22-05-2026, 10:31 AM
हम उस बंगले की तरफ बढ़े।
आस-पास कुछ लोग सड़क पर थे।
उन्होंने नेहा पर एक नज़र डाली — उसकी छोटी ब्लैक ड्रेस, नंगे कंधे और जाँघें देखकर उनकी नज़रें थोड़ी देर अटकी रहीं।
हम गेट के अंदर घुसे।
बंगले का साइज़ देखकर हम पीछे की तरफ गए।
वहाँ एक छोटा-सा कमरा बना हुआ था — servant quarter।
उस आदमी की बीवी बाहर बैठी कपड़े धो रही थी।
वो सच में वैसी ही थी जैसी उसने बताया था — या उससे भी ज़्यादा बदसूरत और कुपोषित।
बहुत कमज़ोर, पीली त्वचा, सूखे बाल।
एक पुरानी साड़ी पहने हुए थी।
जैसे ही हम पास गए, उसके शरीर से एक अजीब-सी पसीने और गंदगी की बदबू आई।
वो उठी।
उसने देखा — उसके पति के साथ दो लोग।
एक जवान लड़की छोटी ब्लैक ड्रेस में, नंगे कंधे और टाँगें।
वो चुपचाप नमस्ते करने लगी।
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे गले में आवाज़ ही न हो।
थोड़ी देर हम उसके कमरे में बैठे।
उसके दोनों लड़कों से मिले।
दोनों लड़के थे।
बड़ा वाला उम्र में छोटा था मगर हाइट में मुझसे भी लंबा।
वो 10th में पढ़ता था।
मैंने सोचा — मैं तो 8th में हिलाना शुरू कर चुका था।
उसकी नज़रें बार-बार नेहा की टाँगों पर जा रही थीं।
फिर उस आदमी ने कहा,
“साहब, ऊपर चलते हैं।”
उसने दो उँगलियों से इशारा किया — स्मोक करने का।
नेहा वहीं बैठी रही, उसकी बीवी से बात करने लगी — बहुत respect से।
मैं उसके साथ ऊपर गया।
वो मुझे एक पुरानी चारपाई दिखाते हुए आँख मारकर बोला,
“यहाँ लेटकर ...
मैं तुम्हारी बीवी से नीचे बात करता हूँ।”
हम नीचे आए तो नेहा भी तैयार खड़ी थी घर जाने के लिए।
उसकी बीवी ने जिद की, “आप लोग खाना खाकर जाइए।”
हमने मना कर दिया।
जब हम वापस जाने लगे तो वो आदमी और दोनों बच्चे गेट तक छोड़ने आए।
उसकी बीवी को हमने मना कर दिया कि वो अपना काम करती रहे।
अभी हमारे दिमाग में वो बिल्कुल नहीं था जो थोड़ी देर पहले कार में हुआ था।
सब कुछ सपना सा लग रहा था।
नेहा ने बंगले की तरफ देखकर पूछा,
“ये लोग कहाँ रहते हैं?”
उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“मालिक मुंबई में रहता है... आते-जाते रहते हैं।
ये servant quarter है।”
“अच्छा... बढ़िया घर बनाया है... काफी अमीर लगते हैं?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“अंदर से भी बहुत खूबसूरत है।”
हम गेट तक पहुँचे।
दोनों बच्चे कार देखकर बहुत एक्साइटेड हो गए थे।
छोटा बच्चा बोला, “अंकल, ये आपकी कार है?”
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
नेहा ने बच्चे के चेहरे के भाव पढ़े और बोली,
“तुम्हें राइड करनी है?”
एक पल के लिए मैंने नेहा को देखा।
सोचा — कितना सोचती है ये। सबका ख्याल रखती है।
मगर अगली ही लाइन में मेरे सारे भाव बदल गए जब उस आदमी ने कहा,
“साहब, क्या बच्चों को गाड़ी में एक राउंड करवा सकते हैं?
मैं तब तक मेमसाहब को अंदर से बंगला दिखा देता हूँ।”
मेरा दिल फिर एक बार धड़का।
मुझे लगा — कितना बड़ा चूतिया हूँ मैं... फिर से बातों में आ गया।
क्या ये दोनों का प्लान था?
