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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
हकीकत का डरावना चेहरा
 
अचानक, शेर की आँखें खुलीं। कमरे में सन्नाटा था। न कोई सिसकी थी, न कोई रेशमी साया।
 
शेर हाँफ रहा था, उसका गला पूरी तरह सूख चुका था। उसने झटके से अपने चारों तरफ देखा—वहाँ न मीरा थी, न उसकी वह नीली ड्रेस, और न ही वह वहशी मिलन। वह अपने उसी बदबूदार और छोटे से कमरे में अकेला था।
 
उसका हाथ अनजाने में ही अपनी जाँघों के बीच गया। उसकी लुंगी उसके चिपचिपे वीर्य से सनी हुई थी।। वह गरम वीर्य जिसे उसने मीरा की गहराई में गिराया था, वह असल में उसके अपने कपड़ों पर बह चुका था। उसका वह 7 इंच का 'घमंड' अब ढीला पड़कर सुस्त पड़ा था, जो बस कुछ पल पहले मीरा के अंदर तबाही मचा रहा था।
 
शेर [हताशा और गुस्से में फुसफुसाते हुए]: "धत तेरी की... सपना! साला सब सपना था!"
 
जैसे-जैसे उसकी याददाश्त साफ़ हुई, हकीकत एक ठंडे साये की तरह उस पर छा गई।
 
शेर [मन ही मन - सदमे में]: 'ये... ये सब क्या था? मेमसाब कहाँ हैं?'
 
उसे धीरे-धीरे सब याद आने लगा। मीरा उसे सहारा देकर उसके क्वार्टर तक लाई थी। फिर जैसे ही वे कमरे के अंदर पहुँचे, वह जानबूझकर नीचे गिर गया और साथ ही मीरा को भी अपने सीने पर खींच लिया। उसने चतुराई से मीरा का हाथ अपने लंड पर रखवा दिया और उसे बताया कि यह हिस्सा इतना सख्त इसलिए है क्योंकि उस चोरनी ने वहाँ ज़ोर से वार किया था।
 
फिर किसी तरह मीरा उसकी पकड़ से छूटी और उसे बिस्तर तक पहुँचाने में मदद की। बिस्तर पर लिटाने के बाद मीरा बिना कुछ कहे वहाँ से निकल गई, जैसे उसे किसी बात पर शर्म आ रही हो।
 
वह सारा मंज़र—मीरा का उसे सहारा देना, उसका नाइटगाउन खुलना, और बिस्तर पर वह वहशी खेल—सिर्फ सपना था।
 
शेर अपनी आँखें मूँदे बिस्तर पर लेटा हुआ था, उसके दिमाग में अभी भी उन काल्पनिक सिसकियों की गूँज बाकी थी।  
 
शेर ने बिस्तर पर पड़े अपने हाथ को देखा, जो अब गंदा हो चुका था। उसने अपनी मुट्ठी भींची।
 
शेर: (गुस्से और हताशा में बुदबुदाते हुए) "साली यह मीरा मेमसाहब, मुझे पागल कर रही है। यह एक ऐसी आग है जो मुझे जलाए जा रही है; हर बार वह बच जाती है। मुझे हर बार इतना पास आकर भी खाली हाथ लौटना पड़ता है।"
 
शेर ने गुस्से में अपनी मुट्ठी बिस्तर पर दे मारी, उसकी आँखों में हवस और बदले की मिली-जुली चिंगारियाँ सुलग रही थीं। वह अपनी ही कल्पनाओं के उस अधूरी प्यास से तिलमिला रहा था, जिसने उसे हकीकत और भ्रम के बीच में फँसा दिया था।
 
उसे अपनी हार का अहसास हुआ। मीरा ने उसे न केवल शारीरिक रूप से चोट पहुँचाई थी, बल्कि उसकी मर्दानगी को धूल में मिला दिया था। वह अकेला, पसीने में तर और अपने ही गंदे ख्यालों के बीच पड़ा रह गया, जबकि मीरा अपने कमरे में सुरक्षित थी।
 
