30-04-2026, 08:10 PM
Update -3
सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी।
सिंगारदान ने उसके अंदर दबी हुई औरत को जगा दिया था। अब वह घर की चार दीवारों में कैद नहीं रहना चाहती थी। उसकी देह को अब अपनी भूख का अहसास हो चुका था — गर्म, भारी और बेचैन।
अब घर में भी वो बिना मेकअप के नहीं रहती । उसके ब्लाउज़ेस का साइज भी दिनों दिन छोटा होता जा रहा था । टाइट ब्लाउज पहनने के कारण उससे अंगों का उभार और भी साफ और अच्छे से दिखता । घर में आने वाले आगंतुक जो अब तक उसे भाभी या संभ्रांत महिला के रूप में देखते थे उनके मन में भी सरला के प्रति कामुक विचार आने लगे थे । उनकी भी धारणा सरला के प्रति बदलने लगी थी । लेकिन उनमें से कुछ ने मर्उयादा बनाए रखी । कुछ पे उसने डोरे डाले लेकिन सफल नहीं हुई । उन लोगों ने अपनी इज्ज़त का खयाल करते हुए वहां जाना छोड़ दिया। कुछ ने सरला से डबल मिनिंग बातें की तो सरला ने उन्हें नेगेटिव रेस्पॉन्स दिया क्योंकि उन्हें वो पसंद नहीं करती थी । लेकिन कुछ को वो भाव देने लायक भी समझती थी । उन्हीं में से एक रमेश जी भी थे जो बृजमोहन के अच्छे दोस्त और शुभचिंतक थे । वो अक्सर बृजमोहन के यहां आते रहते थे ।
ऐसे ही एक दिन वो बैठक में बैठे बात कर रहे थे। अंदर किचन में सरला चाय बना रही थी । रमेश रसोई में खड़ी सरला को देख रहा था । असल में सरला ने बैकलेस ब्लाउज पहना था। जिसमें उसकी गोरी नंगी पीठ उसे आकर्षित कर रही थी। और वो बात करते करते उसे देख रहा था । अचानक सरला घूमती है तो रमेश को अपनी पीठ की ओर घूरता हुआ पाती है । वो चौंकती है, क्योंकि रमेश बहुत सज्जन और शरीफ आदमी थे । सोसाइटी में बहुत इज्ज़त थी उनकी । वो दुबारा उसे देखती है तो रमेश की नजरे अपने बदन पर पाती है ।
" आह , ये भी " सरला एक लंबी सांस छोड़ती है।
चाय लाने के लिए जब वो बाहर आती है तो रमेश को घूरती है । सामने बैठी सरला रमेश को घूरे जा रही थी ।
ब्रिज अपनी बातों में लगा था । रमेश कभी ब्रिज की ओर देखता तो कभी सरला की ओर ।
तभी सरला की आंखों में एक अजीब सा नशा चा जाता है। वो गर्दन को हाथ से सहलाने लगी और रमेश को lusti नजरों से देखने लगी । रमेश उसकी नजरों को समझ जाता है लेकिन थोड़ा डरता है , क्योंकि ब्रिज वहीं पे था । लेकिन सरला बड़ी चालकी से ब्रिज के सामने ही रमेश पर नयन बाण चला रही थी ।
अगले दिन वो ब्रिज की अनुपस्थिति में वहां आया । सरला चाय बना के वहां आई ।
रमेश - भाभी जी आपसे एक बात कहें
सरला – कहिए न, रमेश जी, क्या कहना है
रमेश – वो ये आप ब्लाउज कहां सिलवाती हैं
सरला – क्यों, बहुत छोटा है क्या
रमेश - नहीं नहीं वह सावित्री पूछ रही थी
सरला – ओह अच्छा, लेकिन वो तो पहनती नहीं इतना छोटा ।
रमेश– अरे छोटा कहां है आपने भी तो पहना है अब उसी ने मुझे कहा तो इसलिए पूछ रहा हूं
सरला शरारत भरी आवाज में रहती है।
रमेश जी सच-सच बताओ वह पहनना चाहती है या आप उसे पहनना चाहते हो, क्यों
रमेश – अरे नहीं नहीं वो ही पहनना चाहती है
सरला – ठीक है, वो पहना चाहती हैं तो मैं उसे टेलर का एड्रेस दे देती हूं । वैसे बहुत सेक्सी लगेंगी दीदी इस टाइप के ब्लाउज में ।
रमेश – वो तो है
सरला – वैसे मै कैसी लगती हूं आपको , मेरा मतलब आज जो मैने पहना है ।
रमेश की नजर सरला की कमर पे जाती है।
सरला – क्या सोचने लगे
रमेश - आप तो बहुत सुंदर लग रही हो । ब्रिज बाबू बहुत खुशकिस्मत हैं ।
सरला –खुशकिस्मत आप भी हो सकते हैं
रमेश – जी मै ?
