23-05-2026, 11:53 AM
मैंने जैसे-तैसे गेट खोला।
नेहा खिलखिला रही थी।
नशे में थोड़ा झूल भी रही थी।
उसकी चाल लड़खड़ाती हुई थी, लेकिन वो मुस्कुरा रही थी — वो मुस्कान जो कह रही थी कि आज उसने कुछ बहुत बड़ा कर दिखाया है।
ये सब असली था या गुप्ता जी को दिखाने के लिए एक्टिंग... ये तो रूम में जाने के बाद पता चलेगा।
हम रूम में पहुँचे।
नेहा सीधे हल्के-हल्के झूमते कदमों से किचन में चली गई।
टॉप शेल्फ खोली — जहाँ हम दारू रखते थे।
उसे और दारू चाहिए थी।
मैं सोच रहा था कि आज वो लिमिट से काफी ऊपर निकल चुकी है।
मैंने अपनी बीवी को इतनी दारू की प्यास पहले कभी नहीं देखी थी।
शायद आज जो हुआ... वो पहले कभी नहीं हुआ था।
गोवा में जो हुआ था वो अचानक था, unplanned था।
मगर आज... आज सब कुछ deliberate लग रहा था।
जैसे नेहा ने खुद को पूरी तरह खोल दिया हो।
वो शेल्फ से व्हिस्की की बोतल निकाल रही थी।
उसके बाल बिखरे हुए थे, ड्रेस अभी भी थोड़ी अस्त-व्यस्त थी, और चेहरे पर वो नशा था जो अब और गहरा हो रहा था।
फिर उसने एक बोतल निकाली।
मुझे दूर से नहीं पता चला कौन सी थी।
उसने ग्लास में डाली।
मैंने थोड़ा concern दिखाते हुए कहा,
“आराम से...
तुमने आज बहुत पी ली है...
तुम चाहो तो अवॉइड कर सकते हो।”
वहाँ से तेज़ी से उसकी आवाज़ आई,
“चुप भेनचोद... मुझे मत सिखा!”
नेहा ने घूरकर मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में नशा था, लेकिन साथ में गुस्सा और एक अजीब सी आज़ादी भी थी।
वो ग्लास में और डाल रही थी।
मैं चुप हो गया।
कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई।
नेहा मेरी तरफ मुड़ी।
उसके हाथ में ग्लास था — आधा व्हिस्की से भरा, नीट।
उसने एक घूँट लिया।
चेहरा अजीब सा बन गया — वो नीट नहीं पीती थी, इसलिए स्वाद से मुँह बिगड़ गया।
फिर उसका दूसरा हाथ सीधे अपनी पैंटी पर गया।
धीरे-धीरे उसे नीचे खींचने लगी।
पैंटी जाँघों तक सरक गई।
नेहा ने मुझे घूरते हुए, नशे वाली भरी हुई आवाज़ में कहा,
“कपड़े उतार नुन्नू...”
उसे बार-बार “नुन्नू” कहने में मजा आ रहा था।
हर बार वो शब्द बोलते हुए उसकी आँखों में शरारत चमक जाती।
वो अब सिर्फ ऊपर वाली ड्रेस में खड़ी थी।
नीचे कुछ नहीं।
जाँघें नंगी, चूत अभी भी थोड़ी गीली और सूजी हुई दिख रही थी।
नेहा ने एक और घूँट लिया और बोली,
“क्या हुआ? जल्दी उतार...
उसकी आवाज़ में अब नशा, घमंड और एक ज़बरदस्त भूख थी।
मैं चुपचाप उसे देख रहा था।
मेरा लंड पहले से ही सख्त हो चुका था।
नेहा मेरे ऊपर चढ़ी, लेकिन लंड पर नहीं बैठी।
धीरे-धीरे वो आगे बढ़ती गई और अपने दोनों घुटनों को मेरे कानों के दोनों तरफ रखकर मेरे चेहरे के ठीक ऊपर आ गई।
अब उसकी नंगी चूत मेरे मुँह के बिल्कुल ऊपर थी।
बहुत करीब।
उसकी गर्मी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
मैंने ऊपर देखा।
नेहा दोनों हाथों से सोफे के बैकरेस्ट को पकड़े हुए थी।
उसके बाल आगे को झूल रहे थे, नशे वाली आँखें नीचे मेरी तरफ देख रही थीं।
उसकी चूत थोड़ी सूजी हुई थी और अभी भी थोड़ी गीली दिख रही थी।
नेहा ने धीमी, भारी आवाज़ में कहा,
“चाट...”
मैंने जैसे ही जीभ निकाली, नेहा ने अपने कूल्हे नीचे कर दिए।
अब उसकी पूरी चूत मेरे मुँह पर बैठ गई थी।
उसने हल्का सा कराहते हुए कहा,
“हाँ... इसी तरह...
ज़ोर से चूस।”
मैंने सच में इसकी उम्मीद नहीं की थी।
मेरा लंड बहुत ज़ोर से फड़क रहा था, मुझे भी सेक्स की बहुत ज़रूरत थी। मगर नेहा ने मुझे चूसने या चोदने का एक भी मौका नहीं दिया।
वो सीधे मेरे चेहरे पर बैठ गई।
एक हाथ में व्हिस्की का गिलास था, दूसरा हाथ उसने मेरे बालों में पकड़ रखा था।
वो हल्का-हल्का बाल खींच रही थी — इतना कि दर्द हो, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं।
नेहा ने मेरी तरफ नीचे देखा और भारी, नशे वाली आवाज़ में कहा,
“चाट...
