02-05-2026, 04:28 AM
अध्याय 7
ढोल की थाप से ज़मीन काँप रही थी और स्पीकर्स से फटती बॉलीवुड के लेटेस्ट आइटम नंबर की म्यूज़िक मेरे सीने में एक वाइब्रेशन पैदा कर रही थी।
संगीत की रात थी और हवेली का आँगन किसी शाही महफ़िल से कम नहीं लग रहा था।
यह वही आँगन था जो दिन में शांत रहता था, पर आज इसकी हर ईंट जैसे झूम रही थी।गेंदे के फूलों की लड़ियों में उलझी सुनहरी फेयरी लाइट्स हज़ारों जुगनुओं की तरह टिमटिमा रही थीं।
स्टेज से निकलती नीली और गुलाबी लेज़र लाइट्स हवा में तैरते धुएँ को चीर रही थीं, एक अजीब सा जादुई माहौल बनाते हुए।
हवा भारी थी एक साथ कई चीज़ों से।
एक तरफ कोयलों पर सिकते कबाबों का आग जैसा, मसालेदार धुआँ उठ रहा था, जो बिरयानी के बड़े देग से उठती गरम मसाले और केवड़े की मीठी खुशबू के साथ मिल रहा था।
दूसरी तरफ, औरतों के गजरों से आती मोगरे की मदहोश करने वाली महक थी और मर्दों के कपड़ों से उठता महँगा अत्तर।
यह सारी खुशबुएँ दिल्ली की उमस भरी हवा में मिलकर एक ऐसा नशा तैयार कर रही थीं, जिसमें हर कोई डूबा हुआ था। हर तरफ एक बेफिक्र जश्न का मंज़र था।
चम-चम करते लहंगों और रेशम के कुर्तों में सजे रिश्तेदार बेखबर नाच रहे थे।
कुर्सियों पर बैठे बुज़ुर्ग उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे और आंटियों के झुंड थोड़ी-थोड़ी देर में कहकहों के साथ गॉसिप के नए दौर शुरू कर रहे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे यह पूरी कायनात इस एक आँगन में सिमट आयी हो, और हर कोई इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए बेताब हो।
और इस फिल्म के बीच, मैं एक अनचाहा सा एक्स्ट्रा था। मैं एक कोने में, स्टेज से सबसे दूर वाली कुर्सी पर बैठा, इस पूरी भीड़ से बचकर अपने फोन की दुनिया में खोया हुआ था।
मेरे हाथ में फोन इस जश्न से बचने का मेरा ज़रिया था, एक डिजिटल दुनिया जहाँ इस शोर, इन रोशनियों और इन रिश्तों का कोई मतलब नहीं था।
मैं इंस्टाग्राम पर मीम्स स्क्रोल कर रहा था, अपने दोस्तों के बेमतलब के स्टेटस देख रहा था—कुछ भी, बस कुछ भी जो मुझे इस पल से, इस जगह से दूर ले जाए।
मैं यहाँ जिस्म से मौजूद था, पर मेरी रूह इस जश्न का हिस्सा नहीं थी। मैं एक अलग-थलग टापू था, जिसके चारों तरफ खुशियों का समंदर शोर मचा रहा था।
तभी मेरी नज़रें फोन की स्क्रीन से हटकर भीड़ के बीच ठहरीं, और वक्त जैसे थम सा गया।
अकरम, जो अपनी सुनहरी शेरवानी में चमक रहा था, महफ़िल की जान बन चुका था। वह हर आने-जाने वाले से गले मिल रहा था, हँस रहा था—एक मुकम्मल दूल्हा। पर मेरी नज़र अकरम पर नहीं, उसके ठीक पीछे उस शख्स पर जाकर अटक गई।
वह कद-काठी में अकरम से कहीं ज़्यादा भारी और लंबा था। गहरे काले रंग का पठानी सूट उसके चौड़े कंधों और मज़बूत जिस्म पर इस कदर फिट था कि उसकी मर्दानगी साफ़ झलक रही थी। उसने अपनी आस्तीनें कोहनियों तक मोड़ रखी थीं, जिससे उसकी गठीली कलाइयाँ और हाथों पर उभरती नसें उसकी ताक़त का अहसास करा रही थीं।
उसके चेहरे पर शादी वाला वह उल्लास नहीं था। वह उस शोर-शराबे के बीच एक चट्टान की तरह खामोश खड़ा था।
सबसे ज़्यादा बेचैन करने वाली उसकी आँखें थीं—गहरी, काली और बेहद तेज़। वह महफ़िल का हिस्सा नहीं था, वह महफ़िल का मुआयना कर रहा था। उसकी निगाहें पूरे आँगन में किसी शिकारी की तरह घूम रही थीं:
