Thread Rating:
  • 280 Vote(s) - 4.77 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
अध्याय 12

 
सायमा के मन में विचारों का एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। वह अंदर तक हिल चुकी थी और अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं कर पा रही थी।
 
उसके मन में उठते सवाल:
"या अल्लाह, यह क्या हो रहा है? क्या खाला को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि वह क्या कर रही हैं? उनका पूरा बदन, उनके मम्मे इस तरह सबके सामने नुमाया हो रहे हैं... क्या उन्हें सच में नहीं दिख रहा कि वह कितना ज़्यादा बदन दिखा रही हैं? क्या वह सच में इतनी बेखबर हैं?

 
और वह विशाल... वह दरिंदा! वह सरेआम कैमरे से यह सब रिकॉर्ड कर रहा है और खाला चुपचाप सब सह रही हैं। खाला को तो पता होना चाहिए था! मैंने खुद उन्हें विशाल की गंदी नीयत और उसकी घिनौनी फितरत के बारे में आगाह किया था, उसे दूर रहने की चेतावनी दी थी। तो फिर आज वह उसके सामने इस तरह बेबस क्यों हैं?

 
ऐसा लग रहा था मानो विशाल इस पूरे सीन का डायरेक्टर बना बैठा हो। वह जिस तरह से हुक्म चला रहा था—'थोड़ा और झुककर हल्दी लगाइए'… और खाला उसकी हर बात मानकर और गहरा झुकती जा रही थीं… यह क्या है? क्या विशाल अब मुझे छोड़ने के लिए खाला को निशाना बना रहा है? क्या उसका अगला निशाना मेरी अज़ीज़ खाला हैं ताकि वह मुझे बख्श दे, या फिर वह हम दोनों की ज़िंदगी तबाह करना चाहता है?"

 
भीड़ के शोर के बीच सायमा का दम घुट रहा था। इन अनगिनत खौफनाक ख्यालों ने उसे अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था, और वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी खाला को इस दलदल से कैसे बचाए।

----------
 
उधर टेंट के ठीक पीछे, जहाँ महफ़िल का शोर थोड़ा कम था, विशाल एक खंभे की ओट में खड़ा था। उसके होंठों पर वही शातिर और घिनौनी मुस्कान तैर रही थी। उसने अपनी जेब से फोन निकाला और स्क्रीन ऑन की। उसकी उंगलियाँ तेज़ी से गैलरी की तरफ बढ़ीं, जहाँ अभी-अभी रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरें सेव हुई थीं।
 
उसने वीडियो प्ले किया। स्क्रीन पर आयशा का वही बसंती पीले सूट वाला रूप उभर आया। जब वह दुल्हन को हल्दी लगाने के लिए नीचे झुकी थीं, तो गहरे गले से छलकते उनके भारी और पुष्ट मम्मों का वह लाजवाब नज़ारा कैमरे ने पूरी तरह कैद कर लिया था। विशाल ने वीडियो को पॉज़ किया और ज़ूम करके उस महीन जॉर्जेट के कपड़े के नीचे पूरी तरह सख्त हो चुकी उनकी 'गुलाबी टिप्स' की बनावट को देखने लगा।
 
"उफ़... क्या चीज़ है," विशाल ने दबी आवाज़ में अपनी जीभ को होठों पर फेरते हुए बुदबुदाया। "भरी महफ़िल में सबके सामने जो मज़ा इसने मुझे दिया है, उसकी तो कोई कीमत ही नहीं है। ज़रा सा हुक्म क्या चलाया, यह तो पूरी की पूरी न्यौछावर हो गई।"
 
फिर उसने अगली तस्वीर पर स्वाइप किया। उस फोटो में आयशा का चेहरा झुका हुआ था, उनकी आँखें शर्म और खौफ से काँप रही थीं, लेकिन उनका गोरा, दूधिया सीना पूरी तरह बेपर्दा होकर कैमरे के लेंस के सामने छलक रहा था। विशाल की आँखों में हवस की आग और गहरी हो गई। उसे याद आने लगा कि कैसे उसने आयशा के उन उभारों को अपनी हथेलियों में भींचा था और कैसे आज उसके सिर्फ एक मैसेज मात्र से आयशा का पूरा बदन उसकी उंगलियों पर नाचने को मजबूर हो गया था।
 
