27-05-2026, 11:22 AM
खौफ और साजिश
शाम के साये गहरे हो रहे थे, और शेर के दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं। किचन में बर्तनों को साफ करते हुए उसके हाथ कांप रहे थे। उसका दिमाग चारों तरफ दौड़ रहा था, पर उसे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
शेर रह-रहकर दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देख रहा था। टिक-टिक करती सुइयां उसे चिढ़ा रही थीं।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'धत् तेरे की! सूरज ढल रहा है और मेरे पास अभी तक कोई तोड़ नहीं है। अगर कल सुबह मेमसाब उस डॉक्टर के पास पहुँच गईं, तो मेरा खेल खत्म है। वो खून की जाँच... वो रिपोर्ट... साला सीधा फांसी का फंदा है मेरे लिए।'
शेर [मन ही मन - गुस्से में]: 'मुझे उन्हें रोकना ही होगा। पर कैसे? अगर मैं बीमार होने का नाटक करूँ, तो वो गार्ड को भेज देंगी। अगर मैं फिर से उनके खाने में कुछ मिलाऊँ, तो वो शक करेंगी। उन्हें घर में कैद करने का कोई तो तरीका होगा... कोई ऐसी आफत जो उन्हें दहलीज लांघने न दे।'
शाम के 7 बज चुके थे, लेकिन शेर का शातिर दिमाग इस बार खाली हाथ था। वह हताशा में अपने बाल नोंचने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेमसाब का भरोसा दोबारा कैसे जीते और उस अपॉइंटमेंट को कैसे रद्द करवाए।
उधर अपने बेडरूम में, मीरा खिड़की के पास खड़ी होकर ढलते सूरज को देख रही थी। पिछले 24 घंटों से शेर ने उसे दवा की कोई नई खुराक नहीं दी थी, जिसकी वजह से उसके शरीर पर चढ़ा वह धुंधला सा नशा अब छंटने लगा था।
उसका जिस्म अब 80% सामान्य महसूस कर रहा था। वह जो बेतहाशा उत्तेजना और सुलगती हुई प्यास थी, वह अब मद्धम पड़ चुकी थी। जैसे-जैसे नशा उतर रहा था, मीरा की याददाश्त और भी साफ़ होने लगी थी।
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'अजीब है... अब मुझे वह बेचैनी महसूस नहीं हो रही। मेरा शरीर अब ठंडा पड़ रहा है।'
मीरा ने ठंडी सांस ली। दवा का असर कम होते ही उसके अंदर की नैतिकता फिर से जागने लगी। उसे कल रात के वे धुंधले पल याद आए—शेर का स्पर्श, उसकी वहशी बातें। अब उसे उन यादों से उत्तेजना नहीं, बल्कि गहरी घृणा और सिहरन महसूस हो रही थी।
मीरा [मन ही मन]: 'कल रात जो कुछ भी हुआ, वह भयानक था। भले ही शेर को लगा हो कि वह किसी चोरनी के साथ था, पर उसने जो शब्द इस्तेमाल किए... "काश मैं देख पाता"... वह डरावना है। मुझे कल सुबह हर हाल में डॉक्टर के पास जाना ही होगा। मुझे जानना है कि मेरे साथ क्या हो रहा है।'
रात गहराने लगी थी। सरताज घर लौट आए थे और डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था।
शेर लंगड़ाते हुए खाना परोस रहा था, लेकिन उसका चेहरा पसीने से तर था। उसे पता था कि यह उसकी आख़िरी रात हो सकती है।
उसने देखा कि मीरा अब काफी सामान्य दिख रही थी।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'मेमसाब के चेहरे की ये चमक... ये मेरे लिए मौत का पैगाम है।‘
शेर ने मेमसाब की तरफ एक नज़र डाली, जो कल सुबह क्लिनिक जाने के बारे में सरताज से बात कर रही थीं।
मीरा: "सरताज, कल सुबह मुझे थोड़ा क्लिनिक जाना है। मैंने डॉक्टर से मिलने का समय ले लिया है।"
सरताज [चिंता जताते हुए]: "क्लिनिक? क्यों मीरा, सब ठीक तो है ना? तुम्हारी तबीयत तो खराब नहीं है?"