शेर ने खुद को शांत करते हुए मन ही मन कहा, "खुद पर गुस्सा मत कर शेर। देख तूने आज क्या हासिल किया है। तूने आज मीरा मेमसाब को सिर्फ छुआ ही नहीं, बल्कि उन्हें नंगा कर के उनके शरीर के हर हिस्से को छुआ, चाटा और मरोड़ा है। भले ही तेरा बहाना उस चोरनी को पकड़ने का था, लेकिन वह अच्छी तरह जानती थी कि वह हाथ तेरा ही था। यह उस चोरी-छिपे बाथरूम से देखने या गहरी दवा की नींद में बेडरूम में उन्हें छूने से कहीं लाख गुना बेहतर था।"
 
वह अपनी खटिया पर चित लेटा हुआ था, छत की ओर देखते हुए एक हाथ अपने सीने पर फेर रहा था। बंद आँखों के पीछे वही नज़ारा फिल्म की तरह चल रहा था जिसे उसने अपनी आँखों से जिया था।
 
शेर [मन ही मन]: 'आह... मेमसाब! क्या कयामत जिस्म पाया है आपने। उस अँधेरे में जब आपकी वो नीली थोंग उतरी, तो लगा जैसे जन्नत का दरवाज़ा खुल गया हो। आपकी वह गुलाबी योनि... बिलकुल किसी ताज़ा खिले हुए फूल की कली जैसी, जो डर और उत्तेजना से काँप रही थी। उस पर जो नमी थी, वो किसी अमृत से कम नहीं थी।'
 
शेर के चेहरे पर एक वहशी मुस्कान फैल गई। उसे याद आया कि कैसे उसने मीरा के स्तन अपनी मुट्ठी में भींचे थे।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'कितने सख्त और रसीले... जब मैंने उन्हें मरोड़ा, तो आपकी वो दबी हुई चीख ने मेरे खून की गर्मी बढ़ा दी थी। और जब मेरा मुँह वहां पहुंचा... उफ़! आपके उन निप्पल्स का स्वाद अभी भी मेरी ज़ुबान पर चढ़ा हुआ है। फिर वो नंगे और पसीने से भीगे हुए कूल्हे... जब मैंने आपकी गांड़ को अपनी हथेलियों में भरा और उसे जी भरकर चूसा, तो लगा जैसे दुनिया की सारी दौलत मेरी मुट्ठी में है।'
 
उसके चेहरे पर अब एक शैतानी संतोष की लहर दौड़ गई। उसे याद आया कि कैसे उसकी उंगलियां उन मखमली अंगों को महसूस कर रही थीं और मीरा चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रही थी।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: "और सबसे बड़ी बात थी मीरा की वो आहें... माय गॉड! 'प्लीज मत करो', 'आह'... उनकी हर एक कराह मेरे दिल को ठंडक पहुँचा रही थी।"
 
यह पहली बार था जब उसने मीरा के होश-ओ-हवास में रहते हुए उसके जिस्म की सीमाओं को लांघा था। उसे समझ आ गया था कि अब मीरा के मन में उसके स्पर्श की एक अमिट छाप छूट चुकी है, जो उसे अंदर ही अंदर बेचैन करती रहेगी।
 
 
उस रात कमरे के भीतर सन्नाटा था।, पर मीरा के दिमाग में तूफ़ान मचा हुआ था। वह बिस्तर पर लेटी हुई थी, लेकिन उसकी आँखें छत को ताक रही थीं। जिस्म ठंडा पड़ चुका था, मगर नसों में अभी भी उस दवा की मद्धम सी लहर दौड़ रही थी, जो रह-रहकर उसके बदन में कंपकंपी पैदा कर देती थी।
 
मीरा ने करवट बदली। जैसे ही उसकी कोमल त्वचा रेशमी चादर से रगड़ी, उसे वही अहसास वापस याद आया—शेर के उन सख्त हाथों का स्पर्श।
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'क्यों... क्यों मेरा जिस्म अभी भी उस जलन ढूँढ़ रहा है? वह एक दरिंदा है… उसने मुझे अँधेरे में दबोचा, मुझे बेबस किया। पर वो अहसास...'
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'वो पल... जब उसने मुझे पीछे से दबोचा था। उसके हाथों का वो सख्त अहसास मेरे स्तनों पर... वो नफरत से मरोड़ रहा था या हवस से? पर मेरे शरीर ने क्यों साथ दिया? जब उसने मेरे कूल्हों को अपनी गिरफ्त में लिया और अपना मुँह वहाँ लगाया, तो मेरी रूह तक काँप गई थी। वो अपमान था... पर उस अपमान में एक अजीब सा खिंचाव था।'
 
