19-05-2026, 06:20 PM
अगली सुबह जब मैं कमरे से बाहर निकला, तो मैं ठिठककर रह गया।
गीता और रजनी दोनों अभी-अभी नहाकर आई थीं। दोनों बिल्कुल नंगी थीं। उनकी त्वचा अभी भी नहाने के बाद चमक रही थी। गीता और रजनी आमने-सामने खड़ी होकर धीरे-धीरे बातें कर रही थीं। उनकी नंगी देहें सुबह की हल्की धूप में और भी आकर्षक लग रही थीं। मैत्री रचित कहानी।
गीता ने रजनी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए प्यार से पूछा, “बेटी… अब तो तू पूरी तरह ठीक है ना?”
रजनी ने शर्माते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ माँ… अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ। सच में, यह सब बाबाजी का कमाल है।”
गीता ने रजनी की नंगी कमर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ बेटी, बाबाजी ने तो बहुत मेहनत की… लेकिन मुझे तो गुरुजी की कृपा सबसे ज्यादा लगती है। वो सब कुछ जानते हैं। हमारे शरीर के हर छेद को, हर कमजोरी को।”
रजनी ने अपनी माँ की भरी हुई चूचियों को देखते हुए कहा, “माँ… मुझे एक बात समझ नहीं आ रही। बाबाजी ने हमें पूरे 6 दिन तक नंगे रहने का क्यों आदेश दिया? क्या जरूरी था इतना?”
गीता ने रजनी की नंगी जाँघ पर हाथ रखकर धीरे से कहा, “देख बेटी, गुरुजी के किसी भी आदेश पर शक करना पाप है। लेकिन मैं तुझे बता देती हूँ। प्रेतात्माएँ ज्यादातर औरतों के शरीर में चूत और गांड के रास्ते से ही घुसती हैं। ये दोनों ही सबसे आसान और गर्म छेद हैं। गुरुजी ने इसलिए हमें नंगा रखने को कहा, ताकि वो बुरी शक्तियाँ हमारे शरीर में दोबारा न घुस सकें।” रचयिता मैत्री है।
रजनी ने अपनी छोटी-सी चूत को हल्का सा छूते हुए शर्माते हुए पूछा, “माँ… जब गुरुजी ने मुझे चोदा था… उनका इतना मोटा और लंबा लंड मेरी चूत में आराम से चला गया था। पहले तो बहुत दर्द हुआ। लग रहा था मेरी चूत फट जाएगी। खून भी निकला था… लेकिन फिर… फिर अंदर से बहुत अच्छा लगने लगा। जैसे कोई गंदा तत्व निकल रहा हो।”
गीता ने मुस्कुराते हुए रजनी की चूत की तरफ देखा और बोली, “बेटी, वो तुम्हारी पहली चुदाई थी इसलिए दर्द हुआ। लेकिन गुरुजी का लंड इतना मोटा और ताकतवर है कि पहली बार में ही चूत फाड़ दे। मेरी भी हालत वैसी ही थी। तेरे बाप से इतने साल चुद रही हूँ, फिर भी जब गुरुजी ने मुझे चोदा तो लग रहा था मेरी चूत अभी-अभी पहली बार खुली हो। खून निकला, सूजन हो गई… लेकिन वो दर्द मीठा था बेटी। अभी भी मेरी चूत में हल्का-हल्का दर्द है… और साथ में एक अजीब सी खुजली भी। वह दर्द ऐसा है जो हर औरत बार-बार मांगती है। अभी तुम्हे समज में आया ही गया होगा की वह दर्द कितना हसीं है। अब मुझे तो पक्का यकीं है की गुरूजी के जैसा लंड तुज में समाया है तो तुजे अब ज्यादा से ज्यादा भूख लगेगी।”
रजनी ने अपनी माँ की भारी चूचियों को देखते हुए शर्म से कहा, “माँ… सच बताऊँ? जब गुरुजी मेरे अंदर थे… तो मुझे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। उनका लंड मेरी चूत को अंदर तक फाड़ रहा था, लेकिन फिर भी मैं गांड उठा-उठाकर उनका साथ दे रही थी। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ, मैं नहीं चाहती थी यह सब, पर हो गया और मैंने बड़े आराम से इतना बड़ा और भरी लंड को अन्दर समां लिया।”
गीता ने रजनी को अपनी तरफ खींच लिया। दोनों नंगी देहें एक-दूसरे से सट गईं। गीता ने रजनी की एक चूची को हल्का सा दबाते हुए कहा, “बेटी, यही तो चुदाई का असली मजा है। पहले दर्द, फिर वो मीठा दर्द, और फिर वो आनंद जो पूरे शरीर में फैल जाता है। गुरुजी ने हम दोनों की चूत को फाड़कर साफ कर दिया। अब हमारी चूतें उनके लंड की आदी हो गई हैं।” मैत्री की रचना।
रजनी ने शर्माते हुए अपनी माँ की जाँघ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “माँ… आपने तो आपके जीवन में कई बार चुदवाया होगा। क्या फिर भी तुम्हें दर्द हुआ था ना?”
