02-05-2026, 03:34 PM
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Updete – 5
बृजमोहन की मझली रेखा, उसके भी लक्षण ठीक नहीं थे । परिवार की मंझली होने के कारण वह न तो बड़ी जिम्मेदारी लेती थी, न छोटी की तरह लाड़ली थी। सिंगारदान घर आते ही रेखा सबसे पहले और सबसे गहरे प्रभाव में आती है। आईने के सामने खड़े होते ही जैसे कोई पुरानी आत्मा उसमें समा गई हो। वह घंटों आईने के सामने खड़ी रहती। अपने बालों को बार-बार संवारती, काजल लगाती, गालों पर तिल बनाती और होंठों पर लिपस्टिक को बार-बार लगाकर चिकना करती।
उसकी चाल बदल गई — कूल्हे हल्के-हल्के मटकने लगे, पाँव में पायल बाँधकर चलतेहुए बजाती।
चोली थोड़ी ढीली रखने लगी, आँखों में एक नशीली चमक आ गई। रेखा अब बालकनी की “मुख्य आकर्षण” बन गई थी। वह जानती थी कि नीचे खड़े युवक किस अदा पर रुकते हैं। वह जानबूझकर लंबी अंगड़ाई लेती, एक कंधा झुकाकर खड़ी होती और मुस्कुराते हुए आँखों से इशारा करती।
छोटी को वह “दीदी” कहकर चिढ़ाती और लोशन, पाउडर या गजरा छुपाकर रखती। लेकिन बड़ी के सामने थोड़ी संकोची भी रहती।
शाम को पानदान के पास बैठकर पान की गिलौरी बनाती और हल्के-हल्के ठिठोलियाँ मारती। उसकी हँसी में अब एक अलग ही मिठास और उकसावा था। बाप की उपस्थिति में भी अब उसे शर्म नहीं आती थी।
कुछ महीने बाद रेखा का एक युवक से चक्कर चलने लगा। लड़के का नाम राहुल था ।
वह पान की दुकान के पास रहने वाला, २४-२५ साल का, सुंदर और हुस्नपरस्त युवक था। शुरू में वह सिर्फ बालकनी से इशारे करता था, लेकिन रेखा ने धीरे-धीरे उसे और करीब बुला लिया। रेखा अब रात को भी बालकनी में अकेली खड़ी रहने लगी थी। राहुल नीचे खड़ा इंतजार करता। एक रात रेखा ने इशारा किया और बृजमोहन को कुछ बहाना देकर घर से बाहर निकल गई।
पहली मुलाकात गली के कोने में हुई।
दूसरी मुलाकात में राहुल उसे पास की एक पुरानी कोठरी में ले गया।
रेखा ने कोई विरोध नहीं किया। सिंगारदान ने उसके अंदर जो आग जलाई थी, वह अब बेकाबू हो चुकी थी।
राहुल (हाँफते हुए): “रेखा… कितना दिन से तरस रहा था तुम्हारे लिए।”
रेखा (आँखें झुकाकर, लेकिन शरीर से सटते हुए): “तो अब तरसना बंद करो… जो करना है करो।”
राहुल ने झुककर उसके होंठों को चूस लिया। रेखा ने भी पूरी ताकत से जवाब दिया। उनकी जीभें एक-दूसरे में लिपट गईं। राहुल का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरे हाथ से उसने उसके स्तनों को दबाया।
रेखा (कराहते हुए): “उफ्फ… जोर से दबाओ न… डरते क्यों हो?”
राहुल ने ब्लाउज के बाकी हुक भी खोल दिए। रेखा का काला ब्रा सामने था। उसने ब्रा ऊपर किया और दोनों स्तनों को बाहर निकाल लिया। वे गोल, भरे हुए और सख्त थे। राहुल ने एक स्तन मुंह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा।
रेखा (सिर पीछे करके, आह भरते हुए): “आह… हाँ… काटो… चूसो… मैं आज बहुत गीली हो रही हूँ…”
राहुल दूसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू खींचकर नीचे गिरा दिया। साड़ी कमर तक खुल गई। उसने रेखा की पैंटी पर हाथ रखा — पूरी तरह भीगी हुई थी।
राहुल (उँगलियाँ घुमाते हुए): “वाह रेखा… इतनी गीली? लगता है तुम भी मर रही थीं मेरे लंड के लिए।”
रेखा (साँसें तेज़ करते हुए): “हाँ… मारो मुझे… अपनी रंडी बना लो आज… चोद दो जोर से…”
राहुल ने पैंटी उतार दी। रेखा की चिकनी, गीली योनि सामने थी। उसने घुटनों पर बैठकर जीभ से चाटना शुरू किया। रेखा की टांगें काँपने लगीं।
रेखा (मोचे में हाथ डालकर): “आह… राहुल… वहाँ… हाँ… चूसो… उफ्फ मैं मर जाऊँगी…”
कुछ देर चाटने के बाद राहुल उठा। उसने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पूरा खड़ा, मोटा और नसों वाला था। रेखा ने आगे बढ़कर उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी।
रेखा (नशीली आँखों से): “कितना मोटा है… आज इसे अंदर लेना है मुझे…”
राहुल ने रेखा को चारपाई पर लिटा दिया, उसके पैर फैलाए और लंड के सिरे को योनि पर रगड़ने लगा।
रेखा (बेचैनी से): “मत तड़पाओ… डाल दो… पूरी तरह अंदर कर दो…”
राहुल ने एक झटके में आधा लंड अंदर कर दिया। रेखा चीख उठी।
रेखा: “आआह… धीरे… बड़ा है न… आह…”
राहुल ने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर-पूरा बाहर करना शुरू किया। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ी। अब कमरे में चुटकी बजाने और शरीर की टकराहट की आवाज़ गूंज रही थी।
राहुल (जोर-जोर से धक्के देते हुए): “ले रेखा… ले मेरी जान… कितनी टाइट है तू… आज मैं तुझे भर दूँगा…”
रेखा (नाखून राहुल की पीठ में गड़ाते हुए, चीखते हुए): “हाँ… चोदो… और जोर से… फाड़ दो मुझे… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… आह… राहुल… तेज… तेज…”
कुछ ही मिनटों में रेखा का शरीर तन गया। वह जोर से काँपी और पहली बार झड़ गई। राहुल ने भी कुछ और जोरदार धक्कों के बाद रेखा के अंदर ही वीर्य छोड़ दिया।
दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे।
डसके बाद उनका चक्कर नियमित हो गया।
कभी कोठरी में, कभी रात के अंधेरे में छत पर, कभी राहल के
कमरे में। रेखा अब पूरी तरह कामातुर हो चुकी थी ।
राहुल के साथ बार-बार संबंध बनाने के बाद रेखा गर्भवती हो गई। शुरू के दो महीने तक उसने किसी को नहीं बताया, लेकिन उल्टियाँ और थकान बढ़ने लगी।
एक शाम जब रेखा बालकनी में खड़ी थी, तभी बृजमोहन को शक हो गया। उसने रेखा को कमरे में बुलाया।
बृजमोहन ने रेखा का कान पकड़ लिया और जोर से खींचा।
बृजमोहन (गुस्से में चिल्लाते हुए): “हरामजादी! यह क्या हालत कर रखी है अपनी? पेट में क्या है? बोल, यह किसका बच्चा है? राहुल का? या किसी और का?”