तुम आज मुझे चाटो। अच्छे से चाटो।”
फिर उसने अपने कूल्हे और नीचे किए और अपनी पूरी गीली चूत मेरे मुँह पर दबा दी।
मेरी नाक और मुँह दोनों उसके अंदर दब गए।
उसकी चूत का गर्म, थोड़ा नमकीन स्वाद मेरी ज़ुबान पर फैल गया।
नेहा ने बाल खींचते हुए धीरे-धीरे अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी।
“हाँ... यही... ज़ोर से चूस...
आज पूरा दिन किसी और ने मुझे छुआ...
अब तू मुझे चाट...”
उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं।
वो हर हिलने के साथ और ज़ोर से मेरे मुँह पर दबा रही थी।
मेरा लंड अभी भी खड़ा था और हवा में फड़क रहा था, लेकिन नेहा उसे छूने का नाम भी नहीं ले रही थी।
वो बस मेरे चेहरे पर सवार थी और मुझे चाटने पर मजबूर कर रही थी।
मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को पकड़ लिया और धीरे-धीरे हिलाने लगा।
नेहा मेरे चेहरे पर बैठी हुई थी और अपनी चूत को मेरे पूरे मुँह पर रगड़ रही थी।
उसकी चूत से रस टपक रहा था — मेरा पूरा चेहरा, नाक, होंठ, ठोड़ी सब उससे गीला हो चुका था।
वो नशे में ऊपर से मुझे देख रही थी और बीच-बीच में गंदी-गंदी बातें कर रही थी।
“जीभ निकाल...
ज़ोर से निकाल बहनचोद...
अंदर डाल अपनी जीभ... हाँ... इसी तरह...”
कभी वो कहती, “चाट... पूरी चूत चाट...
ज़ोर से चूस मेरी चूत को...”
उसकी कमर तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
मेरा पूरा चेहरा उसकी चूत के रस में नहा चुका था।
नेहा ने एक हाथ से मेरे बाल और ज़ोर से खींचे और बोली,
“और तेज़...
चूस मेरी चूत को...
फिर अचानक एक पल को नेहा रुक गई।
वो थोड़ा सा खिसक कर मेरे सीने पर बैठ गई। उसकी चूत अब मेरी छाती पर थी। मेरे चेहरे पर उसका पूरा रस लगा हुआ था — होंठ, नाक, गाल सब गीले थे।
नेहा ने मेरी तरफ झुककर कुछ पल तक सिर्फ मुझे देखा। उसकी आँखों में नशा था, लेकिन साथ में एक अजीब सी तीखी चमक भी थी।
फिर उसने बहुत धीरे, लेकिन साफ़-साफ़ कहा,
“तुझे शर्म नहीं आई? हाँ... उसका लंड तूने अपने हाथों में लेकर हिलाया... और अब मेरे ऊपर चढ़ा दिया। तुझे एक पल भी शर्म नहीं आई... क्यों?”
उसकी आवाज़ में नशा तो था, लेकिन उसमें एक अलग तरह का गुस्सा और तीखापन भी था।
नेहा मेरी छाती पर बैठी हुई थी, मेरे चेहरे को घूर रही थी। उसके बाल मेरे चेहरे पर गिर रहे थे।
वो एक पल चुप रही, फिर फिर से बोली — इस बार और धीमी आवाज़ में, लेकिन और ज़्यादा कड़वी,
“बोल ना... क्यों नहीं शर्म आई तुझे?”
उसकी आँखें अब मेरी आँखों में गड़ी हुई थीं। जवाब का इंतज़ार कर रही थी।
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
बस उसे देखता रह गया।
बोल ना...
क्यों किया तूने ऐसा?
क्यों मुझे उस अनजान के सामने खोल दिया?
क्यों तू देखता रहा जब वो मेरी चूत में उँगलियाँ डाल रहा था?”
उसका गुस्सा अब साफ़ दिख रहा था। नशा था, लेकिन ये सिर्फ़ नशा नहीं था। ये वो गुस्सा था जो अंदर कहीं बहुत गहरे से निकल रहा था।
मैं चुप रहा। मेरे पास कोई तैयार जवाब नहीं था।
नेहा ने मेरे बालों को और ज़ोर से खींचा।
“तुझे शर्म नहीं आती? एक अनजान आदमी के साथ तूने आज मुझे बाँट दिया... और तेरा लंड खड़ा था! मुझे अच्छे से याद है!”
उसकी आँखों में आँसू थे। नशा, गुस्सा, ठेस — सब मिला हुआ था।
“हमने कितनी बार ये खेल खेला है... मैंने तुझे कितनी बार थप्पड़ मारे हैं... तुझे ‘नन्नू’ कहा है, ‘चूतिया’ कहा है... लेकिन आज... आज कुछ अलग था। आज मैं खेल नहीं खेल रही थी सैम। मैं सही में जानना चाहती हूँ... क्यों तूने मुझे उस आदमी के साथ
शेयर किया?
उसकी आवाज़ अब काँप रही थी।
“बोल... तुझे मजा आ रहा था? देखने में? अपनी बीवी को किसी और के हाथों में देखने में?”
मैंने आँखें नीचे कर लीं। मेरा गला सूख रहा था।
नेहा ने मेरे गाल पर एक और थप्पड़ मारा — इस बार और तेज़।
“देख मेरी तरफ! मुझे जवाब चाहिए... आज... अभी।”
उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं। उसकी चूत अभी भी मेरी छाती पर गीली और गर्म थी।
मैंने बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में कहा,
“...हाँ। मुझे मजा आ रहा था। देखने में। तुझे... दूसरे के साथ देखने में।”
नेहा ने मेरी आँखों में गहरी नज़र डाली। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं।
“तो तू सच में... चाहता है ना? कि मैं किसी और से चुदूँ?”