पहले उसने स्टेज के पास खड़ी उन जवान लड़कियों को देखा जो अपनी मुस्कुराहटों के साथ सेल्फी ले रही थीं, पर उसकी आँखों में कोई दिलचस्पी नहीं जागी।
फिर उसकी नज़र गॉसिप करती आंटियों पर गई, जिन्हें उसने एक पल में नज़रअंदाज़ कर दिया।
वह किसी खास चीज़ की तलाश में था, किसी ऐसी 'नयामत' की जो इस भीड़ में सबसे जुदा हो।
और फिर, अचानक उसकी तलाश खत्म हुई। उसकी नज़रें एक जगह जाकर ज़मीं, तो फिर हिलीं ही नहीं। मैंने अनजाने में उसकी नज़रों का पीछा किया और मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
वह अम्मी को ताड़ रहा था।
अम्मी उस वक्त भीड़ के शोर से थोड़ा दूर, आँगन के कोने में खड़ी थीं जहाँ रोशनी थोड़ी थी। उनके जिस्म पर एक गहरी, शराबी रंग की साड़ी लिपटी हुई थी। वह जॉर्जेट की साड़ी थी, इतनी नर्म और मुलायम कि हवा के साथ लहरा रही थी। साड़ी का रंग इतना गहरा था जैसे महंगी शराब हो, जो रोशनी में चमक उठता था। उस पर कोई भारी काम नहीं था, बस एक पतली सी सोने की ज़री का बॉर्डर था जो उसके किनारों पर दौड़ रही थी।
साड़ी उनकी पतली कमर पर खूबसूरती से बंधी थी, उनके पुष्ट कूल्हों के कर्व को साफ़ बयान करती हुई।
साड़ी के साथ उन्होंने उसी रंग का वेलवेट का ब्लाउज पहना था। वेलवेट की वह नजाकत उनके भरे हुए सीने पर इस कदर कसी हुई थी कि उनके रसीले अंगों का उभार किसी भी मर्द की धड़कनें रोकने के लिए काफी था। उस ब्लाउज की पीठ इतनी गहरी थी कि अम्मी की मखमली और नंगी सफेद पीठ का एक बड़ा हिस्सा बेपर्दा था।
उनका पल्लू उनके कंधे पर आज़ादी से लहरा रहा था, जिसका एक कोना उनकी कलाई पर लिपटा हुआ था। उनके लंबे बाल एक ढीले से जूड़े में बंधे थे, जिससे उनकी सुराही जैसी गर्दन और उस पर चमकता सोने का पतला सा हार साफ़ नज़र आ रहा था। कानों में बस छोटे से हीरे के टॉप्स थे जो हर बार सर हिलाने पर टिमटिमा उठते।
अम्मी अकेली नहीं थीं। उनके साथ सायमा खड़ी थी, जो अपनी भारी शादी के जोड़े में थोड़ी थकी और सहमी हुई लग रही थी। अम्मी, आयशा, उसके करीब झुकीं। उनके पुष्ट सीने का उभार सायमा के कंधे से हल्का सा छुअन कर रहा था।
और मेरी अम्मी... वह उसके कान में झुक कर कुछ कह रही थीं, उनकी आवाज़ इतनी धीमी और सुकून भरी थी कि मैं दूर से भी उसकी नरमी महसूस कर सकता था।
अम्मी- सायमा :
अम्मी ने सायमा की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ सायमा, बोलो, क्या बोलना है?"
सायमा अम्मी के करीब आई और उनके कान में फुसफुसाते हुए बोली, "विशाल अकरम के साथ खड़ा है, आप उस तरफ मत देखना। उसने काले रंग का पठानी सूट पहना है।। मैं देख रही हूँ, वह अपनी फितरत के अनुसार आपको ही ताड़ रहा था।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने सायमा से कहा, "पर वह मुझे क्यों देख रहा है? ब्लैकमेल तो तुझे करता है।"
"खाला, कभी आपने अपने आप को आईने में देखा है? आप कहाँ और मैं कहाँ! वह अपनी फितरत के अनुसार बड़े शिकार की तैयारी कर रहा है। मैं अब जानती हूँ उसे। देखना, कितने प्यार से आपके साथ चिकनी-चुपड़ी बातें करेगा।"
"हाय अल्लाह! क्या कह रही है तू? मैं एक जवान बेटे की माँ हूँ। वह मुझमें क्या देखेगा?"