रेखा दर्द से चीखी, लेकिन कुछ नहीं बोली। आँखों में आँसू आ गए।
बृजमोहन (और ज़ोर से कान पकड़ते हुए): “मैंने सोचा था सिंगारदान ने घर को बर्बाद कर दिया, लेकिन तू तो पूरी रंडी बन गई! बोल, किस कुत्ते ने तुझे पेट भर दिया?”
इतने में सरला (बृजमोहन की पत्नी) दौड़कर आ गई। पहले तो वह भी हैरान थी, लेकिन अचानक उसका व्यवहार बदल गया। उसने बृजमोहन का हाथ पकड़कर रेखा के कान से अलग किया और शांत स्वर में बोली:
सरला: “बस कीजिए जी। इतना गुस्सा मत कीजिए। लड़की है, गलती हो गई। अब चिल्लाने से क्या होगा? पड़ोस में पता चल जाएगा।”
बृजमोहन हैरान होकर सरला को देखने लगा। सरला ने रेखा की तरफ़ देखा और नाटक करते हुए तेज़ आवाज़ में डाँटा:
सरला: “शर्म नहीं आती तुझे? घर की इज्जत का कुछ ख्याल नहीं? हमने तुझे इतना लाड़-प्यार दिया, और तू यह कर बैठी?”
(सरला अंदर से खुश थी, क्योंकि सिंगारदान का प्रभाव अब उस पर भी पूरा था। वह जानती थी कि बच्चा रखने से घर की “कमाई” प्रभावित होगी।)
सरला (बृजमोहन की तरफ़ मुड़कर, मीठे लेकिन दृढ़ स्वर में): “जी, इसे डाँटने से कुछ नहीं होगा। कल ही अस्पताल ले चलते हैं। बच्चा गिरवा देते हैं। अभी छोटा है, आसानी से हो जाएगा। बाद में मुसीबत बढ़ जाएगी।”
बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर मान गया।
अगले दिन — अस्पताल
सुबह जल्दी ही बृजमोहन, सरला और रेखा अस्पताल गए। रेखा चुप थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखें सूजी हुई थीं।
डॉक्टर ने चेक किया और कहा कि ८-९ हफ्ते का गर्भ है, गर्भपात आसानी से हो सकता है।
रेखा को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। सरला ने बाहर बैठकर बृजमोहन को समझाया, “चिंता मत कीजिए। सब ठीक हो जाएगा। घर में फिर से पहले जैसा माहौल हो जाएगा।”
दो घंटे बाद रेखा को बाहर लाया गया। उसका गर्भपात कर दिया गया था। रेखा बेहोश-सी पड़ी थी, चेहरा सफेद, आँखों के नीचे काले घेरे।
घर लौटकर रेखा बिस्तर पर लेट गई। सरला ने उसे दवा दी और बोली:
सरला (धीरे से, लेकिन मुस्कुराते हुए): “अब आराम कर , )
रेखा – मां मुझे माफ कर दो, मैंने बहुत गलत कर दिया ।
सरला – गलत तो तब होता, अगर लोगों को पता चल जाता । और बदनामी होती ।
रेखा – फिर भी जो हुआ, वह सब ठीक नहीं हुआ। पिताजी कितने परेशान हैं इस बात से
सरला – तू उनकी चिंता मत कर कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा । जवानी में ऐसी गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं । तू भी तो अब जवान हो गई है ।
आखिर कब तक संभालती इस निगोड़ी जवानी को ।
रेखा सरला की बातें और इस तरह ’ निगोड़ी जवानी ’ जैसे शब्दों को अपनी मां के सुनकर हैरान हो जाती है, और उसे एक टक होकर देखने लगती है ।
उसे क्या पता था की आईने का असर सिर्फ उसे पर ही नहीं बल्कि उसकी मां पर भी हुआ था । वह भी उसके गिरफ्त में थी ।
सरला – ऐसे क्या देख रही है, सही तो कह रही हूं । देख मै भी तेरी उम्र से गुजरी हूं । मुझे पता है, जवानी में दिल में कैसे-कैसे अरमान जाते हैं । शरीर भी क्या-क्या चीजों की मांग करने लगता है । ( सरला शरारती नजरों से रेखा को देखते हुए कहती है )
लेकिन अब तू उस राहुल से मत मिलना । नहीं तो दोबारा पेट से हुई , तो मैं भी तेरा साथ नहीं दूंगी । मैं तेरे पापा से तेरी शादी की बात करती हूं, जल्दी कोई लड़का देखकर तेरे हाथ पीले कर देंगे । तब तक अपने को काबू में रख ।
उसके बाद सरला कमरे से जाने लगती है तभी वह दरवाजे पर रख कर रेखा की ओर मुड़ती है और कहती है " और हां ज्यादा बालकनी में सज धज के खड़ी मत रहाकर, और लड़कों को इशारे मत करना ”
गर्भपात के बाद रेखा कुछ दिन तक घर में शांत रही। वह ज़्यादातर अपने कमरे में रहती, कम बोलती, खाना भी कम खाती। कभी-कभी रात को अकेले में रो लेती। शरीर कमजोर था, लेकिन सिंगारदान का असर अभी भी उसके खून में था।
गर्भपात के १०-१२ दिन बाद रेखा की देह में फिर से आग सुलगने लगी।
रात में अकेले लेटे-लेटे उसकी चूत कुलबुलाने लगती। स्तन भारी लगते, निप्पल सख्त हो जाते। वह उँगलियों से खुद को सहलाती, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। आखिरकार उसने राहुल को फोन किया।
रेखा (मोहभरी आवाज़ में): “राहुल… मुझे बहुत याद आ रही है। आज रात मिलोगे?”