सरला – मेरा मतलब खुशकिस्मत तो आप भी हैं जो मेरे जैसी सुंदर भाभी मिली है आपको । क्यों ( सरला रमेश को आंख मारती है )
रमेश – हां जी , वो तो है, आपको तो बार देखने का मन करता है, इतनी सुंदर हो आप
सरला – क्यों पहले नहीं थी क्या ,, हा हा
रमेश - नहीं नहीं पहले भी थी
सरला – तो आ जाया करिए न, अपनी भाभी को देखने के लिए, मैने कहां मन किया है
रमेश सरला का सिग्नल समझ गया और रोज रोज वहां आने लगा ।
सरला समझ गई कि रमेश जी अब गए काम से । उसने तय कर लिया कि अब हथौड़े की चोट कर ही देती हूं ।
एक दोपहर जब बृजमोहन बाजार गया हुआ था, सरला नेे रमेश जी को चाय के बहाने बुला लिया। रमेश जी विधुर थे, उम्र पचास के आसपास, लेकिन शरीर अभी भी तगड़ा था। सरला ने हल्की सी साड़ी पहनी थी — ब्लाउज काफी ढीला और गहरा कटा हुआ, जिससे उसकी भारी छाती का आधा हिस्सा साफ झलक रहा था।
रमेश जी जब आँगन में बैठे, सरला झुककर चाय रख रही थी। उसके स्तन लगभग बाहर आने को थे। रमेश जी की नजरें वहीं अटक गईं।
सरला मुस्कुराई और धीरे से बोली, “क्या देख रहे हो रमेश जी? पहले कभी नहीं देखा क्या?”
रमेश जी का गला सूख गया। “सरला जी... आप... बहुत बदल गई हो।”
सरला ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और सरकाया, अपनी गोरी, मोटी छाती को और नजदीक लाते हुए कहा, “बदलाव तो अच्छा लगता है न? मेरी ये भारी चुचियाँ... अब बहुत दिनों से छूई नहीं गईं। छूना चाहोगे?”
