02-05-2026, 01:12 PM
पूजा ने अपने कपड़े पहने और घर लौट आई। रास्ते भर वह अपने गुरु बाबा के वचनों और उनकी महिमा का ही ध्यान करती रही। उसके दिल में खुशी की एक हल्की सी लहर उठ रही थी, मानो कोई उसके इन पवित्र कार्यों के लिए उसकी तारीफ़ कर रहा हो। जैसे-जैसे वह चलती, वह लिंग भी हिलता-डुलता, और पूजा को यह अच्छा लग रहा था। अब उसका मन बहुत प्रसन्न था। वह पहले से कहीं ज़्यादा प्रसन्नता महसूस कर रही थी, ताकि बाबा का वह लिंग, जो उसके भीतर था, उसे और भी ज़्यादा हैरान करते हुए उत्तेजित कर सके।
घर पहुँचते ही उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर बैठकर खुद को शांत किया। दिल में एक अजीब सा संतोष और गर्माहट थी—बाबा की तारीफ सुनकर उसे अपने आप पर और अपने विश्वास और सुन्दरता पर गर्व सा महसूस हुआ। वह बार बार अपने शारीरिक रचना को निहारे जा रही थी।
वह अपने हाथों से कपड़े ठीक कर रही थी, और हर पल मन ही मन यह सोच रही थी कि बाबा ने उसे क्यों और किस तरह से मार्गदर्शन दिया। उसकी आँखों में श्रद्धा और विश्वास और अब शंका दोनों झलक रहे थे।
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क्रमश:
घर पहुँचते ही उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर बैठकर खुद को शांत किया। दिल में एक अजीब सा संतोष और गर्माहट थी—बाबा की तारीफ सुनकर उसे अपने आप पर और अपने विश्वास और सुन्दरता पर गर्व सा महसूस हुआ। वह बार बार अपने शारीरिक रचना को निहारे जा रही थी।
वह अपने हाथों से कपड़े ठीक कर रही थी, और हर पल मन ही मन यह सोच रही थी कि बाबा ने उसे क्यों और किस तरह से मार्गदर्शन दिया। उसकी आँखों में श्रद्धा और विश्वास और अब शंका दोनों झलक रहे थे।
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क्रमश:



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