18-05-2026, 01:23 PM
ये सुनकर गीता की आँखों में आँसू आ गए। वह खुशी से मेरे पैरों पर गिर पड़ी, मेरे हाथ चूमते हुए बोली, “बाबाजी, आपके हाथों में जादू है!” मैत्री की प्रस्तुति।
मैंने नाटकीय अंदाज में कहा, “गीता जी, मैंने कुछ नहीं किया। जो हुआ, वो ऊपर वाले की मर्जी से हुआ। पर…”
“पर क्या?” गीता ने अधीर होकर पूछा।
“ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। अभी प्रेत का साया तो हटा है, लेकिन पूरी बंदिश बाकी है। इसके लिए सात विविध विधिया करनी होंगी। बहुत कष्ट उठाने पड़ेंगे। कर पाओगी?”
गीता ने बिना सोचे कहा, “मैं अपनी बेटी को पूरी तरह ठीक करने के लिए हर विधि, हर कष्ट करने को तैयार हूँ। अब मुझे आप पर पूरा विश्वास है।”
इतने में रजनी का बाप घर आ गया। गीताने उत्साहित होकर बताया कि उसने सारी बातें जैसी कही थीं, वैसी की हैं।
गीता ने खुशी-खुशी बताया कि रजनी ठीक हो गई है और उसने “माँ” कहकर बात भी की है।
रजनी का पिता दौड़कर अंदर गया, रजनी को देखा, फिर मेरे पैरों में गिर पड़ा और बोला, “बाबाजी, हम कैसे शुक्रिया अदा करें? बताइए क्या चाहिए आपको?”
गीता ने फिर कहा, “बाबाजी कह रहे हैं कि पूरी तरह ठीक करने के लिए अभी सात विधिया और करनी होंगी।” लेखिका मैत्री।
रजनी का पिता तुरंत बोला, “तो देर किस बात की? शुरू कर दीजिए।”
मैंने कहा, “विधि तो मैं शुरू कर दूंगा, लेकिन साथ में आपको सात नदियों का जल सात दिनों में भरकर लाना होगा। तभी विधि पूरी होगी। कर पाओगे?”
रजनी के पिता बोला, “आप विधि शुरू कीजिए बाबाजी, मैं अभी निकलता हूँ। जब तक विधि चलेगी, मैं जल लेकर वापस आ जाऊंगा।”
और फिर…
गीता का पति नाश्ता करके सात नदियों का जल लाने के लिए घर से निकल गया।
सुबह के 8 बज चुके थे।
गीता ने मेरे पास आकर कहा, “बाबाजी जी, आपके स्नान के लिए पानी गर्म कर दिया है। आप स्नान कर लीजिए, मैं आपका नाश्ता लगा देती हूँ।”
मैं बाथरूम में गया, स्नान किया और गीता द्वारा रखी गई सफेद धोती और गंजी पहनकर बाहर आ गया।
गीता ने नाश्ता परोस दिया था। जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी, मेरा मन मोहित हो गया। गुलाबी साड़ी में गीता बेहद आकर्षक लग रही थी, लेकिन उसके बोबले अभी भी ढके हुए थे।
मैंने गंभीर स्वर में कहा, “गीता, मैंने साफ कहा था ना कि जब तक यह सब चलेगी, तब तक सिर्फ साड़ी ही पहननी है।”
गीता थोड़ी घबराकर बोली, “बाबाजी, पहली विधि तो खत्म हो गई थी और आप नाश्ता कर रहे थे, इसलिए…”
मैंने उसे बीच में ही टोक दिया, “वो पहली विधि थी। अब नई विधि शुरू हो चुकी है। तुम्हारा पति जब से घर से निकला है, तब से लेकर जब तक वो सात नदियों का जल लेकर नहीं लौटता, तब तक तुम्हें हर नियम का सख्ती से पालन करना पड़ेगा। अगर कोई विघ्न पड़ा तो तुम्हारे पति की जान भी जा सकती है। तुम्हे तुमारे स्तन खुले रखने पड़ेंगे। जहा तक हो सके मेरे सामने। और इस प्रक्रिया में मेरे सामने तुम्हे शरमाने की कोई बात नहीं।” मैत्री की लेखनी।
गीता फौरन घबरा गई, “माफ कर दीजिए बाबाजी… मुझे पता नहीं था। मैं भी कितनी बुद्धू हूँ, इतना तक नहीं समज पाई की विधि अभी पूरी नहीं हुई!”
अगले ही पल गीता ने अपनी ब्लाउज और ब्रा उतार दी और सिर्फ साड़ी पहनकर मेरे सामने आ गई। अब उसके भरे-भरे 36 साइज के बोबले पूरी तरह नंगे थे। नाश्ता करते समय बार-बार उसकी साड़ी सरक जाती और उसके गुलाबी निप्पल दिख जाते।
********************.
जुड़े रहिये दोस्तों................
