Thread Rating:
  • 4 Vote(s) - 3 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Incest Shaitani aaina
#7
Update – 6

बृजमोहन की डांट का असर कुछ दिन तक रहा लेकिन फिर वही सब चालू हो गया । लड़कियां अब बृजमोहन के सामने नहीं लेकिन उसके घर में मौजूद न होने पर बालकनी पर जाने लगी ।
धीरे-धीरे आने जाने वाले राहगीर उन्हें भी कोठे वाली समझने लगे । असली कोठा उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था । इन कोठा की वश्याएं  बालकनी और छत पर सज धज कर रहती और आनेजने वाले राहगीरों को इशारे से अपने पास बुलाती । तीनो लड़कियों के दिमाग पर शैतानी आइने का असर हो गया था । उनके अंदर भी वैसी ही इच्छाएं जागने लगी जैसे तवायफों की । उनकी चाल ढाल भी वैसी ही होने लग गई थी । अब तो सरला भी बालकनी पर जाने लगी थी । 

---

पिंकी भी शैतानी आइने के असर से अछूती नहीं थी , उसकी जवानी भी अंगड़ाई लेने लगी थी । उम्र में वो 15 साल की हो चुकी थी लेकिन फेल होने की वजह से अभी भी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी । वो कॉलेज में सफेद शर्ट और नीली प्लेटेड स्कर्ट पहनती थी।

पिंकी पहले शर्मीली, दुबली-पतली सी लड़की थी। लेकिन अब सिंगारदान के सामने खड़े होकर खुद को देखते ही उसका बदन अजीब तरह से गर्म हो जाता। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई। सुबह उठते ही वह शीशे के सामने खड़ी होकर अपनी छातियों को दोनों हाथों से हल्के से दबाती, जैसे उन्हें नाप रही हो।

धीरे-धीरे **जवानी की दस्तक** तेज होने लगी।  
उसके निम्बू जैसे स्तन पहले छोटे और कड़े थे, अब तेजी से फूलने लगे। कॉलेज की शर्ट के बटन अब टाइट पड़ने लगे। पहले जहां दूसरा बटन आसानी से बंद हो जाता था, अब वहां कपड़ा खिंचने लगा। स्तन भारी और गोल हो गए, चलते वक्त हल्के से उछलते, शर्ट पर साफ नजर आते। पिंकी खुद उन्हें देखकर मुस्कुराती और शीशे के सामने खड़े होकर ऊपर-नीचे हिलाती, “अब तो काफी बड़े हो गए हैं…” 

बृजमोहन ने भी ये नोटिस किया तो उसे टेंशन होने लगी । लड़कों की घूरती नजरों को देखकर वो समझ गया था कि अब वो भी ज्यादा दिनों तक कोरी नहीं बच पाएगी । वो पिंकी पर नजर रखने लगा और जब वो कहीं जाती तो उससे पूछता की कहां जा रही है । 
उसने सरल को देखा कई बार पिंकी के साथ कुछ धीरे धीरे बातें करते हुए । जैसी सहेलियां आपस में करती हैं । सरला और पिंकी के चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान रहती थी । बृजमोहन को कुछ भी समझमे नहीं आता था । कुछ दिन बद  पिंकी के चलने का ढंग भी बदल गया था । उसके शरीर में मांस तेजी से चढ़ने लगा था । उसका कूल्हा भी चौड़ा होने लगा। स्कर्ट पहले घुटनों तक आती थी, अब वही स्कर्ट जांघों के बीच में चढ़ने लगी। जब वह चलती तो कूल्हे लहराते, और वह जानबूझकर ज्यादा जोर से हिलाकर चलने लगी।

- पहले वह जल्दी सो जाती थी। अब रात को सिंगारदान के सामने घंटों खड़ी रहती। लाइट बंद करके सिर्फ मोबाइल की रोशनी में नंगी हो जाती, अपने नए बदन को देखती — भारी स्तनों को सहलाती, अपनी काली निप्पल को उंगली से घुमाती, फिर हाथ नीचे सरकाकर अपनी गीली जगह को छूती। साँसें भारी हो जातीं, छोटी-छोटी आहें निकलतीं।

