा: “जी बाबाजी यह तो सत्य वचन है, गुरूजी की ताकत का कोई मुकाबला नहीं। मैं सिर्फ रजनी की चिंता कर रही थी। अगर उसे बच्चा ठहर गया तो गाँव में मुंह दीखाना मुश्किल हो सकता है। पर जैसी गुरूजी की इच्छा, अगर रजनी फलित होती भी है तो गुरूजी कोई ना कोई उपाय भी देंगे। उसने रजनी के पेट पर हाथ फेराते हुए एक मादक नजर रजनी पर डाली।
रजनी ने अपनी माँ की तरफ देखकर धीरे से कहा, “माँ… गुरुजी जब चाहेंगे तभी बच्चा रहेगा… वरना नहीं। यह गुरुजी का प्रताप है। और उनका प्रसाद रखना भी तो हमारा धर्म है। तुम नाहक चिंता कर रही हो माँ, फिर से गुरूजी को बुरा लग गया तो!!!” उसने अपनी चूत पर इशारा करते हुए कहा।
गीता ने सहमति में सिर हिलाया और बोली, “हाँ बेटी… गुरुजी की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता। मैं तो बस युही पागल हूँ। जो ऐसा चिंता व्यक्त की।” उसने रजनी की सूजी हुई चूत को देखा। उसकी छुट से थोडा सा खून भी निकल आया था। और वह डर गई की कही फिर से इस चूत पर गुरूजी का गुस्सा ना आ जाए। मैत्री रचित कहानी।
फिर गीता ने बाबा की तरफ देखकर फिर से कहा, “बाबाजी… गुरुजी से कह दीजिएगा कि रजनी का फुग्गा ना फुलाएँ। मेरा फूल जाए तो चलेगा… मुझे कोई आपत्ति नहीं......लेकिन मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। रजनी अभी बच्चा पैदा करने की स्थिति में नहीं है......मैं तो बोल सकती हूँ की यह बच्चा मेरे पति का है। पर रजनी..............?????????? ठीक कह रही हूँ न रजनी बेटी?”
बच्चे की बात पर रजनी शर्मा कर बोली, “हाँ माँ… मैं अभी बच्चा नहीं चाहती… गुरुजी से कह दीजिए ना बाबाजी…” उसने माँ की चूत पर ऊँगली टिकाते हुए कहा। (उसका कहने का मतलब यह था की माँ के चूत से बच्चा आता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है बल्कि ख़ुशी होगी। वह अपनी माँ के किसी दुसरे का बच्चा पैदा करती हुई देखना चाहती है। तो यह सिर्फ इशारा था की माँ की चूत को भरे और प्रसाद दे।)
बाबा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “ठीक है… मैं गुरुजी से कह दूँगा। यह भी भीख मांगूंगा की आप दोनों की चूत और गांड मारते रहे पर बच्चा का आशीर्वाद ना दे।”
बाबजी के तरफ से इतना आश्वासन मिलते ही दोनों खुश हुई। तभी गीता और रजनी दोनों बाबा के पास सरक आईं।
गीता ने बाबा के अभी भी आधे-खड़े लंड को पकड़ लिया और बोली, “अब तो हमारा काम हो गया… अब हम आपका बचा हुआ प्रसाद साफ कर दें?”