राहुल (ठंडे स्वर में): “रेखा, अब नहीं। वो सब खत्म हो गया। मैं नया काम शुरू कर रहा हूँ। तुम भी अपना ध्यान रखो।”
राहुल ने साफ़ मना कर दिया। रेखा का दिल टूट गया, लेकिन उसकी देह और भी बेचैन हो गई।
अब उसकी आँखें आस-पास के लड़कों को तलाशने लगीं।
गर्भपात के बाद रेखा का शरीर काफी बदल गया था। सिंगारदान का प्रभाव, गर्भावस्था के हार्मोन और फिर अचानक गर्भपात — इन सबने मिलकर उसे एक नया, और ज़्यादा कामुक रूप दे दिया था।
रेखा का शारीरिक बदलाव (विस्तार):
स्तन: पहले से ज़्यादा भरे हुए, भारी और नरम हो गए थे। निप्पल गहरे गुलाबी-भूरे रंग के और बहुत संवेदनशील थे — हल्का-सा स्पर्श या कपड़े का रगड़ना भी उन्हें सख्त कर देता।
कमर और पेट: गर्भावस्था के बाद पेट थोड़ा ढीला हो गया था, लेकिन अब वह थोड़ी मोटी और आकर्षक गोलाई के साथ नजर आती थी। कमर में एक नई नरमी आ गई थी।
चूतड़ और जाँघें: अब और मोटी, गोल और दृढ़ हो गई थीं। चलते समय वे हल्के-हल्के लहराती थीं, जो लड़कों को पागल कर देती थीं।
चेहरे और त्वचा: चेहरा थोड़ा गोल हो गया था। त्वचा चमकदार और गुलाबी हो गई थी। होंठ स्वाभाविक रूप से थोड़े फूले हुए लगते थे।
कुल मिलाकर: वह अब पहले से ज़्यादा “मैच्योर और सेक्सी” दिखने लगी थी — १९-२० साल की उम्र में भी वह २४-२५ की शादीशुदा औरत जैसी लगती थी।
लड़कों की नज़र (मोहल्ले और कॉलेज में)
रेखा अब मोहल्ले और कॉलेज दोनों जगह “मुख्य आकर्षण” बन चुकी थी। लड़कों की नज़रें उसके शरीर के हर हिस्से को “खा” रही थीं:
स्तनों पर: जब रेखा चलती तो उसके भारी स्तन हल्के-हल्के उछलते। लड़के दूर से ही उन्हें घूरते और आपस में फुसफुसाते — “यार, देख कितने बड़े और ढीले हो गए हैं…”
चूतड़ पर: पीछे से देखने वाले लड़के उसकी लहराती गांड को देखकर ताली बजाते। कई बार तो सीटी मार देते।
जाँघों और कमर पर: साड़ी या सलवार में जब कमर का गोला दिखता या जाँघों की मोटाई नजर आती, तो लड़के उत्तेजित हो जाते।
चलने के अंदाज़ पर: गर्भपात के बाद रेखा की चाल और भी मटकती हुई हो गई थी — जैसे वह जानबूझकर लड़कों को लुभा रही हो।
लड़कों के बीच चर्चा के कुछ उदाहरण:
“भाई, रेखा तो अब और माल हो गई है। प्रेग्नेंट होने के बाद और गर्म लग रही है।”
“उसकी चूत अब ढीली हो गई होगी… मजा आएगा चोदने में।”
“देख, कितने आराम से स्तन हिल रहे हैं… ब्रा पहनती भी है या नहीं?”
“राहुल ने तो फेंक दिया, अब हमारा टाइम है।”
रेखा जब बालकनी में खड़ी होती, तो १०-१२ लड़के इधर-उधर खड़े होकर उसे घूरते। कोई फोन पर वीडियो बना लेता, कोई सीटी मारता। कुछ तो उसके घर के सामने घंटों घूमते रहते।
रेखा को यह सब अपमान भी लगता था और गर्व भी। वह जानती थी कि अब पूरा मोहल्ला उसकी देह को चाहता है।
कॉलेज और मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई।
“रेखा राहुल के साथ चक्कर चला रही थी… प्रेग्नेंट भी हो गई थी… गर्भपात कराया…”
कुछ लड़के तो इसे सुनकर और उत्तेजित हो गए। अब रेखा जब भी बालकनी में खड़ी होती या कॉलेज जाती, तो लड़के उसकी तरफ़ घूरते, इशारे करते और लाइन मारते।
चिढ़ाने और छेड़खानी आम हो गई:
मोहल्ले के लड़के रेखा के पीछे “ओये रेखा… राहुल ने छोड़ दिया क्या?” कहकर हँसते।
कोई उसके पीछे आकर “अब हमारा नंबर कब आएगा?” whispering करते।
कॉलेज में कुछ लड़के जानबूझकर उसकी बेंच के पास बैठकर उसकी जाँघों को छूने की कोशिश करते।
एक-दो ने तो सीधे फ्रेंडशिप का प्रस्ताव रख दिया — “एक बार मिल ले, तुझे बहुत मज़ा देंगे।”
रेखा पहले तो चिढ़ती, लेकिन धीरे-धीरे उसकी देह इन इशारों पर प्रतिक्रिया देने लगी। उसकी चूत गीली होने लगती जब कोई लड़का उसकी छातियों को घूरता या पीछे से रगड़ने की कोशिश करता।
एक दिन शाम को मोहल्ले का एक लड़का (नाम: विक्रम) रेखा के घर के पास आया और बोला:
विक्रम: “रेखा, राहुल ने तो तुझे यूज़ करके फेंक दिया। अब हम हैं ना… एक बार मौका दे। मैं तुझे राज़ रखूँगा।”
रेखा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर dekhungi kah ke चली गई।
रेखा के दीवाने दिनों दिन बढ़ते जा रहे थे । सरला तो उसे कुछ ज्यादा कहती नहीं थी , लेकिन बृजमोहन उसे टोकटा रहता था ।
शाम का समय था। बृजमोहन पान की दुकान से लौट रहा था। गली के मोड़ पर दो युवक (विक्रम और उसके दोस्त संजय) सिगरेट पीते हुए खड़े थे। वे आपस में जोर-जोर से बात कर रहे थे। बृजमोहन पास से गुजर रहा था, लेकिन वे उसे देखकर भी नहीं रुके।
विक्रम (हँसते हुए): “यार, रेखा का बदन तो अब पूरा गदराया हुआ है। प्रेग्नेंट होने के बाद स्तन देखे हैं? कितने भारी और लटकते हुए हो गए हैं। चलते समय ऐसे हिलते हैं कि लंड खड़ा हो जाए।”
संजय (उत्तेजित होकर): “हाँ भाई, गांड भी कितनी मोटी हो गई है। साड़ी में फंसकर अलग-अलग नजर आती है। कमर भी भर गई है। लगता है जैसे अभी-अभी किसी ने खूब चोदा हो। राहुल ने तो मजा ले लिया, अब बारी हमारी है।”
विक्रम: “एक बार मौका मिल जाए तो रात भर चोदूँ। निप्पल तो अब दूध देने वाले हो गए हैं। कल बालकनी में खड़ी थी, ब्लाउज से साफ़ दिख रहे थे। मैं तो सोच रहा हूँ, अगली बार सीधे प्रपोज कर दूँ।”
संजय (हँसते हुए): “प्रपोज क्या करना, सीधे पकड़ के चूस लेना। वो मानेगी। अब तो पूरी तैयार है।”
दोनों जोर से हँसे।
बृजमोहन कुछ दूर पर खड़ा सब सुन रहा था। उसके हाथ मुट्ठी में भिंच गए। चेहरा लाल हो गया। गुस्सा, शर्म और एक अजीब सी बेचैनी एक साथ उभर आई। वह जानता था कि रेखा अब मोहल्ले की “साझी संपत्ति” बन चुकी है।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