तस्वीरों को एक-एक करके देखते हुए वह अपनी ही जीत के नशे में डूबता जा रहा था। वह जानता था कि उसने एक तीर से दो शिकार कर लिए हैं—एक तरफ आयशा जैसी इज़्ज़तदार औरत उसके जाल में तड़प रही थी, और दूसरी तरफ सहमी हुई सायमा।

-----------

 
साहिल टेंट के कोने में खड़ा अपनी ही उंगलियों को चटका रहा था। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था, लेकिन सीने के अंदर एक भयानक आग सुलग रही थी। विशाल के फोन की स्क्रीन पर उसने जो देखा था, वह मंज़र उसकी आँखों के सामने से हट ही नहीं रहा था।
 
उसके मन में विचारों का एक हिंसक बवंडर उठ खड़ा हुआ:
"या अल्लाह... यह मैंने क्या देख लिया? क्या वह सच में मेरी अम्मी थीं? जो अम्मी घर की चारदीवारी में अपने दुपट्टे का एक कोना भी खिसकने पर उसे हड़बड़ाकर सँभालती थीं, आज वह इस भरे बाज़ार में, पूरी महफ़िल के सामने इस कदर लापरवाह कैसे हो गईं? क्या उन्हें ज़रा भी एहसास नहीं था कि उनका वह गहरा गला, उनके वे पुष्ट और भारी मम्मे पूरी तरह से छलक रहे थे?
 
और वह विशाल... वह कमीना सरेआम कैमरे का लेंस उनके सीने पर टिकाए खड़ा था, और अम्मी... अम्मी उसके इशारों पर और ज़्यादा झुकती जा रही थीं! जैसे वह कोई रस्म नहीं, बल्कि विशाल के हुक्म की तामीर कर रही हों। जब उसने कहा कि 'थोड़ा और झुकिए', तो अम्मी ने बिना किसी ऐतराज़ के अपने उस हिस्से को उसके कैमरे के सामने और ज़्यादा परोस दिया। क्यों? ऐसा क्या है उस शख्स के पास कि अम्मी उसके सामने इस कदर बेबस, इस कदर लाचार नज़र आ रही हैं?
 
सबसे ज़्यादा जो बात मुझे अंदर ही अंदर काट रही है, वह है उनका वह आख़िरी इशारा। जब सब कुछ खत्म हो गया, तो अम्मी ने नज़रें चुराने के बजाय सीधे विशाल की तरफ देखा। विशाल ने आँख उठाई और अम्मी ने ना में सिर हिलाया... लेकिन वह मुस्कान! उनके होठों के कोने पर वह दबी हुई, गद्दार मुस्कान साफ़ कह रही थी कि जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ उन दोनों के बीच का एक खेल था। और फिर... अपने अंगूठे से अपने नीचे वाले होंठ को उस तरह छूना... वह कोई अनजाने में की गई हरकत नहीं थी। वह एक इकरार था, एक मुकम्मल गवाही थी कि अम्मी को पता था कि उनके बदन की नुमाइश हो रही है, और वह इसका लुत्फ़ उठा रही थीं।

एक तरफ मेरा खून खौलता है कि मैं जाकर उस विशाल का गला घोंट दूँ, उसका फोन छीनकर टुकड़े-टुकड़े कर दूँ... लेकिन दूसरी तरफ, अम्मी के उस भीगे, मादक रूप को देखकर मेरे अपने बदन में एक शर्मनाक अकड़न पैदा हो रही है। मैं अपनी ही अम्मी को एक बेटे की नज़र से नहीं, बल्कि एक औरत की नज़र से देख बैठा हूँ। यह कैसी गद्दारी है? मैं उस दरिंदे से नफ़रत करूँ, या अपनी अम्मी की इस छुपी हुई हवस पर रोऊँ?"
 