मगर बच्चों को देखकर लग रहा था कि वो प्लान में शामिल नहीं हो सकते।
मैं कुछ कहता, उससे पहले दोनों बच्चे चिल्लाने लगे।
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“Thank you baby... कितने अच्छे हो तुम।”
अभी तक मैंने हाँ या ना भी नहीं कहा था।
बच्चे जल्दी से कार में बैठ गए।
मैं फिर से ड्राइविंग सीट पर।
उस आदमी की बीवी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी।
वे दोनों बंगले देखने के लिए मुड़ चुके थे।
मैंने देखा — उस आदमी का हाथ हवा में था, जो नेहा की कमर या गांड की तरफ बढ़ रहा था।
और मैं सड़क पर निकल गया।
बच्चे चिल्ला रहे थे।
कभी सीट पर कूदते, कभी गाड़ी के शीशे ऊपर-नीचे करते।
मुझे नहीं पता था कि मैं उन्हें छोटा राउंड में ले आऊँ या नेहा को टाइम दूँ।
मगर आज चुदाई का दिन नहीं था।
नेहा ने उस आदमी को भी क्लियर किया था।
मगर कुछ भी हो सकता था।
वो मेरे बिना थी।
मुझे नहीं लगता था कि वो आदमी जबरदस्ती कर सकता था।
और उसकी बीवी भी ज़्यादा दूर नहीं थी।
मैं जल्दी चाह रहा था कि कम से कम 10 मिनट तो दूँ उनको।
मगर 10 मिनट भी बहुत लंबे लग रहे थे।
बच्चे ही मुझे रास्ता बता रहे थे गलियों का —
“अंकल राइट... यहाँ से लेफ्ट।”
अपने बाप की तरह।
बस बाप का गियर नेहा के हाथ में था तब।
अचानक हम घूमकर घर के सामने आ गए।
बच्चों ने मेरी एक्सपेक्टेशन से कम समय लिया।
अगर बच्चे कार से उतरते तो शायद सीधे बंगले में भागते।
मैंने दो बार हॉर्न बजाया और भगवान से चाहा कि नेहा ये इशारा समझ ले।
बच्चे अंदर भाग चुके थे।
मैं लास्ट गेट में एंटर हुआ।
वहाँ नेहा और वो आदमी दरवाजे पर थे।
बच्चे कार के बारे में बता रहे थे।
नेहा सुन रही थी।
मैंने हाथ हिलाया।
नेहा ने जाते-जाते दोनों बच्चों को कुछ पैसे दिए।
दोनों ने नेहा के पैर छुए।
मैंने देखा — बड़े वाले को स्कर्ट के अंदर झाँकते हुए।
आज रात कम से कम दो लोग तो नेहा को इमेजिन करके हिलाएँगे।
बाप छत पर और बेटे को कहाँ मौका मिलेगा।
वैसे वो इस बॉडी के साथ अपने पापा की तरह gifted हुआ तो फ्यूचर में ज़्यादा मुश्किल नहीं होगी नेहा जैसी कोई ढूँढने में।
नेहा मुस्कुराकर कार में बैठी।
मैं बैठते ही पूछा,
“कैसा था अंदर से बंगला?”
नेहा मुस्कुराई।
मेरी तरफ देखकर बोली,
“पता नहीं... मैं पहले कमरे की पहले दीवार तक ही देख पाई।”
उसने बेशर्मी से मेरी तरफ देखकर wink किया और कहा,
“चलो।”
जाते-जाते मैंने उस आदमी की स्माइल देखी।
उस मुस्कान में कुछ तो था जो मैं समझ नहीं पाया।
जीत थी, घमंड था, और एक अजीब सी दया भी — जैसी कोई अमीर किसी भिखारी को देता है।
जैसे कह रहा हो — “तुम्हारी बीवी तो मेरे पास थी, अब तुम ले जाओ।”
मेरा दिल अंदर से कसक रहा था।
मैं चाहता था कि नेहा मुझे सब कुछ बताए — क्या हुआ, कितना हुआ, कैसा लगा।
मगर नेहा शांत थी।
बस हल्के से मुस्कुरा रही थी।
नज़र आगे सड़क पर, लेकिन दिमाग कहीं और।
वापस जाते समय हमने वही ठेका देखा — शराब का।
अब बारिश रुक चुकी थी।
नेहा ने मेरी तरफ देखकर धीरे से कहा,
“मुझे कुछ और चाहिए।”
उस आदमी के घर पर चाय पीने से सब उतर गया था।
अब नेहा से कुछ उगलवाना था तो हमें पीना पड़ेगा।
मैंने नेहा को देखा।
उसकी आँखों में अभी भी वो नशा बाकी था।
वो मेरी तरफ देख रही थी, लेकिन उसकी नज़र में एक अलग सी चुप्पी थी।
मैंने गाड़ी ठेके के पास रोकी।
नेहा ने सिगरेट निकाली और धीरे से सुलगाई।
खिड़की थोड़ी खुली हुई थी।
बारिश रुक चुकी थी, अब गाड़ी सड़क के किनारे थी।
लोग आसानी से देख सकते थे — एक खूबसूरत लड़की कार में बैठी धुआँ उड़ा रही है।
पुणे में ये दृश्य आम था, लेकिन फिर भी...
