14-05-2026, 08:24 AM
अध्याय 10
रात अपनी पूरी जवानी पर थी, और हवेली का जश्न अब एक थकी हुई मदहोशी में ढल रहा था। गेंदे के फूलों की महक उमस भरी हवा में और भी भारी हो गई थी।
मैं बेचैनी से इधर-उधर घूम रहा था, मेरी नज़रें अनजाने में बस अम्मी को ही तलाश रही थीं। और फिर मैंने उन्हें देखा।
वह आँगन के उस कोने में थे, जहाँ गेंदे के फूलों की लड़ियों के पीछे पुरानी दीवार पर बस एक छोटा सा, नर्म रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। इस धुंधली रोशनी में वह दुनिया से कटे हुए लग रहे थे। वे लोग बहुत करीब खड़े थे, इतने करीब कि उनके बीच कोई फासला नहीं था।
मैं सुन नहीं सकता था कि वह क्या बात कर थे।
मैंने देखा—मेरा दिल ज़ोर से धड़का—कि विशाल का वह गठीला हाथ अम्मी के दूधिया चेहरे की तरफ बढ़ा। उसकी उंगलियों ने अम्मी के गाल पर झूलती उस रेशमी लट को छुआ। वह स्पर्श महज़ इत्तेफाक नहीं था; वह एक मालिकाना हक था। विशाल की उंगलियाँ अम्मी की मखमली त्वचा को सहलाती हुई उनके कान के पीछे गईं।
और अम्मी? मेरी अम्मी, जो घर की दहलीज लांघने से पहले सौ बार सोचती थीं, वह पत्थर की मूरत बनी खड़ी रहीं। उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू उनके पुष्ट सीने से ढीला होकर गिर रहा था। उनकी आँखों में वह 'कशमकश' और 'खुमारी' थी जिसे देखकर मेरा खून खौल उठा।
अम्मी के ख्यालात
अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस ज़हरीले स्पर्श से कांप रहा था, पर उन्हें अपनी सिसकी को मुस्कुराहट में बदलना था।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह... ये दरिंदा सबके सामने मेरा तमाशा बना रहा है। इसके हाथ मेरे नंगे गाल और मेरी सुराहीदार गर्दन के पास रेंग रहे हैं। मेरा जी चाहता है कि मैं इसे ज़ोर से धक्का दे दूँ, पर सायमा... उसकी इज़्ज़त की चाबी इस शैतान के पास है। मुझे चुप रहना होगा... मुझे इज़्ज़त की बलि देनी होगी ताकि मेरी बच्ची बच सके।"
मुझसे अब और सहा नहीं गया। मेरे अंदर एक ऐसी आग भड़की जिसने डर को राख कर दिया। मैं तेज़ कदमों से उनकी तरफ बढ़ा, मेरे जूतों की आहट उस सन्नाटे को चीरती हुई उन तक पहुँची। वे दोनों चौंके। विशाल ने तेज़ी से अपना हाथ अम्मी के मखमली बदन से हटाया, पर उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक हिकारत भरी मुस्कान थी।
मैं: (सख्त आवाज़ में) "अम्मी!"
अम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने घबराकर अपनी शराबी साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर ठीक किया, जैसे वह अपने गुनाह को ढक रही हों। उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे।
अम्मी: (हकलाते हुए) "सा... साहिल? तू यहाँ?"