नेहा ने अपना हाथ अपनी कमर के पीछे ले जाकर मेरे लंड को कस के पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन जकड़ बहुत मज़बूत थी।
“देखा... ये नूनू अभी भी बहुत टाइट है,” उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा। “तुझे मज़ा आ रहा था ना? बहुत मज़ा आ रहा था... जब वो मेरा मुँह चूस रहा था... जब उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में घुस रही थीं... तब भी तेरा लंड खड़ा था।”
उसकी आवाज़ में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के साथ एक गहरी उत्तेजना भी थी। वो मेरे लंड को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी। हर बार जब वो नीचे जाती, तो अपनी हथेली से मेरे अंडकोश को दबा देती।
मैं कराह उठा।
मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं।
“बोल...
तुझे सच में मज़ा आ रहा था?
अपनी बीवी को किसी और के हाथों में देखकर?
जब वो मेरे निप्पल चूस रहा था... तब भी?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस मेरी साँसें तेज़ हो गईं।
नेहा ने मेरे लंड को और ज़ोर से पकड़ा और तेज़ी से हिलाने लगी।
“चूतिया...
तू मेरा पति है... और तू मुझे किसी और के लिए खोल रहा था।
और तेरा छोटा लंड खड़ा हो गया था।”
नेहा को देखकर मैं समझ गया था कि अब वो कुछ नहीं सुनने वाली। वो मेरे जवाब का इंतज़ार भी नहीं कर रही थी। वो सिर्फ़ नशे में बड़बड़ा रही थी और शायद मेरा खड़ा लंड देखकर उसको और गुस्सा आ गया था।
मैं बस चुपचाप रहा।
उसके बाद उसने वापस से वो मेरे ऊपर चढ़ गई। इस बार और भी कस के वो मेरे चेहरे के ऊपर चढ़ चुकी थी। अपनी चूत पूरी रगड़ने लगी मेरे पूरे चेहरे पर। अपनी कमर हिला-हिला के जैसे कोई गोते खा रहा हो, वैसे वो रगड़ना चालू कर रही थी।
मैं जीभ निकाल के बस उसे चाट रहा था। वो अपनी कमर हिला रही थी। धीरे-धीरे मुझे लग रहा था कि उसकी जाँघें काँप रही हैं। मुझे लग रहा था कि वो ऑर्गेज़्म होने वाला है।
फिर थोड़ी देर बाद उसने ज़ोर से चिल्लाया।
“येस... येस... येस बेबी... येस... येस... येस्स्स्स... आआआह्ह्ह...”
उसने मेरे बालों को कस कर पकड़ा। एक हाथ में व्हिस्की का ग्लास अभी भी था। और वो झड़ गई मेरे मुँह के ऊपर।
बहुत सा गहरा, गर्म पानी मेरे पूरे चेहरे पर, मेरी आँखों में, मेरे नाक में, मेरे मुँह के अंदर बहने लगा। मैं चाटता रहा — उसका पूरा रस पीता रहा। उसकी जाँघें मेरे सिर को दबाए हुए थीं। वो जोर-जोर से काँप रही थी।
“आह्ह्ह... फक... येस...”
उसकी आह बहुत ज़ोर से निकली। मुझे लगा कि शायद बाहर कोई सुन लेगा।
नेहा कुछ सेकंड तक मेरे चेहरे पर ही बैठी रही। उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसका पूरा शरीर थर-थर कर रहा था।
फिर उसने धीरे से मेरे बाल छोड़े। उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें नशीली, लाल और पूरी तरह संतुष्ट थीं।
“तुम... अच्छे हो... चूत चाटने में...”
उसने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा, अपना रस फैलाते हुए।
जब नेहा मेरे मुँह पर झड़ रही थी, उसकी जाँघें मेरे सिर को कसकर दबाए हुए थीं, तब मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को पकड़ लिया।
मेरा लंड पहले से ही बहुत टाइट और गीला था। मैंने तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया।
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरा पूरा शरीर तन गया।
“आआह्ह...”
मैं भी झड़ गया। मेरे लंड से मोटी-मोटी धारें निकलीं और मेरे पेट पर गिरने लगीं।
थोड़ी देर मैंने नेहा के चेहरे को देखा। वो लाल हो चुका था। उसकी नाक एकदम लाल, बहुत ही सुंदर लग रही थी। उसका पूरा गोरा, दूध सा सफेद चेहरा — उसपर हल्का-हल्का लालपन और नशीली आँखें।
उसने मेरी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे सोफे से उतरने का फैसला किया। व्हिस्की का ग्लास आधा भरा हुआ था, शायद दो-तीन घूँट ही पिए थे। वो लड़खड़ाते हुए टेबल पर ग्लास रखा। मेरी तरफ देखा भी नहीं।
धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से वो बेडरूम की तरफ चली गई। मुझे एक धम-सी आवाज़ आई। मुझे लगा कहीं गिर न गई हो।
मैं तुरंत उठा और बेडरूम में गया। नेहा बेड पर लेटी हुई थी। पूरी तरह कपड़े पहने, लेकिन स्कर्ट ऊपर चढ़ी हुई, टॉप का एक स्ट्रैप कंधे से नीचे सरका हुआ। उसकी साँसें भारी और धीमी थीं।
वो सही में सो गई थी।
नशे की वजह से... और आज पूरे दिन जो कुछ हुआ — उसकी वजह से भी। वो थक चुकी थी।
मैंने कुछ देर उसे देखा। उसका चेहरा अभी भी लाल था। गले पर हल्के निशान थे। मैंने चादर खींचकर उसे ढक दिया।
फिर मैं हॉल में वापस आया। टेबल पर आधी भरी व्हिस्की का ग्लास रखा था। मैं सोफे पर बैठ गया और उसे खत्म करने लगा।
मेरा दिमाग बहुत कुछ सोच रहा था। आज जो हुआ... वो सब। रेस्टोरेंट में, गाड़ी में, और अब... गुप्ता जी ने नेहा को कितनी बार देखा होगा? कितनी बार उसकी नंगी छाती देखी होगी?