वह चाहकर भी उस खिंचाव को नकार नहीं पा रही थी। दवा के उस शैतानी असर ने उसकी नैतिकता और उसकी वासना के बीच की दीवार को धुंधला कर दिया था।
 
उसे खुद से घिन आ रही थी कि वह एक नौकर की उन हरकतों को याद कर रही है, लेकिन दवाई का असर और उस पल की उत्तेजना ने उसके भीतर एक ऐसी हलचल मचा दी थी जिसे शांत करना उसके बस में नहीं था। वह जितनी बार सरताज का चेहरा याद करने की कोशिश करती, शेर की भारी आवाज़ उसके कानों में गूँज उठती, "देखिए तो सही... ये कैसे मेरे हाथों में समा रहे हैं।"
 
मीरा [मन ही मन]: 'उसने मुझे देखा है... पूरी तरह नंगा। उसकी उँगलियों और ज़ुबान के निशान अब भी मेरे बदन पर जैसे जल रहे हैं। उसे भले ही लगता हो कि उसने किसी चोरनी को भोगा है, पर मेरा रोम-रोम जानता है कि उस वक्त मैं उसके नीचे पिस रही थी। क्या अब मैं कभी उसके सामने सिर उठाकर खड़ी हो पाऊँगी?'
 
मीरा [मन ही मन]: 'कम से कम एक बात की राहत है... उसे नहीं पता कि वो मैं थी। वो तो उस 'चोरनी' को मज़ा चखा रहा था। अगर उसे ज़रा भी शक होता कि वो उसकी मेमसाहब है, तो वो कभी अपनी हद पार नहीं करता। बेचारा... वो तो वफ़ादारी निभा रहा था।'
 
तभी, अचानक उसे शेर के वे शब्द याद आए जो उसने उस अंधेरे गलियारे में फुसफुसाए थे। मीरा के कान सुन्न हो गए।
 
शेर की आवाज़ (यादों में गूँजते हुए): "कितनी गुलाबी दिख रही है, बिल्कुल तेरे ऊपरी लबों की तरह। क्या मेरी मेमसाहब की भी तेरे जैसी ही होगी? काश मैं कभी देख पाता..."
 
मीरा की धड़कन तेज़ हो गई। उसने आँखें मूँद लीं। वह शब्द उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगे—"काश मैं कभी देख पाता…"
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'इसका मतलब... शेर मुझे उस नज़र से देखता है? वो मेरी तुलना उस चोरनी के नंगे जिस्म से कर रहा था। वो मेरे अंगों के बारे में सोचता है... वो मुझे पाना चाहता है!'
 
उसे अहसास हुआ कि शेर की वफ़ादारी के पीछे एक सुलगती हुई हवस छिपी है। वह उसे 'सती-सावित्री' और 'देवी' कहता है, पर मन ही मन वह उसे अपनी मर्दानगी के नीचे कुचलने के सपने देखता है।
 
मीरा ने अपने कांपते हाथों से अपने ही बदन को छुआ। जहाँ-जहाँ शेर के हाथ लगे थे, वहाँ अभी भी एक मीठा दर्द बाकी था।
 
मीरा [मन ही मन - हवस और भ्रम के बीच]: 'वो मुझे चाहता है... और आज उसने अनजाने में ही सही, मुझे पा लिया। उसे लग रहा है कि उसने किसी चोरनी को भोगा, पर उसने मुझे छुआ है। क्या वो सच में नहीं जानता था? या फिर... क्या उसने ये सब जानबूझकर किया?'
 