भीड़ के बीच खड़ा साहिल अपनी मुट्ठियाँ भींचे खड़ा था। खाने की तरफ बढ़ती भीड़ और ढोलक की थम चुकी थाप के बीच, वह खुद को एक ऐसे अंधेरे कुएँ में गिरता हुआ महसूस कर रहा था, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

----------
  
भीड़ हिली और आँगन के दूसरे हिस्से में लगे बुफे की तरफ बढ़ चली। बिरयानी की खुशबू, कबाबों के सिकने की महक और कोरमे का मसालेदार अरोमा हवा में घुल गया। अम्मी भी दूसरे रिश्तेदारों के साथ बुफे की ओर बढ़ चलीं। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था। मगर मैं लास्ट में था। मैंने प्लेट उठाई और उसमें  खाना लिया।
 
फिर मैंने अम्मी को ढूँढा। वह नानी और अपने कुछ दूर के रिश्तेदार औरतों के साथ एक गोल टेबल पर बैठ चुकी थीं। मैं तेज़ी से उनकी तरफ गया और उनके बगल वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया। अम्मी ने मुझे देखा तो वह मुस्कुरा दीं। "आ गया? कुछ और लाऊँ तेरे लिए?"
 
"नहीं, मैं ले लूँगा," मैंने कहा और उनके करीब बैठा रहा।
 
हम सब खाना खा रहे थे और साथ में बातें भी कर रहे थे। नानी मुझे छेड़ रही थीं, मौसी कुछ पूछ रही थीं। अम्मी भी इस सब में शामिल थीं। विशाल अपनी अलग टेबल पर, अपने लोगों के साथ बैठा था। सब कुछ नॉर्मल था।
 
तभी एक मौसी ने अम्मी से कहा, "आयशा, ज़रा गुलाब जामुन तो लाना, खत्म हो गए हैं।"
 
"मैं लाता हूँ," मैं फौरन उठा।
 
"तू बैठ," अम्मी ने मेरा हाथ दबा कर कहा। "मैं देखती हूँ।" और वह उठकर चली गईं।
 
मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा। वह किचन के पास, कैटरिंग वालों से बात कर रही थीं। वह अकेली थीं। एक पल के लिए। और शायद विशाल को बस उसी एक पल का इंतज़ार था।
 
मैंने देखा, वह अपनी टेबल से प्लेट लेकर उठा और ऐसे चलने लगा जैसे उसे भी गुलाब जामुन लेना हो।
 
वह अम्मी के पास पहुँचा। अम्मी ने उसे देखा तो चौंक गईं। उसने अम्मी से कुछ कहा।

-------------- 
 
अम्मी के पास आकर वह बोला, "आप गुलाब जामुन खा रही हैं? मेरा तो कुछ और ही खाने का दिल कर रहा है।"
 
विशाल ने जब यह बात कही, तो उसके चेहरे पर एक बेहद अर्थपूर्ण और गंदी मुस्कान थी। वह अम्मी के इतने करीब खड़ा हो गया था कि उसका कंधा अम्मी  की बाजू से लगभग छू रहा था। अम्मी के हाथ में गुलाब जामुन की प्लेट थी, लेकिन विशाल की आँखों में कुछ और ही पक रहा था। उसकी नज़रें अम्मी के चेहरे पर नहीं, बल्कि अभी भी उनके पुष्ट मम्मों की उस गहराई पर जमी हुई थीं जो झुकने की वजह से और भी ज़्यादा स्पष्ट हो गई थीं।
 
अम्मी का हाथ रुक गया। गुलाब जामुन की मिठास जैसे उनके हलक में ही कड़वी हो गई। उन्हें बखूबी समझ आ गया था कि विशाल के 'कुछ और खाने' से क्या मतलब है। वह उनके दूधिया बदन और उन गुलाबी युक्तियों की बात कर रहा था, जिन्हें उसने अभी कुछ देर पहले अपने कैमरे में कैद किया था।
 
अम्मी (धीमी आवाज़ में, घबराते हुए): "विशाल जी… यहाँ सब लोग हैं… आप क्या बोल रहे हैं?"
 
