22-05-2026, 03:22 PM
रजनी ने अपनी माँ की भारी चूचियों को देखते हुए शरमाते हुए कहा, “माँ… गुरुजी की बातें सुनकर मेरी चूत फिर से गीली हो गई है। पा नहीं क्यों पर अब मुझे गुरूजी के लंड से प्रेम हो गया है।” मैत्री की रचना।
गीता हँस पड़ी। उसने रजनी की छोटी-सी चूत पर हल्का सा हाथ फेर दिया और बोली, “अरे मेरी शैतान बेटी! अभी सुबह-सुबह ही चूत में आग लग गई? गुरुजी ने तो सिर्फ बात की थी, अभी तो कुछ किया भी नहीं। और गुरूजी के लंड से किसको प्रेम नहीं होगा बेटी! वह लोडा है ही ऐसा की जितनी बार चुदे, उनके प्रति उतना ही हमारे मन में प्रेम बढ़ता है।”
रजनी शर्मा कर अपनी माँ से सट गई। दोनों नंगी देहें एक-दूसरे से चिपक गईं। रजनी ने अपनी माँ की एक भारी चूची को हल्के से पकड़ लिया और बोली, “माँ… तुम्हारी चूचियाँ इतनी बड़ी और नरम हैं। गुरुजी ने इन्हें कितना दबाया होगा?”
गीता ने मुस्कुराते हुए रजनी की चूची को अपनी उँगलियों से घुमाते हुए कहा, “हाँ बेटी… गुरुजी ने इन्हें बहुत जोर से मसला था। निप्पल को मुँह में लेकर चूसा था। चूसते वक़्त एस लगता था की अभी-अभी थन से दूध निकाल देंगे। और ऐसे भूखे लग रहे थे जैसे सालो से दूध पीया ही ना हो। अभी भी इनमें हल्का दर्द है। तू भी छूकर देख… कितनी सख्त हो गई हैं। और देख भी ले के किस तरह गुरूजी ने मुझे चूसा है। मेरे निपल्स को काट-काट के खून की लकीर लिख दी है।” ऐसा कहते हुए उसके दोनों बोब्लो को रजनी के आगे लगा दिया।
रजनी ने अपनी माँ की दोनों चूचियों को दोनों हाथों से पकड़ लिया और हल्का सा दबाया। रचयिता मैत्री है।
“वाह माँ… कितनी गर्म और भारी हैं। गुरुजी ने इन्हें चूसते समय क्या कहा था?”
गीता ने आँखें बंद कर लें और सिसकारी भरते हुए बोली, “उन्होंने कहा था… ‘ये चूचियाँ तो किसी अप्सरा की तरह हैं… इन्हें चूसकर दूध निकालना है’ इसे दुहोने में खूब मजा आएगा। और क्यों ना आये......ये थन है ही दुहोने के लिए...तो मैंने भी कहा जो चाहे कीजिये गुरूजी, अभी ये आपके मुंह और हाथ में है। फिर उन्होंने मेरे निप्पल को दाँतों से हल्का काटा था। आह्ह… बेटी, तू भी चूसकर देख ना… माँ को अच्छा लगेगा। और अनुभव कर ले की निपल्स में कैसा स्वाद है और खास कर तेरी इस माँ के निपल में कितना रस भरा पड़ा हुआ है। तेरे बाप को सिर्फ चोदना आता है ऐसा खेल कभी नहीं खेलते जिस की एक औरत को चाह होती है। बस लोडा खड़ा लेके आते है ना मुंह में ना कही ओर पैरो को फैलाते है और लंड को अन्दर डाल देते है। ऐसे किसी भी औरत को शांत नहीं कर सकता बेटी।”
रजनी शरमा कर हँस पड़ी, लेकिन उसने झुककर अपनी माँ की बाईं चूची का निप्पल मुँह में ले लिया और हल्का-हल्का चूसने लगी।
“मम्मी… तुम्हारा निप्पल कितना स्वादिष्ट है। गुरुजी ने कितनी देर चूसा होगा? और पापा क्यों नहीं चूसते इस जवानी को?” प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
गीता ने रजनी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए कराहते हुए कहा, “बहुत देर चूसा था बेटी… दोनों चूचियों को बारी-बारी से। एक को चूसते समय दूसरी को जोर-जोर से मसलते थे। जैसे आटा गूँथ रहे हो। उनके कुरकुरे हाथ......अब क्या बताऊ बेटी.... तू भी दूसरी चूची दबा ना… हाँ… ऐसे… आह्ह्ह! तेरे पापा नहीं चूसते क्यों की उनमे और उनके लंड में ज्यादा देर तक टिकने की ताकत नहीं होती बेटी। यह सब गुरूजी जैसे साधक के पास ही ऐसी कला होती है। जो एक साथ कई औरतो को शांत कर सकते है और उनकी चूत के भोसड़ा बनाने में समर्थ होते है। तभी तो वह गुरूजी है बेटी।”
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बने रहिये दोस्तों।
मैत्री।
गीता हँस पड़ी। उसने रजनी की छोटी-सी चूत पर हल्का सा हाथ फेर दिया और बोली, “अरे मेरी शैतान बेटी! अभी सुबह-सुबह ही चूत में आग लग गई? गुरुजी ने तो सिर्फ बात की थी, अभी तो कुछ किया भी नहीं। और गुरूजी के लंड से किसको प्रेम नहीं होगा बेटी! वह लोडा है ही ऐसा की जितनी बार चुदे, उनके प्रति उतना ही हमारे मन में प्रेम बढ़ता है।”
रजनी शर्मा कर अपनी माँ से सट गई। दोनों नंगी देहें एक-दूसरे से चिपक गईं। रजनी ने अपनी माँ की एक भारी चूची को हल्के से पकड़ लिया और बोली, “माँ… तुम्हारी चूचियाँ इतनी बड़ी और नरम हैं। गुरुजी ने इन्हें कितना दबाया होगा?”