हर गाड़ी धीमी पड़ जाती थी।
लोग नेहा को घूरकर देखते हुए निकल रहे थे।
नेहा बिल्कुल बेफिक्र थी।
सिगरेट को होंठों पर लगाए, धीरे-धीरे कश ले रही थी।
उसके बाल अभी भी थोड़े बिखरे हुए थे, ड्रेस ठीक की हुई थी, लेकिन चेहरे पर वो नशा अभी भी बाकी था।
मैं जानता था कि अब नेहा को नशा चाहिए।
बीयर से होने वाला नहीं था।
उसे अब व्हिस्की चाहिए थी।
“व्हिस्की चाहिए?”
नेहा ने सिगरेट का कश लिया, धुआँ बाहर छोड़ा और मेरी तरफ देखकर सिर्फ सिर हिला दिया।
मैं इस बात में खुद को lucky मान रहा था।
मेरी बीवी — जो व्हिस्की पीती है, सिगरेट पीती है, पोर्न देखती है, और सबसे ज़्यादा... hot दिखती है।
जब वो व्हिस्की पी लेती है, तो उसका अंदर का जानवर बाहर आ जाता है।
उसकी शर्म, उसकी हिचकिचाहट, सब गायब हो जाती है।
फिर वो जो चाहती है, वो लेती है — बिना सोचे, बिना रुके।
मैंने साइड में देखा।
नेहा अब भी सिगरेट पी रही थी।
उसकी आँखें थोड़ी नींद भरी हुई थीं, लेकिन चेहरा अभी भी गर्म था।
उसकी आँखों में अब वो चमक थी जो मुझे हमेशा डराती और उत्तेजित करती थी।
मैंने व्हिस्की की बोतल खोली और दो प्लास्टिक के ग्लास में peg बनाए।
बर्फ डाली, थोड़ा पानी मिलाया।
एक नेहा को दिया, दूसरा खुद रख लिया।
गाड़ी चालू की और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
मैं इंतज़ार कर रहा था।
इंतज़ार कर रहा था कि नशा चढ़े, नेहा खुलकर बोले।
क्या हुआ जब वो उस आदमी के साथ अकेली थी।
कितना हुआ।
कैसा लगा।
लेकिन peg खत्म होते-होते मेरा सब्र टूट गया।
मैंने थोड़ा impatient होकर पूछा,
“बताओ ना... क्या हुआ?”
नेहा ने सिगरेट का आखिरी कश लिया, खिड़की से बाहर फेंका और हल्के से मुस्कुराई।
“तुमने कुछ करने को कहा था... तुम 5 मिनट में आ गए।”
उसकी आवाज़ में हल्का blame था — जैसे मैंने जल्दी आकर उसका मजा खराब कर दिया।
मैंने थोड़ा गुस्से में कहा,
“बच्चे ही मुझे घुमा-घुमा कर ले आए। मैं क्या करता?
मैं तो सोच रहा था कम से कम 10 मिनट तो दूँ तुम्हें...”
नेहा ने मेरी तरफ देखा।
फिर हल्के से हँसी और बोली,
“फिर भी... जो भी हुआ, बताओ ना।”
मैंने गाड़ी को थोड़ा और स्लो कर दिया।
मेरा गला सूख रहा था।
नेहा ने अपने ग्लास से एक घूँट लिया, सिर सीट पर टिकाया और आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल चुप रही।
नेहा ने अपना ग्लास डोर की साइड वाली पॉकेट में रख दिया।
फिर बिना किसी हिचक के अपना हाथ सीधे मेरे लंड पर रख दिया।
उसने हल्के से दबाया और मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए कहा,
“जो कार में हुआ था, उससे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ...
फिर भी इस नुन्नू को क्यों जानना है?”
वो मुझे चिढ़ा रही थी।
उसे अच्छे से पता था कि मुझे ये चिढ़ना पसंद है।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस इंतज़ार कर रहा था।
नेहा ने मेरे गाल पर हल्का किस किया और धीरे-धीरे बताना शुरू किया,
“जब तुम गाड़ी लेकर गए, तो हम भी बंगले की तरफ बढ़े।
आस-पास कोई नहीं था। उसने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया और मुझे चुपके से अपनी तरफ खींच लिया।
दरवाज़े पर पहुँचते ही उसने जेब से चाबी निकालकर मुझे दे दी।
बोला — ‘खोलो’।
लेकिन उसके दोनों हाथ मेरी कमर से हट ही नहीं रहे थे।
मैंने झुककर ताला खोला।
वो मेरे पीछे चला गया।
नेहा ने आगे कहा, उसकी आवाज़ अब और धीमी, और नशे वाली हो गई थी,
“जब वो ये कर रहा था... मुझे बहुत गुदगुदी हो रही थी।
मैं ताला खोलने में पूरा ध्यान नहीं दे पा रही थी।
वैसे भी 2-3 चाबियाँ थीं...