विशाल ने प्लेट से एक चम्मच उठाया और हवा में घुमाते हुए अम्मी के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "लोग तो जश्न मना रहे हैं आयशा जी, लेकिन मेरा असली जश्न तो आपकी इन 'नसों' के बीच छिपा है। ये गुलाब जामुन तो फीके हैं, असली रस तो आपके इस मखमली वजूद में भरा है।"
 
विशाल ने बड़ी चालाकी से अपने हाथ की कोल्ड ड्रिंक का गिलास थोड़ा सा टेढ़ा किया और गहरा लाल शर्बत सीधे अम्मी के मखमली पैरों और उनकी सैंडल पर गिरा दिया।
 
"ओह! आई एम सो सॉरी, आयशा जी, कितनी बड़ी गलती हो गई मुझसे," विशाल ने बनावटी अफसोस जताते हुए कहा। इससे पहले कि अम्मी कुछ समझ पातीं, वह अपनी प्लेट नीचे रखकर उनके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया।
 
उसने अपनी जेब से एक रेशमी रूमाल निकाला और अम्मी के पैरों को साफ करने लगा। उसका हाथ जानबूझकर अम्मी की पिंडलियों और टखनों को छू रहा था। अम्मी हड़बड़ा गईं और पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन विशाल ने पूरी मज़बूती से उनका पैर पकड़ लिया।
 
 
विशाल (नीचे से ऊपर देखते हुए, धीमी और भारी आवाज़ में): "हिलिए मत आयशा जी, दाग गहरा है...।"
 
आस-पास के लोगों को लगा कि वह एक सज्जन की तरह सफाई कर रहा है, लेकिन अम्मी को उसकी अगली फुसफुसाहट ने अंदर तक कंपा दिया।
 
विशाल: "अब ज़रा धीरे से नीचे झुकिए... जैसे आप हल्दी लगा रही थीं। मुझे वो नज़ारा एक बार फिर करीब से देखना है। अपने इन मम्मों को मेरी आँखों के सामने लाइए।"
 
 
मैंने देखा कि अम्मी ने 'ना' में सिर हिलाया, उनके चेहरे पर घबराहट थी। वह इधर-उधर देख रही थीं।
 
फिर अम्मी ने एक आखिरी बार भीड़ की तरफ देखा।
 
उन्होंने काँपते हुए अपने हाथों को अपने घुटनों पर रखा और धीरे-धीरे नीचे झुकने लगीं। जैसे-जैसे वह झुकीं, उनका पीला सूट एक बार फिर उनके भारी और पुष्ट वक्षों के दबाव से तन गया। विशाल की आँखें उनके ब्लाउज के उस गहरे छेद में गड़ गईं, जहाँ से उनके नंगे मम्मों की गोलाई और वे सख्त गुलाबी युक्तियाँ बिल्कुल साफ़ नज़र आ रही थीं।
 
अम्मी की साँसें तेज़ हो गई थीं, और उनका चेहरा शर्म की आग में दहक रहा था।
 
यह सब बीस सेकंड में हो गया। बीस सेकंड में मेरा सुकून, मेरा भरोसा, सब कुछ बिखर गया।
 
विशाल ने अम्मी पर एक जीत भरी निगाह डाली और वहाँ से चला गया।
 
और मैं अपनी कुर्सी पर बैठा, प्लेट में रखी बिरयानी को देखता रहा, जो अब राख जैसी लग रही थी। उनके बीच की वह खामोश ज़बान, अब आवाज़ बन चुकी थी। और उस आवाज़ ने मेरे कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया था।
 
अम्मी टेबल पर वापस आईं। उनके हाथ में गुलाब जामुन का बड़ा बाउल था। उनका चेहरा ऐसा शांत था जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने बाउल टेबल पर रखा और मेरी तरफ देखे बिना अपनी कुर्सी पर बैठ गईं।
 