गीता ने मुस्कुराकर रजनी के कान में फुसफुसाया,
“हाँ बेटी, कई बार चुदवाया है पर ऐसा लोडा नहीं था। दर्द तो बहुत हुआ था बेटी… लेकिन मुझे तो सबसे ज्यादा मजा आया जब गुरुजी ने मुझे अपने ऊपर बिठाकर जोर-जोर से चोदा। मेरी चूत उनके लंड से पूरी तरह भर गई थी। उनका लंड पूरा का पूरा मेरे अन्दर घुसा था और जम के उठा उठा के चोद रहे थे। खून भी निकल रहा था, फिर भी मैं नहीं रुकना चाहती थी। अभी भी जब याद करती हूँ तो मेरी चूत गीली होने लगती है। वैसे भी तू तो नसीबवाली है की तुझे तो पहली बार में ही ऐसा मजबूत लंड ने पेल दिया, अक बढ़िया औरत बना दी। तुम्हे गुरूजी के लंड की आभारी होना चाहिए बेटी, और उनके लंड की अधिकतम सेवा करनी चाहिए।”
दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे को देखकर शर्माती हुई मुस्कुरा रही थीं। उनकी नंगी देहें सुबह की रोशनी में चमक रही थीं और बातें करते-करते दोनों की साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं।
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बने रहिये दोस्तों......
मैत्री।
गीता और रजनी दोनों अभी-अभी नहाकर आई थीं। दोनों बिल्कुल नंगी थीं। उनकी त्वचा अभी भी नहाने के बाद चमक रही थी। गीता और रजनी आमने-सामने खड़ी होकर धीरे-धीरे बातें कर रही थीं। उनकी नंगी देहें सुबह की हल्की धूप में और भी आकर्षक लग रही थीं। मैत्री रचित कहानी।
गीता ने रजनी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए प्यार से पूछा, “बेटी… अब तो तू पूरी तरह ठीक है ना?”
रजनी ने शर्माते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ माँ… अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ। सच में, यह सब बाबाजी का कमाल है।”
गीता ने रजनी की नंगी कमर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ बेटी, बाबाजी ने तो बहुत मेहनत की… लेकिन मुझे तो गुरुजी की कृपा सबसे ज्यादा लगती है। वो सब कुछ जानते हैं। हमारे शरीर के हर छेद को, हर कमजोरी को।”
रजनी ने अपनी माँ की भरी हुई चूचियों को देखते हुए कहा, “माँ… मुझे एक बात समझ नहीं आ रही। बाबाजी ने हमें पूरे 6 दिन तक नंगे रहने का क्यों आदेश दिया? क्या जरूरी था इतना?”
