06-05-2026, 01:29 PM
यहाँ पूजा की हालत यह थी तो वहा बाबा की हालत क्या थी वह भी जानते है।
बाबा भी अपने कमरे में सोया हुआ था और उसका तन और मन पूजा को कैसे वश करके अपनी बनाया जा सकता है उसके बारे में सोच रहा था। उसने सोचा की पूजा ऐसे हाथ आनेवाली लड़की नहीं है। उसके लिए मुझे धैर्य और पूरी साजगता के साथ काम करना होगा।
मुझे मेरी पुरानी गलतियों को दुबारा नहीं दहोराना चाहिए......
*************.............
और वह अपने अतीत में चला गया....................
“बाबा की कहानी, बाबा की जुबानी” इस बार कोई श्रद्धा या भक्ति की कथा नहीं, बल्कि एक ऐसे पाखंडी चेहरे का पर्दाफाश है, जो मासूम लोगों की आस्था और मजबूरी का फायदा उठाकर अपने स्वार्थ पूरे करता रहा। यह कहानी उस सच को सामने लाने का प्रयास है, जो अक्सर भीड़, विश्वास और अंधभक्ति के पीछे छिप जाता है।
शुरुआत में बाबा खुद को एक नि:स्वार्थ सेवक के रूप में प्रस्तुत करता था। वह लोगों की समस्याएँ सुनता, उन्हें ढांढस बंधाता और यह दावा करता कि वह बिना किसी पैसे के उनकी मदद करता है। यही उसकी सबसे बड़ी चाल थी—लोगों का भरोसा जीतना। धीरे-धीरे उसकी झूठी छवि इतनी मजबूत हो गई कि दूर-दूर से लोग उसके पास आने लगे। हर कोई उसे एक मसीहा समझने लगा, जबकि असलियत कुछ और ही थी।
भीड़ बढ़ने लगी, लेकिन यह भीड़ सेवा का प्रमाण नहीं, बल्कि उसके छल का परिणाम थी। लोगों की आस्था उसके लिए एक साधन बन चुकी थी। जब उसके पास भीड़ बहुत अधिक हो गई और उसकी सच्चाई सामने आने का खतरा बढ़ने लगा, तब उसने एक नया तरीका अपनाया—वह खुद मरीजों के घर जाने लगा। यह कदम बाहर से देखने में सेवा जैसा लगता था, लेकिन असल में यह उसके खेल को और गहराई से खेलने की चाल थी, जहाँ वह बिना किसी गवाह के अपने कारनामों को अंजाम दे सके।
यह प्रस्तावना उस अंधे विश्वास के खिलाफ एक चेतावनी है, जो बिना सवाल किए किसी को भी भगवान का दर्जा दे देता है। आगे की कहानी में बाबा के वे सारे कारनामे उजागर होंगे, जिनमें छल, धोखा और स्वार्थ की परतें एक-एक करके सामने आएंगी। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि समाज के उस पहलू का आईना है, जहाँ सच्चाई अक्सर विश्वास के बोझ तले दब जाती है।
एक दिन सुबह एक 40 साल का आदमी मेरे पास हड़बड़ाया हुआ आया और बोला, “बाबा, मेरी लड़की को कुछ हो गया है। आप चलकर देख लो, आपके बारे में बहुत सुना है।”
मैंने पूछा, “उसकी उम्र क्या है?” मैत्री की रचना।
“अभी-अभी 18 साल की हुई है। कई दिनों से पागलों जैसा बर्ताव कर रही है।”
मैं उसकी गाड़ी में बैठकर उसके घर पहुँचा। कमरे में लड़की को देखते ही मेरी नजर ठहर गई। दूध जैसा गोरा रंग, काली-काली आँखें, उभरा हुआ सीना और मात्र 4 फीट 9 इंच की कद-काठी।
मैंने आँखें बंद कीं, कुछ देर ध्यान में बैठा रहा, फिर आँखें खोलकर गंभीर स्वर में कहा, “इस लड़की का ठीक होना नामुमकिन है।”
लड़की के माता-पिता रोने लगे। माँ ने मेरे पैर पकड़ लिये और बोली, “ऐसा मत कहिए बाबा! आप ही हमारी आखिरी उम्मीद हैं। आखिर इसे क्या हो गया है?”
मैंने ठंडे स्वर में कहा, “इस पर एक शक्तिशाली प्रेत का साया है। वो इसकी जान लेकर ही जाएगा।”
ये सुनते ही माँ फूट-फूटकर रो पड़ी। “कुछ तो उपाय होगा बाबा! आपने इतने लोगों को ठीक किया है, इसे भी ठीक कर दीजिए।”
मैंने कहा, “मैं इसे ठीक तो कर सकता हूँ… पर…”
“पर क्या बाबा?” माँ ने अधीर होकर पूछा, “जितने पैसे चाहिए, बता दीजिए। मैं दे दूंगी।”
“मुझे पैसे नहीं चाहिए,” मैंने साफ कहा।
माँ ने रोते हुए पूछा, “तो फिर बताइए, क्या करना होगा?”
“बहुत कठिन काम है। मुझे खास विधि करनी होगी।” प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
मैंने कुछ सामान मंगवाया।
***************************
बने रहिये दोस्तों....................