न तो उन लड़कों को डाँटा, न चिल्लाया।
चुपचाप सिर झुकाए घर की तरफ़ बढ़ गया।
रात में अकेले में लड़के रेखा के बारे में सोचकर हस्तमैथुन करते। उनकी कल्पनाओं में रेखा नंगी होती, चारों खाने चित्त पड़ी होती, या उनके लंड को मुंह में ले रही होती। वे आपस में बात करते:
“यार, रेखा की चूत अब ढीली हो गई होगी… राहुल ने तो खूब चोदा होगा।”
“स्तन देखे हैं? प्रेग्नेंट होने के बाद और भारी हो गए हैं। दूध पिलाने वाली लगती है।”
“एक बार मिल जाए तो रात भर चोदूँ… गर्भपात करा चुकी है, तो अब बिना डर के अंदर भर दूँगा।”
एक रात के करीब ९:३० बजे थे। बृजमोहन दुकान से कुछ सामान लेकर घर लौट रहा था। गली का रास्ता अंधेरा और सुनसान था। जैसे ही वह मोड़ पर मुड़ा, उसकी नज़र एक दृश्य पर पड़ी।
रेखा गली के बीच में एक लड़के (विक्रम) के साथ खड़ी थी। विक्रम के साथ उसके दो और दोस्त भी थे। रेखा की पीठ दीवार से सटी हुई थी। विक्रम उसके बहुत करीब खड़ा था।
बृजमोहन ने देखा कि विक्रम का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरा हाथ उसकी छाती के पास। रेखा हल्के से हँस रही थी। एक लड़का रेखा की जाँघ पर हाथ फेर रहा था, जबकि तीसरा उसके बालों को छू रहा था।
विक्रम (रेखा के कान में): “अब तो रोज मिलोगी न? तेरे स्तन तो छूने को तरस रहे हैं…”
रेखा ने हल्के से उसे धक्का दिया, लेकिन मुस्कुरा भी रही थी।
बृजमोहन का खून खौल उठा। उसका हाथ मुट्ठी में भींच गया। वह आगे बढ़ा, लेकिन अचानक रुक गया। कुछ कदम दूर खड़ा होकर वह सब देखता रहा।
एक लड़का: “रेखा, एक किस तो दे दे… राहुल ने तो खूब लिया होगा।”
रेखा ने शरमाते हुए मुंह फेर लिया, लेकिन विरोध नहीं किया।
बृजमोहन ने सब कुछ देख लिया — रेखा का गदराया बदन, लड़कों की लालची नज़रें, हाथों की छेड़खानी। उसका गुस्सा चरम पर था, लेकिन वह चुप रहा।
वह चुपचाप पीछे हट गया और दूसरे रास्ते से घर चला गया।
घर पहुँचकर वह सीधा सरला के पास गया। उसका चेहरा लाल था, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।
बृजमोहन: “सरला… रेखा अब पूरी तरह बेकाबू हो गई है। अभी मैंने देखा — गली में तीन लड़कों के बीच खड़ी थी। एक तो उसके स्तन छू रहा था, दूसरा जाँघ पर हाथ फेर रहा था… और वह हँस रही थी।”
सरला चौंक गई, लेकिन फिर शांत हो गई।
सरला: “कल मैं उसे अच्छे से समझा लूँगी।”
बृजमोहन (थके हुए स्वर में): “समझाने से कुछ नहीं होगा सरला। अब तो पूरा मोहल्ला जानता है। हम क्या करेंगे?”
वह चुप हो गया। उस रात बृजमोहन सो नहीं सका। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था — उसकी बेटी तीन लड़कों के बीच, छेड़ी जा रही थी, और वह कुछ नहीं कर सका।
रेखा देर रात घर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, होंठ थोड़े सूजे हुए थे। बृजमोहन ये देख के भड़क गया ।
रात के करीब १० बजे थे। बजमोहन कमरे में चहलकदमी कर रहा था। उसका चेहरा लाल था। सरला बिस्तर पर बैठी पान चबा रहंथी। रेखा अपने कमरे में थी. जबकि बडी बेटी मीना और छोटी
पिंकी भी घर पर ही थीं।
बजमोहन ने अचानक तेज़ आवाज़ मं कहाः
बृजमोहनः "सरला! देख लिया तूमने अपनी बेटी का हाल? रेखा दिन-रात बालकनी में खडी रहती है। लडके इशारे करते हैं, सीटी मारते हैं, और यह मुस्कुरा-मुस्कुरा के जवाब देती है! पूरे मोहल्ले में
हमारी इज्जत उड गई है।"
सरला ने पान की गिलौरी मुँह में रखते हुए शांत स्वर में पूछा "तो क्या करँ?"
बजमोहन (गुस्से में): "समझाओ उसे! कहो कि अब बहत हो गया। पहले उस आवारा राहुल के चक्कर में पेट ठहरा लिया, गर्भपात कराया। अब फिर वही सिलसिला शुरू हो गया है? अगर यह नहीं मानी तो घर से निकाल दूँगा!"
सरला ने धीरे से सिर हिलाया और बोली: "ठीक है, मैं कल उसे बोलती हूं । लेकिन आप भी ज़्यादा चिल्लाइए मत.. पडोस में सुनाई दे जाएगा।"
पिंकी और मीना दरवाजे के पीछे से छुपकर देख रही थीं । बृजमोहन की नज़र उन पर पड़ी ।
बृजमोहन का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उसने आवाज ऊँची कीः इधर आओ तुम दोनों भी ।
मीना (बडी) और पिंकी (छोटी) डरते-डरते कमरे में आई ।
बृजमोहन (उनकी तरफ़ उँगली दिखाते हुए): "तुम दोनों भी अपनी बहन जैसी बन रही हो क्या? बालकनी में खडी होकर लडकों से इशारे करती हो ? कोठे वाली बनाना है क्या तुम सब को । , पिंकी तू तो अब छोटी भी नहीं रही, एक बार गलती करके भी सुधरी नहीं , तूभी फिर उसी रास्ते पर जा रही है? और मीना, तू तो बड़ी है, तुझे शर्म नहीं आती? तीनों मिलकर घर की इज्जत मिट्टी में मिला रही हो।"
मीना (सिर झूकाकर): "पापा, हम कुछ नहीं करते..."
पिंकी (डर से): "मैं तो बस...
बजमोहन (चिल्लाकर): " तुम क्या मुझे बेवकूफ समझते हो, ये सफेद बाल ऐसे ही नहीं हुए मेरे , मोहल्ले वाले क्या-क्या बातें कर रहे हैं पता है तुमको ”
मीना – लेकिन पापा ...
बृजमोहन – "बस. अब एक शब्द नहीं कल से तीनो का बालकनी में जाना बंद! और अगर किसी लडके का इशारा देखा तो घर में पीटूँगा तुम्हे, समझ गई?"
सरला बीच में पडीः "बस कीजिए जी। अब जवान लड़कियों पे हाथ उठाओगे । अब क्या बालकनी में भी न जाएं । लड़कों के डर से ।
बृजमोहन – तो बालकनी में जाकर लड़कों को इशारे करेंगी ये ।
सरला – देखो जी , अब घर में तीन तीन जवान लड़कियां हैं, लड़के देखेंगे नहीं क्या , और ये लड़कों को डांटने का इशारा करती हैं, तुम बेकार में ....