गीता ने रजनी की नंगी जाँघ पर हाथ रखकर धीरे से कहा, “देख बेटी, गुरुजी के किसी भी आदेश पर शक करना पाप है। लेकिन मैं तुझे बता देती हूँ। प्रेतात्माएँ ज्यादातर औरतों के शरीर में चूत और गांड के रास्ते से ही घुसती हैं। ये दोनों ही सबसे आसान और गर्म छेद हैं। गुरुजी ने इसलिए हमें नंगा रखने को कहा, ताकि वो बुरी शक्तियाँ हमारे शरीर में दोबारा न घुस सकें।” रचयिता मैत्री है।
रजनी ने अपनी छोटी-सी चूत को हल्का सा छूते हुए शर्माते हुए पूछा, “माँ… जब गुरुजी ने मुझे चोदा था… उनका इतना मोटा और लंबा लंड मेरी चूत में आराम से चला गया था। पहले तो बहुत दर्द हुआ। लग रहा था मेरी चूत फट जाएगी। खून भी निकला था… लेकिन फिर… फिर अंदर से बहुत अच्छा लगने लगा। जैसे कोई गंदा तत्व निकल रहा हो।”
गीता ने मुस्कुराते हुए रजनी की चूत की तरफ देखा और बोली, “बेटी, वो तुम्हारी पहली चुदाई थी इसलिए दर्द हुआ। लेकिन गुरुजी का लंड इतना मोटा और ताकतवर है कि पहली बार में ही चूत फाड़ दे। मेरी भी हालत वैसी ही थी। तेरे बाप से इतने साल चुद रही हूँ, फिर भी जब गुरुजी ने मुझे चोदा तो लग रहा था मेरी चूत अभी-अभी पहली बार खुली हो। खून निकला, सूजन हो गई… लेकिन वो दर्द मीठा था बेटी। अभी भी मेरी चूत में हल्का-हल्का दर्द है… और साथ में एक अजीब सी खुजली भी। वह दर्द ऐसा है जो हर औरत बार-बार मांगती है। अभी तुम्हे समज में आया ही गया होगा की वह दर्द कितना हसीं है। अब मुझे तो पक्का यकीं है की गुरूजी के जैसा लंड तुज में समाया है तो तुजे अब ज्यादा से ज्यादा भूख लगेगी।”
रजनी ने अपनी माँ की भारी चूचियों को देखते हुए शर्म से कहा, “माँ… सच बताऊँ? जब गुरुजी मेरे अंदर थे… तो मुझे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। उनका लंड मेरी चूत को अंदर तक फाड़ रहा था, लेकिन फिर भी मैं गांड उठा-उठाकर उनका साथ दे रही थी। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ, मैं नहीं चाहती थी यह सब, पर हो गया और मैंने बड़े आराम से इतना बड़ा और भरी लंड को अन्दर समां लिया।”
गीता ने रजनी को अपनी तरफ खींच लिया। दोनों नंगी देहें एक-दूसरे से सट गईं। गीता ने रजनी की एक चूची को हल्का सा दबाते हुए कहा, “बेटी, यही तो चुदाई का असली मजा है। पहले दर्द, फिर वो मीठा दर्द, और फिर वो आनंद जो पूरे शरीर में फैल जाता है। गुरुजी ने हम दोनों की चूत को फाड़कर साफ कर दिया। अब हमारी चूतें उनके लंड की आदी हो गई हैं।” मैत्री की रचना।
रजनी ने शर्माते हुए अपनी माँ की जाँघ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “माँ… आपने तो आपके जीवन में कई बार चुदवाया होगा। क्या फिर भी तुम्हें दर्द हुआ था ना?”
गीता ने मुस्कुराकर रजनी के कान में फुसफुसाया,
“हाँ बेटी, कई बार चुदवाया है पर ऐसा लोडा नहीं था। दर्द तो बहुत हुआ था बेटी… लेकिन मुझे तो सबसे ज्यादा मजा आया जब गुरुजी ने मुझे अपने ऊपर बिठाकर जोर-जोर से चोदा। मेरी चूत उनके लंड से पूरी तरह भर गई थी। उनका लंड पूरा का पूरा मेरे अन्दर घुसा था और जम के उठा उठा के चोद रहे थे। खून भी निकल रहा था, फिर भी मैं नहीं रुकना चाहती थी। अभी भी जब याद करती हूँ तो मेरी चूत गीली होने लगती है। वैसे भी तू तो नसीबवाली है की तुझे तो पहली बार में ही ऐसा मजबूत लंड ने पेल दिया, अक बढ़िया औरत बना दी। तुम्हे गुरूजी के लंड की आभारी होना चाहिए बेटी, और उनके लंड की अधिकतम सेवा करनी चाहिए।”
दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे को देखकर शर्माती हुई मुस्कुरा रही थीं। उनकी नंगी देहें सुबह की रोशनी में चमक रही थीं और बातें करते-करते दोनों की साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं।
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बने रहिये दोस्तों......
मैत्री।



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