मीरा [बात को संभालते हुए मुस्कुराकर]: "हाँ, सब ठीक है। आप फिक्र मत कीजिए, बस एक रूटीन चेकअप के लिए जा रही हूँ। वो प्रेगनेंसी वाली दवाइयाँ चल रही हैं ना, तो डॉक्टर ने एक बार बुलाया है।"
अगली सुबह सूरज तो निकला, पर शेर की किस्मत के अंधेरे अभी छंटे नहीं थे। सरताज ऑफिस जा चुके थे और घर में खामोशी थी। शेर की पूरी रात जागते हुए कटी थी, उसका दिमाग बुरी तरह थक चुका था, फिर भी मीरा के डॉक्टर अपॉइंटमेंट को रोकने का कोई रास्ता उसे नहीं सूझा था।
तभी, उसकी नज़र बाहर गई। मीरा की छोटी बेटी, ज्योति, गेट के पास कॉलेज बस का इंतज़ार कर रही थी। बस अभी आई नहीं थी, और बच्ची अपनी ही धुन में सड़क के किनारे एक तितली के पीछे भागते हुए खेलने में मग्न थी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि वह गेट से बाहर सड़क की तरफ बढ़ रही है।
शेर [मन ही मन]: "धत् तेरे की! पूरी रात निकल गई पर मेमसाब को उस डॉक्टर के पास जाने से रोकने की कोई तरकीब दिमाग में नहीं आई। अगर वो क्लिनिक चली गईं और रिपोर्ट में कुछ आ गया, तो मेरा सारा खेल बिगड़ जाएगा।"
मीरा दरवाजे पर खड़ी थी, उसने अपनी वह नीली नाइटगाउन पहनी हुई थी। वह चाय की चुस्कियाँ लेते हुए एक आँख से ज्योति पर नज़र रखे हुए थी, पर उसे भी खतरे की गंभीरता का अहसास नहीं था।
तभी शेर लंगड़ाने का नाटक करते हुए धीरे-धीरे मीरा के पास आया और बेहद तमीज़ से सर झुकाकर खड़ा हो गया।
शेर: "प्रणाम मेमसाब। आज मौसम काफी अच्छा है ना? सुबह-सुबह ठंडी हवा चल रही है।"
मीरा [चाय की चुस्की लेते हुए बाहर की तरफ देखकर]: "हाँ शेर, मौसम तो वाकई आज बहुत अच्छा है। धूप भी अभी हल्की है।"
शेर [जानकारी लेने के इरादे से]: "जी मेमसाब, बहुत बढ़िया दिन है। वैसे आप डॉक्टर के पास कब जा रही हैं? अगर कहें तो निकलने से पहले आपका नाश्ता बना दूँ? खाली पेट जाना ठीक नहीं होगा।"
मीरा: "बस, ज्योति की कॉलेज बस आ जाए, उसे भेजकर मैं तैयार होने जाऊँगी। तुम नाश्ता तैयार करो, मैं आधे घंटे में..."
मीरा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि तभी दूर से एक तेज़ रफ्तार कार आती दिखाई दी। शेर ने यह मंज़र देखा। उसके पास पूरा मौका था कि वह चिल्लाकर ज्योति को आगाह कर दे या कार के पास आने से पहले ही उसे दौड़कर खींच ले। लेकिन उसके शैतानी दिमाग ने एक पल में बाजी पलट दी। वह चुपचाप खड़ा रहा, मौत और जिंदगी के उस फासले को कम होते देखकर देखता रहा।
शेर [मन ही मन]: "हाँ, आने दो... गाड़ी को और पास आने दो। मेमसाब अपनी चाय में खोई रहीं और वो बच्ची तितली के पीछे भागती रही। जैसे ही गाड़ी करीब आएगी, मैं ऐन वक्त पर कूदकर रक्षक बन जाऊँगा। इस बच्ची को थोड़ी चोट लगेगी तो डॉक्टर का अपॉइंटमेंट अपने आप कैंसिल हो जाएगा, और मेरा रास्ता साफ हो जाएगा!"
जैसे ही कार बिल्कुल करीब आई, शेर चीखते हुए झपटा।
शेर [दहाड़ते हुए]: "छोटी मेमसाब! हटिए!"