- कॉलेज जाते वक्त अब वह शर्ट के ऊपरी बटन खुले रखने लगी। ब्रा का किनारा झांकता, और जब कोई लड़का देखता तो वह जानबूझकर झुककर अपना बैग उठाती ताकि गहरी लाइन साफ दिखे।

- घर में वह अब अकेले कमरे में नहीं रहती। सिंगारदान के सामने खड़े होकर अपनी स्कर्ट ऊपर उठाकर जांघों और गदराए हुए नितंबों को देखती। कभी-कभी उंगली अंदर डालकर खुद को सहलाती, फिर उंगली चूसती हुई शीशे में अपने को निहारती ।

एक दिन वह आंगन मैं झूले पर बैठी हई थी । उसने अभी वही कॉलेज वाली स्कर्ट पहनी हुई थी । और एक जांघ को दूसरी जांघ पर चढ़ा रखा था ।
बृजमोहन वहां आता है तो उसकी नजर उसकी गुदाज नग्न जांघों पर पड़ती है । वह जड़ होके पिंकी को देखने लगता है । पिंकी जो अभी मैगजीन पढ़ रही थी । वह बृजमोहन को एक नजर देखती है । और फिर बिना किसी शर्म के मैगजीन पढ़ने लगती है । बृजमोहन यह देखकर हैरान था
 की पिंकी को कोई शर्म नहीं थी कि उसका बाप उसके सामने खड़ा है और वह इस तरह से बैठी है । वह सामने बड़ी कुर्सी पर बैठ जाता है और अखबार पढ़ने लगता है । अखबार पढ़ते पढ़ते उसकी नजर बार-बार पता नहीं क्यों पिंकी की थाइज़ पर जा रही थी । अचानक पिंकी बृजमोहन की तरफ देखती है तो पाती है की बृजमोहन चोर नजर से उसे देख रहा है । उसे समझ में नहीं आता । फिर वह नीचे झुकती है और बैठे-बैठे जूते की एस लेस बांधने लगती है । तभी वह ब्रिज मोहन को देखती है तो पाती है की उसकी नज़रें कहां पर हैं। अब वह समझ चुकी थी लेकिन शर्माने के बजाय वो पता नहीं क्यों मन ही मन खुश होने लगी । उसने अपनी दोनों चुटियाएं खोल दी । बाप उसे देखने लगा , तो वो भी बृजमोहन को देखते-देखते अपने बाल संवारने लगी । बृजमोहन ने जब पिंकी को इस तरह खुद क
 घूरते हुए देखा तो वह अख़बार पढने लगा । उसके बाद पिंकी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई । वह खड़ी उठी और जाने लगी । 
उसके जाने के बाद रेखा चाय लेकर बृजमोहन के पास आई । उसने देखा कि बृजमोहन पिंकी को जाते हुए देख रहा है । 
रेखा – पाप चाय 
बृजमोहन – हां रख दे 
रेखा ने अभी एक रेड कलर की कुर्ती पहनी थी  । जिसकी  बाहें बेहद छोटी और गला काफी गहरा था । रेखा ने यह सूट कुछ ही दिन पहले सिलवाया था । बृजमोहन ने इसमें उसे दो-तीन बार ही देखा था । लेकिन जब भी देखा था, उस समय रेखा ने चुनरी ओढ़ी होती । 
लेकिन अभी रेखा बिना चुनरी के थी । जैसे ही रखा टेबल पर चाय का कप रखने के लिए झुकी उसके स्तन छलक कर आधे बाहर आ गए । बृजमोहन ने अनजाने में अखबार हटाया तो उसकी नज़रें उसकी मछली बेटी की उभरी हुई छाती की घाटियों पर पड़ गई जिसे उसने अपने यार से मिजवा मिजवा कर बड़ा कर दिया था ।
आज उसे पता चला की उसकी बेटी रेखा ने जो सूट पहना है वह कितना टाइट और डीप नेक है । बृजमोहन को भी पता था कि रेखा चुदी हुई है । अब रेखा को वह उतना अच्छा नहीं मानता था जितना पहले । लेकिन अभी जो नजारा रेखा उसे दिखा गई थी उसने उसके दिमाग में हलचल मचा दी थी । 
रेखा जाने लगी तो बृजमोहन ने उसे रोकते हुए कहा ।
– रेखा यह मेज थोड़ा गंदा हो रखा है, इसे थोड़ा साफ कर दे 
रेखा  – जी, पापा, अभी आई
रेखा अंदर जाकर एक कपड़ा लेकर आती है , और मैच को कपड़े से साफ करने लगती है । उसने अभी भी चुन्नी नहीं डाली थी । वो नीचे बैठ के मेज साफ कर रही थी जिससे उसकी घाटी नुमाया हो रही थी । बृजमोहन अखबार साइड में रखकर रेखा के अधखुले उरोजो को देखने लगता है । बृजमोहन सचने लगा की जब बेटी ही इतना खुलकर अंग प्रदर्शन कर रही है तो वह भी देख लेगा तो क्या होगा । रेखा नीचे देख रही थी । तभी उसने नजर उठा कर देखा तो पापा को अपनी ओर देखते हुए पाया । उसने 
अपने बाप की नजर अपने सीने पर पाई तो एक पल के लिए वह ठहर गई । लेकिन फिर अगले ही पल वह मेज साफ करने लगी । उसने फिर बृजमोहन की ओर देखा । बृजमोहन उसे ही देख रहा था । अबकी बार रेखा के होठों पर मुस्कान आ गई और वह बृजमोहन को देख मुस्कुराने लगी ।
रेखा – पापा साफ हो गया , मैं जाऊं
ब्रिज – हां, 
रेखा जाने लगी ।
बृजमोहन – अरे सुन तो, 
रेखा – हां, पापा,
ब्रिज – यह सूट नया सिलाया तूने ,
रेखा - हां, पापा नया ही है, कैसा है 
ब्रिज – इतना डीप नेक क्यों सिलाया है, 
रेखा – क्या पापा कहां छोटा है, इतना तो आजकल नॉर्मल है, सभी लड़कियां पहनती हैं 
ब्रिज – ठीक है लेकिन कम से कम दुपट्टा तो ओढ़ा कर 
रेखा – अब क्या घर में भी चुन्नी डाल के रखूं क्या , आपके सामने भी मुझे दुपट्टा ओढ़ना पड़ेगा 

