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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
करीम का दुस्साहस -3
 
करीम (अपनी लुंगी ठीक करते हुए, फुसफुसाकर): "घबराइए मत बेटी... राज भैया को यहाँ से दूर भेजने का इंतज़ाम हमने कर दिया है। जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही बोलिए... वरना ई बंद दरवाज़ा आपकी रूह और रईसी दोनों को आज नंगा कर देगा।"

 
करीम ने इशारे से अनीता को फ़ोन की ओर इशारा किया।

 
अनीता ने अपनी तेज़ साँसों को काबू में किया और राज को वापस फोन मिलाया। अपनी आवाज़ में बनावटी सामान्यता लाते हुए वह चिल्लाई, "क्या आपको फ़ाइल मिल गई?"
 
राज ने दूसरी तरफ से फिर वही जवाब दिया, "नहीं, अभी तक नहीं मिली।"
 
तभी करीम पीछे से चिल्लाया, "राज साहब! क्या आप एक बार कार में जाकर चेक कर सकते हैं?"
 
अनीता (कांपती हुई आवाज़ को संभालते हुए): "राज! सुनिए... अभी करीम कह रहा है कि शायद वह फाइल आपकी गाड़ी  में रह गई है। उसे याद आ रहा है कि कल उसने वह फाइल गाड़ी की पिछली सीट पर रखी थी। आप एक बार जाकर गाड़ी में चेक कीजिए?"
 
दरअसल, करीम ने वह फाइल चुपके से कार में तभी रख दी थी जब राज उसे नीचे पागलों की तरह ढूँढ रहा था।
 
राज "गाड़ी में? पर मुझे लगा मैंने उसे स्टडी में रखा था।"
 
अनीता (जल्दी-जल्दी बोलते हुए): "एक बार देख लीजिए राज... अगर गाड़ी में मिल जाए तो हमें बता दीजिएगा, ताकि हम यहाँ ऊपर बेडरूम में अलमारियाँ और बिस्तर खंगालना बंद कर दें। बेमतलब यहाँ सब बिखरा पड़ा है।"
 
राज को अपनी पत्नी की बात तर्कसंगत लगी। "हम्म... हो सकता है। करीम ने रखी होगी तो शायद वहीं हो। ठीक है, मैं गैरेज में देखता हूँ।"
 
बेडरूम के भीतर पसरा हुआ वह भारी सन्नाटा अब करीम की मुकम्मल जीत की गवाही दे रहा था। अनीता अभी भी फर्श पर बैठी अपने बिखरे हुए बालों और साटन के गाउन को संभाल रही थी, उसका शरीर करीम के उस १० इंच के फौलादी प्रहार की थकान और वीर्य की गर्माहट से सुस्त पड़ा था।
 
अनीता दम साधे करीम को देख रही थी।
 
अनीता: "करीम, तुम पागल हो गए हो क्या? राज नीचे ही थे और तुम ऐसी हरकतें कर रहे हो!"
 
करीम ने मुस्कान के साथ कहा, "क्या करूँ? जब भी आपको देखता हूँ तो मैं पागल हो जाता हूँ।"
 
अनीता रोते हुए बोली, "करीम, तुमने आज ठीक नहीं किया। आज पहली बार मैंने राज से झूठ बोला है, मेरा मन घृणा से भर रहा है कि मैं कैसी औरत बनती जा रही हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अपने वजूद को इस धोखे की आग से कैसे बचाऊँ।"
 
करीम की नज़रें अनीता की नंगी जाँघों पर जमी थीं, जो बेपरवाही में वहाँ से नुमायां हो रही थीं। उसने मन ही मन सोचा, "इसका फिर से वही रोना-धोना शुरू हो गया, पर इसकी मखमली जाँघें देख कर तो कलेजा मुँह को आता है।" वह उन केलों जैसी चिकनी और बेदाग रंगत को देख कर इतना मदहोश था कि उसका जी उन्हें बस चाट लेने को कर रहा था।
 
करीम ने कहा, "अनीता मैडम, वह झूठ जरूरी था, वरना राज साहब ऊपर आ जाते तो उनको सब पता चल जाता।" यह कहते हुए वह अनीता के पास बैठ गया और अपनी मजबूत हथेली उसकी नंगी सफेद जाँघ के ऊपर रख दी।
 