मगर वो मेरे पीछे लगे हुए था।
जैसे-तैसे मैंने दरवाज़ा खोला...”
नेहा ने एक पल रुककर साँस ली, फिर जारी रखा,
“अंदर... एक आलीशान हॉल था।
लेविश सोफे, बड़ी वाली TV, झूमर...
बहुत सुंदर था।
जब तक मैं अंदर देख पाती, उसने मुझे मजबूती से पकड़ लिया और दीवार से चिपका दिया।”
नेहा बोलती रही, उसकी आवाज़ अब धीमी और भरी हुई थी,
“वो मेरी गर्दन तक पहुँच रहा था...
एक बार उसने कोशिश की मेरे होंठों तक पहुँचने की, मगर फिर वापस मेरी गर्दन को चाटने लगा।
ड्रेस नीचे खींच दी... दोनों बूब्स सामने थे।
वो प्यार से नहीं... किसी जंगली की तरह काट रहा था।
गंदी-गंदी गालियाँ दे रहा था...
‘रंडी... किसी दिन यहीं चोदूँगा तुझे...’
मेरा सिर ऊपर था, हाथ उसके बालों में...
उसका दूसरा हाथ स्कर्ट के अंदर था...
मेरी चूत को बहुत गंदे तरीके से रगड़ रहा था।
थोड़ी देर ये चलता रहा...
फिर तुम्हारे हॉर्न की आवाज़ आई।
उसने कहा, ‘मादरचोद... इतनी जल्दी आ गया...’
ये बोलते हुए उसने मेरी जाँघ पर जोर से पिंच कर दिया।
बहुत हार्ड पिंच।
मेरे मुँह से ‘आह्ह...’ निकल गई।
मगर वो मेरे बूब्स को काटता ही रहा।
फिर उसने जल्दी से मेरे कपड़े ठीक किए...
और हम बाहर आ गए।”
नेहा ने ये कहते हुए अपनी स्कर्ट थोड़ी ऊपर की और मुझे वो निशान दिखाया —
जहाँ उस आदमी ने पिंच किया था।
वहाँ एक गहरा नीला निशान बन चुका था।
नेहा के उस नीले निशान को देखते ही मेरे अंदर एकदम से गुस्सा भड़क उठा।
“तुमने वहाँ कुछ क्यों नहीं कहा?
भोसड़ी के को वहीं बता देती... तुम्हें पता है ये ठीक नहीं है!”
मेरा स्वर तेज़ हो गया था।
नेहा ने शांत नज़रों से मेरी तरफ देखा।
उसका हाथ अभी भी मेरे लंड पर था।
उसने बहुत धीरे से कहा,
“नहीं... मुझे अच्छा लगा।”
ये बोलते हुए उसने अपना टॉप और नीचे खींच दिया।
दोनों बूब्स पर अब और भी ज़्यादा निशान थे — दाँतों के गहरे निशान, नीले-लाल धब्बे।
एक जगह तो दाँतों का पूरा आकार बन गया था।
मैं चुप हो गया।
गुस्सा अचानक शांत हो गया।
नेहा मेरी तरफ देख रही थी।
उसकी आँखों में न कोई शर्म थी, न पछतावा।
बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी।
मुझे अब नेहा की लिमिट का थोड़ा-थोड़ा अंदाज़ा हो रहा था।
वो pain enjoy कर रही थी।
कितनी हद तक enjoy कर सकती है, ये मुझे अभी समझ आ रहा था।
जैसे मैं अपने कॉलेज के दिनों में enjoy करता था — जब कुछ लड़के मुझे humiliate करने के चक्कर में थप्पड़ मार देते थे।
मुझे लगता था कि अब नहीं जाऊँगा...
मगर अगली बार बुलाने पर फिर चला जाता था।
नेहा भी शायद उसी रास्ते पर थी।
हम घर पहुँचने वाले थे।
आधी बोतल खत्म हो चुकी थी।
मैं गाड़ी बहुत धीरे चला रहा था, फिर भी सब कुछ धुँधला दिखने लगा था।
मैंने नेहा से पूछा,
“क्या... बेकार आदमी से दोबारा मिलना चाहोगी?”