मुझे अजीब सा डर लग रहा था। कहीं बाहर कोई खड़ा तो नहीं था? कहीं गुप्ता जी ने कुछ सुन तो नहीं लिया?
मैंने ग्लास खत्म किया। शरीर थका हुआ था, लेकिन दिमाग जाग रहा था। नेहा के चेहरे पर वो आखिरी आह... उसके शरीर का काँपना... और उस आदमी का हाथ उसकी चूत पर...
मैं सोफे पर लेटा हुआ था। एक पैर सोफे पर, दूसरा लटका हुआ। बीच में मेरा लंड मुरझाया पड़ा था। मुँह में अभी भी मेरी बीवी का स्वाद था — नमकीन, गाढ़ा, थोड़ा शराबी।
दिन भर की तस्वीरें आँखें बंद करते ही घूमने लगीं। रेस्टोरेंट... गाड़ी... उस आदमी के हाथ... नेहा की आहें... सब कुछ इतना ताज़ा था कि नींद भी कच्ची ही आई।
मुझे सपना आया।
सपने में भी वही आदमी था। पतली-दुबली बॉडी, लेकिन नेहा को उसने आसानी से उठा रखा था — उल्टा। नेहा की पीठ उसके सीने से सटी हुई। उसने नेहा की जाँघों को पकड़कर खोल रखा था। नेहा की चूत बिल्कुल सामने। और उसके ठीक सामने उसका बेटा —
घुटनों पर बैठा, अपना मुँह नेहा की चूत में दबाए हुए चाट रहा था।
आदमी हँस रहा था। “चाटें साहब की... अच्छे से चाटो...”
मैं वहाँ खड़ा था। अकेला नहीं। गुप्ता जी भी मेरे बगल में खड़े थे। दोनों देख रहे थे।
मेरा लंड खड़ा था। मुझे लगा कोई उसे चाट रहा है। मैंने नीचे देखा — उस आदमी की बीवी मेरे सामने घुटनों पर बैठी, मेरे लंड को चूस रही थी।
मैं हड़बड़ा कर जाग गया।
साँसें तेज़ थीं।
मैंने महसूस किया कि मेरे लंड पर वो नरमी अच्छे से महसूस हो रही थी।
नीचे देखा तो सच में कोई लंड चाट रहा था।
मेरी बीवी।
सुबह के 9 बज रहे थे।
मुझे पता ही नहीं चला कि इतना समय हो गया।
नेहा ज़मीन पर घुटनों के बल बैठी हुई थी।
वो अपनी जीभ से मेरे अंडकोश को चाट रही थी — धीरे-धीरे, प्यार से, लेकिन गहराई से।
जैसे कोई प्यासी औरत पानी पी रही हो।
मैंने देखा तो उसने हल्की सी मुस्कान दी।
आँख मारी।
फिर बिना कुछ कहे अपने काम पर लग गई।
वो खुश लग रही थी।
शायद उसे रात याद आ गई होगी — वो सब जो उसने नशे में मेरे साथ किया था।
अब वो शिद्दत से मुझे ब्लोजॉब दे रही थी।
बिना हाथ इस्तेमाल किए।
मुँह में पूरा ले कर।
उसका चेहरा मेरे लंड पर ऊपर-नीचे जाते हुए बहुत खूबसूरत लग रहा था।
उसकी आँखें कभी-कभी ऊपर उठकर मेरी आँखों से मिल जातीं।
जैसे कह रही हो — “ये सब तुम्हारे लिए है... और मेरे लिए भी।”
मेरा लंड उसके गले तक जा रहा था।
वो गला भर-भर के चूस रही थी।
कभी-कभी उसकी जीभ मेरे टॉपे पर घूम जाती, कभी गहरी तक चली जाती।
उसके मुँह से निकलती गीली-गीली आवाज़ें कमरे में भर रही थीं।
मैंने अपना हाथ उसके बालों में डाला।
धीरे से सहलाया।
नेहा ने अपना काम बखूबी किया।
बिना रुके, बिना थके, पूरी शिद्दत से।
जब तक मैं कुछ नहीं बोला, जब तक मैं झड़ा नहीं — वो लगातार चूसती रही।
उसके मुँह की गर्मी, जीभ की नरमी, और गले की गहराई... सब कुछ एक साथ।
जब मैं झड़ा, तो वो मेरे लंड को मुँह में ही रखे रही।
मेरा सारा पानी उसने निगल लिया — आखिरी बूँद तक।
फिर उसने धीरे से मुँह उठाया।
उसके होंठ चमक रहे थे।
उसके चेहरे पर एक अलग तरह की ख़ुशी थी।
मगर जो पछतावा मैं देखना चाहता था — रात का वो पछतावा — वो उसके चेहरे पर बिल्कुल नहीं था।
नेहा मेरी तरफ बढ़ी।
मुझे एक लंबा, गहरा किस किया।
उसके मुँह में अभी भी मेरा स्वाद था।
“सॉरी बेबी...” उसने मेरे होंठों से हटते हुए धीरे से कहा,
“मैंने रात में कुछ किया तो नहीं... मैं बहुत नशे में थी...”
क्या वो सब भूल चुकी थी?
या नाटक कर रही थी?
मैं कुछ नहीं बोला।
बस उसे देखता रहा।
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“पता है आज सुबह क्या हुआ?”
मेरे दिमाग में कई बातें एक साथ घूम गईं —
उस पतले आदमी की उँगलियाँ...
गुप्ता जी की नज़र...
रात की वो सारी घटनाएँ...