वह उलझ गई थी। लेकिन एक बात साफ़ थी—अब जब भी शेर उसके सामने आएगा, वह उसे एक नौकर की तरह नहीं देख पाएगी। उसे पता चल चुका था कि  वो   उसके जिस्म का प्यासा है।
 
 
 
अगली सुबह मीरा आईने के सामने खड़ी थी, पर आज उसकी आँखों में वह पहले वाली मासूमियत नहीं थी। उसने लाल शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे बदन पर लिपटी हुई थी। शिफॉन का पतला कपड़ा उसके शरीर के उतार-चढ़ाव को नुमाया कर रहा था, लेकिन मीरा का ध्यान अपनी खूबसूरती से ज़्यादा अपने वजूद पर था।
 
उसने आईने में अपनी गर्दन और कंधों को गौर से देखा। उसे अभी भी वहीं कहीं शेर के उन हाथों का अहसास हो रहा था। उसका चेहरा शर्म और गुस्से से लाल-सुर्ख हो गया।
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'कल की वो घटना... और रात की वो दवा लगाने वाली बात। शेर की आँखों में वो जो चमक थी, वो दर्द की नहीं थी। वह मुझे देख रहा था… जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखता है।'
 
मीरा ने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और कस लिया। उसे अब अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी थी। वह जानती थी कि शेर भले ही सरताज के सामने कितना भी ईमानदार और वफ़ादार बनने का नाटक करे, पर उसके मन के अंधेरे कोनों में मीरा के लिए एक ऐसी चाहत पल रही है जो किसी भी वक्त मर्यादा की सरहदें लांघ सकती है।
 
मीरा [मन ही मन]: 'उसने कहा था—"काश मैं कभी देख पाता।" वह मेरे शरीर के बारे में सोचता है। वह मेरी तुलना उस चोरनी से कर रहा था ताकि वह अपनी हवस को वफ़ादारी का नाम दे सके। मुझे अब बहुत सावधान रहना होगा। सरताज तो उस पर आँख बंद करके भरोसा करते हैं।'
 
मीरा ने तय कर लिया था कि अब वह शेर को अपने करीब आने का एक भी मौका नहीं देगी। उसे अब अपनी दूरी बनाए रखनी थी, क्योंकि कल उसका अपना शरीर भी उसके साथ गद्दारी कर चुका था। वह उस अहसास से डर रही थी जो शेर के स्पर्श ने उसके भीतर जगाया था।
 
उसने अपनी बिंदी ठीक की और एक गहरी सांस ली। 
 
सरताज ऑफिस जाने के लिए तैयार था। अपनी रिवॉल्वर चेक करते हुए वह मीरा के पास आया और उसके माथे को चूमते हुए बोला।
 
सरताज: "मीरा, मैं ऑफिस निकल रहा हूँ। आज तुम्हें एक काम करना है… ज़रा शेर को देख लेना। बेचारे को बहुत ज़ोर की चोट लगी है। रात भर दर्द से कराह रहा था। वह कह रहा था कि उस चोरनी ने उसके अंडकोष पर बड़ी बेरहमी से लात मारी है। उसे मरहम या कोई दवा दे देना, आखिर उसने कल अपनी जान पर खेलकर तुम्हारी रक्षा की है।"
 
सरताज के ये शब्द सुनते ही मीरा का चेहरा लाल-सुर्ख हो गया। उसके पेट में जैसे मरोड़ उठने लगी। वह जानती थी कि वह 'बेरहम चोरनी' कोई और नहीं, बल्कि वह खुद थी। उसने ही अपनी पूरी नफ़रत और ताकत उस लात में झोंक दी थी।
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'हे भगवान! सरताज मुझसे उसी दरिंदे की सेवा करने को कह रहे हैं जिसने कल रात मेरी गरिमा के साथ खिलवाड़ किया? मैं उसे कैसे देखूँगी? उसकी आँखों में कैसे झाँकूँगी?'
 
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, "आप चिंता मत करो, मैं देख लूँगी और अगर उसे ज़्यादा दर्द हुआ तो डॉक्टर के पास ले जाऊँगी।"
 
सरताज के जाते ही मीरा की मुस्कुराहट गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरी चिंता और घबराहट ने ले ली। उसे अच्छी तरह पता था कि शेर की वह चोट महज़ एक बहाना हैउसे अपने करीब बुलाने का।
 
मीरा ने एक आखिरी बार आईने में खुद को देखा। लाल शिफॉन की साड़ी उसके जिस्म पर इस कदर खिल रही थी कि खुद उसकी अपनी नज़रें ठहर गईं। उसने अपने होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान लाते हुए खुद से फुसफुसा कर कहा:
 
"सच तो ये है कि मैं शेर को पूरी तरह दोष भी नहीं दे सकती। आखिर कोई भी इंसान मुझ पर मर मिटे। ये बदन ही ऐसा है..."
 