नेहा ने नशे वाली आँखों से मेरी तरफ देखा।
थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली,
“घर पर बताऊँगी।”
आस-पास कुछ लोग सड़क पर थे।
उन्होंने नेहा पर एक नज़र डाली — उसकी छोटी ब्लैक ड्रेस, नंगे कंधे और जाँघें देखकर उनकी नज़रें थोड़ी देर अटकी रहीं।
हम गेट के अंदर घुसे।
बंगले का साइज़ देखकर हम पीछे की तरफ गए।
वहाँ एक छोटा-सा कमरा बना हुआ था — servant quarter।
उस आदमी की बीवी बाहर बैठी कपड़े धो रही थी।
वो सच में वैसी ही थी जैसी उसने बताया था — या उससे भी ज़्यादा बदसूरत और कुपोषित।
बहुत कमज़ोर, पीली त्वचा, सूखे बाल।
एक पुरानी साड़ी पहने हुए थी।
जैसे ही हम पास गए, उसके शरीर से एक अजीब-सी पसीने और गंदगी की बदबू आई।
वो उठी।
उसने देखा — उसके पति के साथ दो लोग।
एक जवान लड़की छोटी ब्लैक ड्रेस में, नंगे कंधे और टाँगें।
वो चुपचाप नमस्ते करने लगी।
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे गले में आवाज़ ही न हो।
थोड़ी देर हम उसके कमरे में बैठे।
उसके दोनों लड़कों से मिले।
दोनों लड़के थे।
बड़ा वाला उम्र में छोटा था मगर हाइट में मुझसे भी लंबा।
वो 10th में पढ़ता था।
मैंने सोचा — मैं तो 8th में हिलाना शुरू कर चुका था।
उसकी नज़रें बार-बार नेहा की टाँगों पर जा रही थीं।
फिर उस आदमी ने कहा,
“साहब, ऊपर चलते हैं।”
उसने दो उँगलियों से इशारा किया — स्मोक करने का।
नेहा वहीं बैठी रही, उसकी बीवी से बात करने लगी — बहुत respect से।
मैं उसके साथ ऊपर गया।
वो मुझे एक पुरानी चारपाई दिखाते हुए आँख मारकर बोला,
“यहाँ लेटकर ...
मैं तुम्हारी बीवी से नीचे बात करता हूँ।”
हम नीचे आए तो नेहा भी तैयार खड़ी थी घर जाने के लिए।
उसकी बीवी ने जिद की, “आप लोग खाना खाकर जाइए।”
हमने मना कर दिया।
जब हम वापस जाने लगे तो वो आदमी और दोनों बच्चे गेट तक छोड़ने आए।
उसकी बीवी को हमने मना कर दिया कि वो अपना काम करती रहे।
अभी हमारे दिमाग में वो बिल्कुल नहीं था जो थोड़ी देर पहले कार में हुआ था।
सब कुछ सपना सा लग रहा था।
नेहा ने बंगले की तरफ देखकर पूछा,
“ये लोग कहाँ रहते हैं?”
उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“मालिक मुंबई में रहता है... आते-जाते रहते हैं।
ये servant quarter है।”
“अच्छा... बढ़िया घर बनाया है... काफी अमीर लगते हैं?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“अंदर से भी बहुत खूबसूरत है।”
हम गेट तक पहुँचे।
दोनों बच्चे कार देखकर बहुत एक्साइटेड हो गए थे।
छोटा बच्चा बोला, “अंकल, ये आपकी कार है?”
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
नेहा ने बच्चे के चेहरे के भाव पढ़े और बोली,
“तुम्हें राइड करनी है?”
एक पल के लिए मैंने नेहा को देखा।
सोचा — कितना सोचती है ये। सबका ख्याल रखती है।
मगर अगली ही लाइन में मेरे सारे भाव बदल गए जब उस आदमी ने कहा,
“साहब, क्या बच्चों को गाड़ी में एक राउंड करवा सकते हैं?
मैं तब तक मेमसाहब को अंदर से बंगला दिखा देता हूँ।”
मेरा दिल फिर एक बार धड़का।
मुझे लगा — कितना बड़ा चूतिया हूँ मैं... फिर से बातों में आ गया।
क्या ये दोनों का प्लान था?