बृजमोहन – कमाल है सरला, तुम भी इन्हें सही ठहरा रही हो ।
बृजमोहन – मैंने कह दिया तो कह दिया ।
सरला – ठीक है, ठीक है, लडकियाँ समझ गई हैं। अब चुप हो जाइए।"
बृजमोहन – अगर इन्होंने शादी होने तक अपनी जवानी को नहीं सम्हाला तो ठीक नहीं होगा । लड़कियां बदनाम हो जाए तो रिश्ता होना मुश्किल होता है । पता है न तुम्हें ।
सरला – ठीक है ठीक है अब बस करो
बजमोहन ने आखिरी बार गुस्से में कहाः "रेखा को खास तौर पर समझा देना सरला। वह सबसे ज्यादा बिगड गई है। अंधेरे में लड़कों के साथ खड़ी रहती है गलियों में । आते जाते लोग क्या सोचते होंगे ।अगर वह नहीं मानी तो में खुद उसका रास्ता सुधारूँगा।"
सरला ने सिर हिलाया, लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। वह जानती थी कि ब्रजमोहन की ये डाँट सिर्फ़ दिखावा है। रेखा अपने कमरे में सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर न तो डर था, न शर्म। बस एक अजीब सी बेचैनी थी ।
बृजमोहन की मझली रेखा, उसके भी लक्षण ठीक नहीं थे । परिवार की मंझली होने के कारण वह न तो बड़ी जिम्मेदारी लेती थी, न छोटी की तरह लाड़ली थी। सिंगारदान घर आते ही रेखा सबसे पहले और सबसे गहरे प्रभाव में आती है। आईने के सामने खड़े होते ही जैसे कोई पुरानी आत्मा उसमें समा गई हो। वह घंटों आईने के सामने खड़ी रहती। अपने बालों को बार-बार संवारती, काजल लगाती, गालों पर तिल बनाती और होंठों पर लिपस्टिक को बार-बार लगाकर चिकना करती।
उसकी चाल बदल गई — कूल्हे हल्के-हल्के मटकने लगे, पाँव में पायल बाँधकर चलतेहुए बजाती।
चोली थोड़ी ढीली रखने लगी, आँखों में एक नशीली चमक आ गई। रेखा अब बालकनी की “मुख्य आकर्षण” बन गई थी। वह जानती थी कि नीचे खड़े युवक किस अदा पर रुकते हैं। वह जानबूझकर लंबी अंगड़ाई लेती, एक कंधा झुकाकर खड़ी होती और मुस्कुराते हुए आँखों से इशारा करती।
छोटी को वह “दीदी” कहकर चिढ़ाती और लोशन, पाउडर या गजरा छुपाकर रखती। लेकिन बड़ी के सामने थोड़ी संकोची भी रहती।
शाम को पानदान के पास बैठकर पान की गिलौरी बनाती और हल्के-हल्के ठिठोलियाँ मारती। उसकी हँसी में अब एक अलग ही मिठास और उकसावा था। बाप की उपस्थिति में भी अब उसे शर्म नहीं आती थी।
कुछ महीने बाद रेखा का एक युवक से चक्कर चलने लगा। लड़के का नाम राहुल था ।
वह पान की दुकान के पास रहने वाला, २४-२५ साल का, सुंदर और हुस्नपरस्त युवक था। शुरू में वह सिर्फ बालकनी से इशारे करता था, लेकिन रेखा ने धीरे-धीरे उसे और करीब बुला लिया। रेखा अब रात को भी बालकनी में अकेली खड़ी रहने लगी थी। राहुल नीचे खड़ा इंतजार करता। एक रात रेखा ने इशारा किया और बृजमोहन को कुछ बहाना देकर घर से बाहर निकल गई।
पहली मुलाकात गली के कोने में हुई।
दूसरी मुलाकात में राहुल उसे पास की एक पुरानी कोठरी में ले गया।
रेखा ने कोई विरोध नहीं किया। सिंगारदान ने उसके अंदर जो आग जलाई थी, वह अब बेकाबू हो चुकी थी।
राहुल (हाँफते हुए): “रेखा… कितना दिन से तरस रहा था तुम्हारे लिए।”
रेखा (आँखें झुकाकर, लेकिन शरीर से सटते हुए): “तो अब तरसना बंद करो… जो करना है करो।”
राहुल ने झुककर उसके होंठों को चूस लिया। रेखा ने भी पूरी ताकत से जवाब दिया। उनकी जीभें एक-दूसरे में लिपट गईं। राहुल का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरे हाथ से उसने उसके स्तनों को दबाया।
रेखा (कराहते हुए): “उफ्फ… जोर से दबाओ न… डरते क्यों हो?”
राहुल ने ब्लाउज के बाकी हुक भी खोल दिए। रेखा का काला ब्रा सामने था। उसने ब्रा ऊपर किया और दोनों स्तनों को बाहर निकाल लिया। वे गोल, भरे हुए और सख्त थे। राहुल ने एक स्तन मुंह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा।
रेखा (सिर पीछे करके, आह भरते हुए): “आह… हाँ… काटो… चूसो… मैं आज बहुत गीली हो रही हूँ…”
राहुल दूसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू खींचकर नीचे गिरा दिया। साड़ी कमर तक खुल गई। उसने रेखा की पैंटी पर हाथ रखा — पूरी तरह भीगी हुई थी।
राहुल (उँगलियाँ घुमाते हुए): “वाह रेखा… इतनी गीली? लगता है तुम भी मर रही थीं मेरे लंड के लिए।”
रेखा (साँसें तेज़ करते हुए): “हाँ… मारो मुझे… अपनी रंडी बना लो आज… चोद दो जोर से…”
राहुल ने पैंटी उतार दी। रेखा की चिकनी, गीली योनि सामने थी। उसने घुटनों पर बैठकर जीभ से चाटना शुरू किया। रेखा की टांगें काँपने लगीं।
रेखा (मोचे में हाथ डालकर): “आह… राहुल… वहाँ… हाँ… चूसो… उफ्फ मैं मर जाऊँगी…”
कुछ देर चाटने के बाद राहुल उठा। उसने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पूरा खड़ा, मोटा और नसों वाला था। रेखा ने आगे बढ़कर उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी।
रेखा (नशीली आँखों से): “कितना मोटा है… आज इसे अंदर लेना है मुझे…”
राहुल ने रेखा को चारपाई पर लिटा दिया, उसके पैर फैलाए और लंड के सिरे को योनि पर रगड़ने लगा।
रेखा (बेचैनी से): “मत तड़पाओ… डाल दो… पूरी तरह अंदर कर दो…”
राहुल ने एक झटके में आधा लंड अंदर कर दिया। रेखा चीख उठी।
रेखा: “आआह… धीरे… बड़ा है न… आह…”
राहुल ने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर-पूरा बाहर करना शुरू किया। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ी। अब कमरे में चुटकी बजाने और शरीर की टकराहट की आवाज़ गूंज रही थी।
राहुल (जोर-जोर से धक्के देते हुए): “ले रेखा… ले मेरी जान… कितनी टाइट है तू… आज मैं तुझे भर दूँगा…”
रेखा (नाखून राहुल की पीठ में गड़ाते हुए, चीखते हुए): “हाँ… चोदो… और जोर से… फाड़ दो मुझे… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… आह… राहुल… तेज… तेज…”
कुछ ही मिनटों में रेखा का शरीर तन गया। वह जोर से काँपी और पहली बार झड़ गई। राहुल ने भी कुछ और जोरदार धक्कों के बाद रेखा के अंदर ही वीर्य छोड़ दिया।
दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे।
डसके बाद उनका चक्कर नियमित हो गया।
कभी कोठरी में, कभी रात के अंधेरे में छत पर, कभी राहल के
कमरे में। रेखा अब पूरी तरह कामातुर हो चुकी थी ।
राहुल के साथ बार-बार संबंध बनाने के बाद रेखा गर्भवती हो गई। शुरू के दो महीने तक उसने किसी को नहीं बताया, लेकिन उल्टियाँ और थकान बढ़ने लगी।
एक शाम जब रेखा बालकनी में खड़ी थी, तभी बृजमोहन को शक हो गया। उसने रेखा को कमरे में बुलाया।
बृजमोहन ने रेखा का कान पकड़ लिया और जोर से खींचा।
बृजमोहन (गुस्से में चिल्लाते हुए): “हरामजादी! यह क्या हालत कर रखी है अपनी? पेट में क्या है? बोल, यह किसका बच्चा है? राहुल का? या किसी और का?”