पर अगले ही पल उसकी मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरी चिंता ने ले ली। उसने अपने सीने पर हाथ रखा, जहाँ धड़कनें बेकाबू थीं।
 
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'असली दुश्मन बाहर नहीं, मेरे अंदर है। मैं ये सब क्यों महसूस कर रही हूँ? क्यों शेर की उन गंदी बातों और उसके वहशी स्पर्श को याद करके मेरा शरीर फिर से वही अजीब सी उत्तेजना महसूस करने लगता है? 'कल रात जो हुआ, वो सिर्फ उस दवा का असर था जो मैं प्रेगनेंसी के लिए ले रही हूँ, या मेरे अंदर की कोई दबी हुई प्यास?''
 
उसने सोचा कि क्या उसे सरताज को सब बता देना चाहिए।
 
मीरा [मन ही मन]: "क्या मुझे सरताज को बता देना चाहिए कि इन दिनों मैं कितनी उत्तेजित महसूस कर रही हूँ? पर क्या वो समझेंगे? कहीं वो मुझ पर शक तो नहीं करने लगेंगे कि उनकी पत्नी के मन में ऐसे गंदे ख्याल क्यों आ रहे हैं? नहीं... उन्हें यह सब बताना ठीक नहीं होगा। यह आग मुझे अंदर ही अंदर जला रही है, पर इसका ज़िक्र करना अपनी ही नज़रों में गिरना होगा।"
 
उसने एक गहरी और बेचैन साँस ली। उसे लगा कि शायद यह कोई शारीरिक या मानसिक समस्या है। शायद वह जो दवाई प्रेगनेंसी के लिए ले रही थी, उसने उसके हॉर्मोन्स में कुछ ऐसी गड़बड़ी कर दी है जो उसे काबू से बाहर कर रही है।
 
मीरा [मन ही मन]: "मुझे अपनी डॉक्टर से बात करनी ही होगी। किसी पेशेवर से सलाह लेना ही इस वक्त सबसे सही रास्ता है, इससे पहले कि मेरी यह अंदरूनी आग मुझे किसी ऐसे रास्ते पर ले जाए जहाँ से लौटना मुमकिन न हो। यह तड़प, यह अहसास... यह सब सामान्य नहीं है।"
 
तभी उसे सरताज का निर्देश याद आया—शेर को मरहम लगाने का। वह फिर से हिचकिचा गई। अब वह शेर के करीब जाने का ज़रा भी जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। कल का वह नज़ारा और शेर की वह वहशी निगाहें उसके जेहन में ताज़ा थीं। उसने तुरंत इंटरकॉम उठाया और गेट पर तैनात गार्ड को बुलाया।
 
जब गार्ड अंदर आया, तो मीरा ने दवा उसके हवाले करते हुए सख्त लहजे में कहा:
मीरा: "गार्ड, यह दवा ले जाओ और शेर को दे दो। उसके शरीर पर जहाँ भी चोट लगी है, वहाँ इसे लगा देना। उसका पूरा ध्यान रखना और मुझे स्टेटस अपडेट देना कि अब उसकी तबीयत कैसी है। अगर उसे आराम नहीं मिलता, तो मुझे तुरंत खबर करना, फिर हम उसे दिखाने के लिए डॉक्टर को बुला लेंगे।"
 
गार्ड: "जी मेमसाहब, आप फिक्र न करें। मैं अभी जाकर उसे देख लेता हूँ।"
 
गार्ड ने सिर झुकाया, दवा ली और शेर के कमरे की ओर चल दिया। मीरा उसे जाते हुए देखती रही।
 
शेर अपने कमरे में बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। उसके दिमाग में अभी भी वही वहशी ख्याल चल रहे थे कि कैसे वह आज मीरा मेमसाहब के हाथों की नरमी का मज़ा लेगा और वहीं से शुरू करेगा जहाँ कल रात उसका भ्रम टूटा था। वह अपनी जाँघों पर चादर डालकर लेटा हुआ था, यह सोचकर कि जब मीरा मरहम लगाएगी, तो वह उसे एक बार फिर अपनी गिरफ्त में ले लेगा।
 
लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़े पर मेमसाहब के बजाय गार्ड को मरहम के साथ खड़ा देखा, उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसे अपनी योजना फेल होती दिखी। उसने मन ही मन मीरा को गंदी गाली देते हुए सोचा, "हरामी औरत... इतनी चालाक निकलेगी सोचा नहीं था। खुद आने के बजाय गार्ड को भेज दिया।"
 
उसने गुस्से में गार्ड की तरफ देखा और कर्कश आवाज़ में बोला, "रख दे इसे वहाँ, मैं खुद लगा लूँगा।" वह चिढ़ रहा था कि मीरा ने इतनी खूबसूरती से उसकी चाल को मात दे दी थी और खुद को उसके साये से भी दूर रखा था।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: "धत् तेरे की! लगता है कल मेमसाब का हाथ अपने लंड पर रखवाकर मैंने जल्दबाज़ी कर दी। शेर, तूने शिकार को वक्त से पहले ही चौंका दिया, इसीलिए तो वो कन्नी काट रही है। उसे बिस्तर तक खींचने का यह मरहम वाला पैंतरा तो बेकार गया।"
 
उसने गुस्से में चादर एक तरफ फेंकी और उठकर बैठ गया। उसकी आँखों में एक शातिर चमक उभरी।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: "अब यहाँ पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। मुझे अभी उठकर वापस किचन की कमान संभालनी होगी। तभी तो मैं उस दवा को दोबारा उनके खाने में मिला पाऊँगा। इस बार खुराक थोड़ी और बढ़ा दूँगा… उनके मन में शक की जो दीवार खड़ी हुई है, उसे ये दवा की गर्मी ही गिराएगी। मेमसाब, आप कितनी भी दूर भागें, मेरे हाथ का बना निवाला तो आपको खाना ही पड़ेगा, और उसी में आपकी बर्बादी का रास्ता छिपा है।"
 
शेर ने अपनी लुंगी कसी और चेहरे पर एक झूठी लाचारी ओढ़ ली। वह लंगड़ाते हुए बाहर निकला ताकि गार्ड्स को लगे कि वह अभी भी दर्द में है, लेकिन उसके दिमाग में उस 'खतरनाक खुराक' को तैयार करने का शैतानी मंसूबा चल रहा था।
 
उसने सावधानी से अपनी जेब से वही शीशी निकाली। आज उसका इरादा और भी खतरनाक था।
 
शेर [मन ही मन]: 'कल रात तो बस ट्रेलर था मेमसाब। आज जब यह डबल डोज़ आपके खून में उतरेगा, तो आप खुद अपने सारे कपड़े फाड़कर मेरे पैरों में डाल देंगी। फिर देखते हैं आपकी सरताज के प्रति वफा कहाँ जाती है। एक बार आपको पा लूँ, फिर मैं आपको रंडी बना कर ही छोड़ूँगा। कई लोग चोदेंगे आपको, तभी मेरा बदला पूरा होगा। आपकी चोदे जाने की पिक्चर बनाऊँगा और सरताज को उसे दिखाने के बाद ही उसे मौत के घाट उतारूँगा।'
 
 
उसने बड़ी सफाई से दवा की दोगुनी मात्रा मीरा की चाय में मिला दी। शेर ने उसे अच्छे से फेंट दिया ताकि कोई शक न रहे। वह बड़ी सावधानी से ट्रे उठाकर डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ा। जैसे ही वह कमरे के करीब पहुँचा, उसे मीरा की आवाज़ सुनाई दी। वह फोन पर अपनी डॉक्टर से बात कर रही थी।
 
शेर दरवाज़े के पास ही ठिठक गया, उसके कान मीरा की बातों पर लग गए।
 
मीरा [फोन पर, घबराई हुई आवाज़ में]: "हाँ डॉक्टर, मैं... मैं समझ नहीं पा रही हूँ। पिछले कुछ दिनों से मुझे बहुत अजीब महसूस हो रहा है। मेरा पूरा शरीर जैसे हर वक्त सुलगता रहता है। मैं... मैं बहुत ज़्यादा उत्तेजित  महसूस कर रही हूँ, हर समय। क्या ये उन दवाइयों की वजह से हो सकता है जो आप मुझे प्रेगनेंसी के लिए दे रही हैं?"
 