"खाला, लगता है आपको अपनी खूबसूरती का अंदाज़ा नहीं है। अगर मैं मर्द होती, तो मैं भी आपको नहीं छोड़ती। विशाल से बचकर रहना, कहीं ऐसा न हो कि आप मुझे बचाने जाएँ और खुद फँस जाएँ।"
मेरे अंदर एक अनजाना डर समा गया।
अम्मी (मन ही मन): 'हे अल्लाह, ये किस आफ़त में घिर गए हम? सायमा को बचाने चली थी, पर क्या अब मुझे खुद को भी इस दरिंदे से बचाना होगा?'
तभी सायमा की भारी झुमकी का पेच ढीला हुआ। अम्मी ने अपने लंबे और नर्म हाथों को ऊपर उठाया।
जब अम्मी ने अपनी बाहें ऊपर कीं, तो उनके ब्लाउज की कसावट और बढ़ गई, जिससे उनके उरोजों का उभार और भी ज़्यादा नुमाया होकर सामने की तरफ तन गया। उनकी पतली कमर का वह हिस्सा, जहाँ साड़ी थोड़ी नीचे खिसक गई थी, अपनी पूरी नूरानी सफेदी के साथ चमक उठा। वह अपनी कोमल उंगलियों से सायमा की झुमकी ठीक कर रही थीं, पर दूर खड़े उस शख्स और मेरी नज़रों के लिए, वह महज़ एक मदद नहीं, बल्कि हुस्न की एक ऐसी नुमाइश थी जिसे देख कर कलेजा मुँह को आता था।
उस वक्त अम्मी का पूरा वजूद एक सलीके से तराशी गई संगमरमर की मूरत जैसा लग रहा था। झुमकी ठीक करने के लिए उनका सर एक तरफ को झुका हुआ था, जिससे उनकी लंबी और दूधिया सुराहीदार गर्दन की सफेदी और भी नुमाया हो गई थी। उस गोरी गर्दन पर सोने का वह बारीक हार किसी जुगनू की तरह अपनी चमक बिखेर रहा था। स्टेज की तेज़ लेज़र लाइट्स जब उनके चेहरे के एक हिस्से पर पड़तीं, तो उनके उभरे हुए गालों और आँखों की गहराई में एक मखमली नशा सा भर जाता।
अम्मी ने सायमा के नर्म गाल को बड़ी ममता से थपथपाया। और फिर, वह उस मद्धम रोशनी वाले कोने से बाहर निकली।
जैसे ही वह महफिल के बीचों-बीच आईं, उनका अंदाज़ एकदम बदल गया। वह शराबी रंग की जॉर्जेट साड़ी उनके सुडौल कूल्हों और टांगों के साथ इस कदर लहरा रही थी कि हर देखने वाले की धड़कन उस लय के साथ अटक रही थी। उनका पल्लू हवा में एक नशीली लहर की तरह उनके पीछे तैर रहा था। उनके चलने के अंदाज़ में एक ऐसी आत्मविश्वास था जो उनके पुष्ट सीने के उभार को और भी गर्व से ऊपर उठा रहा था।
वह सीधे उस तरफ बढ़ीं जहाँ मैं, नानी और मामियाँ खड़ी गपशप कर रही थीं। अम्मी ने अपनी कोमल उंगलियों से आहिस्ता से अपने पल्लू को संभाला और हमारे बीच आकर खड़ी हो गईं। उनके आते ही जैसे हमारे छोटे से ग्रुप की चमक बढ़ गई।
नानी: (हमेशा की तरह लाड़ भरी शिकायत में) "कहाँ मर गई थी तू इतनी देर से? पूरी महफिल तुझे ढूंढ रही है, और तू गायब है।"
अम्मी: (अपनी नशीली और शांत आवाज़ में) "कहीं नहीं अम्मी... बस वह सायमा थोड़ा घबरा रही थी। बेचारी बच्ची है, पहली बार इतना बड़ा बोझ सँभाल रही है। बस उसे ही थोड़ा तसल्ली दे रही थी।"
तभी अकरम, अपनी सुनहरी शेरवानी की चमक बिखेरते हुए, उस काले पठानी सूट वाले शख्स को लेकर सीधे हमारे ग्रुप की तरफ बढ़ा।
अकरम: (मुस्कुराते हुए) "आयशा भाभी, मिलिए... यह मेरा सबसे अज़ीज़ और पुराना यार है, विशाल।"
विशाल की वह शिकारी निगाहें, जो अब तक दूर से अम्मी के रसीले बदन को नाप रही थीं, अब सीधे उनके चेहरे पर आकर टिक गईं। उसकी आँखों में एक ऐसी नंगी तारीफ और हवस भरी चाहत थी, जिसे देख कर अम्मी के भरे हुए सीने की धड़कन तेज़ हो गई।
अम्मी के ख्यालात
अम्मी ने जैसे ही उस गठीले और हैंडसम जवान को इतने करीब देखा, उनके ज़हन में एक साथ कई बातें कौंधीं।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह... सायमा सच कह रही थी। यह तो वाकई किसी बुत की तरह तराशा हुआ मर्द है। इसकी ये गहरी आँखें तो सीधे मेरी शराबी साड़ी को फाड़कर मेरे मखमली जिस्म को छू रही हैं। क्या यही वह दरिंदा है जिसने मेरी बच्ची को सुसाइड के मुहाने पर खड़ा कर दिया? इसके इस मर्दाना रसूख और हैंडसम चेहरे के पीछे इतना ज़हर कैसे छिपा हो सकता है?"