मैंने जवाब नहीं दिया।
नेहा ने लैपटॉप की तरफ इशारा करते हुए कहा,
“अयान का मैसेज आया है।”
नेहा खिलखिला रही थी।
नशे में थोड़ा झूल भी रही थी।
उसकी चाल लड़खड़ाती हुई थी, लेकिन वो मुस्कुरा रही थी — वो मुस्कान जो कह रही थी कि आज उसने कुछ बहुत बड़ा कर दिखाया है।
ये सब असली था या गुप्ता जी को दिखाने के लिए एक्टिंग... ये तो रूम में जाने के बाद पता चलेगा।
हम रूम में पहुँचे।
नेहा सीधे हल्के-हल्के झूमते कदमों से किचन में चली गई।
टॉप शेल्फ खोली — जहाँ हम दारू रखते थे।
उसे और दारू चाहिए थी।
मैं सोच रहा था कि आज वो लिमिट से काफी ऊपर निकल चुकी है।
मैंने अपनी बीवी को इतनी दारू की प्यास पहले कभी नहीं देखी थी।
शायद आज जो हुआ... वो पहले कभी नहीं हुआ था।
गोवा में जो हुआ था वो अचानक था, unplanned था।
मगर आज... आज सब कुछ deliberate लग रहा था।
जैसे नेहा ने खुद को पूरी तरह खोल दिया हो।
वो शेल्फ से व्हिस्की की बोतल निकाल रही थी।
उसके बाल बिखरे हुए थे, ड्रेस अभी भी थोड़ी अस्त-व्यस्त थी, और चेहरे पर वो नशा था जो अब और गहरा हो रहा था।
फिर उसने एक बोतल निकाली।
मुझे दूर से नहीं पता चला कौन सी थी।
उसने ग्लास में डाली।
मैंने थोड़ा concern दिखाते हुए कहा,
“आराम से...
तुमने आज बहुत पी ली है...
तुम चाहो तो अवॉइड कर सकते हो।”
वहाँ से तेज़ी से उसकी आवाज़ आई,
“चुप भेनचोद... मुझे मत सिखा!”
नेहा ने घूरकर मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में नशा था, लेकिन साथ में गुस्सा और एक अजीब सी आज़ादी भी थी।
वो ग्लास में और डाल रही थी।
मैं चुप हो गया।
कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई।
नेहा मेरी तरफ मुड़ी।
उसके हाथ में ग्लास था — आधा व्हिस्की से भरा, नीट।
उसने एक घूँट लिया।
चेहरा अजीब सा बन गया — वो नीट नहीं पीती थी, इसलिए स्वाद से मुँह बिगड़ गया।
फिर उसका दूसरा हाथ सीधे अपनी पैंटी पर गया।
धीरे-धीरे उसे नीचे खींचने लगी।
पैंटी जाँघों तक सरक गई।
नेहा ने मुझे घूरते हुए, नशे वाली भरी हुई आवाज़ में कहा,
“कपड़े उतार नुन्नू...”
उसे बार-बार “नुन्नू” कहने में मजा आ रहा था।
हर बार वो शब्द बोलते हुए उसकी आँखों में शरारत चमक जाती।
वो अब सिर्फ ऊपर वाली ड्रेस में खड़ी थी।
नीचे कुछ नहीं।
जाँघें नंगी, चूत अभी भी थोड़ी गीली और सूजी हुई दिख रही थी।
नेहा ने एक और घूँट लिया और बोली,
“क्या हुआ? जल्दी उतार...
उसकी आवाज़ में अब नशा, घमंड और एक ज़बरदस्त भूख थी।
मैं चुपचाप उसे देख रहा था।
मेरा लंड पहले से ही सख्त हो चुका था।
नेहा मेरे ऊपर चढ़ी, लेकिन लंड पर नहीं बैठी।
धीरे-धीरे वो आगे बढ़ती गई और अपने दोनों घुटनों को मेरे कानों के दोनों तरफ रखकर मेरे चेहरे के ठीक ऊपर आ गई।
अब उसकी नंगी चूत मेरे मुँह के बिल्कुल ऊपर थी।
बहुत करीब।
उसकी गर्मी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
मैंने ऊपर देखा।
नेहा दोनों हाथों से सोफे के बैकरेस्ट को पकड़े हुए थी।
उसके बाल आगे को झूल रहे थे, नशे वाली आँखें नीचे मेरी तरफ देख रही थीं।
उसकी चूत थोड़ी सूजी हुई थी और अभी भी थोड़ी गीली दिख रही थी।
नेहा ने धीमी, भारी आवाज़ में कहा,
“चाट...”
मैंने जैसे ही जीभ निकाली, नेहा ने अपने कूल्हे नीचे कर दिए।
अब उसकी पूरी चूत मेरे मुँह पर बैठ गई थी।
उसने हल्का सा कराहते हुए कहा,
“हाँ... इसी तरह...
ज़ोर से चूस।”
मैंने सच में इसकी उम्मीद नहीं की थी।
मेरा लंड बहुत ज़ोर से फड़क रहा था, मुझे भी सेक्स की बहुत ज़रूरत थी। मगर नेहा ने मुझे चूसने या चोदने का एक भी मौका नहीं दिया।
वो सीधे मेरे चेहरे पर बैठ गई।
एक हाथ में व्हिस्की का गिलास था, दूसरा हाथ उसने मेरे बालों में पकड़ रखा था।
वो हल्का-हल्का बाल खींच रही थी — इतना कि दर्द हो, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं।
नेहा ने मेरी तरफ नीचे देखा और भारी, नशे वाली आवाज़ में कहा,
“चाट...
तुम आज मुझे चाटो। अच्छे से चाटो।”
फिर उसने अपने कूल्हे और नीचे किए और अपनी पूरी गीली चूत मेरे मुँह पर दबा दी।
मेरी नाक और मुँह दोनों उसके अंदर दब गए।
उसकी चूत का गर्म, थोड़ा नमकीन स्वाद मेरी ज़ुबान पर फैल गया।
नेहा ने बाल खींचते हुए धीरे-धीरे अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी।
“हाँ... यही... ज़ोर से चूस...