गीता ने मुस्कुराते हुए रजनी की चूची को अपनी उँगलियों से घुमाते हुए कहा, “हाँ बेटी… गुरुजी ने इन्हें बहुत जोर से मसला था। निप्पल को मुँह में लेकर चूसा था। चूसते वक़्त एस लगता था की अभी-अभी थन से दूध निकाल देंगे। और ऐसे भूखे लग रहे थे जैसे सालो से दूध पीया ही ना हो। अभी भी इनमें हल्का दर्द है। तू भी छूकर देख… कितनी सख्त हो गई हैं। और देख भी ले के किस तरह गुरूजी ने मुझे चूसा है। मेरे निपल्स को काट-काट के खून की लकीर लिख दी है।” ऐसा कहते हुए उसके दोनों बोब्लो को रजनी के आगे लगा दिया।
रजनी ने अपनी माँ की दोनों चूचियों को दोनों हाथों से पकड़ लिया और हल्का सा दबाया। रचयिता मैत्री है।
“वाह माँ… कितनी गर्म और भारी हैं। गुरुजी ने इन्हें चूसते समय क्या कहा था?”
गीता ने आँखें बंद कर लें और सिसकारी भरते हुए बोली, “उन्होंने कहा था… ‘ये चूचियाँ तो किसी अप्सरा की तरह हैं… इन्हें चूसकर दूध निकालना है’ इसे दुहोने में खूब मजा आएगा। और क्यों ना आये......ये थन है ही दुहोने के लिए...तो मैंने भी कहा जो चाहे कीजिये गुरूजी, अभी ये आपके मुंह और हाथ में है। फिर उन्होंने मेरे निप्पल को दाँतों से हल्का काटा था। आह्ह… बेटी, तू भी चूसकर देख ना… माँ को अच्छा लगेगा। और अनुभव कर ले की निपल्स में कैसा स्वाद है और खास कर तेरी इस माँ के निपल में कितना रस भरा पड़ा हुआ है। तेरे बाप को सिर्फ चोदना आता है ऐसा खेल कभी नहीं खेलते जिस की एक औरत को चाह होती है। बस लोडा खड़ा लेके आते है ना मुंह में ना कही ओर पैरो को फैलाते है और लंड को अन्दर डाल देते है। ऐसे किसी भी औरत को शांत नहीं कर सकता बेटी।”
रजनी शरमा कर हँस पड़ी, लेकिन उसने झुककर अपनी माँ की बाईं चूची का निप्पल मुँह में ले लिया और हल्का-हल्का चूसने लगी।
“मम्मी… तुम्हारा निप्पल कितना स्वादिष्ट है। गुरुजी ने कितनी देर चूसा होगा? और पापा क्यों नहीं चूसते इस जवानी को?” प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
गीता ने रजनी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए कराहते हुए कहा, “बहुत देर चूसा था बेटी… दोनों चूचियों को बारी-बारी से। एक को चूसते समय दूसरी को जोर-जोर से मसलते थे। जैसे आटा गूँथ रहे हो। उनके कुरकुरे हाथ......अब क्या बताऊ बेटी.... तू भी दूसरी चूची दबा ना… हाँ… ऐसे… आह्ह्ह! तेरे पापा नहीं चूसते क्यों की उनमे और उनके लंड में ज्यादा देर तक टिकने की ताकत नहीं होती बेटी। यह सब गुरूजी जैसे साधक के पास ही ऐसी कला होती है। जो एक साथ कई औरतो को शांत कर सकते है और उनकी चूत के भोसड़ा बनाने में समर्थ होते है। तभी तो वह गुरूजी है बेटी।”
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बने रहिये दोस्तों।
मैत्री।



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