फिर वह विशाल की तरफ मुड़ीं। "विशाल जी, यह मेरा बेटा है, साहिल।"
उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपनी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर और भी कस लिया, जैसे वह विशाल की उन नंगी नज़रों के निशानों को मुझसे छुपाना चाहती हों।
विशाल ने मुझे देखा, पर उसकी आँखों में रत्ती भर भी खौफ या शर्मिंदगी नहीं थी। उसने अपनी आस्तीनें नीचे कीं और बड़े इत्मीनान से अपना मज़बूत हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।
विशाल: "साहिल... अकरम ने तुम्हारे बारे में बताया था। मिलकर खुशी हुई।"
उसकी पकड़ फौलादी थी, मर्दानगी का एक ऐसा अहसास जो मुझे दबाने के लिए काफी था। मैंने बस "वही हाल यहाँ भी है" कहा और अपना हाथ झटक कर पीछे खींच लिया। मुझे महसूस हो रहा था कि विशाल की नज़रें अब भी अम्मी के मखमली वजूद पर टिकी थीं, जैसे वह मुझे यह जता रहा हो कि मेरा वहाँ होना महज़ एक औपचारिकता है।
अम्मी की साँसें तेज़ थीं, और उनके वेलवेट ब्लाउज के नीचे उनका पुष्ट सीना मेरी मौजूदगी में और भी तेज़ी से धड़क रहा था।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, साहिल ने हमें इस तरह देख लिया। इसके ज़हन में क्या चल रहा होगा
एक अजीब सी खामोशी छा गई, पर सिर्फ एक पल के लिए। अम्मी ने सोचा, शायद मेरी मौजूदगी से उनकी यह मुलाकात खत्म हो जाएगी, पर विशाल के इरादे कुछ और थे।
विशाल ने मुझे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी नज़रें वापस अम्मी की सुराहीदार गर्दन और उनके नूरानी चेहरे पर टिका दीं।
विशाल: "तो जैसा मैं कह रहा था, आयशा जी... यह शहर बहुत खतरनाक है। यहाँ कब कौन अनजान इंसान आपको अपना बना ले, पता ही नहीं चलता।"
अम्मी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक गहरी कशमकश थी, पर फिर उन्होंने अपनी नशीली निगाहें वापस विशाल की आँखों में गड़ा दीं।
अम्मी: (एक हल्की मुस्कान के साथ) "शहर को क्यों दोष देते हैं, विशाल साहब? यहाँ के लोग ही ऐसे हैं जो अनजान मुसाफिरों के दिल पर दबाव डालकर अपनी बात कबूल कराना बखूबी जानते हैं।"
विशाल: (थोड़ा और करीब झुकते हुए, उसकी आवाज़ अब अम्मी के कानों के पास एक सरगोशी थी) "चोरी का इल्ज़ाम तो गलत है... कुछ दिल तो खुद अपनी मर्ज़ी से कैद होना चाहते हैं।"
यह कहते हुए उसकी निगाहें अम्मी के मम्मों पर जमी हुई थीं। उसकी नज़रों की तपिश ब्लाउज के पार भी अम्मी को झुलसा रही थी।
आयशा ने असहज होकर अपनी निगाहें नीची कर लीं, लेकिन विशाल की वह गहरी, भूखी नज़रें उनके पुष्ट उभारों का पीछा नहीं छोड़ रही थीं।
मैं वहाँ एक पत्थर की तरह खड़ा था, अपनी ही अम्मी और एक अजनबी के बीच चल रहे इस इरोटिक सस्पेंस का अनचाहा गवाह।
अम्मी की पलकें झुक गईं और उनके गुलाबी होठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी—उसमें एक अजीब सी 'हार' थी, जैसे वह विशाल की हवस के सामने खुद को सौंप रही हों, और एक 'जीत' भी, जैसे वह उसे अपने हुस्न के जाल में फँसा रही हों।
मेरा दम घुटने लगा।
मैं: "मुझे… मुझे नानी बुला रही हैं।"
मैं बिना पीछे देखे वहाँ से पलट गया। जाते-जाते मैंने मुड़कर देखा—वे दोनों फिर से अपनी उसी निजी और गुप्त दुनिया में खो चुके थे। अम्मी का वह पुष्ट और रसीला बदन उस अंधेरे कोने में विशाल के साये के नीचे और भी ज़्यादा सेक्सी और बेबस लग रहा था।
मैं अंधेरे की तरफ भाग रहा था, जबकि मेरी अम्मी उस दरिंदे की शर्तों और अपने जिस्म के सौदे के बीच एक ऐसी आग में उतर चुकी थीं, जिसका धुआँ अब पूरी हवेली में फैलने वाला था।
उस रात जब हम कमरे में लौटे, तो दरवाज़ा बंद होते ही बाहर का संगीत का शोर एक दम से कट गया। अंदर एक अजीब सी भारी खामोशी छा गई। इस खामोशी में सिर्फ दो आवाज़ें थीं—मेरी तेज़ चलती सांसें, और अम्मी की साड़ी की सरसराहट जो उनके जिस्म से लिपट कर हल्का शोर कर रही थी।
उनके चेहरे पर थकान के निशान थे, जैसे वह कोई बड़ी जंग लड़कर आई हो।
अम्मी ने जब अपनी पीठ को हल्का सा पीछे की तरफ खींचा, तो उनके पुष्ट अंगों का वक्र और भी नुमाया हो गया। उनके उरोजों का उभार उस तंग कपड़े को चीर देने पर आमादा था।
अम्मी: (एक मखमली और भारी सिसकी के साथ) "आज की रात… बहुत लंबी और बोझिल थी, है ना, साहिल?"