क्रमश:
मैत्री।
मैंने नाटकीय अंदाज में कहा, “गीता जी, मैंने कुछ नहीं किया। जो हुआ, वो ऊपर वाले की मर्जी से हुआ। पर…”
“पर क्या?” गीता ने अधीर होकर पूछा।
“ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। अभी प्रेत का साया तो हटा है, लेकिन पूरी बंदिश बाकी है। इसके लिए सात विविध विधिया करनी होंगी। बहुत कष्ट उठाने पड़ेंगे। कर पाओगी?”
गीता ने बिना सोचे कहा, “मैं अपनी बेटी को पूरी तरह ठीक करने के लिए हर विधि, हर कष्ट करने को तैयार हूँ। अब मुझे आप पर पूरा विश्वास है।”
इतने में रजनी का बाप घर आ गया। गीताने उत्साहित होकर बताया कि उसने सारी बातें जैसी कही थीं, वैसी की हैं।
गीता ने खुशी-खुशी बताया कि रजनी ठीक हो गई है और उसने “माँ” कहकर बात भी की है।
रजनी का पिता दौड़कर अंदर गया, रजनी को देखा, फिर मेरे पैरों में गिर पड़ा और बोला, “बाबाजी, हम कैसे शुक्रिया अदा करें? बताइए क्या चाहिए आपको?”
गीता ने फिर कहा, “बाबाजी कह रहे हैं कि पूरी तरह ठीक करने के लिए अभी सात विधिया और करनी होंगी।” लेखिका मैत्री।
रजनी का पिता तुरंत बोला, “तो देर किस बात की? शुरू कर दीजिए।”
मैंने कहा, “विधि तो मैं शुरू कर दूंगा, लेकिन साथ में आपको सात नदियों का जल सात दिनों में भरकर लाना होगा। तभी विधि पूरी होगी। कर पाओगे?”
रजनी के पिता बोला, “आप विधि शुरू कीजिए बाबाजी, मैं अभी निकलता हूँ। जब तक विधि चलेगी, मैं जल लेकर वापस आ जाऊंगा।”
और फिर…
गीता का पति नाश्ता करके सात नदियों का जल लाने के लिए घर से निकल गया।
सुबह के 8 बज चुके थे।
गीता ने मेरे पास आकर कहा, “बाबाजी जी, आपके स्नान के लिए पानी गर्म कर दिया है। आप स्नान कर लीजिए, मैं आपका नाश्ता लगा देती हूँ।”
मैं बाथरूम में गया, स्नान किया और गीता द्वारा रखी गई सफेद धोती और गंजी पहनकर बाहर आ गया।
गीता ने नाश्ता परोस दिया था। जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी, मेरा मन मोहित हो गया। गुलाबी साड़ी में गीता बेहद आकर्षक लग रही थी, लेकिन उसके बोबले अभी भी ढके हुए थे।
मैंने गंभीर स्वर में कहा, “गीता, मैंने साफ कहा था ना कि जब तक यह सब चलेगी, तब तक सिर्फ साड़ी ही पहननी है।”
गीता थोड़ी घबराकर बोली, “बाबाजी, पहली विधि तो खत्म हो गई थी और आप नाश्ता कर रहे थे, इसलिए…”
मैंने उसे बीच में ही टोक दिया, “वो पहली विधि थी। अब नई विधि शुरू हो चुकी है। तुम्हारा पति जब से घर से निकला है, तब से लेकर जब तक वो सात नदियों का जल लेकर नहीं लौटता, तब तक तुम्हें हर नियम का सख्ती से पालन करना पड़ेगा। अगर कोई विघ्न पड़ा तो तुम्हारे पति की जान भी जा सकती है। तुम्हे तुमारे स्तन खुले रखने पड़ेंगे। जहा तक हो सके मेरे सामने। और इस प्रक्रिया में मेरे सामने तुम्हे शरमाने की कोई बात नहीं।” मैत्री की लेखनी।
गीता फौरन घबरा गई, “माफ कर दीजिए बाबाजी… मुझे पता नहीं था। मैं भी कितनी बुद्धू हूँ, इतना तक नहीं समज पाई की विधि अभी पूरी नहीं हुई!”
अगले ही पल गीता ने अपनी ब्लाउज और ब्रा उतार दी और सिर्फ साड़ी पहनकर मेरे सामने आ गई। अब उसके भरे-भरे 36 साइज के बोबले पूरी तरह नंगे थे। नाश्ता करते समय बार-बार उसकी साड़ी सरक जाती और उसके गुलाबी निप्पल दिख जाते।
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क्रमश:
मैत्री।



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