करीम की गर्म छुअन अनीता के शरीर पर बिजली की तरह दौड़ी, जिससे उसका पूरा बदन सिहर उठा। उसने अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली, जैसे वह उन कोमल जाँघों पर अपना हक़ जता रहा हो।
 
तभी राज का फोन आया, जिसे करीम ने उठा लिया। राज के कुछ पूछने से पहले ही करीम झट से बोला, "साहब, मेमसाहब अभी बाथरूम में फ्रेश होने गई हैं।"
 
यह कहते हुए करीम की नज़रें अभी भी अनीता की उन सफेद जाँघों पर टिकी थीं, जिन्हें वह अपनी मजबूत पकड़ में दबाए हुए था। अनीता ने घबराकर करीम का हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन करीम ने अपनी उंगलियों का दबाव और बढ़ा दिया, जिससे अनीता के चेहरे पर दर्द और बेबसी के मिले-जुले भाव उभर आए। फोन की दूसरी तरफ राज बेखबर था कि ऊपर उसके ही कमरे में क्या खेल चल रहा है।
 
राज (फोन पर, राहत की सांस लेते हुए): "हाँ करीम! शुक्र है तुमने याद दिला दिया। फाइल यहीं गाड़ी के डैशबोर्ड के पास पड़ी थी। मैं इसे देने के लिए अभी निकल रहा हूँ, खन्ना जी इंतज़ार कर रहे होंगे। तुम अनीता मेमसाहब को बता देना कि मैं फाइल लेकर जा रहा हूँ और वापस आने में मुझे कम से कम दो घंटे लगेंगे। तब तक वो आराम कर लें।"
 
करीम के चेहरे पर एक वहशी और ज़हरीली मुस्कान फैल गई।
 
करीम (अनीता की आँखों में झाँकते हुए): "जी साहब, बहुत अच्छा। हम मेमसाहब को बता देते हैं कि आप दो घंटे में आएंगे। आप बेफिक्र होकर जाइए, यहाँ हम सब संभाल लेंगे।"
 
जैसे ही फोन कटा, करीम ने मोबाइल को साइड पर रखा और एक क्रूर हँसी हँसा। उसने दरवाज़े की कुंडी को एक बार फिर चेक किया और उसके होंठ अनीता की नंगी जाँघों पर चिपक गए।
 
अनीता के मुँह से एक गहरी सिसकी निकली और वह तड़प उठी। उसने बेबसी में करीम को धक्का देने की कोशिश की और हाँफते हुए बोली, "करीम दूर हटो... यह क्या कर रहे हो?"
 
करीम : "सुना मालकिन? राज भैया ने खुद हमें दो घंटे का इनाम दिया है। उन्होंने कहा है कि वो दो घंटे बाद आएंगे। अब इन दो घंटों में ई काला करीम आपको बताएगा कि असली 'सेवा' क्या होती है।"
 
करीम ने अपना भारी सिर फिर से अनीता की उन दूधिया सफेद जाँघों पर जमा दिया, जहाँ अभी भी करीम की लार की लकीरें चमक रही थीं। उसने अपने दोनों हाथों से अनीता के गाउन को दोनों जाँघों से ऊपर खिसका दिया, यहाँ तक कि उसकी पैंटी नज़र आने लगी। इसके बाद वह किसी भूखे कुत्ते की तरह पागलों की तरह उसकी जाँघों को चाटने लगा।
 
करीम की जीभ का वह खुरदरा अहसास अनीता के जिस्म पर बिजली के झटके दे रहा था। अनीता अपने दोनों हाथों से करीम के सिर को दूर करने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन करीम तो किसी कुत्ते की तरह उसकी नंगी जाँघों को चाटे जा रहा था।
 
अनीता के गले से एक बेबस सिसकी निकली, "बस करो करीम...", जबकि करीम का वहशीपन हर पल बढ़ता जा रहा था। वह उस मखमली मांस का स्वाद ऐसे ले रहा था जैसे उसे बरसों की प्यास बुझानी हो।
 
करीम (फुसफुसाते हुए): "अब कोई हड़बड़ी नहीं है… अब न कोई फोन आएगा और न कोई दरवाज़ा खटखटाएगा।"
 
