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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#66
भाग ~ १९




"क्या सोचने लगे राजू?" 

"आं...नहीं नहीं कुछ नहीं।"

"क्या तुम्हें डर लग रहा है?"

मैं कुछ न बोला।

"क्या तुम घबरा रहे हो?"

मैं अब भी कुछ न बोला। अंदर बड़ी तेज हलचल मची हुई थी और मैं घोर दुविधा में था।

"चिंता मत करो राजू।" काकी ने कहा─"मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगी। हम दोनों का ये राज मरते दम तक हमारे सीने में दफन रहेगा।"

"और किसी को पता चल गया तो?" 

"नहीं पता चलेगा।" काकी ने दृढ़ता से कहा─"मेरा भरोसा करो राजू....किसी को कभी कुछ पता नहीं चलेगा। न तुम किसी को कुछ बताओगे और न ही मैं।"

"पर तुम मेरे साथ ये क्यों करना चाहती हो?"

"अब तुमसे क्या छिपाऊं राजू।" काकी ने एकाएक संजीदा हो कर कहा─"बस ये समझ लो कि मेरी एक मजबूरी है। वरना तुम खुद सोचो कि क्या मैं इतनी गिरी हुई औरत हूं जो जेठ जैसे रिश्ते के साथ ऐसा कर के कलंक लगाऊंगी। क्या मैं इतनी चरित्रहीन हूं जो अपने बेटे की उम्र के लड़के से कहूंगी कि आओ बेटा...मुझे चोदो। नहीं राजू...मैं ऐसी वैसी औरत नहीं हूं...लेकिन मेरी एक मजबूरी है जिसके कारण मैं ऐसा करने के लिए इतना ज्यादा मजबूर हो गई हूं।"

कहने के साथ ही काकी की आँखें छलक पड़ीं। ये देख मैं धक्क से रह गया। समझ ही न आया कि क्या बोलूं। ये अलग बात है कि उनकी मजबूरी वाली बात पर मैं ये सोचने लगा था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी होगी उनकी।

"म..मुझे बताओ काकी।" मैंने हिम्मत कर के पूछा─"ऐसी क्या मजबूरी है तुम्हारी जो तुमने बापू के साथ ऐसा किया और अब मेरे साथ करना चाहती हो। इतना ही नहीं तुमने उस दिन तो ऐसी किसी मजबूरी का जिक्र नहीं किया था...फिर आज क्यों?"

"क्योंकि मैं और ज्यादा मजबूर नहीं होना चाहती थी राजू।" काकी ने सिसकते हुए कहा─"मैं खुद को और ज्यादा नीचे नहीं गिराना चाहती थी तुम्हारी नजरों में। हां राजू...इसी लिए उस दिन अपनी ऐसी किसी मजबूरी का जिक्र नहीं किया था।"

"पर ऐसी वो मजबूरी है क्या?" मैंने पूछा─"तुम्हारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी काकी जो तुमने मेरे बापू के साथ वैसा नाजायज संबंध बनाया और अब आज मुझसे भी बनाने पर तुल गई हो....मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ काकी।"

