16-05-2026, 04:07 PM
(This post was last modified: 16-05-2026, 04:08 PM by maitripatel. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
गीता ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, “सब ठीक है बाबाजी। रजनी कमरे में है। आपके गुरु जी ने उसे बुरी शक्तियों से बचाने के लिए अंदर बंद कर दिया था। अब वे चले गए हैं। आप बताइए आगे क्या करना है?”
मैं मन ही मन बहुत खुश था। मेरा पूरा प्लान काम कर गया था और मेरा नाम कहीं नहीं आया। रचयिता मैत्री[b]।[/b]
सुबह के 5 बज चुके थे। मेरी धोती खुली पड़ी थी और गीता भी पूरी तरह नंगी मेरे सामने बैठी थी।
मैंने पूछा, “गीता जी, हमारे कपड़े इस तरह अस्त-व्यस्त क्यों हैं?”
गीता शर्माते हुए बोली, “ये सब पूजा का ही हिस्सा था बाबाजी। गुरूजी ने जी भर के महेनत की थी।”
“हाँ...हाँ यह सब तो ठीक है, चलो, कपड़े ठीक कर लो,” मैंने कहा।
गीता उठकर कपड़े पहनने चली गई। उसकी चाल में एक नया अंदाज दिख रहा था। वह मन ही मन सोच रही थी की अच्छा है की गुरूजी की आत्मा बाबाजी में आ जाती है। इसलिए बाबाजी को कुछ भी याद नहीं रहता की क्या हुआ। अच्चा लगता है, उसने निचे देखा और मुस्कुराते हुए मन ही मन बोली: “रजनी के पिता करते रहे फिर भी गुरूजी ने खून तो निकाल ही दिया।“
मैंने भी अपनी धोती और कपड़े ठीक कर लिये।
जब गीता वापस आई तो बोली, “बाबाजी, अब क्या करना है?”
मैंने आँखें बंद करके कुछ देर नाटक किया, फिर बोला, “चलो, रजनी को कमरे से बाहर लाते हैं।” मैत्री लिखित रचना[b]।[/b]
हम दोनों रजनी के कमरे का दरवाजा खोलकर अंदर गए। रजनी अभी भी शांत लेटी हुई थी। उसके दोनों पैर खुले हुए थे। उसकी गांड का छेद बहार की और निकल आया था।
मैंने गीता से कहा, “रजनी से बात करो।”
गीता ने प्यार से पुकारा, “रजनी बेटा… रजनी?”
रजनी कुछ नहीं बोली। मैंने गीता को गंगाजल लाने को भेज दिया। जैसे ही गीता गई, मैंने रजनी के पास जा कर उसकी चूत देखी — पूरी तरह सूजी हुई थी और हल्का खून अभी भी रिस रहा था।
गीता के आने से पहले मैंने जल्दी से अपनी जगह संभाल ली। गीता गंगाजल लेकर आई तो मैंने मंत्र पढ़ते हुए रजनी पर जल छिड़कना शुरू कर दिया।
फिर मैंने गीता से कहा, “रजनी के लिए नए कपड़े ले आओ।”
गीता कपड़े लेकर आई। मैंने कहा, “गीता जी, अगर आपको एतराज न हो तो मैं मंत्र जपते हुए रजनी को कपड़े पहना दूँ? ये जरूरी है।”
गीता ने तुरंत कहा, “जैसा आप ठीक समझें बाबाजी। मुझे अब आप पर पूरा भरोसा है।”
मैं गीता के सामने ही रजनी को कपड़े पहनाने लगा - पहले ब्रा, फिर पैंटी, फिर सूट और सलवार। कपड़े पहनाते समय मेरे हाथ जानबूझकर रजनी के स्तनों और चूत पर घूमते रहे। यह सब नजारा गीता देखती रही।
कपड़े पहनाने के बाद मैंने रजनी के सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे पुकारा।
गीता ने पूछा, “बेटा रजनी, कैसी हो?” प्रस्तुतकर्ता मैत्री[b]।[/b]
रजनी ने पहली बार धीमी आवाज में कहा, “माँ… मैं ठीक हूँ।”
***********************
आज के लिए बस यही तक[b]।[/b]
फिर निलेंगे एक नए अपडेट के साथ[b]।[/b]
तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत।।
मैं मन ही मन बहुत खुश था। मेरा पूरा प्लान काम कर गया था और मेरा नाम कहीं नहीं आया। रचयिता मैत्री[b]।[/b]
सुबह के 5 बज चुके थे। मेरी धोती खुली पड़ी थी और गीता भी पूरी तरह नंगी मेरे सामने बैठी थी।
मैंने पूछा, “गीता जी, हमारे कपड़े इस तरह अस्त-व्यस्त क्यों हैं?”