बिल्कुल आख़िरी सेकंड में, शेर ने ज्योति को अपनी गिरफ्त में लिया और अपनी ओर छलांग लगाकर उसे खींच लिया। कार सनसनाते हुए उनके ठीक बगल से निकल गई, पर सड़क पर ज़ोर से गिरने की वजह से दोनों ज़ख्मी हो गए।
ज्योति के पैरों से खून बहने लगा; हालाँकि वे सिर्फ खरोंचें थीं, पर वह डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। लेकिन शेर की हालत इस बार वाकई खराब थी। वह कंक्रीट पर इस तरह गिरा था कि उसके पैरों से खून की धार निकल पड़ी।
मीरा के हाथ से चाय का कप छूटकर गिर गया। वह बदहवास होकर चिल्लाई, "ज्योति! शेर!"
मीरा पागलों की तरह दौड़ती हुई सड़क की ओर भागी। उसका दिल हलक को आ गया था।
वह दौड़ती हुई सड़क पर आई। उसने देखा कि शेर दर्द से तड़प रहा था, लेकिन फिर भी उसने ज्योति को अपने सीने से लगा रखा था।
शेर [कराहते हुए और नाटक करते हुए]: "मेमसाब... देखिए... छोटी मेमसाब ठीक तो हैं? मुझे... मुझे कुछ भी हो जाए... पर इन्हें खरोंच नहीं आनी चाहिए थी... मैं मर भी जाता तो..."
उसने तड़पकर अपनी बेटी को गोद में उठा लिया।
मीरा [रोते और हाँफते हुए]: "ज्योति! मेरी बच्ची! तुम ठीक तो हो ना? कहाँ चोट लगी है बेटा? ओ गॉड, यह क्या हो गया!"
ज्योति डर के मारे मीरा के गले से लिपट गई और हिचकियाँ लेते हुए रोने लगी। मीरा ने राहत की साँस ली कि उसकी बेटी की जान बच गई थी, लेकिन तभी उसकी नज़र ज़मीन पर तड़प रहे शेर पर पड़ी।
शेर का पैर कंक्रीट के नुकीले किनारे से टकराया था, और वहाँ से गाढ़ा लाल खून सड़क पर बहकर फैल रहा था। वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कुटिल संतोष था।
मीरा [आँखों में आँसू लिए, घबराहट में]: "शेर! तुम... तुमने अपनी जान दांव पर लगा दी। देखो तुम्हारा पैर... कितना खून बह रहा है! गार्ड! कोई है? जल्दी आओ!"
मीरा ने खून से लथपथ शेर को देखा। उसके मन में शेर के प्रति जो घृणा और शक पैदा हो रहा था, वह इस 'बलिदान' को देखकर एक पल में मिट्टी में मिल गया। उसकी आँखों में आंसू आ गए।
मीरा [कांपती आवाज़ में]: "शेर! तुमने... तुमने अपनी जान की परवाह नहीं की? तुम पागल हो क्या? देखो कितनी चोट आई है!"
मीरा का दिल पिघल चुका था। उसे लगा कि जो आदमी उसकी बच्ची के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकता है, वह बुरा नहीं हो सकता। दवा के असर के बिना भी, अब हमदर्दी की एक नई लहर उसे शेर की ओर खींच रही थी।
शेर [मन ही मन - एक वहशी मुस्कान के साथ]: 'शिकार अब पूरी तरह जाल में है। अब डॉक्टर का अपॉइंटमेंट गया तेल लेने... अब तो मेमसाब खुद अपने हाथों से मेरे ज़ख्म धोएंगी।'
इसी बीच, शोर सुनकर गार्ड्स भी दौड़ते हुए वहां पहुंच गए। नजारा देखकर उनके भी हाथ-पांव फूल गए।
मीरा [घबराहट में]: "शेर, तुम हिलना मत! बहुत खून बह रहा है। ज्योति बेटा, चुप हो जाओ... देखो, शेर चाचा ने तुम्हें बचा लिया।"
मीरा [गार्ड्स पर चिल्लाते हुए]: "देख क्या रहे हो? जल्दी से शेर को उठाओ और अंदर ले चलो! इसकी हालत बहुत खराब है। और कोई गाड़ी निकालो, हमें फौरन डॉक्टर को बुलाना होगा या इसे अस्पताल ले जाना होगा!"