अम्मी: (अपनी शहद जैसी मीठी आवाज़ में, जो हल्का सा कांप रही थी) "आपसे मिलकर… खुशी हुई, विशाल साहब।"
विशाल: (अपनी भारी और रसीली आवाज़ में, अम्मी की सुराहीदार गर्दन पर अपनी नज़रें टिकाते हुए) "अकरम अक्सर आपकी तारीफों के पुल बाँधता था भाभी... पर उसने यह ज़िक्र कभी नहीं किया कि आप इतनी बेपनाह खूबसूरत हैं।"
उसने अपना मज़बूत हाथ आगे बढ़ाया। अम्मी ने हिचकिचाते हुए अपना कोमल हाथ उसकी हथेली पर रखा।
विशाल ने सिर्फ हाथ मिलाया नहीं। उसने अम्मी के नर्म पंजों को अपनी गर्म और मजबूत गिरफ्त में दबा लिया। वह स्पर्श महज़ औपचारिक नहीं था; उसकी उंगलियों का दबाव अम्मी के मखमली मांस में धंस रहा था और उसे महसूस कर रहा था।
एक सेकंड... दो सेकंड... तीन सेकंड।
विशाल ने हाथ छोड़ा नहीं। अम्मी ने झटके से अपनी आँखें ऊपर उठायीं और सीधे विशाल की आँखों में देखा।
अम्मी के गोरे गालों पर एक सुर्ख लाली दौड़ गई। उन्होंने तेज़ी से अपना हाथ खींच लिया, जैसे किसी जलती हुई चीज़ को छू लिया हो।
अम्मी (मन में): "तौबा... इस मर्द का छूना कितना खतरनाक है। इसने महज़ हाथ नहीं पकड़ा, जैसे मेरी रूह तक अपनी हवस का निशान छोड़ दिया हो। मुझे संभलना होगा… यह विशाल जितना सेक्सी और जादुई दिखता है, उतना ही शातिर शिकारी है। पर इसे क्या मालूम, कि इसकी इसी हवस को मैं सायमा की ढाल बनाऊँगी।"
विशाल की नज़रें अम्मी की झुकी हुई आँखों से होते हुए, उनके रस भरे होंठों से सरकती हुई, अब अम्मी के ब्लाउज की उस गहरी ढलान पर टिक गई थीं।
विशाल की नज़रें अभी भी अम्मी के गले की उस गहरी ढलान पर जमी हुई थीं। उसने मदहोश सी आवाज़ में बुदबुदाते हुए कहा, "ब्यूटीफुल…"
अम्मी का चेहरा शर्म और डर से लाल हो गया। उन्होंने बात संभालते हुए पूछा, "क्या… क्या आपने कुछ कहा?"
विशाल थोड़ा और झुककर अम्मी के कान के पास अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए बोला, "नहीं... मैं तो बस दो पहाड़ियों के बीच की उस गहरी वादी की खूबसूरती की तारीफ कर रहा था।"
अम्मी का पूरा शरीर इस दो-अर्थी बात को सुनकर सुन्न पड़ गया। विशाल की आँखों में एक अजीब सी दरिंदगी और भूख थी, जो साफ़ कह रही थी कि उसका निशाना अब सायमा नहीं, बल्कि खुद अम्मी हैं।
अम्मी की साँसें तेज़ होने लगी थीं, जिसके कारण उनकी छाती घबराहट में और भी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, मानो उनके शरीर के उस हिस्से को भी पता चल गया हो कि वह अब किसी की भूखी नज़रों के निशाने पर है। विशाल की नज़रों का भारीपन उनके रेशमी ब्लाउज के पार उनकी खाल पर महसूस हो रहा था।
Deepak Kapoor
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