उनकी उंगलियाँ कांप रही थीं जब वे कंधे पर लगी उस सेफ्टी पिन तक पहुँचे। उन्होंने आहिस्ता से पिन खोली, और वह रेशमी पल्लू, धीरे से सरक कर फर्श पर जा गिरा।
पल्लू के गिरते ही जैसे मेरे सामने से हया का आखिरी पर्दा भी हट गया था। अम्मी के वे दूधिया सफेद कंधे और वेलवेट ब्लाउज की तंग गिरफ्त में दबे उनके पुष्ट वक्ष देख मेरी साँसें वहीं थम गईं। उस गहरे रंग के वेलवेट के नीचे उनका गोरा बदन किसी बेशकीमती संगमरमर की तरह चमक रहा था। ब्लाउज की डोरी शायद उनके उन भारी उभारों का बोझ सहने में नाकाम हो रही थी, क्योंकि वे हर तेज़ आती-जाती साँस के साथ बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।
मेरी आँखों में एक अजीब सी बेताबी उतर आई थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपनी सगी अम्मी का यह रूप मुझे इस कदर सुध-बुध खोने पर मजबूर कर देगा। उनकी गर्दन की सुराहीदार बनावट और कंधों की वह मखमली कोमलता देखकर मेरा हाथ खुद-ब-खुद उनकी ओर बढ़ने को तड़प उठा। मेरा गला पूरी तरह सूख चुका था और दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं।
अब साड़ी का सिर्फ वह हिस्सा उनके जिस्म पर बचा था जो उनकी प्लीट्स से जुड़ा था। उनका पल्लू, जो अब तक उनके जिस्म के ऊपरी हिस्से को ढक रहा था, अब उनके पैरों के पास एक रेशमी समंदर की तरह फैला हुआ था।
उनका ब्लाउज गहरे, शराबी रंग के मखमल (वेलवेट) का था, जिसका गला आगे से गहरा U-शेप का था, पर उसकी असली खूबसूरती उसकी पीठ में थी। उनकी पीठ पूरी तरह से खुली तो नहीं थी, लेकिन वह काफी हद तक बेपर्दा थी और मखमली त्वचा का एक बड़ा हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
डांस और गर्मी की वजह से उनकी स्किन पर पसीने की जो हल्की, चमकती हुई परत थी, वह साफ़ झलक रही थी। ब्लाउज का कपड़ा कई जगहों से उनकी स्किन से चिपक गया था, उनकी रीढ़ की हड्डी के कर्व को और भी गहरा और आकर्षक बना रहा था। उनकी पीठ एक साफ़, बेदाग कैनवस की तरह थी, जो सब कुछ छिपाकर भी, सब कुछ दिखा रही थी।
उनका यह अंदाज़ एक बेफिक्र आज़ादी से भरा था। उनके लिए मैं अभी भी वही मासूम बेटा था, जिसके सामने पर्दे की ज़रूरत नहीं थी।
वह सीधे ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर खड़ी हो गईं। शीशे में वह खुद को नहीं, शायद उस औरत को देख रही थीं जो वह आज रात थीं—आयशा।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, मेरा यह मखमली बदन जैसे मेरा अपना नहीं रहा। विशाल ने आज महफिल में मेरे इन मम्मों को जिस तरह अपनी हथेलियों में भींचा था, उसकी हरारत अभी भी मेरे निप्पल्स को सख्त कर रही है। मेरा पेटीकोट अभी भी उस नमी से गीला है जो उस हैवान की दरिंदगी ने पैदा की थी।“