रमेश हैरान रह गया । सरला ने इतनी बोल्डली कह दिया । लेकिन रमेश खुद वासना में अंधा हो गया था ।
रमेश जी का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। सरला ने खुद उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। “ आह, अरे रमेश जी कब तक रोज रोज इन्हें देखने यहां आते रहोगे । अब कर लो जो करना है । मै भी तैयार हूं , कब से सिग्नल दे रही हूं, आप भी न ।
रमेश सरला का एक बूब दबा देता है ।
सरला - आह, अब आए न औकात पे, जोर से दबाओ... जैसे कोई रंडी की चूचियाँ दबाता है।
रमेश सरला के मुंह से जब इस तरह की सड़क छाप लैंग्वेज सुनता है तो उसके अंदर का शरीफ आदमी भी भेड़िया बन जाता है, और वो सरला को खींच कर अपनी बाहों में बिठा कर दोनों हाथों से उसके चूचे दबाने लगता है ।
सरला –आह्ह्... हाँ... इसी तरह।
रमेश –भाभी जी, आप तो सच में रण्डी बन गई हो । ये साड़ी उतारो ।
रमेश सरला का पल्लू खींच के हटा देता है ।
सरला सोफे से उठ जाती है ।
सरला – यहां नहीं रमेश जी, अंदर चलो, ये काम बंद कमरों में होते हैं
कुछ ही देर में सरला रमेश जी को हाथ पकड़ के अपने कमरे में ले गई। सिंगारदान के सामने खड़े होकर उसने अपनी साड़ी पूरी उतार दी। नंगी देह आईने में चमक रही थी — भारी स्तन, चौड़ी कमर, मोटी गांड और अब गीली हो चुकी चूत।
सरला ने रमेश जी की पैंट उतारी, उनके मोटे, सख्त लंड को हाथ में लेकर कहा, “कितना मोटा है... आज मेरी भूखी फुद्दी को ठंडक दो। चोदो मुझे जोर से।”
रमेश जी ने सरला को दीवार से सटाकर पीछे से चोदा। सरला की चीखें निकल रही थीं — “हाँ... और तेज... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी की तरह चोदो... आह्ह्ह्... गहरा...!”
रमेश – ब्रिज बाबू तो नहीं आयेंगे
सरला – चिंता मत कीजिए, उन्हें मैने जिस काम से भेजा है वो 4 घंटे से पहले नहीं आयेंगे।
रमेश सरला की चूत को चोद रहा था ।
रमेश – और बेटियां
सरला - आह, वो भी घर से बाहर हैं । देर में आएंगी
इस तरह सरला के रमेश से संबंध स्थापित हो जाते हैं । ब्रिज को भी कुछ दिनों बाद सरला पे शक हो जाता है वो सरला को अपना शरीर रमेश को दिखाते हुए देख लेता है।
सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी।
सिंगारदान ने उसके अंदर दबी हुई औरत को जगा दिया था। अब वह घर की चार दीवारों में कैद नहीं रहना चाहती थी। उसकी देह को अब अपनी भूख का अहसास हो चुका था — गर्म, भारी और बेचैन।
अब घर में भी वो बिना मेकअप के नहीं रहती । उसके ब्लाउज़ेस का साइज भी दिनों दिन छोटा होता जा रहा था । टाइट ब्लाउज पहनने के कारण उससे अंगों का उभार और भी साफ और अच्छे से दिखता । घर में आने वाले आगंतुक जो अब तक उसे भाभी या संभ्रांत महिला के रूप में देखते थे उनके मन में भी सरला के प्रति कामुक विचार आने लगे थे । उनकी भी धारणा सरला के प्रति बदलने लगी थी । लेकिन उनमें से कुछ ने मर्उयादा बनाए रखी । कुछ पे उसने डोरे डाले लेकिन सफल नहीं हुई । उन लोगों ने अपनी इज्ज़त का खयाल करते हुए वहां जाना छोड़ दिया। कुछ ने सरला से डबल मिनिंग बातें की तो सरला ने उन्हें नेगेटिव रेस्पॉन्स दिया क्योंकि उन्हें वो पसंद नहीं करती थी । लेकिन कुछ को वो भाव देने लायक भी समझती थी । उन्हीं में से एक रमेश जी भी थे जो बृजमोहन के अच्छे दोस्त और शुभचिंतक थे । वो अक्सर बृजमोहन के यहां आते रहते थे ।