रेखा दर्द से चीखी, लेकिन कुछ नहीं बोली। आँखों में आँसू आ गए।
बृजमोहन (और ज़ोर से कान पकड़ते हुए): “मैंने सोचा था सिंगारदान ने घर को बर्बाद कर दिया, लेकिन तू तो पूरी रंडी बन गई! बोल, किस कुत्ते ने तुझे पेट भर दिया?”
इतने में सरला (बृजमोहन की पत्नी) दौड़कर आ गई। पहले तो वह भी हैरान थी, लेकिन अचानक उसका व्यवहार बदल गया। उसने बृजमोहन का हाथ पकड़कर रेखा के कान से अलग किया और शांत स्वर में बोली:
सरला: “बस कीजिए जी। इतना गुस्सा मत कीजिए। लड़की है, गलती हो गई। अब चिल्लाने से क्या होगा? पड़ोस में पता चल जाएगा।”
बृजमोहन हैरान होकर सरला को देखने लगा। सरला ने रेखा की तरफ़ देखा और नाटक करते हुए तेज़ आवाज़ में डाँटा:
सरला: “शर्म नहीं आती तुझे? घर की इज्जत का कुछ ख्याल नहीं? हमने तुझे इतना लाड़-प्यार दिया, और तू यह कर बैठी?”
(सरला अंदर से खुश थी, क्योंकि सिंगारदान का प्रभाव अब उस पर भी पूरा था। वह जानती थी कि बच्चा रखने से घर की “कमाई” प्रभावित होगी।)
सरला (बृजमोहन की तरफ़ मुड़कर, मीठे लेकिन दृढ़ स्वर में): “जी, इसे डाँटने से कुछ नहीं होगा। कल ही अस्पताल ले चलते हैं। बच्चा गिरवा देते हैं। अभी छोटा है, आसानी से हो जाएगा। बाद में मुसीबत बढ़ जाएगी।”
बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर मान गया।
अगले दिन — अस्पताल
सुबह जल्दी ही बृजमोहन, सरला और रेखा अस्पताल गए। रेखा चुप थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखें सूजी हुई थीं।
डॉक्टर ने चेक किया और कहा कि ८-९ हफ्ते का गर्भ है, गर्भपात आसानी से हो सकता है।
रेखा को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। सरला ने बाहर बैठकर बृजमोहन को समझाया, “चिंता मत कीजिए। सब ठीक हो जाएगा। घर में फिर से पहले जैसा माहौल हो जाएगा।”
दो घंटे बाद रेखा को बाहर लाया गया। उसका गर्भपात कर दिया गया था। रेखा बेहोश-सी पड़ी थी, चेहरा सफेद, आँखों के नीचे काले घेरे।
घर लौटकर रेखा बिस्तर पर लेट गई। सरला ने उसे दवा दी और बोली:
सरला (धीरे से, लेकिन मुस्कुराते हुए): “अब आराम कर , )
रेखा – मां मुझे माफ कर दो, मैंने बहुत गलत कर दिया ।
सरला – गलत तो तब होता, अगर लोगों को पता चल जाता । और बदनामी होती ।
रेखा – फिर भी जो हुआ, वह सब ठीक नहीं हुआ। पिताजी कितने परेशान हैं इस बात से
सरला – तू उनकी चिंता मत कर कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा । जवानी में ऐसी गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं । तू भी तो अब जवान हो गई है ।
आखिर कब तक संभालती इस निगोड़ी जवानी को ।
रेखा सरला की बातें और इस तरह ’ निगोड़ी जवानी ’ जैसे शब्दों को अपनी मां के सुनकर हैरान हो जाती है, और उसे एक टक होकर देखने लगती है ।
उसे क्या पता था की आईने का असर सिर्फ उसे पर ही नहीं बल्कि उसकी मां पर भी हुआ था । वह भी उसके गिरफ्त में थी ।
सरला – ऐसे क्या देख रही है, सही तो कह रही हूं । देख मै भी तेरी उम्र से गुजरी हूं । मुझे पता है, जवानी में दिल में कैसे-कैसे अरमान जाते हैं । शरीर भी क्या-क्या चीजों की मांग करने लगता है । ( सरला शरारती नजरों से रेखा को देखते हुए कहती है )
लेकिन अब तू उस राहुल से मत मिलना । नहीं तो दोबारा पेट से हुई , तो मैं भी तेरा साथ नहीं दूंगी । मैं तेरे पापा से तेरी शादी की बात करती हूं, जल्दी कोई लड़का देखकर तेरे हाथ पीले कर देंगे । तब तक अपने को काबू में रख ।
उसके बाद सरला कमरे से जाने लगती है तभी वह दरवाजे पर रख कर रेखा की ओर मुड़ती है और कहती है " और हां ज्यादा बालकनी में सज धज के खड़ी मत रहाकर, और लड़कों को इशारे मत करना ”
गर्भपात के बाद रेखा कुछ दिन तक घर में शांत रही। वह ज़्यादातर अपने कमरे में रहती, कम बोलती, खाना भी कम खाती। कभी-कभी रात को अकेले में रो लेती। शरीर कमजोर था, लेकिन सिंगारदान का असर अभी भी उसके खून में था।
गर्भपात के १०-१२ दिन बाद रेखा की देह में फिर से आग सुलगने लगी।
रात में अकेले लेटे-लेटे उसकी चूत कुलबुलाने लगती। स्तन भारी लगते, निप्पल सख्त हो जाते। वह उँगलियों से खुद को सहलाती, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। आखिरकार उसने राहुल को फोन किया।
रेखा (मोहभरी आवाज़ में): “राहुल… मुझे बहुत याद आ रही है। आज रात मिलोगे?”
राहुल (ठंडे स्वर में): “रेखा, अब नहीं। वो सब खत्म हो गया। मैं नया काम शुरू कर रहा हूँ। तुम भी अपना ध्यान रखो।”
राहुल ने साफ़ मना कर दिया। रेखा का दिल टूट गया, लेकिन उसकी देह और भी बेचैन हो गई।
अब उसकी आँखें आस-पास के लड़कों को तलाशने लगीं।
गर्भपात के बाद रेखा का शरीर काफी बदल गया था। सिंगारदान का प्रभाव, गर्भावस्था के हार्मोन और फिर अचानक गर्भपात — इन सबने मिलकर उसे एक नया, और ज़्यादा कामुक रूप दे दिया था।
रेखा का शारीरिक बदलाव (विस्तार):
स्तन: पहले से ज़्यादा भरे हुए, भारी और नरम हो गए थे। निप्पल गहरे गुलाबी-भूरे रंग के और बहुत संवेदनशील थे — हल्का-सा स्पर्श या कपड़े का रगड़ना भी उन्हें सख्त कर देता।
कमर और पेट: गर्भावस्था के बाद पेट थोड़ा ढीला हो गया था, लेकिन अब वह थोड़ी मोटी और आकर्षक गोलाई के साथ नजर आती थी। कमर में एक नई नरमी आ गई थी।
चूतड़ और जाँघें: अब और मोटी, गोल और दृढ़ हो गई थीं। चलते समय वे हल्के-हल्के लहराती थीं, जो लड़कों को पागल कर देती थीं।
चेहरे और त्वचा: चेहरा थोड़ा गोल हो गया था। त्वचा चमकदार और गुलाबी हो गई थी। होंठ स्वाभाविक रूप से थोड़े फूले हुए लगते थे।
कुल मिलाकर: वह अब पहले से ज़्यादा “मैच्योर और सेक्सी” दिखने लगी थी — १९-२० साल की उम्र में भी वह २४-२५ की शादीशुदा औरत जैसी लगती थी।
लड़कों की नज़र (मोहल्ले और कॉलेज में)
रेखा अब मोहल्ले और कॉलेज दोनों जगह “मुख्य आकर्षण” बन चुकी थी। लड़कों की नज़रें उसके शरीर के हर हिस्से को “खा” रही थीं:
स्तनों पर: जब रेखा चलती तो उसके भारी स्तन हल्के-हल्के उछलते। लड़के दूर से ही उन्हें घूरते और आपस में फुसफुसाते — “यार, देख कितने बड़े और ढीले हो गए हैं…”
चूतड़ पर: पीछे से देखने वाले लड़के उसकी लहराती गांड को देखकर ताली बजाते। कई बार तो सीटी मार देते।
जाँघों और कमर पर: साड़ी या सलवार में जब कमर का गोला दिखता या जाँघों की मोटाई नजर आती, तो लड़के उत्तेजित हो जाते।
चलने के अंदाज़ पर: गर्भपात के बाद रेखा की चाल और भी मटकती हुई हो गई थी — जैसे वह जानबूझकर लड़कों को लुभा रही हो।
लड़कों के बीच चर्चा के कुछ उदाहरण:
“भाई, रेखा तो अब और माल हो गई है। प्रेग्नेंट होने के बाद और गर्म लग रही है।”
“उसकी चूत अब ढीली हो गई होगी… मजा आएगा चोदने में।”
“देख, कितने आराम से स्तन हिल रहे हैं… ब्रा पहनती भी है या नहीं?”