अम्मी (मन में): “साहिल मुझे देख रहा है… क्या उसे मेरी इस 'गद्दार' देह की महक आ रही होगी? क्या वह मेरी आँखों में छिपी उस ज़िल्लत को पढ़ पा रहा है जो मैं विशाल के पास छोड़ आई हूँ? मेरा वजूद आज दो पाटों के बीच पिस रहा है—एक तरफ अपनी सायमा की इज़्ज़त बचाने की तड़प और दूसरी तरफ अपने ही जिस्म की यह बेवफाई, जो उस ज़ालिम की छुअन पर इस कदर प्रतिक्रिया दे रही है।"
उनके गीले और सुर्ख होंठों पर एक अजीब, फीकी सी मुस्कान फैली हुई थी—एक ऐसा राज़ जिसे वह बार-बार अपने ज़हन में दोहरा रही थीं।
उनकी उंगलियां अपने कान तक गईं और उन्होंने हीरे के टॉप्स को आहिस्ता से निकाला। फिर उनके हाथ उनकी गर्दन पर गए। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, एक गहरी सांस ली, और अपनी सोने के हार का पेच खोला। जब हार उनकी गोरी स्किन से अलग हुई, तो एक पल के लिए उसकी जगह पर एक हल्की सी लाल लकीर रह गई।
"अम्मी," मैंने आवाज़ को नॉर्मल रखने की कोशिश करते हुए कहा। "आप थकी नहीं हैं?"
शीशे से ही मुझे देखते हुए उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "थकान? आज तो थी, पर बहुत दिन बाद इतना अच्छा लगा।"
उन्होंने अपनी चूड़ियाँ उतारना शुरू कीं। एक-एक करके, सोने की चूड़ियाँ उनकी नर्म कलाई से सरक रही थीं, और उनकी 'खन-खन' की आवाज़ कमरे की खामोशी में एक संगीत की तरह गूँज रही थी।
"अकरम के दोस्त काफी अच्छे थे ना?" मैंने अचानक कहा, मेरी आवाज़ में एक बच्चों जैसी उत्सुकता थी।
अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का। अकरम के दोस्त (विशाल) उस ज़हरीले नाम का ज़िक्र सुनते ही उनके ज़हन में वही मंज़र ताज़ा हो गया—विशाल के वे हाथ और उनके वक्षों पर बढ़ता उसका बेबाक दबाव। सचाई उनके हलक तक आ गई थी, पर ज़ुबान पर ताला लगा था। वह बस "हूँ" कह सकी।
"अम्मी, आपको विशाल कैसे लगे? मैंने देखा कि आप उनसे काफी देर तक बातें कर रही थीं।"
वह मेरी तरफ पलटीं, उनकी आँखों में शायद एक डर था या कुछ और, मैं समझ नहीं पाया।
अम्मी (अपने खयालों में): "साहिल इतने सवाल क्यों कर रहा है? क्या उसे मुझ पर शक हो गया है? या अल्लाह, मैं किस मुसीबत में फँस गई हूँ। मेरा बस चले तो मैं उस शख्स को अपने पास फटकने भी न दूँ। लेकिन मुझे साहिल के सामने ऐसा जताना होगा जैसे मुझे उसकी सोहबत सच में पसंद आई है, वरना इसके शक की सुई कहीं और ही घूम जाएगी।"
अम्मी: "कितना सुलझा हुआ आदमी है। और बातें… ऐसी गहरी बातें करता है कि वक्त का पता ही नहीं चलता।"
वह बता रही थीं, और मैं सुन रहा था। पर मैं सिर्फ उनके लफ़्ज़ नहीं सुन रहा था। मैं उनकी बदलती आवाज़ सुन रहा था। मैं उनके चेहरे पर आती लाली देख रहा था। मैं उनकी आँखों में वह खुमारी देख रहा था जो किसी की यादों से पैदा होती है।
"कह रहा था दिल्ली का शहर लोगों को अपना बना लेता है," उन्होंने हंसते हुए कहा, उस फ्लर्टी लाइन को एक मासूम सी, फलसफे वाली बात की तरह पेश करते हुए। "बहुत अजीब है ना?"