शेर ने दर्द से कराहते हुए गार्ड्स को अपने करीब आने से रोका। वह अच्छी तरह जानता था कि अगर गार्ड्स उसे उठाकर ले गए, तो मीरा से सीधे सहानुभूति पाने और उसके करीब आने का यह सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा।
उसने अपने लहूलुहान पैर पर एक हाथ रखा और दूसरे हाथ से गार्ड को पीछे हटने का इशारा किया।
शेर [हाँफते और दर्द भरी आवाज़ में]: "हटो... मुझे छोड़ो तुम लोग! पहले तुम ज्योति बेटी को अंदर ले जाओ… देखो कैसे बेचारी घबराकर रो रही है। बच्चू का दिल दहल गया है, उसे पहले संभालो। मेरे को कुछ नहीं होगा... मैं मर भी जाऊँ तो कोई बात नहीं, पर छोटी बेबी ठीक रहनी चाहिए।"
गार्ड ने मीरा की तरफ देखा, और मीरा शेर की इस "निःस्वार्थ वफादारी" को देखकर अंदर तक हिल गई। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो आदमी खुद खून से लथपथ है, उसे इस हालत में भी उसकी बेटी की फिक्र थी।
मीरा [गार्ड से, रुआँसी आवाज़ में]: "हाँ, तुम ज्योति को अंदर ले जाओ और इसके पैरों पर फौरन डिटॉल लगाओ। मैं... मैं शेर को देखती हूँ।"
उनमें से एक गार्ड ने फुर्ती दिखाई और ज्योति को अपनी गोद में उठाकर तुरंत बंगले के अंदर ले गया ताकि उसके जख्मों को साफ किया जा सके।
मीरा ने शेर के ज़ख्म को दबाने की कोशिश करने लगी। उसके कांपते हाथों का स्पर्श शेर को एक अलग ही नशा दे रहा था।
पीछे सड़क पर अब मीरा, एक दूसरा गार्ड और जख्मी शेर रह गए थे। सुबह की हल्की धूप में मीरा का चेहरा घबराहट और आंसुओं से भीगा हुआ था।
जैसे ही मीरा शेर को सहारा देने के लिए नीचे झुकी, उसके ढीले नीले रेशमी नाइटगाउन के गले से शेर को एक बार फिर उसके भरे हुए स्तनों की गहरी झलक मिल गई। मीरा का गोरा बदन उस मखमली कपड़े के पीछे से झाँक रहा था, लेकिन मीरा इस समय लोक-लाज और अपने तन-बदन के होश से बिल्कुल बेखबर थी।
उसका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ शेर के गहरे घाव पर था, जिससे गाढ़ा लाल खून तेज़ी से बहकर कंक्रीट को भिगो रहा था।
शेर दर्द से बुरी तरह कराहने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी भूखी और वहशी आँखें मीरा के झुके हुए शरीर का पूरा जायजा ले रही थीं। उसे अपनी जाँघों में उठते तेज़ दर्द से ज़्यादा मज़ा उस छुअन और नज़ारे में आ रहा था जो उसकी आँखों के ठीक सामने था।
शेर [मन ही मन - एक शैतानी संतोष के साथ]: 'वाह मेमसाब! आपकी इस ममता ने आपको मेरे इतना करीब ला खड़ा किया। इस बदन की खुशबू के लिए तो मैं अपना दूसरा पैर भी कटवाने को तैयार हो जाऊँ।'
शेर ने जानबूझकर लड़खड़ाते हुए अपना पूरा वजन मीरा और उस दूसरे गार्ड के कंधों पर डाल दिया। जैसे ही मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे सहारा दिया, शेर का चौड़ा और भारी शरीर मीरा के कोमल, सुडौल बदन से कसकर सट गया। उसकी कसी हुई छाती मीरा के कंधों और उरोजों से रगड़ खा रही थी।
मीरा [गार्ड से, हांफते हुए]: "जल्दी करो! इसे अंदर ले चलो, इसका खून रुक नहीं रहा है। शेर, हिम्मत मत हारना, बस हम अंदर पहुंच ही रहे हैं।"