ऐसे ही एक दिन वो बैठक में बैठे बात कर रहे थे। अंदर किचन में सरला चाय बना रही थी । रमेश रसोई में खड़ी सरला को देख रहा था । असल में सरला ने बैकलेस ब्लाउज पहना था। जिसमें उसकी गोरी नंगी पीठ उसे आकर्षित कर रही थी। और वो बात करते करते उसे देख रहा था । अचानक सरला घूमती है तो रमेश को अपनी पीठ की ओर घूरता हुआ पाती है । वो चौंकती है, क्योंकि रमेश बहुत सज्जन और शरीफ आदमी थे । सोसाइटी में बहुत इज्ज़त थी उनकी । वो दुबारा उसे देखती है तो रमेश की नजरे अपने बदन पर पाती है ।
" आह , ये भी " सरला एक लंबी सांस छोड़ती है।
चाय लाने के लिए जब वो बाहर आती है तो रमेश को घूरती है । सामने बैठी सरला रमेश को घूरे जा रही थी ।
ब्रिज अपनी बातों में लगा था । रमेश कभी ब्रिज की ओर देखता तो कभी सरला की ओर ।
तभी सरला की आंखों में एक अजीब सा नशा चा जाता है। वो गर्दन को हाथ से सहलाने लगी और रमेश को lusti नजरों से देखने लगी । रमेश उसकी नजरों को समझ जाता है लेकिन थोड़ा डरता है , क्योंकि ब्रिज वहीं पे था । लेकिन सरला बड़ी चालकी से ब्रिज के सामने ही रमेश पर नयन बाण चला रही थी ।
अगले दिन वो ब्रिज की अनुपस्थिति में वहां आया । सरला चाय बना के वहां आई ।
रमेश - भाभी जी आपसे एक बात कहें
सरला – कहिए न, रमेश जी, क्या कहना है
रमेश – वो ये आप ब्लाउज कहां सिलवाती हैं
सरला – क्यों, बहुत छोटा है क्या
रमेश - नहीं नहीं वह सावित्री पूछ रही थी
सरला – ओह अच्छा, लेकिन वो तो पहनती नहीं इतना छोटा ।
रमेश– अरे छोटा कहां है आपने भी तो पहना है अब उसी ने मुझे कहा तो इसलिए पूछ रहा हूं
सरला शरारत भरी आवाज में रहती है।
रमेश जी सच-सच बताओ वह पहनना चाहती है या आप उसे पहनना चाहते हो, क्यों
रमेश – अरे नहीं नहीं वो ही पहनना चाहती है
सरला – ठीक है, वो पहना चाहती हैं तो मैं उसे टेलर का एड्रेस दे देती हूं । वैसे बहुत सेक्सी लगेंगी दीदी इस टाइप के ब्लाउज में ।
रमेश – वो तो है
सरला – वैसे मै कैसी लगती हूं आपको , मेरा मतलब आज जो मैने पहना है ।
रमेश की नजर सरला की कमर पे जाती है।
सरला – क्या सोचने लगे
रमेश - आप तो बहुत सुंदर लग रही हो । ब्रिज बाबू बहुत खुशकिस्मत हैं ।
सरला –खुशकिस्मत आप भी हो सकते हैं
रमेश – जी मै ?
सरला – मेरा मतलब खुशकिस्मत तो आप भी हैं जो मेरे जैसी सुंदर भाभी मिली है आपको । क्यों ( सरला रमेश को आंख मारती है )
रमेश – हां जी , वो तो है, आपको तो बार देखने का मन करता है, इतनी सुंदर हो आप
सरला – क्यों पहले नहीं थी क्या ,, हा हा
रमेश - नहीं नहीं पहले भी थी
सरला – तो आ जाया करिए न, अपनी भाभी को देखने के लिए, मैने कहां मन किया है
रमेश सरला का सिग्नल समझ गया और रोज रोज वहां आने लगा ।
सरला समझ गई कि रमेश जी अब गए काम से । उसने तय कर लिया कि अब हथौड़े की चोट कर ही देती हूं ।
एक दोपहर जब बृजमोहन बाजार गया हुआ था, सरला नेे रमेश जी को चाय के बहाने बुला लिया। रमेश जी विधुर थे, उम्र पचास के आसपास, लेकिन शरीर अभी भी तगड़ा था। सरला ने हल्की सी साड़ी पहनी थी — ब्लाउज काफी ढीला और गहरा कटा हुआ, जिससे उसकी भारी छाती का आधा हिस्सा साफ झलक रहा था।
रमेश जी जब आँगन में बैठे, सरला झुककर चाय रख रही थी। उसके स्तन लगभग बाहर आने को थे। रमेश जी की नजरें वहीं अटक गईं।
सरला मुस्कुराई और धीरे से बोली, “क्या देख रहे हो रमेश जी? पहले कभी नहीं देखा क्या?”