"ठीक है तुम्हें सब कुछ बताती हूं।" काकी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा─"देखो बात ऐसी है कि तुम्हारे काका को एक बेटा चाहिए था और उन्हें ही बस क्यों...बल्कि मुझे भी चाहिए राजू था। मेरी भी इच्छा है कि मेरे एक बेटा हो। दो दो बेटियां तो हैं...लेकिन ये जब बड़ी हो जाएंगी तो ब्याह के बाद दूसरे के घर चली जाएंगी। उसके बाद क्या??? उसके बाद तो मैं और तुम्हारे काका अकेले ही रह जाएंगे न। मानती हूं कि मेरा इतना बड़ा परिवार है....जेठ जेठानी हैं...देवर देवरानी हैं...तुम हो। मतलब तुम सबके रहते किसी तरह जीवन गुजर ही जाएगा लेकिन उस मलाल का क्या राजू....जो जीवन भर हमारे अंदर रहेगा कि काश हमारे भी एक बेटा होता। मेरा दो दो बार पेट खराब हो चुका था और मैं मरने वाली हालत में पहुंच गई थी। शहर के डॉक्टर ने कहा था कि कुछ समय तक सम्बन्ध बनाने से परहेज रखना। हमने परहेज रखा भी....उसके बाद जब हमने संबंध बनाया तो कुछ न हुआ। मैं कभी पेट से हुई ही नहीं। तुम्हारे काका को कई बार कहा कि शहर जा कर डॉक्टर को दिखाने चलें मगर वो नहीं माने। फिर जब मैंने एक बार बहुत ज्यादा गुस्सा किया तब वो गए...मुझे ले कर फिर भी नहीं गए। शहर में उन्होंने खुद को दिखाया। बाद में पता चला कि तुम्हारे काका अब बच्चा पैदा ही नहीं कर सकते। जब उन्होंने मुझे ये बताया तो मैं धक्क से रह गई। ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर पूरा आसमान ही गिर पड़ा हो। हम दोनों इस बात से बहुत दुखी हो गए थे मगर अपना ये दुख घर परिवार में किसी को बता नहीं सकते थे....बताने की हिम्मत ही नहीं थी। हालांकि मैंने जीजी को बताने का सोचा भी लेकिन तुम्हारे काका ने ये कह कर मुझे रोक दिया कि वो क्या सोचेंगी उनके बारे में कि उमर में अपने भाई से छोटा होने के बाद भी बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं है मुझमें। बस तब से यही चलता रहा। फिर लगभग दो महीना पहले उन्होंने एक रात मुझसे कहा कि क्या मैं उनके कहने पर किसी और से बच्चा पैदा कर सकती हूं। मैं तो उनकी इस बात को सुन के सन्न ही रह गई थी। फिर एकदम गुस्से में आ कर बोली कि ऐसा वो सोच भी कैसे सकते हैं....मतलब क्या मैं कोई गिरी हुई और चरित्रहीन औरत हूं जो किसी के भी सामने अपनी टांगें फैला कर लेट जाऊंगी। तब उन्होंने कहा कि किसी और के सामने नहीं बल्कि उनके बड़े भाई के सामने।"

"क...क्या सच में काका ने ऐसा कहा।" मैंने चकित भाव से पूछा।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"उन्होंने कहा कि घर की बात घर में ही रहेगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा....तुम्हारे बापू भी न जान सकेंगे कि उनके द्वारा मैं पेट से हो गई हूं।"

"इसका मतलब तुमने बापू के साथ जो संबंध बनाया उसके मुख्य सूत्रधार मझले काका थे।" मैं इस रहस्योद्घाटन से आश्चर्य चकित था─"फिर तो उस दिन खेत में जब तुम बापू के साथ वो सब कर रही थी उसके बारे में काका को भी पता रहा होगा...है न।"

"नहीं।" काकी ने कहा─"उस दिन का उन्हें पता नहीं था। उन्होंने ये कभी नहीं कहा था कि मैं तुम्हारे बापू के साथ कहीं भी जा के संबंध बनाने लग जाऊं। उन्होंने उनसे संबंध बनाने के लिए सिर्फ घर में कहा था। इसी लिए तो उन्होंने महीना भर पहले सुनीता और रानी को भी उनके मामा के साथ आसानी से भेज दिया था। मेरे भाई के आने से उन्हें आसानी हो गई थी....और फिर उन्होंने सुनीता और रानी को भेजने में एक बार भी न नुकुर नहीं की थी। बेटियों के जाने के बाद उन्होंने साफ शब्दों में मुझसे कहा था कि अब मेरे पास मौका ही मौका है उनके बड़े भाई को इस काम के लिए फंसाने का। उन्होंने ये भी कहा था कि वो खेतों में रह कर मुझे इस काम के लिए पूरा मौका देंगे।"

"तो फिर आपने बापू को फंसाया कैसे इसके लिए।" मैंने पूछा।

"उनको फंसाने की नौबत ही नहीं आई थी राजू।" काकी ने कहा─"वो तो इत्तेफाक से उस दिन वो घर आ गए थे और मुझे घर के पीछे कुएं में नहाते हुए देख लिया था। उसी समय शायद उनके मन में मेरे प्रति हवस जाग गई थी। अब क्योंकि वो भी समझते थे कि हवस के साथ अगर वो मेरे साथ कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश करेंगे तो मैं शोर मचा दूंगी। इस लिए उन्होंने मुझे फंसाने के लिए प्रेम का नाटक रचा था। राजू.....दुनिया में हर मरद ऐसा ही होता है। वो हर औरत को सिर्फ हवस की नजर से ही देखता है। औरत को भोगने के लिए वो हर तरह का तरीका अपनाता है।"