रजनी ने भी शर्माते हुए लेकिन उत्सुकता से कहा, “हाँ बाबाजी… हम दोनों मिलकर आपका लंड साफ कर देते हैं… चलो माँ बाबाजी का लंड चाट के साफ़ कर देते है जैसे अभी भी नहा की आए हो।” रचयिता मैत्री।
दोनों माँ-बेटी बाबा के लंड के दोनों तरफ बैठ गईं।
****************************************
बने रहिये दोस्तों।
गीता ने अभी भी हाँफते हुए सवालिया नजर से बाबा की तरफ देखा और बोली, “बाबाजी… आप हमारी चूत तो भर देते हैं… पर कहीं फुग्गा फूल गया तो? बच्चा ठहर गया तो क्या होगा? मैत्री की पेशकश।
मेरा तो कुछ नहीं… मैं तो आपका और गुरुजी का प्रसाद लेकर बच्चे को जन्म दे सकती हूँ… लेकिन रजनी का क्या होगा? वो अभी सिर्फ 18 की है…”
रजनी भी शर्माते हुए अपनी माँ की तरफ देखने लगी। उसका एक हाथ अपने आप उसके पेट पर चला गया।
बाबा ने ठंडे दिमाग से, गुरु वाली भारी आवाज में जवाब दिया, “यह गुरुजी का प्रसाद है गीता। तुम दोनों को इस प्रसाद की कदर करनी चाहिए।
दूसरी बात… गुरुजी जब चाहेंगे तभी बच्चा रहेगा। उनके अलावा किसी की मर्जी नहीं चलती। तुम दोनों को इस बात की कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।अ और अगर गुरूजी की मर्जी हुई तो कोई तुमे माँ बन ने से रोक भी नहीं सकता। अगर किसी ने भी हिम्मत की तो उसका सर्वनाश तय है।”
बाबा मन ही मन मुस्कुराए -“जो सफेद लेप मैं तुम दोनों को चाटने को देता हूँ, वो कोई प्रसाद नहीं… बल्कि मजबूत गर्भनिरोधक दवा है। लेकिन ये बात तुम दोनों को कभी पता नहीं चलेगी।”
गीता और रजनी गुरुजी की इस “ताकत” के सामने पूरी तरह झुक गईं।
गीता ने कहा: “जी बाबाजी यह तो सत्य वचन है, गुरूजी की ताकत का कोई मुकाबला नहीं। मैं सिर्फ रजनी की चिंता कर रही थी। अगर उसे बच्चा ठहर गया तो गाँव में मुंह दीखाना मुश्किल हो सकता है। पर जैसी गुरूजी की इच्छा, अगर रजनी फलित होती भी है तो गुरूजी कोई ना कोई उपाय भी देंगे। उसने रजनी के पेट पर हाथ फेराते हुए एक मादक नजर रजनी पर डाली।
रजनी ने अपनी माँ की तरफ देखकर धीरे से कहा, “माँ… गुरुजी जब चाहेंगे तभी बच्चा रहेगा… वरना नहीं। यह गुरुजी का प्रताप है। और उनका प्रसाद रखना भी तो हमारा धर्म है। तुम नाहक चिंता कर रही हो माँ, फिर से गुरूजी को बुरा लग गया तो!!!” उसने अपनी चूत पर इशारा करते हुए कहा।
गीता ने सहमति में सिर हिलाया और बोली, “हाँ बेटी… गुरुजी की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता। मैं तो बस युही पागल हूँ। जो ऐसा चिंता व्यक्त की।” उसने रजनी की सूजी हुई चूत को देखा। उसकी छुट से थोडा सा खून भी निकल आया था। और वह डर गई की कही फिर से इस चूत पर गुरूजी का गुस्सा ना आ जाए। मैत्री रचित कहानी।
फिर गीता ने बाबा की तरफ देखकर फिर से कहा, “बाबाजी… गुरुजी से कह दीजिएगा कि रजनी का फुग्गा ना फुलाएँ। मेरा फूल जाए तो चलेगा… मुझे कोई आपत्ति नहीं......लेकिन मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। रजनी अभी बच्चा पैदा करने की स्थिति में नहीं है......मैं तो बोल सकती हूँ की यह बच्चा मेरे पति का है। पर रजनी..............?????????? ठीक कह रही हूँ न रजनी बेटी?”
बच्चे की बात पर रजनी शर्मा कर बोली, “हाँ माँ… मैं अभी बच्चा नहीं चाहती… गुरुजी से कह दीजिए ना बाबाजी…” उसने माँ की चूत पर ऊँगली टिकाते हुए कहा। (उसका कहने का मतलब यह था की माँ के चूत से बच्चा आता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है बल्कि ख़ुशी होगी। वह अपनी माँ के किसी दुसरे का बच्चा पैदा करती हुई देखना चाहती है। तो यह सिर्फ इशारा था की माँ की चूत को भरे और प्रसाद दे।)
बाबा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “ठीक है… मैं गुरुजी से कह दूँगा। यह भी भीख मांगूंगा की आप दोनों की चूत और गांड मारते रहे पर बच्चा का आशीर्वाद ना दे।”
बाबजी के तरफ से इतना आश्वासन मिलते ही दोनों खुश हुई। तभी गीता और रजनी दोनों बाबा के पास सरक आईं।
गीता ने बाबा के अभी भी आधे-खड़े लंड को पकड़ लिया और बोली, “अब तो हमारा काम हो गया… अब हम आपका बचा हुआ प्रसाद साफ कर दें?”
रजनी ने भी शर्माते हुए लेकिन उत्सुकता से कहा, “हाँ बाबाजी… हम दोनों मिलकर आपका लंड साफ कर देते हैं… चलो माँ बाबाजी का लंड चाट के साफ़ कर देते है जैसे अभी भी नहा की आए हो।” रचयिता मैत्री।
दोनों माँ-बेटी बाबा के लंड के दोनों तरफ बैठ गईं।
****************************************
बने रहिये दोस्तों।



![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)