बाबा भी अपने कमरे में सोया हुआ था और उसका तन और मन पूजा को कैसे वश करके अपनी बनाया जा सकता है उसके बारे में सोच रहा था। उसने सोचा की पूजा ऐसे हाथ आनेवाली लड़की नहीं है। उसके लिए मुझे धैर्य और पूरी साजगता के साथ काम करना होगा।
मुझे मेरी पुरानी गलतियों को दुबारा नहीं दहोराना चाहिए......
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और वह अपने अतीत में चला गया....................
“बाबा की कहानी, बाबा की जुबानी” इस बार कोई श्रद्धा या भक्ति की कथा नहीं, बल्कि एक ऐसे पाखंडी चेहरे का पर्दाफाश है, जो मासूम लोगों की आस्था और मजबूरी का फायदा उठाकर अपने स्वार्थ पूरे करता रहा। यह कहानी उस सच को सामने लाने का प्रयास है, जो अक्सर भीड़, विश्वास और अंधभक्ति के पीछे छिप जाता है।
शुरुआत में बाबा खुद को एक नि:स्वार्थ सेवक के रूप में प्रस्तुत करता था। वह लोगों की समस्याएँ सुनता, उन्हें ढांढस बंधाता और यह दावा करता कि वह बिना किसी पैसे के उनकी मदद करता है। यही उसकी सबसे बड़ी चाल थी—लोगों का भरोसा जीतना। धीरे-धीरे उसकी झूठी छवि इतनी मजबूत हो गई कि दूर-दूर से लोग उसके पास आने लगे। हर कोई उसे एक मसीहा समझने लगा, जबकि असलियत कुछ और ही थी।
भीड़ बढ़ने लगी, लेकिन यह भीड़ सेवा का प्रमाण नहीं, बल्कि उसके छल का परिणाम थी। लोगों की आस्था उसके लिए एक साधन बन चुकी थी। जब उसके पास भीड़ बहुत अधिक हो गई और उसकी सच्चाई सामने आने का खतरा बढ़ने लगा, तब उसने एक नया तरीका अपनाया—वह खुद मरीजों के घर जाने लगा। यह कदम बाहर से देखने में सेवा जैसा लगता था, लेकिन असल में यह उसके खेल को और गहराई से खेलने की चाल थी, जहाँ वह बिना किसी गवाह के अपने कारनामों को अंजाम दे सके।
यह प्रस्तावना उस अंधे विश्वास के खिलाफ एक चेतावनी है, जो बिना सवाल किए किसी को भी भगवान का दर्जा दे देता है। आगे की कहानी में बाबा के वे सारे कारनामे उजागर होंगे, जिनमें छल, धोखा और स्वार्थ की परतें एक-एक करके सामने आएंगी। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि समाज के उस पहलू का आईना है, जहाँ सच्चाई अक्सर विश्वास के बोझ तले दब जाती है।
एक दिन सुबह एक 40 साल का आदमी मेरे पास हड़बड़ाया हुआ आया और बोला, “बाबा, मेरी लड़की को कुछ हो गया है। आप चलकर देख लो, आपके बारे में बहुत सुना है।”
मैंने पूछा, “उसकी उम्र क्या है?” मैत्री की रचना।
“अभी-अभी 18 साल की हुई है। कई दिनों से पागलों जैसा बर्ताव कर रही है।”
मैं उसकी गाड़ी में बैठकर उसके घर पहुँचा। कमरे में लड़की को देखते ही मेरी नजर ठहर गई। दूध जैसा गोरा रंग, काली-काली आँखें, उभरा हुआ सीना और मात्र 4 फीट 9 इंच की कद-काठी।
मैंने आँखें बंद कीं, कुछ देर ध्यान में बैठा रहा, फिर आँखें खोलकर गंभीर स्वर में कहा, “इस लड़की का ठीक होना नामुमकिन है।”
लड़की के माता-पिता रोने लगे। माँ ने मेरे पैर पकड़ लिये और बोली, “ऐसा मत कहिए बाबा! आप ही हमारी आखिरी उम्मीद हैं। आखिर इसे क्या हो गया है?”
मैंने ठंडे स्वर में कहा, “इस पर एक शक्तिशाली प्रेत का साया है। वो इसकी जान लेकर ही जाएगा।”
ये सुनते ही माँ फूट-फूटकर रो पड़ी। “कुछ तो उपाय होगा बाबा! आपने इतने लोगों को ठीक किया है, इसे भी ठीक कर दीजिए।”
मैंने कहा, “मैं इसे ठीक तो कर सकता हूँ… पर…”
“पर क्या बाबा?” माँ ने अधीर होकर पूछा, “जितने पैसे चाहिए, बता दीजिए। मैं दे दूंगी।”
“मुझे पैसे नहीं चाहिए,” मैंने साफ कहा।
माँ ने रोते हुए पूछा, “तो फिर बताइए, क्या करना होगा?”
“बहुत कठिन काम है। मुझे खास विधि करनी होगी।” प्रस्तुतकर्ता मैत्री।
मैंने कुछ सामान मंगवाया।
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बने रहिये दोस्तों....................



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