इसके बाद रेखा चली जाती है ।

कुछ दिन बाद पिंकी बंक मारकर वह राहुल के साथ गई। कार में बैठते ही उसकी भूख फूट पड़ी।  
राहुल ने जैसे ही उसकी शर्ट के बटन खोले, भरे-भरे स्तन बाहर आ गए — अब वे बड़े, गोल और भारी हो चुके थे। राहुल ने उन्हें मुंह में लिया तो पिंकी की कमर खुद-ब-खुद उठने लगी। “और जोर से चूसो…” वह कराह रही थी।

उसकी स्कर्ट कमर तक चढ़ गई। गीली पैंटी दिख रही थी। राहुल ने उसे गोद में बिठाया। पिंकी खुद नीचे बैठ गई और ऊपर-नीचे होने लगी। उसके भारी स्तन राहुल के चेहरे पर टकरा रहे थे। वह तेज-तेज हिल रही थी, आँखें बंद, मुंह खुला, “अम्म्माहhh… गहरी… और गहरी…” 

राहुल ने पूरा सीन रिकॉर्ड किया। पिंकी को पता भी नहीं चला। वह तो बस अपने नए खिले हुए बदन के मजा में खोई हुई थी।

---

**घर लौटकर:**

पिंकी सीधा सिंगारदान के पास गई। पूरी यूनिफॉर्म उतारकर नंगी खड़ी हो गई। अब उसका बदन पूरी तरह खिल चुका था — भारी निम्बू जैसे स्तन, पतली कमर, गोल नितंब और हमेशा गीली रहने वाली जगह। वह शीशे में खुद को देखकर मुस्कुराई और बोली, “अब मैं तैयार हूँ…”