"इसका मतलब ये हुआ कि बापू ने ऐसा कर के खुद ही तुम्हारा काम आसान कर दिया था।" मैंने कहा─"मतलब जो काम तुम उनके साथ करना चाहती थी वैसा उन्होंने खुद ही आ के कर दिया था।"

"हां सही कहा तुमने।" 

"फिर क्या तुमने इस बारे ने काका को भी बताया था।" मैंने पूछा।

"हां.... उन्हें सब कुछ बताया था।" काकी ने कहा─"फिर वो कहने लगे कि जो भी करो जल्दी करो....और थोड़ा एहतियात भी बरतो। मतलब मैं हमेशा ये याद रखूं कि ऐसे सम्बन्ध का किसी को भी पता न चल सके।"

"चलो ये तो समझ गया मैं।" मैंने गहरी सांस ली─"लेकिन अब ये नहीं समझ पा रहा कि जब काका ने ही बापू के साथ तुम्हें ऐसा करने की अनुमति दे रखी है तो अब बापू को छोड़ कर मुझसे ऐसा करने को क्यों कह रही हो? मतलब तुम तो अभी भी बड़े आराम से बापू के साथ सम्बन्ध बना सकती हो...फिर मुझसे क्यों कह रही हो? मुझे तो ऐसा करने का कोई अनुभव भी नहीं है। मैंने आज तक किसी लड़की या औरत की बु...बुर नहीं देखी...चुदाई करने की तो बहुत दूर की बात है।"

"क्या सच में??? काकी को जैसे यकीन न हुआ तो पूछ पड़ीं।

"मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगा काकी।"

"हां ये भी सही कहा तुमने।" काकी ने कहा─"देखो बात ये है कि तुम्हारे बापू से अब मैं ऐसा करना ही नहीं चाहती।"

"क्यों??"

"एक तो तुम्हारे सामने हमारा भेद खुल चुका है जिसकी वजह से अब शायद वो भी ऐसा करने की इतना जल्दी हिम्मत न करें।" काकी ने कहा─"दूसरे कई बार मेरे मन में ये खयाल आया है कि क्या पता अब वो खुद भी बच्चा पैदा करने की क्षमता न रखते हों। मतलब उमर में वो काफी बड़े हैं तुम्हारे काका से। जब उनसे छोटा होने के कारण तुम्हारे काका बच्चा पैदा नहीं कर पा रहे तो वो कैसे ऐसा कर लेंगे।"

"काका में कोई अंदरूनी खराबी होगी।" मैंने कहा─"शायद इस लिए वो बच्चा पैदा करने की क्षमता खो चुके हैं लेकिन बापू के पास शायद वो क्षमता अभी भी हो।"

"मानती हूं कि होगी।" काका ने कहा─"लेकिन ये एक संभावना ही है न। मान लो उनके पास भी बच्चा पैदा करने की क्षमता न हो तो??? ऐसे में तो बेमतलब ही मैं उनके नीचे हर बार लेटती रहूंगी न और वो भी यही समझेंगे कि मैं हवस में अंधी हो के उनसे बार बार चु..चुदवाए जा रही हूं।"

"हां ये भी सही बात है।"

"इसी लिए आज इस वक्त अचानक मुझे खयाल आया कि क्यों न मैं ऐसा काम तुम्हारे साथ करूं।" काकी ने कहा─"तुमने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा है राजू। मतलब कि तुम अभी नए नए जवान हुए हो और ऊपर वाले की कृपा से तुम्हारे पास दमदार हथियार भी है। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर तुम मेरे साथ करोगे तो निश्चित ही मैं पेट से हो सकती हूं।"

मैं काकी की इस बात पर हैरान रह गया। मेरे अंदर अजीब सी गुड़मुड़ होने लगी थी। मन में एकाएक सवाल कौंधा कि क्या सच में मैं काकी को चोद कर उन्हें पेट से कर सकता हूं। इस सवाल से मेरे बदन में अजीब सी झुरझुरी हुई। मन में कल्पनाओं का समंदर उभर आया।