मैं कुछ नहीं बोला। मैं बस उस औरत को देख रहा था जिसे मैं अपनी 'अम्मी' कहता था। वह आज एक नई औरत लग रही थी। एक ऐसी औरत जिसके अंदर एक राज़ था, एक ऐसी खुशी थी जिसका हिस्सा मैं नहीं था, मेरे अब्बू नहीं थे।
"बड़ा शरीफ और तमीज़दार लगा मुझे," वह कहती चली गईं, अपनी ही धुन में, यह समझे बिना कि उनका हर लफ़्ज़ मेरे सीने में एक खंजर की तरह उतर रहा था। "साहिल? सुन रहे हो?"
"हाँ, अम्मी," मैंने आखिरकार कहा।
"अच्छा है।"
"अच्छा ही तो है," उन्होंने खुश होकर कहा, जैसे मेरे इस छोटे से जवाब ने उनकी हर बात पर मोहर लगा दी हो। "चलो, अब सो जाओ। कल हल्दी है, बहुत काम होगा।"
वह वापस ड्रेसिंग टेबल की तरफ मुड़ गईं, अपने खयालों में मुस्कुराते हुए। पर मैं जानता था। उनकी मुस्कुराहट हल्दी की तैयारियों के लिए नहीं थी। वह उस आदमी के लिए थी, जिसने एक ही शाम में मेरी माँ को फिर से आयशा बना दिया था। और उस रात, कमरे की उस खामोशी में, मुझे नींद नहीं आई।
अम्मी (मन में): "साहिल को लग रहा है कि मैं थकी हुई हूँ, पर मेरी रगों में तो उस हैवान के दिए हुए नशे की आग दौड़ रही है। मेरे होठों पर यह मुस्कान... यह मेरी बेबसी है या उस ज़हरीली वासना की खुमारी? मेरे मम्मे इस तंग ब्लाउज के अंदर अभी भी विशाल की उंगलियों की जलन महसूस कर रहे हैं। मेरी पीठ पर यह पसीना... यह उस डर और लज्ज़त की गवाही है जो आज मैंने सही है।"
अम्मी ने आईने में खुद को देखा, और पहली बार उन्हें अपना ही चेहरा किसी अजनबी जैसा लगा। उनकी आँखों के कोरों में छाई वह सुर्खी सिर्फ थकान नहीं थी, बल्कि उस अपमान की आंच थी जिसने उनकी रूह को झुलसा दिया था। उन्होंने अपने काँपते हाथों से ब्लाउज के गले को थोड़ा ऊपर खींचने की कोशिश की, जैसे वह उन उंगलियों के निशानों को दुनिया से, और खुद अपने बेटे से छिपाना चाहती हों।
अम्मी (मन ही मन): "या अल्लाह, मुझे हिम्मत दे। मेरा यह दूधिया बदन आज एक गुनाह की गवाही दे रहा है। मैं कैसे नज़रें मिलाऊँ अपने बेटे से, जब मेरे वजूद का कोना-कोना उस गैर-मर्द की छुअन से अभी भी दहक रहा है?"