बृजमोहन जब बेटियों और पत्नी के साथ बाजार निकलता तो लोग उनको लार टपकाते हुए देखते । बृजमोहन साफ देखता की उनकी नजर कहां पर है  ।
ऐसे ही एक दिन वो लड़कियों के साथ बाजार के लिए निकला । बाजार पहुँचते ही चारों तरफ़ नज़रें उन पर टिक गईं। लड़के फुसफुसाने लगे, दुकानदार घूरने लगे।

**बृजमोहन** (बेटियों को देखकर, तनाव भरे स्वर में): “अरे मीना! पिंकी! dupatta नीचे करो जरा! इतना ऊपर क्यों ओढ़ रखा है? लोग क्या सोचेंगे? शर्म करो थोड़ी!”

**मीना** (चिढ़कर): “पापा, गर्मी लग रही है ना। dupatta ऊपर रखूँ तो गला घुटता है।”

**पिंकी** (मासूमियत से): “मैंने तो ठीक से ओढ़ रखा है पापा… आप हर समय डाँटते रहते हो।”

**रेखा** (मुस्कुराते हुए, थोड़ी चिढ़कर): “पापा, आप तो हर बाहर निकलने पर यही ड्रामा करते हो। हम चल तो रहे हैं ना, कोई कुछ नहीं कर रहा।”

**बृजमोहन** (रेखा को घूरकर): “तुम चुप रहो रेखा! तुम्हारी वजह से ही तो पूरा मोहल्ला हमारी तरफ़ देखता है।”

सब्जी वाले की दुकान पर सरला झुककर टमाटर चुन रही थी। उसका पल्लू सरक गया और थैली पर गिर गया। सब्जी वाला मुस्कुराते हुए घूरने लगा।

**बृजमोहन** (तुरंत नाराज होकर): “सरला! अरे, पल्लू तो संभाल लो! देखो, सब देख रहे हैं। कितनी बार कहना पड़ेगा?”

**सरला** (पल्लू ठीक करते हुए, चिढ़कर): “अरे बाबा! पल्लू गिर गया तो गिर गया। जानबूझकर तो नहीं गिराया मैंने। तुम्हें हर छोटी बात में शक हो जाता है।”

**बृजमोहन** (गुस्से में): “शक नहीं, हकीकत देख रहा हूँ सरला! पूरा बाजार तुम चारों को घूर रहा है। रेखा तो खुलकर घूम रही है, अब तुम भी शुरू हो गई हो।”

**सरला** (हँसते हुए, मजाक में चढ़ाते हुए): “अरे मेरे शक्की बाबू… इतना जलते क्यों हो? तब तो दुकान वाले अच्छी सब्जी देंगे, पूरा वजन देंगे। थोड़ा मुस्कुरा लो ना! देखो, सब्जी वाला कितना ध्यान से चुन रहा है।”

**बृजमोहन** (और चिढ़कर): “सरला! मजाक मत करो। यह हँसी-खेल की बात नहीं है। लोग हमारी तरफ़ उँगलियाँ उठा रहे हैं।”

**सरला** (अब थोड़ा गंभीर, लेकिन आत्मविश्वास से): “उँगलियाँ उठा रहे हैं तो उठाने दो। हम क्या करें? घर में बैठकर सड़ें? मैं कोई कैदखाने में तो नहीं हूँ ना? तुम भी तो समझो थोड़ा।”

**बृजमोहन** (सिर हिलाते हुए): “तुम लोग समझ ही नहीं रही हो। पहले रेखा, अब तुम… मुझे डर लग रहा है सरला।”

**सरला** (हल्के से हँसकर, बृजमोहन का हाथ पकड़ते हुए): “अरे, डरो मत। दुनिया बदल रही है, हमें भी बदलना पड़ेगा। अब चुपचाप चलो, अच्छी-अच्छी सब्जियाँ लेते हैं।”