यह कहते ही उसने अपना मुँह अनीता की उस बिल्कुल सफेद जाँघ पर गड़ा दिया। उसने पहले उस कोमल मांस को ज़ोर से चूसा और फिर अपने दाँतों से वहाँ एक गहरा ज़ख्म सा देते हुए काट लिया। अनीता के मुँह से दर्द और सिहरन की एक मिली-जुली चीख लने ही वाली थी कि उसने अपना हाथ अपने होंठों पर रख लिया। करीम के दाँतों के निशान उसकी दूधिया खाल पर साफ़ उभर आए थे, जो उसके वहशीपन की गवाही दे रहे थे।
 
वह उस निशान को देखकर और भी उत्तेजित हो गया और अपनी उंगलियों से उस कटे हुए हिस्से को सहलाने लगा, जिससे अनीता का पूरा बदन थरथरा उठा।
 
अनीता ने सिसकते हुए कहा, "करीम अब बस करो, निशान पड़ रहे हैं। मुझे बहुत चिप-चिप महसूस हो रहा है। अब मुझे नहाने जाना है।"
 
उसकी आवाज़ में डर और थकान साफ़ झलक रही थी। करीम की लार की वजह से उसकी जाँघों पर एक अजीब सी चिपचिपाहट जम गई थी, जो उसे ग्लानि महसूस करा रही थी। उसने बेबसी से उन लाल निशानों को देखा जो करीम के वहशीपन की छाप छोड़ रहे थे। उसे डर था कि अगर राज ने ये निशान देख लिए तो वह क्या जवाब देगी, लेकिन करीम था कि जैसे कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था।
 
करीम (एक वहशी चमक के साथ): "राज भैया तो गए बेटी... अब इन दो घंटों में ई काला करीम आपके साथ नहाना चाहते हैं।"
 
अनीता (कांपते हुए और कमज़ोर विरोध करते हुए): "नहीं... करीम, बस करो। जो हुआ सो हुआ... अब मुझे जाने दो। मैं अकेले नहा लूँगी। तुम नीचे जाओ।"
 
करीम ने उसकी एक नहीं सुनी। उसकी आँखों में अब एक पागलपन सवार था। उसने एक झटके में अनीता के उस पीले साटन गाउन को बीच से पकड़कर पूरी ताक़त से फाड़ दिया। रेशमी कपड़ा 'चर्ररर' की आवाज़ के साथ दो टुकड़ों में बँट गया और फर्श पर जा गिरा।
 
अब अनीता राज के बेडरूम के बीचों-बीच पूरी तरह नग्न बैठी थी, उसके बदन पर सिर्फ वह पीली रेशमी पैंटी बची थी, जो पहले ही गीली होकर उसके गोरे मांस से चिपकी हुई थी। करीम ने एक पल के लिए अनीता के उस पीली पैंटी में लिपटे जिस्म को ऊपर से नीचे तक देखा—उसके पुष्ट गोरे स्तन और उन पर मौजूद लाल सुर्ख निप्पल, जो शायद डर या वासना की वजह से अकड़कर सख़्त हो गए थे। उसकी पतली कमर और वे भारी कूल्हे जो पैंटी के महीन कपड़े को फाड़ देने पर आमादा थे, करीम की आँखों में एक अजीब सी आग जला रहे थे।
 
अनीता बिलखते हुए चीखी, "यह क्या कर रहे हो करीम? पागल हो गए हो क्या?" उसकी आवाज़ में छिपी दहशत कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थी।
 
करीम के चेहरे पर एक बेपरवाह मुस्कान फैल गई। उसने अनीता की आँखों में अपनी दहकती हुई नज़रें गड़ा दीं और भारी आवाज़ में बोला, "हाँ, मैं पागल हो गया हूँ। आपके इस दूधिया बदन की महक ने मेरा दिमाग सुन्न कर दिया है, मैडम।"
 
करीम ने बिना कुछ कहे अनीता को किसी नवजात बच्ची की तरह अपनी बाँहों में उठाया और बाथरूम की ओर बढ़ गया।
 
करीम (बाथरूम का दरवाज़ा लात मारकर खोलते हुए): "विरोध मत कीजिए मालकिन... आज इस फव्वारे के नीचे जब ई काला बदन आपके इस दूधिया बदन से रगड़ खाएगा, तब आपको पता चलेगा कि असली 'मर्दाना' साबुन क्या होता है। ई पीली पैंटी भी अब ज़्यादा देर नहीं टिकेगी।"
 