"क...क्या सच में तुम्हें भरोसा है काकी कि मैं तुम्हें पेट से कर सकता हूं।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"हां राजू....मुझे इस बात का पूरा भरोसा है।" काकी ने पूरे आत्मविश्वास से कहा─"इसी लिए अचानक मैं तुम्हें ऐसा करने को कहने लगी थी। अगर तुम्हें बापू के साथ मेरे संबंध वाली बात का पता न चलता तो शायद मैं इस दोराहे पर न आ पाती और न ही कभी ये कल्पना कर सकती थी कि मुझे तुम्हारे साथ ऐसा करने को कहना पड़ेगा। अब तो ऐसा लगता है जैसे ऊपर वाला खुद चाहता है कि ऐसा ही हो....तभी तो इन चार दिनों में हमारे बीच इतना कुछ हो चुका है। क्या तुमने कल्पना की थी ऐसा होने की।"

"न..नहीं।"

"मैंने भी नहीं की थी राजू।" काकी ने गंभीरता से कहा─"पर हर कल्पना से परे ऐसा हुआ। जाहिर है मेरे नसीब में यही होना लिखा है। हां राजू....शायद तुम्हारे ही बच्चे की मां बनना लिखा है।"

"ये...ये क्या कह रही हो तुम??" मैं बुरी तरह चौंक पड़ा।

"हां राजू....अगर तुमसे मुझे बच्चा होगा तो तुम ही तो उसके बापू कहलाओगे।" काकी ने कहा─"और मैं तुम्हारे उस बेटे की मां। एक तरह से मैं तुम्हारी काकी नहीं बल्कि बीवी ही बन जाऊंगी....हाय दय्या ये क्या क्या बोले जा रही हूं मैं।"

काकी ने बुरी तरह शर्मा कर अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपा लिया। इधर उनकी इस बात से मुझे अलग ही तरह का एहसास होने लगा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है। न चाहते हुए भी मैं सोचने लगा कि क्या सच में मैं काकी के बच्चे का बापू हो जाऊंगा। इस खयाल ने मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ा दी।

"ज्यादा मत सोचो राजू।" तभी काकी ने कहा─"मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं....भगवान के लिए मुझे एक बेटे की मां बना दो।"

काकी ने सच में हाथ जोड़ लिए। उनकी आंखों में एकाएक आंसू झलकने लगे। बेटे की चाह ने उन्हें क्या क्या करने के लिए मजबूर कर दिया था। मुझे समझ न आया कि अब क्या करूं और क्या बोलूं उन्हें।

"ह..हाथ मत जोड़ो काकी।" मैंने आगे बढ़ कर उनके हाथ अलग किए─"मुझे ये अच्छा नहीं लग रहा।"

"तो फिर मान जाओ न।" काकी ने भारी गले से कहा─"बाकी तुम काका की चिंता मत करो। मैं उन्हें अच्छे से सब कुछ समझा दूंगी।"

"न..नहीं नहीं।" मैं बुरी तरह हड़बड़ा गया─"काका से इस बारे में कुछ मत कहना। मैं काका से नजरें नहीं मिला सकूंगा।"

"ठीक है।" काकी ने कहा─"मैं उन्हें ये नहीं बताऊंगी। तुम्हारे द्वारा अगर मैं पेट से हो जाती हूं तो उनसे यही कहूंगी कि ये जेठ जी से हुआ है।"

"तो क्या बापू को इस बारे में पता नहीं चलेगा।"

"तुम्हारे बापू को कैसे पता चल जाएगा भला।" काकी ने कहा─"उनकी नजर में मैं और वो जो कर रहे हैं वो बस एक दूसरे की जिस्मानी जरूरत है। उन्हें कभी पता ही नहीं चलेगा कि असल में इस सबके पीछे मैं क्या कर रही थी। तुम्हारे काका भी यही समझेंगे कि मैं उनके बड़े भाई के द्वारा गर्भवती हुई। ऐसे में तुम्हें भी कभी उनके सामने अपनी नजरें नहीं झुकाना पड़ेगा। अब तो ठीक है न राजू।"