रेखा पीछे से मुस्कुरा रही थी। मीना और पिंकी चुपचाप चल रही थीं। बृजमोहन निराश होकर आगे बढ़ गया, लेकिन उसके मन में तूफान चल रहा था।

शाम के सात बज चुके थे। बृजमोहन अखबार पढ़ रहा था। तभी बाहर बाइक की तेज़ आवाज़ आई और दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक हुई।

सरला ने दरवाज़ा खोला। सामने **जहांगीर** खड़ा था — क्षेत्र का सबसे दबंग नेता और बदमाश। काला कुर्ता, जींस, गले में मोटी सोने की चेन। उसकी आँखों में साफ़ हवस झलक रही थी।

**जहांगीर** (सरला को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, मुस्कुराते हुए): “अरे वाह सरला भाभी…! आपकी खूबसूरती की तो मैंने बहुत तारीफ़ सुनी थी, लेकिन सामने देखकर लग रहा है कि अफ़वाहें कम थीं। इतनी निखरी हुई, इतनी मस्त… उम्र कहाँ छुपा रखी है आपने?”

सरला थोड़ी झिझक गई। उसने साड़ी का पल्लू समेटा और नजरें नीचे कर लीं, लेकिन उसके गाल लाल हो गए।

**सरला** (हल्के से मुस्कुराते हुए): “आइए अंदर आइए जहांगीर भाई…”

जहांगीर अंदर आया। बृजमोहन भी उठकर सामने आ गया।

**जहांगीर** (बृजमोहन की तरफ़ देखकर): “क्या हाल है बृजमोहन भाई? सब ठीक-ठाक तो है न? घर-परिवार कैसे चल रहा है?”

**बृजमोहन** (घबराते हुए): “जी… सब ठीक है।”

**जहांगीर** (आराम से सोफ़े पर बैठते हुए): “सुनो भाई, अगला पंचायत चुनाव नज़दीक है। मैं सोच रहा हूँ आपको टिकट दिलवा दूँ। मेरे पूरे समर्थन के साथ आप आसानी से जीत सकते हो। क्या कहते हो? तैयार हो?”

**बृजमोहन** (हड़बड़ाकर): “जी… यह तो बड़ी कृपा होगी आपकी…”

**जहांगीर** (फिर सरला की तरफ़ मुड़कर, हवस भरी नज़रों से): “सरला भाभी, आपकी बड़ी बेटी रेखा की भी बहुत चर्चा है मोहल्ले में। कहते हैं लड़की अब पूरी तरह खुल गई है। अच्छा है। आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही होनी चाहिए। अगर कोई दिक्कत हो, कोई परेशानी हो, तो सीधा मुझे बता देना। मैं सब सँभाल लूँगा।”

सरला अब सामान्य हो चुकी थी। वह मुस्कुराई और बोली:

**सरला**: “आपका आशीर्वाद है जहांगीर जी ।”

तभी अंदर से **पिंकी** पानी का गिलास लेकर आई। वह बहुत छोटी स्कर्ट और टाइट टॉप पहने थी, जिससे उसकी जाँघें और पेट का निचला हिस्सा साफ़ दिख रहा था।

जहांगीर की नज़र पिंकी पर अटक गई। उसने मुस्कुराते हुए पिंकी को पास बुलाया।

**जहांगीर** (पिंकी के कंधे पर हाथ रखकर, धीरे-धीरे सहलाते हुए): “अरे… यह कौन सी प्यारी सी गुड़िया है? नाम क्या है बेटा?”

**पिंकी** (शरमाते हुए, लेकिन मुस्कुराते हुए): “पिंकी…”

**जहांगीर** (कंधा सहलाते हुए और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए): “बहुत प्यारी बच्ची है पिंकी। नाजुक, सुंदर और मासूम। स्कर्ट भी कितनी अच्छी पहनी है। लग रही हो जैसे कोई छोटी परी। कितने साल की हो गई हो?”