मीरा ने पूरी ताकत लगा दी थी ताकि शेर को गिरने न दे। चलते वक्त मीरा का शरीर बार-बार शेर से टकरा रहा था, और शेर जानबूझकर लड़खड़ाने का नाटक करते हुए अपना दबाव मीरा की तरफ बढ़ा रहा था। उसे अपनी जांघों की जलन में भी एक अजीब सुकून मिल रहा था क्योंकि उसे पता था कि उसने अपनी बर्बादी को एक बड़ी जीत में बदल दिया है।
शेर [झूठी लाचारी और धीमी आवाज़ में]: "अहह… मेमसाब… मुझे यहीं छोड़ दीजिए… आप थक जाएँगी।"
मीरा [रोते हुए, शेर को और कसकर संभालते हुए]: "चुप रहो शेर! कैसी बातें कर रहे हो? तुमने मेरी बच्ची की जान बचाई है। इस वक्त तुम्हारी जान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है। हिम्मत मत हारना, बस हम अंदर पहुंच ही रहे हैं।"
गार्ड ने शेर का हाथ अपने कंधे पर रखा और दूसरी तरफ से मीरा ने उसे मजबूती से थाम रखा था। मीरा की सांसें तेज चल रही थीं और शेर को अपने चेहरे के पास उसकी गर्म सांसों और इत्र की महक महसूस हो रही थी।
शेर [मन ही मन]: 'खेल अब पूरी तरह मेरे कब्जे में है। आज तो मेमसाब के आँसू मेरे लिए किसी अमृत से कम नहीं हैं।'
बंगले के अंदर दाखिल होते वक्त मीरा के चेहरे पर सिर्फ चिंता और अपने वफादार नौकर को बचाने की तड़प थी, जबकि शेर के दिमाग में अगली साजिश की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
अंदर जाते वक्त शेर ने अपनी पूरी मक्कारी झोंक दी थी। वह जानबूझकर इस तरह लड़खड़ा रहा था जैसे उसके पैरों में जान ही न बची हो। अपना संतुलन बनाए रखने के बहाने उसका हाथ बार-बार मीरा के भरे हुए उरोजों से टकरा रहा था।
एक वक्त तो ऐसा आया जब सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने अपना पूरा वजन मीरा की तरफ डाल दिया और उसका एक हाथ पूरी तरह से मीरा के बाएं स्तन पर जम गया। नाइटगाउन का रेशमी, पतला कपड़ा उस सख्त और वहशी छुअन को रोकने में नाकाम था। शेर अपनी उंगलियों को फैलाकर उस मखमली गर्माहट और मांसल उभार को अपनी हथेली में भींच रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर दर्द का एक मुखौटा चढ़ा हुआ था।
मीरा इस कामुक हमले से बिल्कुल बेखबर थी। उसका दिमाग अपनी बेटी के खौफ और शेर के बहते खून के बीच उलझा हुआ था। उसे तो बस यह दिख रहा था कि इस आदमी ने अपनी जान की बाजी लगाकर उसकी कोख उजड़ने से बचाई है।
मीरा [रोते हुए, हाँफते हुए और शेर के भारी बदन से रगड़ खाते हुए]: "शेर... तुम बस हिम्मत मत हारना। तुमने आज मेरी दुनिया बचा ली... अगर ज्योति को कुछ हो जाता तो मैं ज़िंदा नहीं बचती। मैं तुम्हारा यह अहसान कैसे उतारूँगी? मैं तुम्हारी कर्जदार हो गई हूँ शेर... तुम जैसा वफादार इंसान भगवान सबको दे। थोड़ा और संभलो।"
शेर ने जब मीरा के मुंह से 'कर्जदार' शब्द सुना, तो उसके अंदर एक वहशी खुशी दौड़ गई। वह मन ही मन मुस्कुराया कि अब अहसान का यह बोझ मीरा को कभी उसके खिलाफ जाने नहीं देगा।
शेर [धीमी आवाज़ में, दर्द का नाटक करते हुए]: "मेमसाब... अहसान कैसा? आप तो मेरी अन्नदाता हैं... छोटी मेमसाब के लिए तो मैं सौ बार जान दे दूँ। बस आप परेशान मत होइए..."