आज पूरा दिन किसी और ने मुझे छुआ...
अब तू मुझे चाट...”
उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं।
वो हर हिलने के साथ और ज़ोर से मेरे मुँह पर दबा रही थी।
मेरा लंड अभी भी खड़ा था और हवा में फड़क रहा था, लेकिन नेहा उसे छूने का नाम भी नहीं ले रही थी।
वो बस मेरे चेहरे पर सवार थी और मुझे चाटने पर मजबूर कर रही थी।
मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को पकड़ लिया और धीरे-धीरे हिलाने लगा।
नेहा मेरे चेहरे पर बैठी हुई थी और अपनी चूत को मेरे पूरे मुँह पर रगड़ रही थी।
उसकी चूत से रस टपक रहा था — मेरा पूरा चेहरा, नाक, होंठ, ठोड़ी सब उससे गीला हो चुका था।
वो नशे में ऊपर से मुझे देख रही थी और बीच-बीच में गंदी-गंदी बातें कर रही थी।
“जीभ निकाल...
ज़ोर से निकाल बहनचोद...
अंदर डाल अपनी जीभ... हाँ... इसी तरह...”
कभी वो कहती, “चाट... पूरी चूत चाट...
ज़ोर से चूस मेरी चूत को...”
उसकी कमर तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
मेरा पूरा चेहरा उसकी चूत के रस में नहा चुका था।
नेहा ने एक हाथ से मेरे बाल और ज़ोर से खींचे और बोली,
“और तेज़...
चूस मेरी चूत को...
फिर अचानक एक पल को नेहा रुक गई।
वो थोड़ा सा खिसक कर मेरे सीने पर बैठ गई। उसकी चूत अब मेरी छाती पर थी। मेरे चेहरे पर उसका पूरा रस लगा हुआ था — होंठ, नाक, गाल सब गीले थे।
नेहा ने मेरी तरफ झुककर कुछ पल तक सिर्फ मुझे देखा। उसकी आँखों में नशा था, लेकिन साथ में एक अजीब सी तीखी चमक भी थी।
फिर उसने बहुत धीरे, लेकिन साफ़-साफ़ कहा,
“तुझे शर्म नहीं आई? हाँ... उसका लंड तूने अपने हाथों में लेकर हिलाया... और अब मेरे ऊपर चढ़ा दिया। तुझे एक पल भी शर्म नहीं आई... क्यों?”
उसकी आवाज़ में नशा तो था, लेकिन उसमें एक अलग तरह का गुस्सा और तीखापन भी था।
नेहा मेरी छाती पर बैठी हुई थी, मेरे चेहरे को घूर रही थी। उसके बाल मेरे चेहरे पर गिर रहे थे।
वो एक पल चुप रही, फिर फिर से बोली — इस बार और धीमी आवाज़ में, लेकिन और ज़्यादा कड़वी,
“बोल ना... क्यों नहीं शर्म आई तुझे?”
उसकी आँखें अब मेरी आँखों में गड़ी हुई थीं। जवाब का इंतज़ार कर रही थी।
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
बस उसे देखता रह गया।
बोल ना...
क्यों किया तूने ऐसा?
क्यों मुझे उस अनजान के सामने खोल दिया?
क्यों तू देखता रहा जब वो मेरी चूत में उँगलियाँ डाल रहा था?”
उसका गुस्सा अब साफ़ दिख रहा था। नशा था, लेकिन ये सिर्फ़ नशा नहीं था। ये वो गुस्सा था जो अंदर कहीं बहुत गहरे से निकल रहा था।
मैं चुप रहा। मेरे पास कोई तैयार जवाब नहीं था।
नेहा ने मेरे बालों को और ज़ोर से खींचा।
“तुझे शर्म नहीं आती? एक अनजान आदमी के साथ तूने आज मुझे बाँट दिया... और तेरा लंड खड़ा था! मुझे अच्छे से याद है!”
उसकी आँखों में आँसू थे। नशा, गुस्सा, ठेस — सब मिला हुआ था।
“हमने कितनी बार ये खेल खेला है... मैंने तुझे कितनी बार थप्पड़ मारे हैं... तुझे ‘नन्नू’ कहा है, ‘चूतिया’ कहा है... लेकिन आज... आज कुछ अलग था। आज मैं खेल नहीं खेल रही थी सैम। मैं सही में जानना चाहती हूँ... क्यों तूने मुझे उस आदमी के साथ
शेयर किया?
उसकी आवाज़ अब काँप रही थी।
“बोल... तुझे मजा आ रहा था? देखने में? अपनी बीवी को किसी और के हाथों में देखने में?”
मैंने आँखें नीचे कर लीं। मेरा गला सूख रहा था।
नेहा ने मेरे गाल पर एक और थप्पड़ मारा — इस बार और तेज़।
“देख मेरी तरफ! मुझे जवाब चाहिए... आज... अभी।”
उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं। उसकी चूत अभी भी मेरी छाती पर गीली और गर्म थी।
मैंने बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में कहा,
“...हाँ। मुझे मजा आ रहा था। देखने में। तुझे... दूसरे के साथ देखने में।”
नेहा ने मेरी आँखों में गहरी नज़र डाली। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं।
“तो तू सच में... चाहता है ना? कि मैं किसी और से चुदूँ?”