बाथरूम के भीतर पहुँचते ही करीम ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। दीवारों पर लगे आलीशान आईनों में अनीता का गोरा और पीली पैंटी वाला बदन और करीम का काला, मज़बूत और वहशी रूप साफ़ दिखाई दे रहा था। करीम ने फव्वारा खोल दिया और गरम पानी की फुहारें जैसे ही अनीता के नंगे और गर्म बदन पर पड़ीं, उसके मुँह से एक तीखी सिसकी निकल गई।
 
करीम ने एक हाथ से शावर की धार को सेट किया और दूसरे हाथ से कीमती साबुन की टिकिया उठाई। उसके चेहरे पर एक ऐसी कुटिल मुस्कान थी जैसे वह किसी मखमली खिलौने से खेल रहा हो।
 
करीम (साबुन को अपने काले हाथों में रगड़ते हुए): "आज ई काला करीम आपके बदन के एक-एक कोने की मैल और अपनी हवस के निशान खुद साफ़ करेगा। बिलकुल मत हिलना बेटी... आज इस सफाई में बहुत वक़्त लगेगा।"
 
करीम ने झाग से भरे अपने बड़े और खुरदरे हाथ अनीता के गोरे और मासूम चेहरे पर रखे। उसने बहुत ही धीमेपन से गालों को मला, फिर उसकी उंगलियां सरकती हुई अनीता की सुराहीदार गर्दन पर आईं। जहाँ-जहाँ करीम के हाथ जा रहे थे, वहां साबन का सफ़ेद झाग अनीता की गोरी त्वचा पर फिसल रहा था।
 
अनीता ने दीवार का सहारा ले लिया, उसकी आँखें भाप और मदहोशी में मुँदती जा रही थीं। करीम के हाथ अब नीचे की ओर रेंगने लगे। उसने साबुन भरे हाथों से अनीता के पुष्ट और नंगे स्तनों को अपनी गिरफ्त में लिया। झाग की वजह से उसका स्पर्श और भी चिकना और फिसलन भरा हो गया था। वह कभी उन्हें गोल-गोल घुमाता, तो कभी अपनी हथेलियों के बीच दबाकर झाग को निचोड़ता।
 
करीम (फुसफुसाते हुए): "उफ़... ई मलाई जैसी चिकनाई।"
 
करीम के हाथ अब और नीचे उतरे। उसने अनीता के सपाट पेट पर झाग फैलाया और अपनी उंगली अनीता की गहरी नाभि में डाल दी। अनीता का पूरा बदन बिजली के झटके की तरह सिहर उठा। गरम पानी ऊपर से गिर रहा था और नीचे करीम की उंगलियां उसके जिस्म को नाप रही थीं।
 
करीम ने अपनी उंगली को नाभि के घेरे में धीरे-धीरे घुमाया, जिससे अनीता के पैरों के बीच एक अजीब सी सिहरन होने लगी। वह पानी की फुहारों के नीचे खड़ी कांप रही थी, जबकि करीम का स्पर्श उसके पेट की कोमलता को महसूस कर रहा था।
 
उसकी उंगलियां झाग के साथ फिसलती हुई अनीता की मखमली त्वचा पर किसी जहरीले सांप की तरह रेंग रही थीं। अनीता ने बेबसी में अपना सिर पीछे की ओर झुका दिया, गर्म पानी की बूंदें उसके चेहरे और उभरे हुए सीने पर गिरकर नीचे की ओर बह रही थीं।
 
जैसे-जैसे पानी और झाग नीचे की ओर बह रहे थे, करीम का हाथ उसकी नाभि से फिसलकर और भी नीचे जाने की कोशिश करने लगा। अनीता ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस वहशीपन को कैसे रोके।
 
करीम (नीचे झुकते हुए): "अब ज़रा असली सफाई कर लें..."
 