"ले साहिल, खा," उन्होंने बाउल मेरी तरफ सरकाते हुए कहा। उनकी आवाज़ नॉर्मल थी, लेकिन उसके पीछे की कपकपी मैं साफ़ सुन सकता था।
 
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मेरी नज़र अभी भी प्लेट पर ही टिकी थी।
 
"क्या हुआ? खा ना," उन्होंने धीरे से पूछा, सिर्फ इतना कि मैं ही सुन सकूँ।
 
उनका स्पर्श, जो हमेशा मुझे सुकून देता था, आज आग जैसा लगा।
 
"कुछ नहीं अम्मी… भूख नहीं है," मैंने रूखे से जवाब दिया।
 
टेबल पर एकदम सन्नाटा छा गया। नानी, मौसी, सब मुझे हैरानी से देखने लगे। अम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया। उनकी आँखों में दुख, घबराहट और एक अनकहा सवाल थे।
 
इससे पहले कि कोई कुछ कहता, मेहमानों के जाने का सिलसिला शुरू हो गया। विशाल और उसके साथ आए लोग भी विदा लेने के लिए उठ खड़े हुए।
 
जाते-जाते विशाल नानी के पास आदाब करने आया। फिर वह अम्मी के सामने खड़ा हुआ। "नानी जी, आपकी मेहमान-नवाजी याद रहेगी। हर चीज़... बहुत खूबसूरती से अरेंज की गई थी, बार-बार देखने का दिल करता है।" उसने आखिरी लफ़्ज़ कहते हुए एक पल के लिए अम्मी के मम्मों की तरफ देखा।
 
विशाल के लहजे में जो शातिरपन था, उसने अम्मी के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। नानी तो उसकी तारीफ सुनकर मुस्कुरा रही थीं, लेकिन अम्मी जानती थीं कि 'खूबसूरती से अरेंज' की गई चीज़ों से उसका असली मतलब क्या था। उसकी आँखें एक पल के लिए उनके पुष्ट मम्मों पर ठहरीं, जैसे वह उस नज़ारे को अपने दिमाग की गैलरी में हमेशा के लिए सेव कर रहा हो।
 
अम्मी ने घबराहट में अपना दुपट्टा और ऊपर खींचने की कोशिश की, लेकिन विशाल की वह आखिरी चुभती हुई नज़र उनके सूट के कपड़े को चीरती हुई उनके सख्त हो चुके निप्पल्स को छू गई।
 
विशाल (धीमी आवाज़ में, सिर्फ अम्मी को सुनाई दे): "जल्द मिलेंगे आयशा जी... अपनी 'यादगार' चीज़ों को सँभाल कर रखिएगा।"
 
अम्मी कुछ बोल न सकीं, उनका गला सूख चुका था। विशाल एक विजयी मुस्कान के साथ मुड़ा और महफिल से बाहर निकल गया, लेकिन वह अपने पीछे अम्मी के बदन पर अपनी हवस की एक ऐसी छाप छोड़ गया जिसे वह चाहकर भी नहीं धो सकती थीं।
 
मैं यह सब देखता रहा। मेरा खून खौल रहा था। जैसे ही विशाल मेरी तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ा, मैं बिना कुछ कहे वहाँ से उठ गया और सीधा अपने कमरे की तरफ चल दिया।
 
घर धीरे-धीरे खाली हो गया। शोर कम हो गया, लेकिन मेरे अंदर का तूफान बढ़ता जा रहा था।
 
कुछ देर बाद, दरवाज़े पर दस्तक हुई। "साहिल?" अम्मी की आवाज़ थी।
 
मैंने जवाब नहीं दिया।
 
दरवाज़ा धीरे से खुला। वह अंदर आईं और मेरे बेड के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन मैंने अपना हाथ खींच लिया।
 
"साहिल, क्या बात है बेटा?" उनकी आवाज़ में दर्द था। "तुम मुझसे इस तरह नाराज़ क्यों हो? मैंने कुछ किया क्या?"
 