“राहुल ने तो फेंक दिया, अब हमारा टाइम है।”
रेखा जब बालकनी में खड़ी होती, तो १०-१२ लड़के इधर-उधर खड़े होकर उसे घूरते। कोई फोन पर वीडियो बना लेता, कोई सीटी मारता। कुछ तो उसके घर के सामने घंटों घूमते रहते।
रेखा को यह सब अपमान भी लगता था और गर्व भी। वह जानती थी कि अब पूरा मोहल्ला उसकी देह को चाहता है।
कॉलेज और मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई।
“रेखा राहुल के साथ चक्कर चला रही थी… प्रेग्नेंट भी हो गई थी… गर्भपात कराया…”
कुछ लड़के तो इसे सुनकर और उत्तेजित हो गए। अब रेखा जब भी बालकनी में खड़ी होती या कॉलेज जाती, तो लड़के उसकी तरफ़ घूरते, इशारे करते और लाइन मारते।
चिढ़ाने और छेड़खानी आम हो गई:
मोहल्ले के लड़के रेखा के पीछे “ओये रेखा… राहुल ने छोड़ दिया क्या?” कहकर हँसते।
कोई उसके पीछे आकर “अब हमारा नंबर कब आएगा?” whispering करते।
कॉलेज में कुछ लड़के जानबूझकर उसकी बेंच के पास बैठकर उसकी जाँघों को छूने की कोशिश करते।
एक-दो ने तो सीधे फ्रेंडशिप का प्रस्ताव रख दिया — “एक बार मिल ले, तुझे बहुत मज़ा देंगे।”
रेखा पहले तो चिढ़ती, लेकिन धीरे-धीरे उसकी देह इन इशारों पर प्रतिक्रिया देने लगी। उसकी चूत गीली होने लगती जब कोई लड़का उसकी छातियों को घूरता या पीछे से रगड़ने की कोशिश करता।
एक दिन शाम को मोहल्ले का एक लड़का (नाम: विक्रम) रेखा के घर के पास आया और बोला:
विक्रम: “रेखा, राहुल ने तो तुझे यूज़ करके फेंक दिया। अब हम हैं ना… एक बार मौका दे। मैं तुझे राज़ रखूँगा।”
रेखा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर dekhungi kah ke चली गई।
रेखा के दीवाने दिनों दिन बढ़ते जा रहे थे । सरला तो उसे कुछ ज्यादा कहती नहीं थी , लेकिन बृजमोहन उसे टोकटा रहता था ।
शाम का समय था। बृजमोहन पान की दुकान से लौट रहा था। गली के मोड़ पर दो युवक (विक्रम और उसके दोस्त संजय) सिगरेट पीते हुए खड़े थे। वे आपस में जोर-जोर से बात कर रहे थे। बृजमोहन पास से गुजर रहा था, लेकिन वे उसे देखकर भी नहीं रुके।
विक्रम (हँसते हुए): “यार, रेखा का बदन तो अब पूरा गदराया हुआ है। प्रेग्नेंट होने के बाद स्तन देखे हैं? कितने भारी और लटकते हुए हो गए हैं। चलते समय ऐसे हिलते हैं कि लंड खड़ा हो जाए।”
संजय (उत्तेजित होकर): “हाँ भाई, गांड भी कितनी मोटी हो गई है। साड़ी में फंसकर अलग-अलग नजर आती है। कमर भी भर गई है। लगता है जैसे अभी-अभी किसी ने खूब चोदा हो। राहुल ने तो मजा ले लिया, अब बारी हमारी है।”
विक्रम: “एक बार मौका मिल जाए तो रात भर चोदूँ। निप्पल तो अब दूध देने वाले हो गए हैं। कल बालकनी में खड़ी थी, ब्लाउज से साफ़ दिख रहे थे। मैं तो सोच रहा हूँ, अगली बार सीधे प्रपोज कर दूँ।”
संजय (हँसते हुए): “प्रपोज क्या करना, सीधे पकड़ के चूस लेना। वो मानेगी। अब तो पूरी तैयार है।”
दोनों जोर से हँसे।
बृजमोहन कुछ दूर पर खड़ा सब सुन रहा था। उसके हाथ मुट्ठी में भिंच गए। चेहरा लाल हो गया। गुस्सा, शर्म और एक अजीब सी बेचैनी एक साथ उभर आई। वह जानता था कि रेखा अब मोहल्ले की “साझी संपत्ति” बन चुकी है।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
न तो उन लड़कों को डाँटा, न चिल्लाया।
चुपचाप सिर झुकाए घर की तरफ़ बढ़ गया।
रात में अकेले में लड़के रेखा के बारे में सोचकर हस्तमैथुन करते। उनकी कल्पनाओं में रेखा नंगी होती, चारों खाने चित्त पड़ी होती, या उनके लंड को मुंह में ले रही होती। वे आपस में बात करते:
“यार, रेखा की चूत अब ढीली हो गई होगी… राहुल ने तो खूब चोदा होगा।”
“स्तन देखे हैं? प्रेग्नेंट होने के बाद और भारी हो गए हैं। दूध पिलाने वाली लगती है।”
“एक बार मिल जाए तो रात भर चोदूँ… गर्भपात करा चुकी है, तो अब बिना डर के अंदर भर दूँगा।”
एक रात के करीब ९:३० बजे थे। बृजमोहन दुकान से कुछ सामान लेकर घर लौट रहा था। गली का रास्ता अंधेरा और सुनसान था। जैसे ही वह मोड़ पर मुड़ा, उसकी नज़र एक दृश्य पर पड़ी।
रेखा गली के बीच में एक लड़के (विक्रम) के साथ खड़ी थी। विक्रम के साथ उसके दो और दोस्त भी थे। रेखा की पीठ दीवार से सटी हुई थी। विक्रम उसके बहुत करीब खड़ा था।
बृजमोहन ने देखा कि विक्रम का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरा हाथ उसकी छाती के पास। रेखा हल्के से हँस रही थी। एक लड़का रेखा की जाँघ पर हाथ फेर रहा था, जबकि तीसरा उसके बालों को छू रहा था।
विक्रम (रेखा के कान में): “अब तो रोज मिलोगी न? तेरे स्तन तो छूने को तरस रहे हैं…”
रेखा ने हल्के से उसे धक्का दिया, लेकिन मुस्कुरा भी रही थी।
बृजमोहन का खून खौल उठा। उसका हाथ मुट्ठी में भींच गया। वह आगे बढ़ा, लेकिन अचानक रुक गया। कुछ कदम दूर खड़ा होकर वह सब देखता रहा।
एक लड़का: “रेखा, एक किस तो दे दे… राहुल ने तो खूब लिया होगा।”
रेखा ने शरमाते हुए मुंह फेर लिया, लेकिन विरोध नहीं किया।
बृजमोहन ने सब कुछ देख लिया — रेखा का गदराया बदन, लड़कों की लालची नज़रें, हाथों की छेड़खानी। उसका गुस्सा चरम पर था, लेकिन वह चुप रहा।
वह चुपचाप पीछे हट गया और दूसरे रास्ते से घर चला गया।
घर पहुँचकर वह सीधा सरला के पास गया। उसका चेहरा लाल था, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।
बृजमोहन: “सरला… रेखा अब पूरी तरह बेकाबू हो गई है। अभी मैंने देखा — गली में तीन लड़कों के बीच खड़ी थी। एक तो उसके स्तन छू रहा था, दूसरा जाँघ पर हाथ फेर रहा था… और वह हँस रही थी।”
सरला चौंक गई, लेकिन फिर शांत हो गई।
सरला: “कल मैं उसे अच्छे से समझा लूँगी।”
बृजमोहन (थके हुए स्वर में): “समझाने से कुछ नहीं होगा सरला। अब तो पूरा मोहल्ला जानता है। हम क्या करेंगे?”