"ठीक तो है।" मैं अजीब दुविधा में पड़ गया था─"पर मुझे सोचने के लिए समय चाहिए। बात ये है कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं और क्या न करूं।"

"क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारी ये अभागन काकी एक बेटे का सुख पाए।" काकी ने अधीरता से कहा─"क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे जो काका अपने दिल पर पत्थर रख कर अपनी औरत को किसी गैर मर्द के नीचे लेटने को कहा है उनकी एक बेटा पाने की हसरत पूरी हो जाए।"

"च...चाहता हूं काकी।" मैं झट बोला─"भला मैं ये कैसे चाह सकता हूं कि मेरे काका काकी किसी बात से दुखी रहें।"

"तो फिर बस।" काकी ने कहा─"सब कुछ भूल जाओ राजू....अपने मन से हर दुविधा को निकाल दो और अपनी इस काकी को मां बना दो।"

"मुझे सोच लेने दो काकी।" मैं लड़खड़ाते स्वर में बोला─"तुम्हें अंदाजा ही नहीं है कि इस बात से मेरे अंदर क्या क्या चलने लगा है।"

"हां मैं समझती हूं राजू।" काकी ने सिर हिलाया─"मैं समझ सकती हूं कि अचानक इस बात से तुम किस हद तक सोच में पड़ गए होगे। मैं समझ सकती हूं कि इस बात के कारण तुम्हारे अंदर उथल पुथल मच गई होगी। तो ठीक है फिर....मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूंगी। तुम्हें जितना सोचना है सोच लो लेकिन भगवान के लिए मुझे....अपनी इस अभागन काकी को निराश मत करना।"

"ठीक है।" मैंने कहा─"अच्छा अब मैं जा रहा हूं। सब लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे।"

"ठीक है जाओ।" काकी ने खुद को सम्हालते हुए कहा─"मैं भी थोड़ी देर में आती हूं।"

उसके बाद मैं मन में हजारों तरह के खयाल लिए चल पड़ा वहां से। खेत तक मैं इसी सबके बारे में सोचते हुए आया था। मेरे अंदर की उथल पुथल शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

*********

करीब एक डेढ़ घंटे बाद जब मुझे और अनीता को फुर्सत मिली तो हम दोनों ने अपना अपना डंडा सुनीता और रानी को पकड़ा दिया। वो दोनों हमारी जगह बैलों के पीछे चलने लगीं। सुनीता तो खैर अनीता से बस एक ही साल छोटी थी लेकिन रानी अभी छोटी थी। जब वो बैलों के पीछे डंडा ले कर उन्हें हांकते हुए चलने लगी तो हम सब हंसने लगे थे जिससे वो बुरी तरह झेंपते हुए शर्मा गई थी। फिर मां ने एकदम से हमें ये कहते हुए डांट दिया कि─क्यों मेरी बच्ची पर हंस रहे हो तुम सब। खबरदार अगर किसी ने उसे सताया।

उसके बाद मैं और अनीता आमों की तरफ आ गए। पहले आमों का अच्छे से मुआयना किया उसके बाद एक पेड़ के नीचे बैठ के सुस्ताने लगे।

"अब जा के राहत मिली है।" अनीता दुपट्टे से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए बोली─"कितनी मस्त हवा लग रही है न यहां।"

"हां सही कहा।" मैं बोला─"ला अपना दुपट्टा दे न...मैं भी पसीना पोंछ लूं। मेरी साफी शायद खलिहान में ही रह गई है।"

अनीता ने दुपट्टे को कमर से छोरा। उसमें नमकीन गुड़ छुपा हुआ था जिसे उसने निकाल कर अपने पास रखा और दुपट्टा मुझे पकड़ा दिया।

"नमकीन गुड़ खाने का मन है कि नहीं।" उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा।

"तू प्यार से खिलाएगी तो खा लूंगा।" मैं बोला।

"अच्छा....और अगर नहीं खिलाऊंगी तो नहीं खाएगा।" उसने तिरछी नजरों से देख मुस्कुराते हुए पूछा।

"हां...फिर नहीं खाऊंगा।" मेरा दिल एकाएक तेज तेज धड़कने लगा। पता नहीं उसके साथ रहने से क्यों मेरा दिल धड़कनें लगता था।