मैंने आँखें खोलीं और उनके चेहरे को देखा। वह मासूमियत से भरा चेहरा... क्या यह सब एक धोखा था?
 
"मैं थक गया हूँ, अम्मी," मैंने बे-रुखी से कहा। "सोना है।"
 
उनके चेहरे पर छाई उम्मीद बुझ गई। उन्होंने एक ठंडी सांस भरी। "ठीक है," वह धीरे से बोलीं और उठकर अपने बेड की तरफ चली गईं।
 
मैं करवट लेकर उन्हें ही देखता रहा। वह अपने बेड पर बैठ गईं, उनकी पीठ मेरी तरफ थी। एक पल के लिए कमरे में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज़ थी। और फिर... एक हल्की सी 'बज़' की आवाज़ हुई।
 
अम्मी ने फोन देखा। मैं उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था, लेकिन उनके कंधों के हल्के से कांपने से मैं समझ गया कि वह मुस्कुरा रही हैं। उनकी उंगलियाँ बड़ी तेज़ी से फोन पर चैट कर रही थीं। हर 'टैप' की आवाज़ मेरे दिल पर हथौड़े की तरह लग रही थी।
 
कुछ मिनट बाद उन्होंने फोन रख दिया। "मैं ज़रा फ्रेश होकर आती हूँ," उन्होंने कहा और फोन को साइड टेबल पर चार्जिंग के लिए रख दिया।
 
वह उठ कर अटैच्ड वॉशरूम में चली गईं। यह मेरा मौका था।
 
मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, लेकिन मेरे जिस्म में एक अजीब सी फुर्ती आ गई थी। मैं बेड से उतरा और उनके फोन के पास गया। स्क्रीन अंधेरी थी। मैं जानता था कि अम्मी लॉक के लिए एक सिंपल सा पैटर्न इस्तेमाल करती हैं— L शेप का।
 
मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं जब मैंने स्क्रीन पर वही 'L' बनाया।
 
एक 'क्लिक' की आवाज़ हुई। फोन अनलॉक हो गया।
 
 
मैंने फौरन व्हाट्सएप खोला। सबसे ऊपर 'विशाल' का नाम था। मैंने चैट खोली। ऊपर उसकी डिस्प्ले पिक्चर थी और नीचे मैसेजेस का सिलसिला था।
 