शेर के चेहरे पर एक कमीनी मुस्कान दौड़ गई। उसे अपनी जीत का अहसास होने लगा। पर तभी डॉक्टर की आवाज़, जो फोन से बाहर तक सुनाई दे रही थी,  ने शेर के होश उड़ा दिए।
 
डॉक्टर [फोन पर]: "नहीं मीरा, उन दवाइयों का ऐसा कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता। प्रेगनेंसी की दवाओं से थकान या जी मिचलाना हो सकता है, पर ऐसी उत्तेजना नहीं। मुझे डर है कि कहीं तुम अनजाने में कुछ और तो नहीं ले रही हो। तुम कल सुबह क्लिनिक आ जाओ, मैं तुम्हारे कुछ ब्लड टेस्ट करना चाहती हूँ"टेस्ट की रिपोर्ट से शायद साफ हो जाएगा कि तुम्हारे शरीर में क्या चल रहा है।"
 
'टेस्ट' शब्द सुनते ही शेर के हाथ बुरी तरह कांपने लगे। उसका माथा पसीने से भीग गया।
 
शेर [आंतरिक संवाद]: 'सत्यानाश! अगर कल टेस्ट हो गया और खून में इस दवा का पता चल गया, तो साहब मेरी खाल उधेड़ देंगे। सिक्युरिटी मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी। ये डॉक्टर तो सारा खेल बिगाड़ देगी!'
 
घबराहट में शेर का संतुलन बिगड़ गया। उसके कांपते हाथों से चाय की ट्रे फिसल गई।
 
"छपाक!"
 
गर्म चाय का प्याला फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया। चाय की छींटें और कांच के टुकड़े हर तरफ फैल गए। मीरा ने चौंककर फोन काटा और डाइनिंग टेबल की तरफ दौड़ी।
 
मीरा [हैरानी में]: "शेर, तुम्हारा ध्यान कहाँ है? कल ही तुम्हें इतनी चोट लगी है, काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है! मैंने गार्ड को तुम्हारे कमरे में भेजा था ताकि तुम आराम कर सको!"
 
शेर ने फर्श पर बिखरे कांच के टुकड़ों को देखते हुए चेहरे पर एक बेहद मासूम और लाचार भाव ओढ़ लिया। उसने झुककर कांच उठाने का नाटक किया, जिससे उसकी लुंगी थोड़ी सरक गई और उसकी जाँघ का वह हिस्सा दिखाई देने लगा जहाँ उसने जानबूझकर लाल निशान बना रखे थे।
शेर [धीमी और दर्द भरी आवाज़ में]: "माफी चाहता हूँ मेमसाब, पर मेरा मन कमरे में नहीं लग रहा था। साहब ने मुझे आपकी सेवा के लिए रखा है, और जब तक मुझमें जान है, मैं अपना फर्ज़ निभाऊँगा।"
 
उसने एक गहरी आह भरी और लंगड़ाते हुए खड़ा हुआ, जैसे उसे खड़े होने में बहुत तकलीफ हो रही हो। मीरा ने उसे इस तरह लड़खड़ाते देखा, तो उसका गुस्सा एक पल में पिघलकर हमदर्दी में बदल गया। वह भूल गई कि कल इसी आदमी ने उसे गलत तरीके से छुआ था। उसे बस एक घायल नौकर दिखाई दे रहा था जो अपनी तकलीफ के बावजूद उसके लिए काम करने आया था।
 
मीरा [नरमी से]: "पागल मत बनो शेर। देखो, हाथ से खून निकल रहा है। तुम फौरन बैठो, ये सब मैं साफ कर लूँगी।"
 
मीरा लाल साड़ी में उसके सामने खड़ी थी, पर शेर की नज़रों में अब हवस के साथ-साथ मौत का खौफ भी साफ़ झलक रहा था।
 
शेर [मन ही मन]: 'अब ये चाय नहीं, मुझे कुछ और गिराना होगा... कल सुबह होने से पहले मुझे ऐसा कुछ करना होगा कि मेमसाब घर से बाहर कदम भी न रख सकें। वरना कल मेरा अंत निश्चित है।'
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - Yesterday, 05:02 AM



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