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उधर दूसरी तरफ, विशाल अपने आलीशान बेडरूम में बिस्तर पर अधलेटा था। कमरे की मद्धम रोशनी में उसके चेहरे पर एक दरिंदगी भरी चमक थी। उसके हाथ में उसका फोन था, जिसमें वह सायमा की उन तमाम तस्वीरों और वीडियो को स्क्रॉल कर रहा था जिनका इस्तेमाल उसने उसे ब्लैकमेल करने के लिए किया था।
जैसे-जैसे वह सायमा के उन वीडियो को देख रहा था, उसकी कल्पनाओं में सायमा का चेहरा धुंधला होने लगा और उसकी जगह आयशा का वह मखमली और पुष्ट बदन उभर आया। वह कल्पना करने लगा कि उन शर्मनाक वीडियो में सायमा की जगह आयशा है—वही गहरा उबटन जैसा रंग, वही भारी मम्मे और वही बेबस आँखें।
उसका एक हाथ उसके लंड पर था, जिसे वह आयशा के ख्यालों में डूबा हुआ तेज़ी से सहला रहा था। उसकी साँसें भारी हो रही थीं और आँखों में हवस का नंगा नाच था।
विशाल (खुद से फुसफुसाते हुए): "आह्ह... आयशा। अभी तो सिर्फ शुरुआत है। बहुत जल्द इन वीडियो में सायमा नहीं, तुम होगी। मैं तुम्हारे साथ भी बिल्कुल ऐसे ही वीडियो बनाऊँगा... तुम्हारी हर कराह और हर सिसकी को रिकॉर्ड करूँगा।"
उसने एक कुटिल और शैतानी हंसी हंसी।
विशाल: "कितनी भोली है यह औरत... इसे लगता है कि मेरी बात मानकर, मेरे हाथों खुद को मसलवाकर यह सायमा को बचा लेगी। तुम सायमा को बचाने के चक्कर में उस दलदल में उतर चुकी हो जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। मैं तुम्हें इस कदर बर्बाद करूँगा कि तुम खुद अपनी परछाईं से डरोगी।"
विशाल की आँखों के सामने संगीत की उस महफिल का नज़ारा किसी फिल्म की तरह घूमने लगा। वह याद कर रहा था कि कैसे आयशा महफिल के बीचों-बीच नाच रही थी। उसकी हर थिरकन के साथ उसके वे भारी और पुष्ट मम्मे जिस तरह लहरा रहे थे, विशाल की नज़रें वहीं जम गई थीं। साड़ी के पल्लू और तंग ब्लाउज के नीचे उनकी वह 'शान' देखकर विशाल उसी पल तय कर चुका था कि इन उभारों को अपनी हथेलियों में भरकर इनकी गहराई को महसूस करना ही है।
वह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अपनी आँखें मूँदकर उसी मंज़र को फिर से जीने लगा।
विशाल (मन में): "क्या कयामत ढाह रही थी वह... नाचते हुए जब उसका जिस्म लचकता था, तो वे मम्मे भी अपनी आज़ादी के लिए मचलते थे। मैं तो बस मौके की तलाश में था कि कब इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचूँ, और इस नादान औरत ने खुद ही मुझे वह मौका दे दिया।"
वह सोचकर और भी उत्तेजित हो गया कि कैसे आयशा खुद उसके पास चलकर आई थी, सायमा को छोड़ने की भीख माँगने। उसने खुद ही उस शेर के जबड़े में अपना सिर दे दिया था।
विशाल: "बेवकूफ औरत... उसे लगा कि अपनी इज़्ज़त की बोली लगाकर वह सायमा को बचा लेगी। उसे क्या पता कि उसने मुझे वह 'ओपनिंग' दे दी है जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था। अब तो वह मेरी मर्जी की ग़ुलाम है। आज तो सिर्फ हाथ लगाया है, बहुत जल्द उसे अपनी बाहों में ऐसा जकड़ूँगा कि वह सायमा का गम भूलकर अपनी बर्बादी का जश्न मनाएगी।"