विशाल: हाय आयशा जी। कैसी हो?  
आयशा: हेलो। ठीक हूँ।  
विशाल: ऐसे ही बैठा था, तो सोचा, आपको याद कर लूँ।  
आयशा: ओह्ह...  
विशाल: और बताओ। क्या कर रही हो अभी…?  
आयशा: कुछ नहीं। मैं भी बस बैठी हूँ...  
विशाल: नाइस... एक बात कहूँ...? आप बुरा तो नहीं मानोगी?  
आयशा: बताओ क्या बात है…  
विशाल: हल्दी में आप बहुत कमाल लग रही थीं, आयशा जी… दुल्हन से ज़्यादा तो आप ब्यूटीफुल लग रही थीं…  
आयशा: बस बस हाँ... झूठी तारीफें नहीं...  
विशाल: सच बोल रहा हूँ… माँ कसम...  
आयशा: ओववव... थैंक्स...  
 विशाल: अरे... थैंक्स किस लिए?....  
आयशा: सच बोलने के लिए...  
 विशाल: मुझे आपका थैंक्स बोलना चाहिए...  
आयशा: किस बात का?  
विशाल: मेरी बात मानने के लिए। कसम से, आपके मम्मों को ऐसा देखकर कलेजा मुँह को आ गया।  
विशाल: आपकी पिक्स और वीडियो बहुत अच्छी आई हैं… आपको बाद में दिखाऊँगा… एक एल्बम बनाऊँगा…  
विशाल: क्या हुआ? आप मेरी बात का जवाब नहीं दे रही हैं। यकीन नहीं होता तो पिक्स भेजूँ, या उसे वेडिंग व्हाट्सएप ग्रुप में सेंड करूँ?  
आयशा: नहीं...  
विशाल: अरे... आप क्यों शरमा रही हैं? आप मेरी फेवरेट हो...  
आयशा: बस बस... विशाल जी...  
विशाल: सच बोल रहा हूँ… पता है हल्दी के वक्त जब आपका दुपट्टा नीचे फिसल गया था... मेरी सांस ही अटक गई थी... वह नज़ारा पूरी ज़िंदगी याद रहेगा मुझे...  
विशाल: आपकी क्लीवेज पर जो काला तिल था... उसे देखकर मेरा दिल इतना ज़ोर से धड़क रहा था... मानो कहीं फट ना जाए... और ऊपर से आपके वे दो गुलाबी नुकीले... ऐसा लग रहा था वे मेरे इंतज़ार में खड़े थे…  
विशाल: मेरी गर्लफ्रेंड रिस्पॉन्स नहीं कर रही, क्या शरमा गई? आपको याद है ना हमारा वादा?  
आयशा: ओह्ह... इतना गौर से कौन देखता है?....  
विशाल: जो चीज़ होश उड़ा दे, उसे गौर से ही देखा जाता है।  
आयशा: बदतमीज़।  
विशाल: तमीज़ से ही तो कह रहा हूँ। उस पीले रंग में आप... आग लग रही थीं। बिल्कुल। हाथों पर हल्दी... और आँखों में वह चमक...  
विशाल: तो... शाम को क्या कर रही हो?  
आयशा: प्री-वेडिंग पार्टी मान लो। बहुत सारे गेस्ट्स... रिलेटिव्स... दावत... फन...  
विशाल: कूल... और आप क्या पहनोगी?....  
आयशा: एक बहुत सुंदर डिज़ाइनर मरून और गोल्ड सलवार-सूट है।  
विशाल: मरून... नहीं। ब्लैक पहनो  और उसके नीचे लाल अंडरगारमेंट्स |
आयशा: ब्लैक? शादी के फंक्शन में? लोग क्या कहेंगे?  
 विशाल: लोग तो कहते रहेंगे। लेकिन ब्लैक में... आप जो लगोगी... सोच कर ही...  
 आयशा: सोचकर क्या?  
विशाल: सोच कर ही गर्मी बढ़ रही है। ब्लैक आपके गोरे जिस्म पर अलग ही चमकेगा।  
आयशा: तुम्हारी बातें ना...  
विशाल: प्लीज आयशा जी, मेरी बात मान लो... और दो-तीन पिक भी शेयर कर दीजिएगा…  
विशाल: उसमें काला तिल और गुलाबी टिप्स वाली ज़रूर हों…  
आयशा: देखती हूँ।  
विशाल: 'देखती हूँ' नहीं... 'भेजूँगी' कहो।  
आयशा: ज़िद्दी हो।  
विशाल: सिर्फ आपके लिए। इंतज़ार करूँगा, आयशा।  
आयशा: चलो... बहुत काम है... गुड आफ्टरनून।  
 
मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। हाथ अब भी कांप रहे थे, लेकिन अब सिर्फ घबराहट से नहीं... गुस्से और एक अजीब सी घिन से। हर लफ़्ज़, हर इमोजी... "ब्लैक पहनो और उसके नीचे लाल अंडरगारमेंट्स"... "तिल है"...ऊपर से आपके वे दो गुलाबी नुकीले... "दुपट्टा"... मेरे कानों में हथौड़ों की आवाज़ बज रही थी।
 
ऊपर पुरानी चैट के मैसेजेस भी थे। मैं उन्हें पढ़ने ही वाला था कि बाथरूम से आवाज़ आई। मैंने जल्दी से फोन को वापस चार्जिंग पर लगाया और स्क्रीन को लॉक करके अंधेरा कर दिया—बिल्कुल वैसा ही, जैसा उन्होंने छोड़ा था।
 
मैं तेज़ी से पलटकर अपने बिस्तर पर लेट गया और चादर को अपने ऊपर खींच लिया, पीठ उनकी तरफ करके। आँखें ज़ोर से बंद कर लीं, जैसे मैं सोया हुआ था, जैसे मैंने कुछ नहीं देखा। पर अब नींद और सुकून मेरी ज़िंदगी से कोसों दूर जा चुके थे।
 