नेहा ने अपना हाथ अपनी कमर के पीछे ले जाकर मेरे लंड को कस के पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन जकड़ बहुत मज़बूत थी।
“देखा... ये नूनू अभी भी बहुत टाइट है,” उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा। “तुझे मज़ा आ रहा था ना? बहुत मज़ा आ रहा था... जब वो मेरा मुँह चूस रहा था... जब उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में घुस रही थीं... तब भी तेरा लंड खड़ा था।”
उसकी आवाज़ में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के साथ एक गहरी उत्तेजना भी थी। वो मेरे लंड को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी। हर बार जब वो नीचे जाती, तो अपनी हथेली से मेरे अंडकोश को दबा देती।
मैं कराह उठा।
मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं।
“बोल...
तुझे सच में मज़ा आ रहा था?
अपनी बीवी को किसी और के हाथों में देखकर?
जब वो मेरे निप्पल चूस रहा था... तब भी?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस मेरी साँसें तेज़ हो गईं।
नेहा ने मेरे लंड को और ज़ोर से पकड़ा और तेज़ी से हिलाने लगी।
“चूतिया...
तू मेरा पति है... और तू मुझे किसी और के लिए खोल रहा था।
और तेरा छोटा लंड खड़ा हो गया था।”
नेहा को देखकर मैं समझ गया था कि अब वो कुछ नहीं सुनने वाली। वो मेरे जवाब का इंतज़ार भी नहीं कर रही थी। वो सिर्फ़ नशे में बड़बड़ा रही थी और शायद मेरा खड़ा लंड देखकर उसको और गुस्सा आ गया था।
मैं बस चुपचाप रहा।
उसके बाद उसने वापस से वो मेरे ऊपर चढ़ गई। इस बार और भी कस के वो मेरे चेहरे के ऊपर चढ़ चुकी थी। अपनी चूत पूरी रगड़ने लगी मेरे पूरे चेहरे पर। अपनी कमर हिला-हिला के जैसे कोई गोते खा रहा हो, वैसे वो रगड़ना चालू कर रही थी।
मैं जीभ निकाल के बस उसे चाट रहा था। वो अपनी कमर हिला रही थी। धीरे-धीरे मुझे लग रहा था कि उसकी जाँघें काँप रही हैं। मुझे लग रहा था कि वो ऑर्गेज़्म होने वाला है।
फिर थोड़ी देर बाद उसने ज़ोर से चिल्लाया।
“येस... येस... येस बेबी... येस... येस... येस्स्स्स... आआआह्ह्ह...”
उसने मेरे बालों को कस कर पकड़ा। एक हाथ में व्हिस्की का ग्लास अभी भी था। और वो झड़ गई मेरे मुँह के ऊपर।
बहुत सा गहरा, गर्म पानी मेरे पूरे चेहरे पर, मेरी आँखों में, मेरे नाक में, मेरे मुँह के अंदर बहने लगा। मैं चाटता रहा — उसका पूरा रस पीता रहा। उसकी जाँघें मेरे सिर को दबाए हुए थीं। वो जोर-जोर से काँप रही थी।
“आह्ह्ह... फक... येस...”
उसकी आह बहुत ज़ोर से निकली। मुझे लगा कि शायद बाहर कोई सुन लेगा।
नेहा कुछ सेकंड तक मेरे चेहरे पर ही बैठी रही। उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसका पूरा शरीर थर-थर कर रहा था।
फिर उसने धीरे से मेरे बाल छोड़े। उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें नशीली, लाल और पूरी तरह संतुष्ट थीं।
“तुम... अच्छे हो... चूत चाटने में...”
उसने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा, अपना रस फैलाते हुए।
जब नेहा मेरे मुँह पर झड़ रही थी, उसकी जाँघें मेरे सिर को कसकर दबाए हुए थीं, तब मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को पकड़ लिया।
मेरा लंड पहले से ही बहुत टाइट और गीला था। मैंने तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया।
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरा पूरा शरीर तन गया।
“आआह्ह...”
मैं भी झड़ गया। मेरे लंड से मोटी-मोटी धारें निकलीं और मेरे पेट पर गिरने लगीं।
थोड़ी देर मैंने नेहा के चेहरे को देखा। वो लाल हो चुका था। उसकी नाक एकदम लाल, बहुत ही सुंदर लग रही थी। उसका पूरा गोरा, दूध सा सफेद चेहरा — उसपर हल्का-हल्का लालपन और नशीली आँखें।
उसने मेरी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे सोफे से उतरने का फैसला किया। व्हिस्की का ग्लास आधा भरा हुआ था, शायद दो-तीन घूँट ही पिए थे। वो लड़खड़ाते हुए टेबल पर ग्लास रखा। मेरी तरफ देखा भी नहीं।
धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से वो बेडरूम की तरफ चली गई। मुझे एक धम-सी आवाज़ आई। मुझे लगा कहीं गिर न गई हो।
मैं तुरंत उठा और बेडरूम में गया। नेहा बेड पर लेटी हुई थी। पूरी तरह कपड़े पहने, लेकिन स्कर्ट ऊपर चढ़ी हुई, टॉप का एक स्ट्रैप कंधे से नीचे सरका हुआ। उसकी साँसें भारी और धीमी थीं।
वो सही में सो गई थी।
नशे की वजह से... और आज पूरे दिन जो कुछ हुआ — उसकी वजह से भी। वो थक चुकी थी।
मैंने कुछ देर उसे देखा। उसका चेहरा अभी भी लाल था। गले पर हल्के निशान थे। मैंने चादर खींचकर उसे ढक दिया।
फिर मैं हॉल में वापस आया। टेबल पर आधी भरी व्हिस्की का ग्लास रखा था। मैं सोफे पर बैठ गया और उसे खत्म करने लगा।
मेरा दिमाग बहुत कुछ सोच रहा था। आज जो हुआ... वो सब। रेस्टोरेंट में, गाड़ी में, और अब... गुप्ता जी ने नेहा को कितनी बार देखा होगा? कितनी बार उसकी नंगी छाती देखी होगी?