"ऐसा क्यों।" उसने पूछा─"सच सच बता न राजू....मैं अगर नहीं खिलाऊंगी तो क्यों नहीं खाएगा तू।"

"बस ऐसे ही।" मैं बोला।

"अरे...बता न।"

"सच्ची बताऊं।"

"हां।"

"देख...मेरा मन ये कहता है कि जब तू खिलाएगी तो उसे बहुत अच्छा लगेगा।" मैंने कहा─"उसी तरह मैं तुझे खिलाऊंगा तब भी उसे अच्छा लगेगा।"

"अच्छा ऐसा क्या।" अनीता मुस्कुराई─"पर मैं तो आज न खिलाऊंगी तुझे।"

"ठीक है जैसी तेरी मर्जी।" मैं थोड़ा मायूस हो गया─"मैं तुझे मजबूर नहीं कर सकता।"

"क्यों नहीं कर सकता मजबूर।" उसने फिर तिरछी नजरों से देखा।

"क्योंकि......क्योंकि मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"और मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुझे कोई तकलीफ हो। तुझे मजबूर करूंगा तो तुझे तकलीफ ही तो होगी।"

"कितना अजीब है न राजू।" अनीता ने कहा─"दो दिन में हमारे बीच कितना बदलाव आ गया है। पहले हम दोनों एक दूसरे की तकलीफ के बारे में तनिक भी नहीं सोचते थे और अब....बहुत ज्यादा सोचते हैं। क्या सच में भाई बहन के प्यार में ऐसा होता है।"

"हां शायद।" मैं खुद उलझ सा गया।

"चल मुंह खोल अपना।" उसने नमकीन गुड़ मेरे मुंह के पास ला कर कहा─"मैं तो ऐसे ही कह रही थी कि नहीं खिलाऊंगी आज। सच ये है कि मैं ऐसा कर ही नहीं पाऊंगी।"

"क्यों??" मैं मन ही मन थोड़ा चौंक पड़ा।

"पता नहीं।" अनीता ने मेरे मुंह में नमकीन गुड़ डाल कर कहा─"बस इतना पता है कि अगर नहीं खिलाऊंगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"

मैंने भी मुस्कुराते हुए उसके मुख की तरफ नमकीन गुड़ बढ़ाया जिसे उसने हल्के से मुस्कुरा कर मुंह में लपक लिया।

"मतलब...जैसे मुझे ऐसा करने से अच्छा नहीं लगता वैसे ही तुझे अच्छा नहीं लगता...है न।" मैंने पूछा।

"हां।" अनीता ने कहा फिर सहसा उसे कुछ याद आया तो पूछा─"अच्छा ये बता..उस समय तू इतनी देर से क्यों आया था। श्यामू काका के लिए पान सुपाड़ी लेने जाने में क्या इतना समय लगता है।"

उसकी ये बात सुन मैं अंदर ही अंदर घबरा उठा। मन ही मन ये भी सोचा कि कितना जल्दी ये चीजों को समझ कर उसे पकड़ लेती है। इतना ही नहीं इस तरह पूछने लगती है जैसे कोई शक्की बीवी अपने मरद से पूछती है।

"क्या सोचने लगा।" मुझे सोचता देख वो बोल पड़ी─"बता न....इतना समय कहां लगा दिया था तूने। कहीं तू...बबलू के साथ खेलने तो नहीं चला गया था।"

"नहीं यार।" मैंने फटाफट बहाना बनाया─"बात ये है कि मैं थोड़ी देर काका के यहां ही बैठ गया था। वो बोले कि साथ में ही चलते हैं।"

"पर तू तो उनके साथ नहीं आया था।" अनीता ने फिर से मेरे मुंह में नमकीन गुड़ डाला─"वो और छोटी काकी तो साथ ही आए थे....मगर तू बहुत बाद में आया था। आखिर कहां रह गया था तू।"