शेर [दर्द से कराहने का नाटक करते हुए, अपनी उंगलियों को मीरा के स्तन पर और कसते हुए]: "अहह... मेमसाब... मुझे माफ़ कर देना... मेरा हाथ आपके... आपके इस पवित्र बदन पर लग रहा है... पर मुझसे अपना वजन संभाला नहीं जा रहा… आऽऽह! कसम से मेमसाब, बेबी जी के लिए मैं अपनी जान भी दे देता… अहह, बहुत तेज़ दर्द हो रहा है मेमसाब!"
मीरा [शेर के हाथ की कसी हुई पकड़ को बिना गलत समझे, घबराहट में]: "कोई बात नहीं शेर, तुम पकड़ कर रखो मुझे! गिरने मत देना खुद को। मेरा सहारा लो। गार्ड, जल्दी से पैर उठाओ इसका, सीढ़ियों पर खून फैल रहा है!"
शेर [मन ही मन - हवस के गहरे उन्माद में]: 'वाह मेमसाब, क्या मखमली बदन है तुम्हारा! यह हाथ यहाँ से अब तक नहीं हटेगा जब तक मैं तुम्हारे इस उरोज की पूरी नरमी को निचोड़ न लूँ। तुम रोती जा रही हो और तुम्हारी हर साँस के साथ यह गाउन मेरे हाथ के नीचे और कसता जा रहा है। आज तुमने खुद मुझे अपने इस जिस्म को भींचने का हक दे दिया है। तुम कर्ज उतारने की बात करती हो ना? यह ७ इंच का शेर तुम्हारा ऐसा कर्ज उतारेगा कि तुम्हारी रूह भी काँप उठेगी।'
शेर ने जानबूझकर एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा मीरा की गर्दन के पास ला दिया, जहाँ से उसके पसीने और महँगे परफ्यूम की मिली-जुली मादक खुशबू शेर के नथुनों में समा रही थी।
मीरा ने उसे और भी मजबूती से थाम लिया, जिससे उसका सीना शेर के हाथ पर और भी कस गया। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिसे वह वफादारी समझ रही थी, वह दरिंदगी की एक सोची-समझी चाल थी। वह बस बार-बार यही दोहरा रही थी कि वह शेर का यह कर्ज कभी नहीं चुका पाएगी।
घर के अंदर पहुँचते ही अफरा-तफरी का माहौल था। मीरा ने तुरंत फर्स्ट-एड बॉक्स मंगाया। उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने एक गार्ड को निर्देश दिया कि वह ज्योति के ज़ख्मों को साफ करे, क्योंकि वे मामूली खरोंचें थीं और बच्ची अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी।
लेकिन शेर की हालत चिंताजनक थी। उसके पैर में एक गहरा घाव हो गया था, जिससे खून का फव्वारा सा छूट रहा था। शेर को सोफे पर लिटाया गया। घाव इतना गहरा था कि खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था। मीरा घुटनों के बल उसके पास बैठ गई। इस दौरान, शेर का बहता हुआ गर्म खून मीरा के नीले रेशमी नाइटगाउन पर भी गिर गया। वह गहरा लाल खून नीले कपड़े पर फैलकर एक वीभत्स और डरावना दाग बना रहा था, लेकिन मीरा को इसकी कोई परवाह नहीं थी।
मीरा [घबराहट में काँपते हाथों से पट्टियाँ निकालते हुए]: "ओह गॉड! शेर, यह तो बहुत गहरा है। कितना खून बह रहा है... तुम्हें फौरन अस्पताल ले जाना होगा। गार्ड, गाड़ी निकालो जल्दी!"