रमेश जी का गला सूख गया। “सरला जी... आप... बहुत बदल गई हो।”
सरला ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और सरकाया, अपनी गोरी, मोटी छाती को और नजदीक लाते हुए कहा, “बदलाव तो अच्छा लगता है न? मेरी ये भारी चुचियाँ... अब बहुत दिनों से छूई नहीं गईं। छूना चाहोगे?”
रमेश हैरान रह गया । सरला ने इतनी बोल्डली कह दिया । लेकिन रमेश खुद वासना में अंधा हो गया था ।
रमेश जी का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। सरला ने खुद उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। “ आह, अरे रमेश जी कब तक रोज रोज इन्हें देखने यहां आते रहोगे । अब कर लो जो करना है । मै भी तैयार हूं , कब से सिग्नल दे रही हूं, आप भी न ।
रमेश सरला का एक बूब दबा देता है ।
सरला - आह, अब आए न औकात पे, जोर से दबाओ... जैसे कोई रंडी की चूचियाँ दबाता है।
रमेश सरला के मुंह से जब इस तरह की सड़क छाप लैंग्वेज सुनता है तो उसके अंदर का शरीफ आदमी भी भेड़िया बन जाता है, और वो सरला को खींच कर अपनी बाहों में बिठा कर दोनों हाथों से उसके चूचे दबाने लगता है ।
सरला –आह्ह्... हाँ... इसी तरह।
रमेश –भाभी जी, आप तो सच में रण्डी बन गई हो । ये साड़ी उतारो ।
रमेश सरला का पल्लू खींच के हटा देता है ।
सरला सोफे से उठ जाती है ।
सरला – यहां नहीं रमेश जी, अंदर चलो, ये काम बंद कमरों में होते हैं
कुछ ही देर में सरला रमेश जी को हाथ पकड़ के अपने कमरे में ले गई। सिंगारदान के सामने खड़े होकर उसने अपनी साड़ी पूरी उतार दी। नंगी देह आईने में चमक रही थी — भारी स्तन, चौड़ी कमर, मोटी गांड और अब गीली हो चुकी चूत।
सरला ने रमेश जी की पैंट उतारी, उनके मोटे, सख्त लंड को हाथ में लेकर कहा, “कितना मोटा है... आज मेरी भूखी फुद्दी को ठंडक दो। चोदो मुझे जोर से।”
रमेश जी ने सरला को दीवार से सटाकर पीछे से चोदा। सरला की चीखें निकल रही थीं — “हाँ... और तेज... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी की तरह चोदो... आह्ह्ह्... गहरा...!”
रमेश – ब्रिज बाबू तो नहीं आयेंगे
सरला – चिंता मत कीजिए, उन्हें मैने जिस काम से भेजा है वो 4 घंटे से पहले नहीं आयेंगे।
रमेश सरला की चूत को चोद रहा था ।
रमेश – और बेटियां
सरला - आह, वो भी घर से बाहर हैं । देर में आएंगी
इस तरह सरला के रमेश से संबंध स्थापित हो जाते हैं । ब्रिज को भी कुछ दिनों बाद सरला पे शक हो जाता है वो सरला को अपना शरीर रमेश को दिखाते हुए देख लेता है।


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