**पिंकी** (पॉजिटिव और थोड़ी खुश होकर): “सोलह साल…”

**जहांगीर** (हँसते हुए, हाथ अभी भी कंधे पर): “वाह! सोलह साल की उम्र में इतनी खूबसूरत। आगे चलकर तो बहुत माल बनोगी। अच्छे से पढ़ना और अपना ख्याल रखना। अगर कोई परेशानी हो तो चाचा को बता देना, ठीक है?”

**पिंकी** (मुस्कुराते हुए, सिर हिलाते हुए): “जी चाचा…”

जहांगीर ने पिंकी के कंधे को आखिरी बार दबाया, फिर सरला की तरफ देखकर बोला:

**जहांगीर**: “सरला भाभी, आपकी सारी लड़कियाँ बहुत खूबसूरत हैं। घर का माहौल अच्छा रखना। मैं बीच-बीच में आता रहूँगा।”

वह हँसता हुआ उठा और बाहर चला गया।

बृजमोहन चुपचाप खड़ा सब देखता रहा। उसके माथे पर पसीना था, लेकिन मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला।

---

**बृजमोहन और सरला के बीच संवाद (विस्तारित सीन)**

जहांगीर के जाने के कुछ मिनट बाद बृजमोहन ने दरवाजा बंद किया। उसका चेहरा तनावग्रस्त था। वह सीधा सरला के पास गया, जो सोफे पर बैठी थी।

**बृजमोहन** (उत्तेजित स्वर में): “सरला, वह यहां क्यों आया था? इतने सालों में कभी नहीं आया, आज अचानक क्यों?”

**सरला** (शांत स्वर में, पान चबाते हुए): “मुझे क्या मालूम? शायद रेखा की बात सुनकर आया होगा। या फिर… किसी और वजह से।”

**बृजमोहन** (गुस्से और डर के मिश्रण से): “आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ। तुम भी उसकी नजर में आ गईं। तुमने देखा नहीं कैसे घूर रहा था? जैसे कोई शिकार देख रहा हो।”

सरला ने पान की गिलौरी मुँह में रखी और धीरे से मुस्कुराई।

**सरला**: “तो क्या करूँ? अब मैं खुद को घर में कैद तो नहीं रख सकती ना? बाहर निकलूँगी तो लोग देखेंगे ही।”

**बृजमोहन** (आवाज़ ऊँची करते हुए): “लेकिन वो औरतबाज है सरला! पूरा मोहल्ला जानता है। उसके पीछे कितनी औरतों की कहानियाँ हैं। तुम्हें समझ नहीं आ रहा क्या?”

**सरला** (शांत लेकिन दृढ़ स्वर में): “मैं जानती हूँ। तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है। वो मुझे कुछ नहीं कर सकता।”

**बृजमोहन** (बैठते हुए, सिर पकड़कर): “मैं कहता हूँ कि राजनीति और इन सब लोगों से दूर रहो। जहांगीर जैसे लोगों से दूर रहना ही अच्छा है।”

**सरला** (बृजमोहन की तरफ़ देखकर, समझाते हुए): “इसमें गलत क्या है? वो कह रहा था कि तुम्हें चुनाव लड़वाएगा। घर की स्थिति सुधरेगी, पैसे आएंगे, इज्जत बढ़ेगी। मैं अभी तो कुछ कहा भी नहीं ना। बस बात कर रही थी।”

**बृजमोहन**: “लेकिन उसके साथ करीबी ठीक नहीं है सरला। तुम देख नहीं रही हो? वो तुम्हें कैसे देख रहा था।”

**सरला** (थोड़ा हँसते हुए, लेकिन गंभीर स्वर में): “चिंता मत करो। वो ऐसा-वैसा कुछ नहीं करेगा। मैं कोई दुकान का सामान नहीं हूँ कि कोई भी उठाकर ले जाए। मैं जानती हूँ कि कैसे बात करनी है। तुम बस शांत रहो।”

बृजमोहन कुछ देर चुप रहा। फिर धीरे से बोला:

**बृजमोहन**: “सरला… पहले घर में सिर्फ रेखा की चिंता थी। अब तुम भी… मुझे डर लग रहा है।”

**सरला** (बृजमोहन का हाथ पकड़कर): “डरो मत। समय बदल रहा है। हमें भी तो आगे का सोचना है  । तुम्हारी दुकान से घर नहीं चल सकता अब । और वो तुम्हे पता है न कौन है, इतना ताकतवर आदमी हमारे दरवाजे पर आया है । अब हमें भी उसके हिसाब से चलना चाहिए । इसमें हमारा भी तो फायदा है”

बृजमोहन ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप बैठा रहा। उसके मन में हजारों सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं मिल रहे थे।

सरला उठी और रसोई की तरफ चली गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

---दो दिन बाद शाम को दरवाजे पर दस्तक हुई। सरला ने दरवाजा खोला तो जहांगीर सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। इस बार वह अकेला था।
जहांगीर (सरला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए, प्रशंसात्मक स्वर में): “अरे वाह सरला भाभी…! आज तो और भी खूबसूरत लग रही हो। रंग में निखार आ गया है। सच कहूँ तो मोहल्ले की कोई औरत तुम्हारे सामने फीकी पड़ जाती है।”
सरला (थोड़ी झिझकते हुए, पल्लू संभालते हुए): “आइए अंदर आइए जहांगीर भाई… बृजमोहन तो दुकान गया है।”
जहांगीर अंदर आकर सोफे पर बैठ गया। उसकी नज़रें सरला के स्तनों और कमर पर बार-बार जा रही थीं।
जहांगीर (आराम से पैर फैलाते हुए): “बृजमोहन की चिंता मत करो। मैं खास तौर पर तुमसे मिलने आया हूँ।”
सरला (पानी का गिलास देते हुए): “मुझसे? कोई काम था क्या?”
जहांगीर (गिलास लेते हुए और सरला की उँगलियों को छूते हुए): “काम तो बहुत हैं… लेकिन सबसे पहले तुम्हारी तारीफ कर लूँ। तुम्हारी चाल, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा अंदाज़ — सब कुछ देखकर मन नहीं भरता। बृजमोहन कितना भाग्यशाली है, फिर भी तुम्हारी कद्र नहीं करता लगता है।”
सरला (नजरें नीचे करते हुए, लेकिन मुस्कुराते हुए): “आप ऐसे बोल रहे हैं… मैं क्या जवाब दूँ? आप तो नेता हैं, बड़े-बड़े काम करते हैं।”
जहांगीर (हँसते हुए, आगे झुककर): “नेता होने का फायदा यही है कि जो पसंद आए, उसे अपना बना लूँ। सरला, तुम्हें अगर कभी अकेलापन लगे, या कोई परेशानी हो — घर की, बच्चों की, या… खुद की — तो सीधा मुझे बता देना। मैं हर वक्त तैयार हूँ।”
सरला (थोड़ी घबराकर, लेकिन आकर्षित होते हुए): “आपकी कृपा है भाई… लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
जहांगीर (मुस्कुराते हुए, हाथ बढ़ाकर सरला के कंधे पर रखते हुए): “लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर जीवन नहीं जीते सरला। तुम खूबसूरत हो, समझदार हो। बस थोड़ा हिम्मत रखो। मैं तुम्हारे पूरे परिवार का ख्याल रखूँगा — रेखा का, पिंकी का… और तुम्हारा भी।”
सरला ने कंधा हटाने की कोशिश नहीं की। वह बस चुपचाप खड़ी रही। जहांगीर ने अंत में उसकी कमर की तरफ एक लालची नज़र डाली और उठ खड़ा हुआ।
जहांगीर: “अब ज्यादा देर नहीं रुकता। बृजमोहन आ जाएगा तो शक करेगा। लेकिन याद रखना — मेरे पास आने में संकोच मत करना।”
जहांगीर के जाते ही सरला ने दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।


दो दिन बाद दोपहर में एक सफेद इनोवा कार बृजमोहन के घर के सामने रुकी। ड्राइवर उतरकर दरवाजे पर आया और एक लिफाफा दिया।