अनीता का रोम-रोम इस अनचाहे स्पर्श से कांप रहा था, पर करीम का हाथ रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह धीरे-धीरे अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ाते हुए और भी नीचे की ओर सरकने लगा, जहाँ अनीता की रेशमी पैंटी अब पानी और झाग से पूरी तरह पारदर्शी होकर उसके जिस्म से चिपक गई थी।
 
करीम धीरे से नीचे की ओर झुका, अब उसकी आँखें अनीता की उस पीली पैंटी के बिल्कुल सामने थीं। पानी से पूरी तरह भीग जाने के कारण वह रेशमी कपड़ा अब पारदर्शी हो चुका था, जिससे अनीता के जिस्म का वह उभरा हुआ हिस्सा (कैमल टो) साफ झलक रहा था। करीम के चेहरे पर एक दरिंदगी भरी चमक आ गई।
 
उसने मदहोश होकर कहा, "माशाअल्लाह... क्या नज़ारा है। आपके नीचे के ये लब तो जैसे चीख-चीख कर मुझे बुला रहे हैं।"
 
अनीता ने शर्म के मारे अपनी जाँघों को आपस में भींचने की कोशिश की, लेकिन करीम ने अपनी मज़बूत हथेलियों से उसके घुटनों को पकड़कर उन्हें ज़बरदस्ती अलग कर दिया। वह टकटकी लगाए उस भीगे हुए पीले कपड़े के पार दिखती अनीता की आबरू को निहार रहा था। अनीता का पूरा बदन कांप रहा था, उसे समझ आ गया था कि करीम अब किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार है। उसकी गरम साँसें अब सीधे अनीता के नाजुक अंगों पर महसूस हो रही थीं।
 
करीम ने बिना कुछ सोचे-समझे अनीता की उस भीगी हुई पैंटी के ऊपर से ही उसके उभर को अपने मुँह में भर लिया। उसकी भारी और खुरदरी जीभ किसी प्यासे कुत्ते की तरह पैंटी के उस मखमली कपड़े के ऊपर से उसके अंग को चाटने और सहलाने लगी।
 
अनीता का पूरा जिस्म जैसे बिजली के झटके खाकर हवा में उछल गया। उसके मुँह से एक ज़ोरदार कराह निकली, "ओह गॉड! करीम… बस करो… मैं पागल हो रही हूँ!"
 
करीम का वहशीपन अब चरम पर था; वह कपड़े के ऊपर से ही अपनी जीभ के दबाव से उस कोमल हिस्से को बुरी तरह मसल रहा था। अनीता की आवाज़ बाथरूम की दीवारों से टकराकर गूँज रही थी, उसका शरीर उत्तेजना और शर्म के एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ से निकलना उसके बस में नहीं था। करीम के इस पागलपन ने अनीता के होश पूरी तरह फाख्ता कर दिए थे।
 
करीम ने एक वहशी मुस्कान के साथ अपना सिर ऊपर उठाया, उसकी दाढ़ी से पानी और लार की बूंदें टपक रही थीं। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "अभी कहाँ मैडम? अभी तो मैंने बस शुरू ही किया है। आज इस बाथरूम में आपकी ऐसी चीखें निकलेंगी कि आप खुद को भूल जाएँगी।"
 
अनीता का शरीर बेतहाशा थरथरा रहा था। करीम ने एक झटके में उसकी पीली रेशमी पैंटी के किनारों को अपनी मजबूत उंगलियों में फँसाया। अनीता ने घबराकर उसके कंधों पर हाथ रखे, पर करीम ने बिना किसी रहम के उस भीगे हुए कपड़े को नीचे की ओर खींचना शुरू कर दिया।
 
"करीम, नहीं... खुदा के वास्ते रुक जाओ!" अनीता ने सिसकते हुए मिन्नत की, लेकिन करीम पर अब किसी के बाप का खौफ नहीं था।
 
उसने पैंटी को पूरी तरह उतारकर पैर की तरफ फेंक दिया और अब उसकी भूखी नज़रें अनीता के उस अंग पर जा टिकीं जो अब बिना किसी परदे के उसके सामने पूरी तरह नुमाया था। वह उस गुलाबी और कोमल गोश्त को देखकर अपनी जीभ अपने होंठों पर फेरने लगा।
 
अब अनीता उस फव्वारे के नीचे पूरी तरह नग्न थी। करीम ने साबुन का ढेर सारा झाग लिया और अपना हाथ अनीता की उस साफ़ और चिकनी चूत की ओर बढ़ाया। जैसे ही उसकी झाग भरी उंगलियां उस गुलाबी कली के संपर्क में आईं, अनीता की सिसकी बाथरूम की टाइलों से टकराकर गूँज उठी।
 