वह चुप हो गया। उस रात बृजमोहन सो नहीं सका। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था — उसकी बेटी तीन लड़कों के बीच, छेड़ी जा रही थी, और वह कुछ नहीं कर सका।
रेखा देर रात घर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, होंठ थोड़े सूजे हुए थे। बृजमोहन ये देख के भड़क गया ।
रात के करीब १० बजे थे। बजमोहन कमरे में चहलकदमी कर रहा था। उसका चेहरा लाल था। सरला बिस्तर पर बैठी पान चबा रहंथी। रेखा अपने कमरे में थी. जबकि बडी बेटी मीना और छोटी
पिंकी भी घर पर ही थीं।
बजमोहन ने अचानक तेज़ आवाज़ मं कहाः
बृजमोहनः "सरला! देख लिया तूमने अपनी बेटी का हाल? रेखा दिन-रात बालकनी में खडी रहती है। लडके इशारे करते हैं, सीटी मारते हैं, और यह मुस्कुरा-मुस्कुरा के जवाब देती है! पूरे मोहल्ले में
हमारी इज्जत उड गई है।"
सरला ने पान की गिलौरी मुँह में रखते हुए शांत स्वर में पूछा "तो क्या करँ?"
बजमोहन (गुस्से में): "समझाओ उसे! कहो कि अब बहत हो गया। पहले उस आवारा राहुल के चक्कर में पेट ठहरा लिया, गर्भपात कराया। अब फिर वही सिलसिला शुरू हो गया है? अगर यह नहीं मानी तो घर से निकाल दूँगा!"
सरला ने धीरे से सिर हिलाया और बोली: "ठीक है, मैं कल उसे बोलती हूं । लेकिन आप भी ज़्यादा चिल्लाइए मत.. पडोस में सुनाई दे जाएगा।"
पिंकी और मीना दरवाजे के पीछे से छुपकर देख रही थीं । बृजमोहन की नज़र उन पर पड़ी ।
बृजमोहन का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उसने आवाज ऊँची कीः इधर आओ तुम दोनों भी ।
मीना (बडी) और पिंकी (छोटी) डरते-डरते कमरे में आई ।
बृजमोहन (उनकी तरफ़ उँगली दिखाते हुए): "तुम दोनों भी अपनी बहन जैसी बन रही हो क्या? बालकनी में खडी होकर लडकों से इशारे करती हो ? कोठे वाली बनाना है क्या तुम सब को । , पिंकी तू तो अब छोटी भी नहीं रही, एक बार गलती करके भी सुधरी नहीं , तूभी फिर उसी रास्ते पर जा रही है? और मीना, तू तो बड़ी है, तुझे शर्म नहीं आती? तीनों मिलकर घर की इज्जत मिट्टी में मिला रही हो।"
मीना (सिर झूकाकर): "पापा, हम कुछ नहीं करते..."
पिंकी (डर से): "मैं तो बस...
बजमोहन (चिल्लाकर): " तुम क्या मुझे बेवकूफ समझते हो, ये सफेद बाल ऐसे ही नहीं हुए मेरे , मोहल्ले वाले क्या-क्या बातें कर रहे हैं पता है तुमको ”
मीना – लेकिन पापा ...
बृजमोहन – "बस. अब एक शब्द नहीं कल से तीनो का बालकनी में जाना बंद! और अगर किसी लडके का इशारा देखा तो घर में पीटूँगा तुम्हे, समझ गई?"
सरला बीच में पडीः "बस कीजिए जी। अब जवान लड़कियों पे हाथ उठाओगे । अब क्या बालकनी में भी न जाएं । लड़कों के डर से ।
बृजमोहन – तो बालकनी में जाकर लड़कों को इशारे करेंगी ये ।
सरला – देखो जी , अब घर में तीन तीन जवान लड़कियां हैं, लड़के देखेंगे नहीं क्या , और ये लड़कों को डांटने का इशारा करती हैं, तुम बेकार में ....
बृजमोहन – कमाल है सरला, तुम भी इन्हें सही ठहरा रही हो ।
बृजमोहन – मैंने कह दिया तो कह दिया ।
सरला – ठीक है, ठीक है, लडकियाँ समझ गई हैं। अब चुप हो जाइए।"
बृजमोहन – अगर इन्होंने शादी होने तक अपनी जवानी को नहीं सम्हाला तो ठीक नहीं होगा । लड़कियां बदनाम हो जाए तो रिश्ता होना मुश्किल होता है । पता है न तुम्हें ।
सरला – ठीक है ठीक है अब बस करो
बजमोहन ने आखिरी बार गुस्से में कहाः "रेखा को खास तौर पर समझा देना सरला। वह सबसे ज्यादा बिगड गई है। अंधेरे में लड़कों के साथ खड़ी रहती है गलियों में । आते जाते लोग क्या सोचते होंगे ।अगर वह नहीं मानी तो में खुद उसका रास्ता सुधारूँगा।"
सरला ने सिर हिलाया, लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। वह जानती थी कि ब्रजमोहन की ये डाँट सिर्फ़ दिखावा है। रेखा अपने कमरे में सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर न तो डर था, न शर्म। बस एक अजीब सी बेचैनी थी ।


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