शेर ने नीचे देखा कि कैसे उसका गर्म खून मीरा के जांघों पर फैले नीले रेशमी कपड़े को भिगोकर अंदर उसकी गोरी त्वचा से सट रहा है। उसे इस मंज़र में एक अजीब सा वहशी सुकून मिल रहा था। वह जानता था कि यह खून का दाग अब मीरा के दिमाग से उसके प्रति सारा शक हमेशा के लिए हटा देगा। पर मन ही मन उसके अंदर वासना का एक और तूफान उबल रहा था।
शेर [मन ही मन - एक गहरी हवस के साथ]: 'वाह मेमसाब, आज तो आपका यह कीमती गाउन मेरे खून से रंग गया। पर काश... काश इस लाल खून की बजाय मेरा गाढ़ा, सफ़ेद वीर्य आपकी इस छाती और इस नीले रेशमी गाउन पर गिरा होता। मज़ा आ जाता है जब आप मेरी उन चिपचिपी बूंदों को अपने इन गोरे हाथों से साफ कर रही होतीं।'
अपनी इस गंदी सोच को छुपाते हुए उसने चेहरे पर दर्द और लाचारी का एक और मुखौटा ओढ़ लिया।
शेर [धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में]: "नहीं मेमसाब... अस्पताल मत ले जाइए। बेकार में साहब परेशान होंगे। बस आप अपने इन हाथों से इसे बांध दीजिए... मैं ऐसे ही ठीक हो जाऊंगा।"
मीरा [आँसू पोंछते हुए]: "तुम पागल हो क्या शेर? तुम्हारी जान जा सकती है! पर ठीक है, पहले मैं इसे रोकने की कोशिश करती हूँ।"
मीरा ने थरथराते हाथों से एंटीसेप्टिक लिया और शेर की नंगी जाँघ के पास बने उस गहरे घाव को साफ करने के लिए आगे झुकी। जैसे ही वह झुकी, उसका गाउन और ढीला हो गया, जिससे उसके जिस्म की मदहोश करने वाली खुशबू सीधे शेर के नथुनों में समा गई। जैसे ही मीरा ने रुई ज़ख्म पर लगाई, शेर ने दर्द का एक ज़ोरदार नाटक किया।
शेर [ज़ोर से 'आह' भरते हुए]: "उफ़्फ़... मेमसाब... आऽऽह!"
कराहते ही शेर ने झटके से मीरा का नाजुक हाथ मजबूती से पकड़ लिया।
मीरा [चौंककर, पर उसकी पकड़ को दर्द की छटपटाहट समझकर]: "शेर! छोड़ो... दर्द हो रहा है मैं जानती हूँ, पर मुझे दवा लगाने दो। थोड़ा सहन करो, वरना सेप्टिक हो जाएगा।"
शेर [मीरा की उंगलियों को अपनी कलाई के नीचे और भींचते हुए, आँखों में झूठे आँसू लाकर]: "मेमसाब... बहुत जानलेवा दर्द है... "
मीरा इस वक्त पूरी तरह उसके करीब थी। उसके नाइटगाउन का गला और भी ढीला हो गया था और शेर का हाथ मीरा की कलाई पर था। खून की महक और मीरा के जिस्म की खुशबू मिलकर शेर के दिमाग में एक खतरनाक नशा पैदा कर रही थी। उसने देखा कि मीरा की आँखों में उसके लिए अब सिर्फ और सिर्फ ममता और अहसान का भाव था।
शेर [मन ही मन]: 'खेल शुरू हो चुका है मेमसाब। अब न आप उस डॉक्टर के पास जाएंगी, न ही मुझसे दूर भाग पाएंगी। ये जो आपके गाउन पर मेरे खून के दाग लगे हैं, ये मुझे आपके और करीब लाएंगे।'
मीरा अपने हाथों से शेर के पैर को थामे हुए थी, और शेर का खून उसके हाथों के जरिए उसकी बाहों तक चढ़ रहा था। वह अनजाने में उस दरिंदे से और भी करीब आ रही थी, जिसे वह अपना रक्षक समझ बैठी थी।
एक बार जब खून का बहाव थमा, तो मीरा ने राहत की सांस ली। उसने बाहर खड़े गार्ड्स को वापस गेट पर अपनी ड्यूटी पर भेज दिया।
अब उस बड़े से दीवान (सोफे) पर एक अजीब सी खामोशी और गर्माहट छाई थी। एक तरफ छोटी ज्योति निढाल होकर सो गई थी, दूसरी तरफ शेर लेटा हुआ था।
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