तभी... शॉवर की आवाज़ बंद हो गई। एकदम खामोशी छा गई। कुछ पल बाद वॉशरूम के दरवाज़े के खुलने की 'क्लिक'  की आवाज़ आई। मैं सांस रोके लेटा रहा। मुझे उनके कदमों की नर्म आवाज़ आई। फिर कमरे में उनके परफ्यूम, साबुन और शैम्पू की मिली-जुली महक फैल गई। वही महक जो बचपन से मुझे दुनिया की सबसे महफूज़ जगह लगती थी। आज... आज उस महक में मुझे धोखे की एक अजीब सी चुभन महसूस हो रही थी।
 
 
बाथरूम के बंद दरवाजे के पीछे, आयशा आईने के सामने खड़ी खुद को निहार रही थीं। बाहर शादी का शोर था, लेकिन उनके दिमाग में विशाल के उन मैसेजेस का शोर उससे कहीं ज्यादा तेज था।
 
"कितना शातिर है वह... जब मैंने उसके मैसेज का फौरन जवाब नहीं दिया, तो उसने अपनी असली औकात दिखा दी। 'यकीन नहीं होता तो पिक्स भेजूँ, या उसे वेडिंग व्हाट्सएप ग्रुप में सेंड करूँ?'—यह धमकी नहीं, सीधा खंजर था जो उसने मेरी इज़्ज़त पर चलाया है।"
 
आयशा का हाथ अनजाने में उनके पुष्ट मम्मों पर चला गया, जिन्हें वह दुपट्टे से छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।
 
"वह दरिंदा महफिल में सबके सामने मेरे जिस्म की नुमाइश कराता रहा और मैं एक कठपुतली की तरह झुककर उसे नज़ारे देती रही। और अब वह उन वीडियो और तस्वीरों का इस्तेमाल मुझे पूरी तरह अपना गुलाम बनाने के लिए कर रहा है। वह मुझे याद दिला रहा है कि मैं अब सिर्फ एक माँ या बीवी नहीं हूँ, बल्कि उसकी वह 'गर्लफ्रेंड' हूँ जिसे वह जब चाहे बेपर्दा कर सकता है।"
 
उन्होंने कांपते हाथों से अपने चेहरे पर पानी के छींटे मारे, पर विशाल की बातें किसी उनके ज़हन से नहीं उतर रही थीं।
 
आईने में अपनी अक्स को देखते हुए उनके मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ:
 
आयशा ने धीरे से अपने कुर्ते का गला थोड़ा नीचे किया और उस काले तिल को देखा जिसे विशाल 'क्लीवेज' की गहराई में ढूंढ चुका था। उनका चेहरा शर्म से तमतमा उठा।
 
"बदतमीज़... कितनी गहराई से उसने मेरे बदन को टटोला है। 'गुलाबी नुकीले'... या अल्लाह, उसने उन हिस्सों का नाम लिया जिन्हें एक औरत अपने शौहर के अलावा किसी को नहीं दिखाती।
 
"काला रंग... वह जानता है कि काले लिबास में मेरा गोरा जिस्म और भी निखरेगा। वह चाहता है कि मैं शाम को उसके लिए एक तोहफे की तरह सजकर जाऊँ। क्या मुझमें इतनी भी हिम्मत नहीं कि मैं उसे मना कर दूँ? क्या मैं सच में उसकी जागीर बनती जा रही हूँ?"
 
आयशा के दिमाग में विशाल की वह आखिरी शर्त किसी बिजली की तरह कौंध गई। उसने न सिर्फ काला सूट पहनने को कहा था, बल्कि एक ऐसी मांग भी रख दी थी जिसने आयशा के तन-बदन में आग लगा दी थी।
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



Like Reply


Messages In This Thread
RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 23-05-2026, 07:11 PM



Users browsing this thread: 8 Guest(s)