**ड्राइवर**: “सरला जी के नाम है। जहांगीर साहब ने भेजा है।”

सरला ने लिफाफा खोला। अंदर एक सुंदर कार्ड था और कुछ नोट्स। कार्ड पर लिखा था:

“प्रिय सरला भाभी,  
आज शाम ७ बजे अपने परिवार के साथ मेरे घर आना। खास तौर पर तुम और बृजमोहन। इंतजार रहेगा।  
— जहांगीर”

सरला ने कार्ड बृजमोहन को दिखाया।

**बृजमोहन** (चिंतित होकर): “यह क्या है सरला? वह हमें अपने घर बुला रहा है? दोनों को? मैं नहीं जाना चाहता।”

**सरला** (कार्ड को सहलाते हुए): “देखो जी, इनकार करना ठीक नहीं होगा। वह दबंग नेता है। अगर हम नहीं गए तो सोच सकता है कि हम उसका अपमान कर रहे हैं।”

**बृजमोहन** (घबराकर): “लेकिन उसकी नीयत साफ नहीं है। तुम्हें देखने का तरीका… मुझे अच्छा नहीं लगता।”

**सरला** (बृजमोहन का हाथ पकड़कर, समझाते हुए): “मैं जानती हूँ। लेकिन हमें भी समझदारी से काम लेना होगा। वहाँ जाकर बात करेंगे। राजनीति की बात भी होगी। तुम्हारा भविष्य बन सकता है।”

**बृजमोहन** (सिर हिलाते हुए): “मुझे डर लग रहा है सरला…”

**सरला** (मुस्कुराते हुए, लेकिन दृढ़ता से): “डरो मत। मैं हूँ ना। हम दोनों साथ जाएँगे। अगर कुछ गलत लगा तो हम तुरंत लौट आएंगे। बस एक बार चलकर देखते हैं। इनकार करने से फायदा नहीं होगा।”

बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर अनमने ढंग से मान गया।

**बृजमोहन**: “ठीक है… चलते हैं। लेकिन तुम सावधानी से रहना।”

सरला ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

शाम ६:४५ बजे वही इनोवा कार फिर आ गई। जहांगीर ने स्वयं ड्राइवर को भेजा था। बृजमोहन ने देखा सरला ने आज स्लीव्स लेस साड़ी पहनी है । बृजमोहन, सरला, — कार में बैठकर जहांगीर के बड़े बंगले की तरफ रवाना हो गए।
[+] 2 users Like Hot_randi_rishita's post
Like Reply


Messages In This Thread
Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 30-04-2026, 04:18 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 30-04-2026, 06:54 PM
RE: Shaitani aaina - by rajeev13 - 30-04-2026, 08:08 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 30-04-2026, 08:10 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 30-04-2026, 08:39 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 02-05-2026, 03:34 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 02-05-2026, 03:43 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 02-05-2026, 09:50 PM
RE: Shaitani aaina - by Praveen84 - 26-05-2026, 08:25 AM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 13-06-2026, 11:55 PM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 15-06-2026, 02:31 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 16-06-2026, 01:47 AM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 16-06-2026, 08:38 AM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 16-06-2026, 02:06 PM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 16-06-2026, 10:29 PM
RE: Shaitani aaina - by Raj14592 - 16-06-2026, 11:11 PM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 17-06-2026, 04:51 PM
RE: Shaitani aaina - by 123@abc - 17-06-2026, 07:48 PM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 20-06-2026, 12:22 PM
RE: Shaitani aaina - by Rocksanna999 - 26-06-2026, 06:47 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 07-07-2026, 12:05 AM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 07-07-2026, 01:26 AM
RE: Shaitani aaina - by Raj14592 - 08-07-2026, 12:31 PM
RE: Shaitani aaina - by Raj14592 - 09-07-2026, 05:04 PM
RE: Shaitani aaina - by Hot_randi_rishita - 11-07-2026, 10:27 PM



Users browsing this thread: 2 Guest(s)