मगर बच्चों को देखकर लग रहा था कि वो प्लान में शामिल नहीं हो सकते।
मैं कुछ कहता, उससे पहले दोनों बच्चे चिल्लाने लगे।
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“Thank you baby... कितने अच्छे हो तुम।”
अभी तक मैंने हाँ या ना भी नहीं कहा था।
बच्चे जल्दी से कार में बैठ गए।
मैं फिर से ड्राइविंग सीट पर।
उस आदमी की बीवी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी।
वे दोनों बंगले देखने के लिए मुड़ चुके थे।
मैंने देखा — उस आदमी का हाथ हवा में था, जो नेहा की कमर या गांड की तरफ बढ़ रहा था।
और मैं सड़क पर निकल गया।
बच्चे चिल्ला रहे थे।
कभी सीट पर कूदते, कभी गाड़ी के शीशे ऊपर-नीचे करते।
मुझे नहीं पता था कि मैं उन्हें छोटा राउंड में ले आऊँ या नेहा को टाइम दूँ।
मगर आज चुदाई का दिन नहीं था।
नेहा ने उस आदमी को भी क्लियर किया था।
मगर कुछ भी हो सकता था।
वो मेरे बिना थी।
मुझे नहीं लगता था कि वो आदमी जबरदस्ती कर सकता था।
और उसकी बीवी भी ज़्यादा दूर नहीं थी।
मैं जल्दी चाह रहा था कि कम से कम 10 मिनट तो दूँ उनको।
मगर 10 मिनट भी बहुत लंबे लग रहे थे।
बच्चे ही मुझे रास्ता बता रहे थे गलियों का —
“अंकल राइट... यहाँ से लेफ्ट।”
अपने बाप की तरह।
बस बाप का गियर नेहा के हाथ में था तब।
अचानक हम घूमकर घर के सामने आ गए।
बच्चों ने मेरी एक्सपेक्टेशन से कम समय लिया।
अगर बच्चे कार से उतरते तो शायद सीधे बंगले में भागते।
मैंने दो बार हॉर्न बजाया और भगवान से चाहा कि नेहा ये इशारा समझ ले।
बच्चे अंदर भाग चुके थे।
मैं लास्ट गेट में एंटर हुआ।
वहाँ नेहा और वो आदमी दरवाजे पर थे।
बच्चे कार के बारे में बता रहे थे।
नेहा सुन रही थी।
मैंने हाथ हिलाया।
नेहा ने जाते-जाते दोनों बच्चों को कुछ पैसे दिए।
दोनों ने नेहा के पैर छुए।
मैंने देखा — बड़े वाले को स्कर्ट के अंदर झाँकते हुए।
आज रात कम से कम दो लोग तो नेहा को इमेजिन करके हिलाएँगे।
बाप छत पर और बेटे को कहाँ मौका मिलेगा।
वैसे वो इस बॉडी के साथ अपने पापा की तरह gifted हुआ तो फ्यूचर में ज़्यादा मुश्किल नहीं होगी नेहा जैसी कोई ढूँढने में।
नेहा मुस्कुराकर कार में बैठी।
मैं बैठते ही पूछा,
“कैसा था अंदर से बंगला?”
नेहा मुस्कुराई।
मेरी तरफ देखकर बोली,
“पता नहीं... मैं पहले कमरे की पहले दीवार तक ही देख पाई।”
उसने बेशर्मी से मेरी तरफ देखकर wink किया और कहा,
“चलो।”
जाते-जाते मैंने उस आदमी की स्माइल देखी।
उस मुस्कान में कुछ तो था जो मैं समझ नहीं पाया।
जीत थी, घमंड था, और एक अजीब सी दया भी — जैसी कोई अमीर किसी भिखारी को देता है।
जैसे कह रहा हो — “तुम्हारी बीवी तो मेरे पास थी, अब तुम ले जाओ।”
मेरा दिल अंदर से कसक रहा था।
मैं चाहता था कि नेहा मुझे सब कुछ बताए — क्या हुआ, कितना हुआ, कैसा लगा।
मगर नेहा शांत थी।
बस हल्के से मुस्कुरा रही थी।
नज़र आगे सड़क पर, लेकिन दिमाग कहीं और।
वापस जाते समय हमने वही ठेका देखा — शराब का।
अब बारिश रुक चुकी थी।
नेहा ने मेरी तरफ देखकर धीरे से कहा,
“मुझे कुछ और चाहिए।”
उस आदमी के घर पर चाय पीने से सब उतर गया था।
अब नेहा से कुछ उगलवाना था तो हमें पीना पड़ेगा।
मैंने नेहा को देखा।
उसकी आँखों में अभी भी वो नशा बाकी था।
वो मेरी तरफ देख रही थी, लेकिन उसकी नज़र में एक अलग सी चुप्पी थी।
मैंने गाड़ी ठेके के पास रोकी।
नेहा ने सिगरेट निकाली और धीरे से सुलगाई।
खिड़की थोड़ी खुली हुई थी।
बारिश रुक चुकी थी, अब गाड़ी सड़क के किनारे थी।
लोग आसानी से देख सकते थे — एक खूबसूरत लड़की कार में बैठी धुआँ उड़ा रही है।
पुणे में ये दृश्य आम था, लेकिन फिर भी...