गीता शर्माते हुए बोली, “ये सब पूजा का ही हिस्सा था बाबाजी। गुरूजी ने जी भर के महेनत की थी।”
“हाँ...हाँ यह सब तो ठीक है, चलो, कपड़े ठीक कर लो,” मैंने कहा।
गीता उठकर कपड़े पहनने चली गई। उसकी चाल में एक नया अंदाज दिख रहा था। वह मन ही मन सोच रही थी की अच्छा है की गुरूजी की आत्मा बाबाजी में आ जाती है। इसलिए बाबाजी को कुछ भी याद नहीं रहता की क्या हुआ। अच्चा लगता है, उसने निचे देखा और मुस्कुराते हुए मन ही मन बोली: “रजनी के पिता करते रहे फिर भी गुरूजी ने खून तो निकाल ही दिया।“
मैंने भी अपनी धोती और कपड़े ठीक कर लिये।
जब गीता वापस आई तो बोली, “बाबाजी, अब क्या करना है?”
मैंने आँखें बंद करके कुछ देर नाटक किया, फिर बोला, “चलो, रजनी को कमरे से बाहर लाते हैं।” मैत्री लिखित रचना[b]।[/b]
हम दोनों रजनी के कमरे का दरवाजा खोलकर अंदर गए। रजनी अभी भी शांत लेटी हुई थी। उसके दोनों पैर खुले हुए थे। उसकी गांड का छेद बहार की और निकल आया था।
मैंने गीता से कहा, “रजनी से बात करो।”
गीता ने प्यार से पुकारा, “रजनी बेटा… रजनी?”
रजनी कुछ नहीं बोली। मैंने गीता को गंगाजल लाने को भेज दिया। जैसे ही गीता गई, मैंने रजनी के पास जा कर उसकी चूत देखी — पूरी तरह सूजी हुई थी और हल्का खून अभी भी रिस रहा था।
गीता के आने से पहले मैंने जल्दी से अपनी जगह संभाल ली। गीता गंगाजल लेकर आई तो मैंने मंत्र पढ़ते हुए रजनी पर जल छिड़कना शुरू कर दिया।
फिर मैंने गीता से कहा, “रजनी के लिए नए कपड़े ले आओ।”
गीता कपड़े लेकर आई। मैंने कहा, “गीता जी, अगर आपको एतराज न हो तो मैं मंत्र जपते हुए रजनी को कपड़े पहना दूँ? ये जरूरी है।”
गीता ने तुरंत कहा, “जैसा आप ठीक समझें बाबाजी। मुझे अब आप पर पूरा भरोसा है।”
मैं गीता के सामने ही रजनी को कपड़े पहनाने लगा - पहले ब्रा, फिर पैंटी, फिर सूट और सलवार। कपड़े पहनाते समय मेरे हाथ जानबूझकर रजनी के स्तनों और चूत पर घूमते रहे। यह सब नजारा गीता देखती रही।
कपड़े पहनाने के बाद मैंने रजनी के सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे पुकारा।
गीता ने पूछा, “बेटा रजनी, कैसी हो?” प्रस्तुतकर्ता मैत्री[b]।[/b]
रजनी ने पहली बार धीमी आवाज में कहा, “माँ… मैं ठीक हूँ।”
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आज के लिए बस यही तक[b]।[/b]
फिर निलेंगे एक नए अपडेट के साथ[b]।[/b]
तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत।।



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