अनीता का गला सूख गया था, उसने घबराकर करीम की तरफ देखा और दबी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, "करीम, मत करो ऐसा...।"
 
करीम बड़े ही इत्मीनान से उसकी गहराइयों को साफ़ करने लगा, उसकी उंगलियां झाग के बहाने उस नाजुक हिस्से के भीतर अपनी जगह बना रही थीं।
 
करीम ने अपनी एक बड़ी और मोटी उंगली अनीता के अंदर उतार दी और फुसफुसाते हुए कहा, "अंदर तक सफाई करनी पड़ेगी, मैडम।" इसके बाद उसने किसी पिस्टन की तरह अपनी उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया।
 
करीम की हर हरकत के साथ अनीता के मुँह से सिसकियाँ फूट रही थीं, "ओह गॉड... आह!" वह बेतहाशा कराह रही थी। तभी करीम ने बिना रुके अपनी दूसरी उंगली भी अंदर धकेल दी।
 
करीम की उन दो उंगलियों की मोटाई उसके लिंग के बराबर ही महसूस हो रही थी। वह दोहरा दबाव अनीता के जिस्म में वही सनसनी पैदा कर रहा था जो किसी मर्द के साथ मिलन के वक्त होती है। अनीता का पूरा वजूद उस रगड़ और दबाव से काँप उठा। उसकी आँखें पलट गईं और वह दीवार का सहारा लेकर अपनी कमर को करीम की उंगलियों की थाप पर झुलाने लगी, जैसे वह अनचाहे में ही उस वहशीपन का साथ दे रही हो।
 
जैसे ही अनीता चरम सुख के बिल्कुल करीब पहुँची, करीम ने अचानक अपनी उंगलियाँ बाहर निकाल लीं और रुक गया। उत्तेजना के उस शिखर पर अचानक मिली इस खामोशी ने अनीता को तड़प कर छोड़ दिया, उसका शरीर अधूरे अहसास की आग में जलने लगा।
 
करीम ने बिना कोई वक्त जाया किए शॉवर का हैंडल उठाया और पानी की तेज़ धार सीधे अनीता की योनि की ओर मोड़ दी। वह बड़ी सावधानी और इत्मीनान से पानी के प्रेशर के साथ उसके कोमल अंगों को धोने लगा, जैसे वह अपनी हवस के हर निशान को मिटा देना चाहता हो।
 
गरम पानी की वो तेज़ बौछारें जब अनीता के संवेदनशील अंगों से टकराईं, तो वह एक बार फिर सिहर उठी।
 
करीम (हवस भरी आवाज़ में): "देखिए मालकिन… कैसे ही झाग सफ़ेद से गुलाबी हो रहा है।"
 
अनीता की योनि को पूरी तरह धोने के बाद, करीम ने अपनी उंगलियों से उसके काम-लबों  को अलग किया और अपनी जीभ सीधे उसके दाने पर दे मारी। उस अचानक हुए हमले से अनीता के मुँह से एक तीखी चीख निकली, "ओह गॉड... करीम बस करो!" उसका पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया।
 
लेकिन करीम पर जैसे जुनून सवार था, उसने अनीता की बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया। उसके दोनों मज़बूत हाथ अनीता की सुडौल गाँड पर जम गए थे, जिसे वह पागलों की तरह भींच रहा था। वह उसे इस तरह चाट रहा था जैसे दुनिया खत्म होने वाली हो और अनीता के बदन के अंदर कोई शाही दावत रखी हो।
 
करीम की जीभ की लयबद्ध रगड़ और उसके हाथों का दबाव अनीता को होश खोने पर मजबूर कर रहे थे। वह दीवार से चिपकी हाँफ रही थी, जबकि करीम का मुँह उसकी गहराइयों में दफन हर अहसास को निचोड़ लेने पर आमादा था।
 
 "आज तो आपकी इस गहराई का एक-एक कतरा ई करीम चखकर ही दम लेगा," उसने अनीता के जाँघों के बीच मुँह गड़ाए हुए ही गूँजती आवाज़ में कहा।
 
अनीता का हाथ शॉवर के हैंडल पर कस गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस 'सफाई' से नफरत करे या उस सुख का आनंद ले जो उसे अपनी गरिमा खोने के बाद मिल रहा था।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 04-05-2026, 05:51 AM



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