उसे याद आया कि जब उसकी हथेली आयशा के उस नंगे पेट पर पड़ी थी, तो वह मखमली अहसास कितना जादुई था। वह गोरा, दूधिया हिस्सा जो डर के मारे अंदर की तरफ सिकुड़ रहा था, विशाल की उंगलियों के नीचे किसी रेशम की तरह फिसल रहा था।
उसने बिस्तर पर करवट ली और अपनी आँखें मूँदकर उस पल को फिर से महसूस किया जब उसने आयशा को मजबूर किया था कि वह खुद विशाल के हाथ पकड़कर अपने मम्मों पर रखे। वह बेबसी, वह काँपते हुए हाथ और आयशा की आँखों में तैरता वह खौफ—विशाल के लिए किसी नशे से कम नहीं थे।
विशाल (मदहोश होकर फुसफुसाते हुए): "आह्ह... वो पल सबसे शानदार था। जब मैंने उसे अपनी आँखों में देखने पर मजबूर किया और मेरे दोनों हाथ उसके ब्लाउज और ब्रा की सीमाओं को तोड़कर उन नंगे चूँचों पर जम गए थे।"
वह याद कर रहा था कि कैसे उसके हाथ उन गर्म और पुष्ट उभारों की नंगी छुअन को महसूस कर रहे थे। आयशा का वह जिस्म, जो शर्म से लाल हो रहा था, विशाल की हथेलियों में पूरी तरह समाया हुआ था।
उसने सोचा कि कैसे आयशा के वे नंगे मम्मे उसकी उंगलियों के बीच दबकर अपनी शक्ल बदल रहे थे। वह गर्मी, वह नमी और वह रूह कंपा देने वाली सिहरन विशाल के दिमाग पर छा गई थीं।
विशाल (हाँफते हुए): "आह्ह... आयशा। तुम्हारी वो दूधिया त्वचा... और वो ज़ालिम उभार। जब मैंने उन्हें मसला था, तो तुम जिस तरह तड़पी थीं, मेरा रोम-रोम जाग उठा था।"
विशाल का हाथ अब उसके लंड पर अपनी पूरी रफ़्तार में था। वह कल्पना कर रहा था कि आयशा की पीठ उस दीवार से सटी हुई है और उसके दोनों हाथ आयशा के ब्लाउज के अंदर घुसकर उन नंगे चूँचों के साथ बेरहमी से खेल रहे हैं। उसे महसूस हो रहा था कि कैसे उसके निप्पल्स उसकी उंगलियों के दबाव में और भी सख्त और उत्तेजित हो रहे थे।
विशाल: "वो डर... तुम्हारी उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो बेबसी और छिपी हुई चाहत... वही तो मेरा असली इनाम है। तुम जितना डरोगी, मुझे तुम्हें मसलने में उतना ही मज़ा आएगा।"
उसकी साँसें अब उखड़ रही थीं। आयशा के उस नंगे पेट की नरमी और उसके भारी वक्षों की गर्माहट का ख्याल जैसे उसके दिमाग की नसों को फाड़ देने वाला था। उसने कल्पना की कि वह आयशा का वह वेलवेट ब्लाउज फाड़ चुका है और वह पूरी तरह से ऊपर से नंगी उसके सामने खड़ी है, उसकी इज़्ज़त की आखिरी दीवार भी अब विशाल के पैरों तले है।
जैसे ही विशाल अपनी उत्तेजना के चरम पर पहुँचा, उसने एक ज़ोरदार सिसकी ली और उसका शरीर बिस्तर पर अकड़ गया। आयशा का नाम उसके होंठों पर एक इबादत की तरह निकला, पर उसकी आँखों में जो चमक थी, वह किसी शैतान की जीत जैसी थी।
विशाल (खुद को सँभालते हुए, एक कुटिल मुस्कान के साथ): "आज तो सिर्फ हाथ लगा कर महसूस किया है आयशा... अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं तुम्हें अपनी रूह और जिस्म की गहराइयों तक रुला दूँगा। और तुम... तुम खुशी-खुशी अपनी इज़्ज़त मेरे कदमों में बिछा दोगी।"
उसने अपना फोन पास रखा और छत की तरफ देखते हुए एक ठंडी मुस्कान के साथ अगली मुलाकात का मंज़र बुनने लगा, जहाँ आयशा सिर्फ एक 'मेहमान' नहीं, बल्कि उसकी हवस की 'कैदी' होने वाली थी।
Deepak Kapoor
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