मुझे अजीब सा डर लग रहा था। कहीं बाहर कोई खड़ा तो नहीं था? कहीं गुप्ता जी ने कुछ सुन तो नहीं लिया?
मैंने ग्लास खत्म किया। शरीर थका हुआ था, लेकिन दिमाग जाग रहा था। नेहा के चेहरे पर वो आखिरी आह... उसके शरीर का काँपना... और उस आदमी का हाथ उसकी चूत पर...
मैं सोफे पर लेटा हुआ था। एक पैर सोफे पर, दूसरा लटका हुआ। बीच में मेरा लंड मुरझाया पड़ा था। मुँह में अभी भी मेरी बीवी का स्वाद था — नमकीन, गाढ़ा, थोड़ा शराबी।
दिन भर की तस्वीरें आँखें बंद करते ही घूमने लगीं। रेस्टोरेंट... गाड़ी... उस आदमी के हाथ... नेहा की आहें... सब कुछ इतना ताज़ा था कि नींद भी कच्ची ही आई।
मुझे सपना आया।
सपने में भी वही आदमी था। पतली-दुबली बॉडी, लेकिन नेहा को उसने आसानी से उठा रखा था — उल्टा। नेहा की पीठ उसके सीने से सटी हुई। उसने नेहा की जाँघों को पकड़कर खोल रखा था। नेहा की चूत बिल्कुल सामने। और उसके ठीक सामने उसका बेटा —
घुटनों पर बैठा, अपना मुँह नेहा की चूत में दबाए हुए चाट रहा था।
आदमी हँस रहा था। “चाटें साहब की... अच्छे से चाटो...”
मैं वहाँ खड़ा था। अकेला नहीं। गुप्ता जी भी मेरे बगल में खड़े थे। दोनों देख रहे थे।
मेरा लंड खड़ा था। मुझे लगा कोई उसे चाट रहा है। मैंने नीचे देखा — उस आदमी की बीवी मेरे सामने घुटनों पर बैठी, मेरे लंड को चूस रही थी।
मैं हड़बड़ा कर जाग गया।
साँसें तेज़ थीं।
मैंने महसूस किया कि मेरे लंड पर वो नरमी अच्छे से महसूस हो रही थी।
नीचे देखा तो सच में कोई लंड चाट रहा था।
मेरी बीवी।
सुबह के 9 बज रहे थे।
मुझे पता ही नहीं चला कि इतना समय हो गया।
नेहा ज़मीन पर घुटनों के बल बैठी हुई थी।
वो अपनी जीभ से मेरे अंडकोश को चाट रही थी — धीरे-धीरे, प्यार से, लेकिन गहराई से।
जैसे कोई प्यासी औरत पानी पी रही हो।
मैंने देखा तो उसने हल्की सी मुस्कान दी।
आँख मारी।
फिर बिना कुछ कहे अपने काम पर लग गई।
वो खुश लग रही थी।
शायद उसे रात याद आ गई होगी — वो सब जो उसने नशे में मेरे साथ किया था।
अब वो शिद्दत से मुझे ब्लोजॉब दे रही थी।
बिना हाथ इस्तेमाल किए।
मुँह में पूरा ले कर।
उसका चेहरा मेरे लंड पर ऊपर-नीचे जाते हुए बहुत खूबसूरत लग रहा था।
उसकी आँखें कभी-कभी ऊपर उठकर मेरी आँखों से मिल जातीं।
जैसे कह रही हो — “ये सब तुम्हारे लिए है... और मेरे लिए भी।”
मेरा लंड उसके गले तक जा रहा था।
वो गला भर-भर के चूस रही थी।
कभी-कभी उसकी जीभ मेरे टॉपे पर घूम जाती, कभी गहरी तक चली जाती।
उसके मुँह से निकलती गीली-गीली आवाज़ें कमरे में भर रही थीं।
मैंने अपना हाथ उसके बालों में डाला।
धीरे से सहलाया।
नेहा ने अपना काम बखूबी किया।
बिना रुके, बिना थके, पूरी शिद्दत से।
जब तक मैं कुछ नहीं बोला, जब तक मैं झड़ा नहीं — वो लगातार चूसती रही।
उसके मुँह की गर्मी, जीभ की नरमी, और गले की गहराई... सब कुछ एक साथ।
जब मैं झड़ा, तो वो मेरे लंड को मुँह में ही रखे रही।
मेरा सारा पानी उसने निगल लिया — आखिरी बूँद तक।
फिर उसने धीरे से मुँह उठाया।
उसके होंठ चमक रहे थे।
उसके चेहरे पर एक अलग तरह की ख़ुशी थी।
मगर जो पछतावा मैं देखना चाहता था — रात का वो पछतावा — वो उसके चेहरे पर बिल्कुल नहीं था।
नेहा मेरी तरफ बढ़ी।
मुझे एक लंबा, गहरा किस किया।
उसके मुँह में अभी भी मेरा स्वाद था।
“सॉरी बेबी...” उसने मेरे होंठों से हटते हुए धीरे से कहा,
“मैंने रात में कुछ किया तो नहीं... मैं बहुत नशे में थी...”
क्या वो सब भूल चुकी थी?
या नाटक कर रही थी?
मैं कुछ नहीं बोला।
बस उसे देखता रहा।
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“पता है आज सुबह क्या हुआ?”
मेरे दिमाग में कई बातें एक साथ घूम गईं —
उस पतले आदमी की उँगलियाँ...
गुप्ता जी की नज़र...
रात की वो सारी घटनाएँ...
मैंने जवाब नहीं दिया।
नेहा ने लैपटॉप की तरफ इशारा करते हुए कहा,
“अयान का मैसेज आया है।”


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