हर गाड़ी धीमी पड़ जाती थी।
लोग नेहा को घूरकर देखते हुए निकल रहे थे।
नेहा बिल्कुल बेफिक्र थी।
सिगरेट को होंठों पर लगाए, धीरे-धीरे कश ले रही थी।
उसके बाल अभी भी थोड़े बिखरे हुए थे, ड्रेस ठीक की हुई थी, लेकिन चेहरे पर वो नशा अभी भी बाकी था।
मैं जानता था कि अब नेहा को नशा चाहिए।
बीयर से होने वाला नहीं था।
उसे अब व्हिस्की चाहिए थी।
“व्हिस्की चाहिए?”
नेहा ने सिगरेट का कश लिया, धुआँ बाहर छोड़ा और मेरी तरफ देखकर सिर्फ सिर हिला दिया।
मैं इस बात में खुद को lucky मान रहा था।
मेरी बीवी — जो व्हिस्की पीती है, सिगरेट पीती है, पोर्न देखती है, और सबसे ज़्यादा... hot दिखती है।
जब वो व्हिस्की पी लेती है, तो उसका अंदर का जानवर बाहर आ जाता है।
उसकी शर्म, उसकी हिचकिचाहट, सब गायब हो जाती है।
फिर वो जो चाहती है, वो लेती है — बिना सोचे, बिना रुके।
मैंने साइड में देखा।
नेहा अब भी सिगरेट पी रही थी।
उसकी आँखें थोड़ी नींद भरी हुई थीं, लेकिन चेहरा अभी भी गर्म था।
उसकी आँखों में अब वो चमक थी जो मुझे हमेशा डराती और उत्तेजित करती थी।
मैंने व्हिस्की की बोतल खोली और दो प्लास्टिक के ग्लास में peg बनाए।
बर्फ डाली, थोड़ा पानी मिलाया।
एक नेहा को दिया, दूसरा खुद रख लिया।
गाड़ी चालू की और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
मैं इंतज़ार कर रहा था।
इंतज़ार कर रहा था कि नशा चढ़े, नेहा खुलकर बोले।
क्या हुआ जब वो उस आदमी के साथ अकेली थी।
कितना हुआ।
कैसा लगा।
लेकिन peg खत्म होते-होते मेरा सब्र टूट गया।
मैंने थोड़ा impatient होकर पूछा,
“बताओ ना... क्या हुआ?”
नेहा ने सिगरेट का आखिरी कश लिया, खिड़की से बाहर फेंका और हल्के से मुस्कुराई।
“तुमने कुछ करने को कहा था... तुम 5 मिनट में आ गए।”
उसकी आवाज़ में हल्का blame था — जैसे मैंने जल्दी आकर उसका मजा खराब कर दिया।
मैंने थोड़ा गुस्से में कहा,
“बच्चे ही मुझे घुमा-घुमा कर ले आए। मैं क्या करता?
मैं तो सोच रहा था कम से कम 10 मिनट तो दूँ तुम्हें...”
नेहा ने मेरी तरफ देखा।
फिर हल्के से हँसी और बोली,
“फिर भी... जो भी हुआ, बताओ ना।”
मैंने गाड़ी को थोड़ा और स्लो कर दिया।
मेरा गला सूख रहा था।
नेहा ने अपने ग्लास से एक घूँट लिया, सिर सीट पर टिकाया और आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल चुप रही।
नेहा ने अपना ग्लास डोर की साइड वाली पॉकेट में रख दिया।
फिर बिना किसी हिचक के अपना हाथ सीधे मेरे लंड पर रख दिया।
उसने हल्के से दबाया और मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए कहा,
“जो कार में हुआ था, उससे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ...
फिर भी इस नुन्नू को क्यों जानना है?”
वो मुझे चिढ़ा रही थी।
उसे अच्छे से पता था कि मुझे ये चिढ़ना पसंद है।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस इंतज़ार कर रहा था।
नेहा ने मेरे गाल पर हल्का किस किया और धीरे-धीरे बताना शुरू किया,
“जब तुम गाड़ी लेकर गए, तो हम भी बंगले की तरफ बढ़े।
आस-पास कोई नहीं था। उसने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया और मुझे चुपके से अपनी तरफ खींच लिया।
दरवाज़े पर पहुँचते ही उसने जेब से चाबी निकालकर मुझे दे दी।
बोला — ‘खोलो’।
लेकिन उसके दोनों हाथ मेरी कमर से हट ही नहीं रहे थे।
मैंने झुककर ताला खोला।
वो मेरे पीछे चला गया।
नेहा ने आगे कहा, उसकी आवाज़ अब और धीमी, और नशे वाली हो गई थी,
“जब वो ये कर रहा था... मुझे बहुत गुदगुदी हो रही थी।
मैं ताला खोलने में पूरा ध्यान नहीं दे पा रही थी।
वैसे भी 2-3 चाबियाँ थीं...