"तू पूरी बात बताने देगी तब न बताऊंगा।" मैं थोड़ा चिढ़ कर बोला─"मैं मझले काका के यहां मंजू काकी के पास रुक गया था। हुआ ये कि...छोटे काका के घर से बाहर आया तो मझले काका अपने घर के बाहर दिख गए। वो पूछने लगे कि अभी तक नहीं गया क्या तो मैंने उन्हें बताया कि छोटे काका के लिए पान सुपाड़ी लेने लाला की दुकान चला गया था। उसी समय अचानक प्यास लग आई तो वहीं से घर के अंदर चला गया। काकी से मांग के पानी पिया और फिर वहीं थोड़ी देर बैठे उनसे दरबार करने लगा। ऐसे में समय का ध्यान ही नहीं रहा मुझे। फिर जब ध्यान आया तो सरपट भागते हुए यहां आया।"

"अच्छा तो इस लिए तू इतनी देर से आया था।" अनीता ने सब कुछ जान लेने के बाद सिर हिलाया। इस बीच मैंने भी फिर से उसके मुख में नमकीन गुड़ डाल दिया।

"वैसे एक बात कहूं तुझसे।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"बुरा तो नहीं मानेगी न।"

"हां कह न।" उसने मुंह चलाते हुए कहा─"और बुरा क्यों मानूंगी भला।"

"तू न कभी कभी ऐसा बर्ताव कर जाती है जैसे कोई शक्की बीवी अपने मरद से करती है।" मैंने एक झटके में और एक ही सांस में बोल दिया।

"हाय दय्या।" अनीता बुरी तरह उछल पड़ी। आश्चर्य से आँखें फाड़ कर बोली─"ये तू क्या बोल रहा है....मैंने कब तुझसे ऐसे बर्ताव किया।"

"अभी जिस तरह तू मेरे देर से आने की बात पूछ रही थी न।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"उससे तो यही लगा था। तू एक शक्की बीवी की तरह ही तो पूछ रही थी कि मैं इतनी देर से क्यों आया था...कहां रह गया था...छोटे काका काकी के साथ तो मैं आया ही नहीं था।"

"हां तो ऐसा पूछने से मैं बीवी बन गई तेरी।" अनीता ने हैरान नजरों से देखते हुए कहा।

"अरे मैंने कब कहा कि तू मेरी बीवी बन गई।" मैं हंस पड़ा─"मैं तो बस बता रहा हूं कि तू एक शक्की बीवी की तरह ऐसे कुरेद कुरेद के पूछ रही थी मुझसे।"

"बहुत खराब है तू।" अनीता ने बुरा सा मुंह बना लिया─"जाने क्या क्या बोलता रहता है....गंदा कहीं का।"

"ले अब मैं गंदा हो गया।" मैं मुस्कुरा उठा─"और तू जो शक्की बीवी की तरह कुरेद कुरेद के मेरे देर से आने की बात पूछ रही थी...उसका क्या...हां।"

"हां तो क्या मैं नहीं पूछ सकती तुझसे।" अनीता ने घूरा─"क्या एक बहन अपने भाई से ऐसे नहीं पूछ सकती।"

"यार तू तो बात का पतंगड़ बनाने लगी।" मैंने कहा─"जबकि मैंने तो बस मजाक में ऐसा कहा है।"

"ऐसा मजाक करता है क्या कोई।" उसने फिर से मुंह बनाया।

"पर मैं तो अपनी प्यारी बहन से ऐसा ही मजाक करूंगा।" मैंने नमकीन गुड़ हाथ में ले कर उसकी तरफ बढ़ाया और मुस्कुराते हुए बोला─"हां तुझे बुरा लगा हो तो बोल दे...कान पकड़ के माफी मांग लूंगा तुझसे। भला अपनी प्यारी बहन को कैसे नाराज कर दूंगा मैं....हां।"

ये सुनते ही अनीता अनायास ही मुस्कुराने लगी और झट से मुंह खोल कर मेरे हाथ का नमकीन गुड़ मुंह में लपक लिया। थोड़ी देर उसने चबाया फिर बोली─"चल अब बातें न बना तू....सब समझती हूं तेरी शैतानी को।"

"अच्छा...सच में??" मैं मुस्कुरा उठा।

"हां...इतनी बुद्धू न समझ मुझे।" उसने फिर से तिरछी नजरों से देखा और मुस्कुराने लगी।

इस बार मैं उसके तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्कुराने को नजरअंदाज न सका। जब वो तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्कुराती थी तो वो अलग ही दिखने लगती थी। एक अदा सी  दिखने लगती थी उसमें।



जारी है..........




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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 27-05-2026, 09:00 AM



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