मगर वो मेरे पीछे लगे हुए था।
जैसे-तैसे मैंने दरवाज़ा खोला...”
नेहा ने एक पल रुककर साँस ली, फिर जारी रखा,
“अंदर... एक आलीशान हॉल था।
लेविश सोफे, बड़ी वाली TV, झूमर...
बहुत सुंदर था।
जब तक मैं अंदर देख पाती, उसने मुझे मजबूती से पकड़ लिया और दीवार से चिपका दिया।”
नेहा बोलती रही, उसकी आवाज़ अब धीमी और भरी हुई थी,
“वो मेरी गर्दन तक पहुँच रहा था...
एक बार उसने कोशिश की मेरे होंठों तक पहुँचने की, मगर फिर वापस मेरी गर्दन को चाटने लगा।
ड्रेस नीचे खींच दी... दोनों बूब्स सामने थे।
वो प्यार से नहीं... किसी जंगली की तरह काट रहा था।
गंदी-गंदी गालियाँ दे रहा था...
‘रंडी... किसी दिन यहीं चोदूँगा तुझे...’
मेरा सिर ऊपर था, हाथ उसके बालों में...
उसका दूसरा हाथ स्कर्ट के अंदर था...
मेरी चूत को बहुत गंदे तरीके से रगड़ रहा था।
थोड़ी देर ये चलता रहा...
फिर तुम्हारे हॉर्न की आवाज़ आई।
उसने कहा, ‘मादरचोद... इतनी जल्दी आ गया...’
ये बोलते हुए उसने मेरी जाँघ पर जोर से पिंच कर दिया।
बहुत हार्ड पिंच।
मेरे मुँह से ‘आह्ह...’ निकल गई।
मगर वो मेरे बूब्स को काटता ही रहा।
फिर उसने जल्दी से मेरे कपड़े ठीक किए...
और हम बाहर आ गए।”
नेहा ने ये कहते हुए अपनी स्कर्ट थोड़ी ऊपर की और मुझे वो निशान दिखाया —
जहाँ उस आदमी ने पिंच किया था।
वहाँ एक गहरा नीला निशान बन चुका था।
नेहा के उस नीले निशान को देखते ही मेरे अंदर एकदम से गुस्सा भड़क उठा।
“तुमने वहाँ कुछ क्यों नहीं कहा?
भोसड़ी के को वहीं बता देती... तुम्हें पता है ये ठीक नहीं है!”
मेरा स्वर तेज़ हो गया था।
नेहा ने शांत नज़रों से मेरी तरफ देखा।
उसका हाथ अभी भी मेरे लंड पर था।
उसने बहुत धीरे से कहा,
“नहीं... मुझे अच्छा लगा।”
ये बोलते हुए उसने अपना टॉप और नीचे खींच दिया।
दोनों बूब्स पर अब और भी ज़्यादा निशान थे — दाँतों के गहरे निशान, नीले-लाल धब्बे।
एक जगह तो दाँतों का पूरा आकार बन गया था।
मैं चुप हो गया।
गुस्सा अचानक शांत हो गया।
नेहा मेरी तरफ देख रही थी।
उसकी आँखों में न कोई शर्म थी, न पछतावा।
बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी।
मुझे अब नेहा की लिमिट का थोड़ा-थोड़ा अंदाज़ा हो रहा था।
वो pain enjoy कर रही थी।
कितनी हद तक enjoy कर सकती है, ये मुझे अभी समझ आ रहा था।
जैसे मैं अपने कॉलेज के दिनों में enjoy करता था — जब कुछ लड़के मुझे humiliate करने के चक्कर में थप्पड़ मार देते थे।
मुझे लगता था कि अब नहीं जाऊँगा...
मगर अगली बार बुलाने पर फिर चला जाता था।
नेहा भी शायद उसी रास्ते पर थी।
हम घर पहुँचने वाले थे।
आधी बोतल खत्म हो चुकी थी।
मैं गाड़ी बहुत धीरे चला रहा था, फिर भी सब कुछ धुँधला दिखने लगा था।
मैंने नेहा से पूछा,
“क्या... बेकार आदमी से दोबारा मिलना चाहोगी?”
नेहा ने नशे वाली आँखों से मेरी तरफ देखा।
थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली,
“घर पर बताऊँगी।”


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